इकाई प्रथम:
विभिन्न समुदायों के साथ समाज कार्य
1. नगरीय करण के फलस्वरूप तंग बस्तियों के कारण एवं प्रभाव संक्षिप्त में बताइये।
तंग बस्तियाँ नगरीयकरण के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली समस्याओं के चलते होती हैं। यहां कुछ मुख्य कारण और प्रभावों को संक्षेप में देखा जा सकता है:
कारण:
1. जनसंख्या दबाव: नगरीयकरण के कारण शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या का विस्तार होता है, जिसके परिणामस्वरूप संकीर्ण इलाकों में ज्यादातर लोग बस्तियों में निवास करने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
2. अवसाद इलाकों में घुसपैठ: तंग बस्तियों में अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर लोग रहते हैं और इसके कारण अवसाद, आर्थिक संकट और अपराध की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे इलाकों में अधिकांश बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहते हैं।
3. सामाजिक और आर्थिक असामानता: तंग बस्तियों में सामाजिक और आर्थिक असामानता बढ़ती है। यहां लोग न्यूनतम सुविधाओं के बिना रहते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति पक्षपाती नीतियों के कारण मजबूत नहीं होती है।
प्रभाव:
1. सामाजिक संकट: तंग बस्तियों में जीवन की कठिनाइयों से जूझना पड़ता है, जैसे कि घुसपैठ, अपराध, विपरीत सामाजिक व्यवहार और सामाजिक स्थिति के कारण निराशा।
2. आर्थिक अस्थिरता: तंग बस्तियों में आर्थिक सुरक्षा की कमी होती है, जो लोगों को रोजगार और आय कमाने की सुविधा से वंचित रखती है। ऐसे इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और आवास की कमी होती है।
3. स्वास्थ्य समस्याएं: तंग बस्तियों में स्वच्छता, साफ़ पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी होती है, जिससे बीमारियों का प्रसार बढ़ता है। यहां तनाव, दुष्प्रभावी आहार और बाधाएं स्वास्थ्य पर असर डालती हैं।
4. शिक्षा के अभाव: तंग बस्तियों में शिक्षा की सुविधा कम होती है और बच्चों को स्कूल जाने में असुविधा होती है। इसके कारण उनका शिक्षाधिकार प्रभावित होता है और इन इलाकों में शिक्षा स्तर कम होता है।
ये सभी कारण और प्रभाव तंग बस्तियों के विकास में बाधाओं के रूप में काम करते हैं और इसके परिणामस्वरूप वहां रहने वाले लोगों की जीवन गुणवत्ता प्रभावित होती है।
OR
शिक्षा और जागरूकता का अभाव- शिक्षा और जागरूकता के अभाव में गंदी बस्तियों के विकास में वृद्धि हुई है। वे व्यक्ति जो निर्धनता के शिकार हैं, वे गंदी बस्तियों की गंदगी से भी अनभिज्ञ हैं। जहां सुविधाएं नाम को भी नहीं है और बीमारियों और सामाजिक बुराइयां असीमित हैं फिर भी यहां इसलिए आतें हैं क्योंकि उन्हें नाम मात्र का किराया देना पड़ता है। अशिक्षा के चलते भोजन के पौष्टिक तत्वों के संरक्षण की विधि से लोग वाकिफ नहीं हैं। भोजन को तल कर खाने में उन्हें, इस बात का अंदाजा नहीं लगता है कि वे अपने ही हाथों से, जो कुछ उन्हें मिल सकता था, उसे भी नहीं ले रहें हैं। भोजन में पकाया पानी या माड़ आदि निकालकर, न जाने कितने पोषक तत्व वे स्वयं नष्ट कर देते हैं। शिक्षा और जागरूकता के अभाव में वे अपने ही हाथों से अपनी ही क्या, अपनी अगली पीढ़ी की भी हानि कर रहें हैं।
