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औद्योगिक संगठनो में समाज कार्य : अतिलघु उत्तरीय प्रष्न (Very Short Answer Type Questions)


UNIT - 1
  1. आधुनिक श्रम विधानों के नाम लिखिए:

    • कारखाना अधिनियम, 1948 (Factories Act, 1948)
    • औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947)
    • न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948)
    • मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961)
    • कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 (Employees' Provident Fund and Miscellaneous Provisions Act, 1952)
  2. श्रम विधान के इतिहास में इनकी आवश्यकता क्यों हुई:

    • श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए।
    • काम के घंटे, वेतन, और अन्य कार्य शर्तों को विनियमित करने के लिए।
    • श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और उनके शोषण को रोकने के लिए।
    • उद्योगों में काम की बेहतर स्थिति सुनिश्चित करने के लिए।
    • औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए।
  3. सामाजिक सुरक्षा की पद्धतियां कौन-कौन सी हैं:

    • पुरानी पेंशन योजनाएं (Old Age Pension Schemes)
    • बेरोजगारी बीमा (Unemployment Insurance)
    • स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance)
    • दुर्घटना बीमा (Accident Insurance)
    • मातृत्व लाभ (Maternity Benefits)
  4. सामाजिक सुरक्षा का अर्थ बताइए:

    • सामाजिक सुरक्षा एक ऐसी प्रणाली है जिसके तहत सरकार या अन्य संस्थान नागरिकों को आर्थिक सुरक्षा और सहायता प्रदान करते हैं, विशेष रूप से तब जब वे बीमार, बेरोजगार, वृद्धावस्था में, या किसी अन्य कारण से काम करने में असमर्थ होते हैं। इसका उद्देश्य नागरिकों को जीवन की बुनियादी जरूरतें और सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित करना है।


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UNIT - 2

  1. औद्योगिक विकास को परिभाषित करें:

    • औद्योगिक विकास का अर्थ है उद्योगों की स्थापना और विस्तार, उत्पादन की क्षमता में वृद्धि, और तकनीकी उन्नति के माध्यम से आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
  2. श्रम कल्याण को परिभाषित करें:

    • श्रम कल्याण उन सेवाओं, सुविधाओं और लाभों का समुच्चय है जो श्रमिकों के कार्य और जीवन की स्थिति को सुधारने के लिए प्रदान किए जाते हैं, जैसे कि स्वास्थ्य सेवाएं, आवास, शिक्षा, और मनोरंजन।
  3. औद्योगिक विकास के कोई पांच सिद्धांत लिखिए:

    • प्रौद्योगिकी और नवाचार: नवीन तकनीकों और प्रौद्योगिकी का उपयोग कर उत्पादन प्रक्रिया में सुधार।
    • संवहनीयता: उद्योगों का विकास इस प्रकार करना कि पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
    • श्रम कौशल विकास: श्रमिकों के प्रशिक्षण और कौशल में सुधार लाना।
    • अवसंरचना विकास: उद्योगों के लिए आवश्यक भौतिक और सामाजिक अवसंरचना का निर्माण।
    • नीति और विनियमन: उद्योगों के विकास के लिए उचित नीतियों और नियमों का निर्माण और कार्यान्वयन।
  4. औद्योगिक विकास की आवश्यकता क्यों होती है:

    • औद्योगिक विकास रोजगार के अवसर पैदा करता है।
    • यह आर्थिक विकास और राष्ट्रीय आय में वृद्धि करता है।
    • सामाजिक और भौतिक अवसंरचना का विकास करता है।
    • जीवन स्तर में सुधार लाता है।
    • नवाचार और तकनीकी उन्नति को प्रोत्साहित करता है।
  5. हड़ताल को परिभाषित कीजिए:

    • हड़ताल एक सामूहिक कार्य है जिसमें श्रमिक अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए काम बंद कर देते हैं और प्रदर्शन करते हैं, जिससे नियोक्ता पर दबाव बनाया जाता है।



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UNIT -3 
  1. किस अधिनियम में श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान है:

    • श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान कारखाना अधिनियम, 1948 में है।
  2. श्रमिकों को किस क्षेत्र में परामर्श दिया जा सकता है:

    • श्रमिकों को निम्नलिखित क्षेत्रों में परामर्श दिया जा सकता है:
      • कार्यस्थल की सुरक्षा और स्वास्थ्य
      • कानूनी अधिकार और श्रम कानून
      • आर्थिक प्रबंधन और वित्तीय योजना
      • करियर विकास और प्रशिक्षण
      • सामाजिक और व्यक्तिगत मुद्दे
  3. श्रम कल्याण अधिकारी के कार्य:

    • श्रमिकों के कल्याण और हितों की रक्षा करना।
    • श्रमिकों को उनकी समस्याओं के समाधान में सहायता प्रदान करना।
    • स्वास्थ्य, सुरक्षा, और स्वच्छता की स्थितियों में सुधार के लिए कदम उठाना।
    • श्रमिकों को शिक्षा और प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करना।
    • श्रमिकों के लिए सांस्कृतिक और मनोरंजनात्मक कार्यक्रमों का आयोजन करना।
  4. कारखाना अधिनियम किस सन में लागू हुआ:

    • कारखाना अधिनियम, 1948 में लागू हुआ।




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UNIT - 4

1.    श्रम संघ को परिभाषित कीजिए।

श्रम संघ, जिसे ट्रेड यूनियन भी कहा जाता है, एक संगठन होता है जो श्रमिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा और संवर्धन के लिए कार्य करता है। श्रम संघ का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्यों के वेतन, काम की स्थिति, और अन्य रोजगार संबंधी मुद्दों में सुधार करना होता है। ये संगठन श्रमिकों को सामूहिक रूप से अपने नियोक्ताओं के साथ बातचीत करने का एक मंच प्रदान करते हैं, जिससे श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ती है।

श्रम संघ के कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

  1. सामूहिक सौदेबाजी: वेतन, काम के घंटे, लाभ, और अन्य काम की स्थितियों के बारे में नियोक्ताओं के साथ बातचीत करना।
  2. वकालत: श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए सरकार और अन्य संस्थानों के साथ बातचीत करना।
  3. विधिक समर्थन: श्रमिकों को कानूनी मुद्दों में सहायता प्रदान करना।
  4. शिक्षा और प्रशिक्षण: श्रमिकों के लिए विभिन्न शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
  5. कल्याणकारी कार्य: सदस्यों और उनके परिवारों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाना।

श्रम संघ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे श्रमिकों को उनके अधिकारों और हितों के लिए सामूहिक रूप से खड़ा होने का अवसर प्रदान करते हैं।


2.    श्रम संघ कैसे कार्य करते हैं?

श्रम संघों के कार्यों को समय-समय पर विभिन्न विचारधाराओं ने प्रभावित किया है। आधुनिक श्रम काफी विकसित है तथा उसका कार्य-क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। श्रम संघों का मूल उद्देश्य अपने सदस्यों के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना तथा उनको कार्य के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके अतिरिक्त श्रम शिक्षा, शोध, कल्याणकारी कार्य बीमा योजनाएँ, मनोरंजन सुविधाएँ, आदि संघो के कार्यों में सम्मिलित किये जाते हैं।




3.    श्रम संघ के प्रकार लिखिए।

संघों के प्रकार
क्लार्क कैरने छः प्रकार के श्रम संघ बताये है। यह वर्गीकरण आर्थिक उद्देश्यों तथा विधियोंपर आधारित है।


(1)    शुद्ध एवं तरल संघ- इनमें सामूहिक सौदेबाजी को महत्व दिया जाता है। इसमें इस बात पर बल दिया जाता है कि मौद्रिक लाभ में वृद्धि होनी चाहिए किन्तु इसमें विभिन्न सिद्धान्तों एवं सूत्रों का कोई उपयोग नहीं किया जाता है।


(2)    विकसित संघ-ये वास्तविक मजदूरी में वृद्धि की माँग करते है तथा अधिक उत्पादन में से श्रमिकों के लिए लाभांश चाहते हैं।


(3)    प्रबन्धकीय संघ- यह संघ लाभागिता पर बल देते हैं। श्रम संघ प्रबन्ध एवं संघ व्यवस्था, मूल्य निर्धारण तथा नयी औद्योगिक इकाइयों के प्रवेश पर नियन्त्रण करनेके प्रयास करते हैं।