गतिशीलता में वृद्धि- पहले व्यक्ति को अपनी जमीन और घर की ड्योढ़ी से अत्यधिक लगाव था।वह किसी भी दशा में अपना गांव, कस्बा छोड़ना नहीं चाहता था, किन्तु औद्योगिक क्रांति और आवागमन की सुविधाओं ने व्यक्ति को नगरों में काम खोजने और नौकरी करने के लिए उत्प्रेरित किया। नित्य लाखों की संख्या में व्यक्ति एक गांव से एक नगर, एक नगर से दुसरे नगर और नगर से महानगर में काम की तलाश में जाता है। इतने व्यक्तियों के रहने के स्थान कोई भी नगर, लायक कैसे बना सकता है। अस्तु वे गंदी बस्तियों के शरण में जाते हैं। इस तरह गंदी बस्तियों का विकास निरन्तर होते जा रहा है।
शोषण की प्रवृति- उत्पादन का महत्वपूर्ण अंग श्रमिक, मलिन बस्तियों में रहता है और मालिक वातानुकूलित बंगलों में। पूंजीवादी व्यवस्था की यह बुनियादी नीति है कि आप आदमी की रोजी-रोटी की परेशानियों में फसायें रखें। भूखा व्यक्ति अपने परिवार के पेट भरने की चिंता पहले करता है और कुछ बाद में। उसे जीने की इतनी सुविधाएं नहीं देते जिससे की वह दहाड़ने लगे और बाजू समेटकर अपने अधिकारों की मांग करने लगे। इसलिए उसे अभाव में जीने दो जिससे कि वह सदैव मालिकों का दास बनकर रहें। उसकी स्थायी नियत शोषण करना है, श्रमिकों को सुविधायें पहुंचना नहीं। अंततः निर्धन शोषित श्रमिक रहने के लिए मलिन बस्तियों की शरण में ही जाता है।
सुरक्षा का स्थल है- गाँव छोड़कर ग्रामीण इसलिए भी नगर आ रहा है क्योंकि वहां सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं है। चोरी और डकैती सामान्य बात है। डकैतों का बढ़ता हुआ आतंक ग्रामीणों को गाँव छोड़ने के लिए मजबूर करता है। नगर में प्रशासक, पुलिस की व्यवस्था है जो उनके जान-माल की रक्षा करती है। इसलिए नगर की जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और इसी के साथ गंदी बस्तियों में भी वृद्धि हो रही है।
ग्रामीण बेरोजगारी- भारतीय निर्धन गांव जहाँ वर्ष में कुछ ही महीने व्यक्ति को काम मिलता है और शेष माह वह बेरोजगारी के अभिशाप को भोगता है। ग्रामीण क्षेत्र में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है कि व्यक्ति को खाली समय में काम मिल सके। इसलिए खेती के समय जो ग्रामीण व्यक्ति गाँव में उपलब्ध रहता है उसके पश्चात वह नगरों में काम करने आ जाता है। इनमें से अधिकांश व्यक्ति रिक्शाचालक, ठेले खींचने वाले, खोमचा लगाने वाले या मिल में श्रमिक होते हैं अथवा कोई छोटा-मोटा कार्य करके अपनी जीविका अर्जित करते हैं। उनमें से अधिकांश व्यक्ति गंदी बस्तियों में रहते हैं। यह उनकी विवशता भी है ।
नगर नियोजन का अभाव- नगर में गंदी बस्तियों का यदि विकास हो रहा है तो इसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व नगरपालिका और सरकार पर है। यदि नगर का विकास सुनियोजित और योजनाबद्ध ढंग से किया जाए तो गंदी बस्तियों का विकास शायद इस रूप में संभव न हो पाता और ये नगर मानवता के कलंक नहीं बनते।
नगरीयता की अवधारणा- नगरीय समाज की दूसरी प्राथमिक अवधारणा के सम्बन्ध में भी नगरीय समाजशास्त्रीयों के मध्य विभिन्न विचार प्रचलित हैं। क्वीन और कारपेंटर ने नगरीयता को नगर निवास की एक प्रघटना बताया है। इन्होने लिखा है, “हम नगरीयता का प्रयोग नगर निवास की प्रघटना को पहचानने के लिए करते हैं।“ इस प्रकार नगरीयता एक स्थायी घटना है अथवा नगरीयता परिस्थितियों का एक स्थायी रूप है। विर्थ ने नगरीयता को बिल्कुल भिन्न अर्थों में परिभाषित किया है। उसने लिखा है, नगरीयता की परिभाषा करते हुए स्पष्टतया लिखा है, “नगरीयता लक्षणों का वह पुंज है जो नगरों में एक विशिष्ट प्रकार का जीवन उत्पन्न करता है।“ इस प्रकार नगरीयता की परिभाषा के सम्बन्ध में ‘‘विर्थ’’ के विचार प्रमुख स्थान रखते हैं। उनके अनुसार नगरीयता जीवन का एक ढंग है। इस विचार का समर्थन बर्गल व एंडरसन ने भी किया है । इस विचार पर हम यहां तनिक विस्तार में विचार करेंगे ।
नगरीयता:- जीवन की एक प्रणाली दृ ‘‘विर्थ’’ ने नगर में पायी जाने वाली नगरीयता को जीवन का एक ढंग कहा है। उन्होंने इसकी विशेषताओं का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार नगरीयता के निम्नलिखित लक्षण तथा विशेषताएं हैं:
ऽ विषमता ऽ दूसरों पर निर्भरता की ऊँची दर
ऊपरी दिखावे के अनेकानेक सामाजिक सम्बन्ध एवं व्यवहार और उनकी तथाथित सभ्य और बुद्धिमत्तापूर्ण जीवन प्रणाली ।
विषमता ‘‘विर्थ’’ के अनुसार ‘नगर की विषमता’ दुसरे पर अत्यधिक निर्भरता उपरी दिखावे के अनेकानेक सामाजिक सम्बन्ध एवं व्यवहार और उनकी तथाकथित सभ्य और बुद्धिमत्तापूर्ण जीवन प्रणाली ये सब नगरीयता के परिचायक लक्षण हैं। ये उस भेद को उत्पन्न करते हैं जो ग्रामीण व नगरीय जीवन में होता है। नगरवासी ही नहीं, आज एक ग्रामवासी कृषक भी अपने आधुनिकतम कृषि साधनों तथा ट्रेक्टर, उसके पुर्जे व साथ ही अन्य मशीनें, फर्टिलाइजर, विधुत, अणुशक्ति, उत्तम बीज, आवागवन के सथानों आदि के लिए उतना ही दूसरों पर निर्भर है जितना कि एक नगरवासी । इसी कारण उसे अनेकानेक सम्बन्ध स्थापित करने पड़ते हैं और उनकी जटिलताओं में प्रवेश करना पड़ता है। यह सब होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि एक सीमा तक विर्थ के कथन में सत्यता है। ग्राम व नगर जीवन प्रणाली के अंतर के विषय में कोई दो राय नहीं हो सकती (चाहे इस अन्तर की मात्रा कम अथवा अधिक क्यों न हो )
निर्भरता-नगरवासियों और ग्रामवासियों में मुख्य अन्तर निभरता का है। नगरवासी अधिक मात्रा में और अधिक विषयों में एक दुसरे पर निर्भर रहते हैं और साथ ही प्रकृति से दूर होते हुए अप्राकृतिक साधनों, तथा विधुत व इससे बने साधन साइकिल, कार, मनोरंजनों के साधनों आदि पर आना जीवन निर्भर रखते हैं। ग्रामवासियों और नगरवासियों में यह निर्भरता की मात्रा जीवन से भी व्यापक अंतर ला देती है। ग्रामवासियों के विपरीत नगरवासी प्रकृति पर कम निर्भर रहते हंा और अनके बार वे प्रकृति के सामीप्य का अनुभव नहीं कर पातें। वे मनुष्यों पर, सामाजिक सम्बन्धों पर और अप्राकृतिक साधनों पर निर्भर रहते हैं।
विर्थ ने अपने शोध लेख जो “अमरीकन जरनल ऑफ सोशियोलोजी” में प्रकाशित हुआ, में नगरीयता और उसके तत्वों पर विशेष विश्लेषण प्रस्तुत किये हैं। इसने नगरीयता का एक सिद्धांत भी पारित किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगर में नगरीयता का विकास होता है और नगरीयता नगरों का विकास करती है। नगरों की उत्पत्ति घनी और मलिन बस्तियों की स्थापना के फलस्वरूप होती है। प्रथम इन बस्तियों में नगरीयता से परिपूर्ण विशिष्ट प्रकार के सामाजिक सम्बन्ध बनते हैं। इन सामाजिक संबंधों से एक विशिष्ट प्रकार के जीवन ढंग विकसित हो जाता है। यह ही जीवन का ढंग नगरीयता कहलाता है। इस सिद्धांत के सम्बन्ध में ‘‘विर्थ’’ ने लिखते हुए कहा है ,” अतः जितना अधिक विस्तृत घना बसा हुआ है और अधिक बेमेल एक समुदाय होगा, उतनी ही उसकी विशेषताएं नगरीयता जैसी होगी।“ इसी संदर्भ में विर्थ द्वारा प्रस्तुत नगरीय जीवन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं भी वर्णित की जा सकती हैं। ये निन्मलिखित हैं:
’’विर्थ’’ ने निम्न तत्वों को अत्यधिक महत्त्व दिया है:-
1. जनसंख्या के आकार ,
2. घनत्व
3. विभिन्न या बेमेल प्रकार के लोग
जनसंख्या के आकार पर अनेक प्रकार के परिवर्तन सामाजिक संबंधों से उत्पन्न होते हैं। हर व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। इसलिए उसमें विभिन्न प्रतिभाएं, योग्यताएं इत्यादि पायी जाती हैं। इसके कारण अंतरण उत्पन्न होता है। ‘‘विर्थ’’ ने भी लिखा है: “जनसंख्या में वृद्धि इस प्रकार बदल हुए सामाजिक संबंधों का समावेश करती है।” संख्या अधिक होने के कारण व्यक्ति हर एक से पूर्ण रूप से नहीं मिल पाता। वह केवल अंशों में सम्बंधित एवं आवश्यक सम्बन्ध रख पाता है। नगर में सबंध प्राथमिक न होकर द्वैतीयक होते हैं। इस सम्बन्ध में विर्थ का कहना है कि ये सम्बन्ध व्यक्तियों पर आधारित नहीं होते हैं बल्कि अवैयक्तिक होते हैं। ये दिखावटी, कृत्रिम, अस्थायी एवं कार्य-विशेष से ही सम्बंधित होते हैं। नगर के व्यक्ति के संम्बंध तर्क पर आधारित होते हैं। ये परिवर्तित सामाजिक सम्बन्ध नये प्रकार के सामाजिक संगठन एवं ढांचे को जन्मे देते हैं।
जनसंख्या का घनत्व भी महत्व रखता है- डार्विन ने पेड़ पौधों इत्यादी के सम्बन्ध में खोज की, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि घनत्व के कारण विशेषीकरण का विकास होता है। दुर्खीम ने मानव समाजों के विषय में यही खोज की और श्रम-विभाजन का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इस प्रकार नगरों में घनत्व अधिक होने से विशेषीकरण का विकास होता है। विभिन्नता पर भी विर्थ ने विशेष बल दिया है ।उनका मत है कि “इसके कारण नगरों को एक विशेष शक्ति प्राप्त होती है ।नये नये विचार, नये-नये कार्य दिखायी पड़ते हैं, जो नगर के जीवन को प्रगति की ओर ले जाते हैं। विभिन्न जातियों, प्रजातियों, वर्गों, प्रदेशों, देशों इत्यादि के लोग एकत्रित होते हैं । ये एक नवीन सभ्यता एवं संस्कृति को जन्मे देतें हैं” नगर नये नये अनुभवों एवं संस्कृतियों का लाभ उठता है। इन सबके कारण एक नये जीवन का उदय होता है।
2. प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी करें।
प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण, जिसे अंग्रेजी में "Democratization" कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाजों और राष्ट्रों में लोकतांत्रिक मूल्यों, संरचनाओं, और प्रक्रियाओं का विकास होता है। यह आमतौर पर व्यापक सार्वभौमिक प्रदेशों के संगठन में विकास को संकेत करता है जहां जनता की सहभागिता, न्याय, और नागरिकों की अधिकारों की सुरक्षा प्रमुखता होती है।
प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण की मुख्य विशेषताएं शामिल हैं:
1. लोकतांत्रिक शासन: प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण लोकतांत्रिक शासन को प्रोत्साहित करता है, जिसमें सत्ताधारी नेतृत्व और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। यह नागरिकों को निर्णय लेने, प्रतिभूति करने और सत्ताधारी नेता की जिम्मेदारी का प्रश्न करने की अनुमति देता है।