(4)     नये संघ-इनमे पूर्ण नियोजन की दशाएँ प्राप्त करने के लिए सरकारीएवं राजनीतिक प्रयास किये जाते हैं तथा विकासमान अर्थव्यवस्था में विकास के साथ सुधरी हुई अधिक दशाओं के लिए ऊँची मजदूरी की माँग की जाती है।


(5)     श्रम गुट संघ- इसके अन्तर्गत राज्य पर प्रभाव डालकर सरकार के माध्यम से कार्य करवाया जाता है। किन्तु सामूहिक सुविधाओं का सहारा नहीं लिया जाता। प्रगतिशीलकरों तथा विभिन्न योगदानों द्वारा वितरण व्यवस्था में सुधार किया जाता है।


(6)     प्रत्यक्ष नियन्त्रण संघ- ये संघ सरकार से अल्पकाल के लिए नियन्त्रण अपेक्षित करते हैं इस स्तर पर वर्ग हितों के लिए संसदीय स्तर पर मजदूरी, मूल्यों, दरों, राजकीय लाभों आदि समस्याओं पर विचार किया जाता है एवं उनका निराकरण किया जाता है।




4.    अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना कब हुई?

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization - ILO) की स्थापना 1919 में हुई थी। इसका उद्देश्य श्रमिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा देना और श्रम मानकों को स्थापित करना है। ILO की स्थापना वर्साय की संधि (Treaty of Versailles) के एक भाग के रूप में की गई थी, जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद की गई थी। यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष एजेंसी है और श्रम संबंधी अंतर्राष्ट्रीय नीतियों और कार्यक्रमों को निर्धारित करती है।


5.    श्रम संघों के उद्देश्य लिखिए।

ब्रिटिश ट्रेड यूनियन काँग्रेस नेश्रम संघों के उद्देश्य सम्बन्धी विचारों को तीन भागों में बाँटा है:
(1)     मजदूरी संघ एवं उसमें सुधार कार्य,कार्य के घण्टों एवं कार्य की दशाओं का संधारण एवं वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि के प्रयास तथा बढ़ी हुई राष्ट्रीय आय के फलस्वरूप श्रमिकों को अपना बढ़ा हुआ भाग दिलाने का प्रयास करना।
(2)     श्रमिकों के लिए उपलब्ध अवसरों को प्राप्त करना। श्रम संघों का उद्देश्य ‘पूर्ण रोजगार‘ की दशाएँ स्थापित करना है।
(3)     प्रत्येक श्रम संघ श्रमिकों में अपना प्रभाव व्यापक करने के प्रयास करता है। इनके लिए वे श्रमिकों को प्रबन्ध में सहभागिता दिलाने का प्रयास करते है।
फ्लेंडस एवं क्लेग के अनुसार श्रम संघों के उद्देश्य इस प्रकार हैं:
(1)    कार्य की दशाएँ सुधारना तथा मजदूरी सम्बन्धी समस्याओं के प्रति श्रमिक का पक्ष दृढ़ करना।
(2)    श्रमिकों को अपने रहन-स्तर का स्तर सुधारने के अवसर प्रदान करना।
(3)    उन्हें राष्ट्रीय आर्थिक जीवन को नियन्त्रित करने में सहयोग देना।


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UNIT - 5


1. श्रम विधान क्या होता है? परिभाषित करें।

श्रम विधान वे कानून और नियम होते हैं जो श्रमिकों और नियोक्ताओं के अधिकारों, कर्तव्यों, और संबंधों को नियंत्रित करते हैं। इन विधानों का उद्देश्य श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, कार्य स्थितियों में सुधार, वेतन, और अन्य लाभ सुनिश्चित करना होता है। श्रम विधान औद्योगिक शांति बनाए रखने, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने, और कार्यस्थल पर उचित व्यवहार की स्थापना के लिए बनाए जाते हैं।

2. औद्योगिक विवाद को परिभाषित करें।

औद्योगिक विवाद वह विवाद या असहमति होती है जो नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच काम की शर्तों, रोजगार, या काम करने की परिस्थितियों से संबंधित होती है। यह विवाद मजदूरी, कार्य घंटे, काम के नियम, श्रमिकों की सेवा शर्तें, या अनुशासनात्मक कार्रवाई के बारे में हो सकता है। औद्योगिक विवाद का समाधान औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत किया जाता है।

3. बोनस को परिभाषित करें।

बोनस एक अतिरिक्त वित्तीय लाभ होता है जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों को उनके काम के प्रदर्शन, कंपनी के लाभ, या अन्य निर्धारित मानदंडों के आधार पर दिया जाता है। बोनस का उद्देश्य कर्मचारियों को प्रोत्साहित करना और उनकी मेहनत को पुरस्कृत करना होता है। भारत में, बोनस के प्रावधान बोनस अधिनियम, 1965 के तहत विनियमित होते हैं।

OR

5.     पारिवारिक पेन्शन योजना - औद्योगिक कर्मचारियों की अकाल मृत्यु की अवस्था में उनके परिवारों को दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से मार्च सन 1971 से कोयला खान परिवार पेन्शन योजना 1971 तथा ‘कर्मचारी परिवार पेन्शन योजना 1971‘‘ प्रारम्भ की गई। ये योजनाएं उन कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो कोयला खान भविष्य निधि परिवार पेंशन और बोनस योजनाएं अधिनियम सन् 1948 तथा कर्मचारी भविष्य निधि और परिवार पेंशन अधिनियम सन् 1952 के अन्तर्गत आते हैं। किसी सदस्य की मृत्यु होने पर विधवा, विधुर, नाबालिग पुत्र या अविवाहित पुत्री को भी मासिक पेंशन  देते हैं।



4. ग्रेच्युटी परिभाषित करें।

ग्रेच्युटी एक वित्तीय लाभ है जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों को सेवा की एक निश्चित अवधि पूरा करने के बाद दिया जाता है। यह लाभ कर्मचारी के दीर्घकालिक सेवा और कंपनी के प्रति उसकी निष्ठा का सम्मान करने के लिए दिया जाता है। भारत में, ग्रेच्युटी का भुगतान भुगतान ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972 के तहत होता है। आमतौर पर, पाँच वर्ष या उससे अधिक सेवा पूरा करने वाले कर्मचारी इसके पात्र होते हैं।

OR

7.     ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम -सम्पूर्ण देश में ग्रेच्युटी नियम में समानता लाने के उद्देश्य से 1971 में सरकार ने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम अनुसार निश्चित मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को चाहे वे किसी कारखाने, खाने बागान, तेल क्षेत्र बन्दरगाह तथा तेल कम्पनी में काम करते हों, सेवा निवृत्ति, त्यागपत्र, मृत्यु आदि पर ग्रेेच्युटी दी जाती है। इस सम्बन्ध में शर्त केवल यह है कि यह लाभ केवल 10 अथवा अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों में संलग्न कर्मचारियों को ही मिलेगा। इस अधिनियम के अन्तर्गत कर्मचारियों को सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए 15 दिन का वेतन (अधिक से अधिक 20 माह का वेतन)ग्रेच्युटी के रूप में दिया जाता है।


5. क्षतिपूर्ति का अर्थ बताइए।

क्षतिपूर्ति का अर्थ है किसी व्यक्ति को किसी हानि, चोट, या क्षति के लिए मुआवजा या प्रतिपूर्ति प्रदान करना। यह आमतौर पर कानूनी दायित्व के तहत दिया जाता है, ताकि पीड़ित व्यक्ति को उसकी हानि का आर्थिक बदला मिल सके। कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत, काम के दौरान दुर्घटना या चोट लगने पर श्रमिकों को नियोक्ता द्वारा मुआवजा दिया जाता है।

OR

क्षतिपूर्ति- किसी आर्थिक क्षति का हर्जाना देना। उदाहरण के लिये कोई श्रमिक दुर्घटना में अपंग होकर अपनी आंख, हाथ, पैर खो बैठता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तब उसका परिवार आर्थिक संकट में पड़ता है। ऐसे समय सहायता से उसकी क्षतिपूर्ति होती है।





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