2. सामाजिक सहभागिता: प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण लोगों को सामाजिक सहभागिता के माध्यम से सक्रिय भूमिका में लाता है। यह नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ विभिन्न मामलों में अपनी राय रखने और सार्वभौमिक निर्णयों में भाग लेने की सुविधा प्रदान करता है।
3. शक्ति का वितरण: प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण में सत्ता और अधिकार का वितरण बढ़ता है। यह सामाजिक वर्गों, जनजातियों, महिलाओं, और अल्पसंख्यक समुदायों को सशक्त बनाने की संभावना प्रदान करता है और उन्हें निर्णय लेने के लिए सामर्थ्य प्रदान करता है।
4. न्याय: प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण न्यायपालिका को स्वतंत्रता और विश्वासयोग्यता प्रदान करता है। यह न्यायपालिका को न्याय और अधिकार की रक्षा करने के लिए मजबूत बनाता है और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से समाज के हर व्यक्ति को इंसाफ प्रदान करता है।
प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण एक सामाजिक संघर्ष, न्याय, स्वतंत्रता, और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने वाली प्रक्रिया है। यह सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है और लोगों को स्वतंत्रता, सहभागिता, और अधिकारों की सुरक्षा प्रदान करता है।
3. जनजातीय विकास की आवश्यकता के प्रमुख बिन्दुओं को लिखिए।
जनजातीय विकास की आवश्यकता के प्रमुख बिंदुओं को निम्नलिखित रूप में संक्षेप में वर्णित किया जा सकता है:
1. सामाजिक और आर्थिक समानता: जनजातियों को सामाजिक और आर्थिक रूप से समान अवसर और सुरक्षा के अधिकार होने चाहिए। उन्हें समान पहुंच, शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य सेवाएं, और खाद्य सुरक्षा में लाभ मिलना चाहिए।
2. संरक्षण और संरक्षण की आवश्यकता: जनजातियों को उनकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और परंपरागत जीवनशैली को संरक्षित रखने के लिए संरक्षण और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। इसमें भाषा, संगीत, नृत्य, लोककथा, और शिल्पी कला का संरक्षण और प्रशंसा शामिल हो सकता है।
3. जनसांख्यिक सेवाएं: जनजातियों को जनसांख्यिक सेवाओं की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें उपयोगी डेटा और जनसंख्या सम्बंधी जानकारी मिल सके। यह उन्हें आर्थिक योजनाओं, सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, और अन्य विकास कार्यों के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान कर सकती है।
4. सामाजिक न्याय: जनजातियों को सामाजिक न्याय की आवश्यकता होती है, जिसमें उन्हें उचित वितरण और गरीबी मुक्त समाज के लिए उचित आवास, बेरोजगारी की रोकथाम, और संघर्षशील वर्गों के साथ संघर्ष करने के लिए आरक्षण जैसी योजनाएं शामिल हो सकती हैं।
5. सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता: जनजातियों को स्वयं की सांस्कृतिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्थायी बनाने के लिए समर्थन, प्रशिक्षण, उद्यमिता, और उत्पादन की क्षमता का विकास करने की आवश्यकता होती है। इससे उन्हें रोजगार के अवसर, उद्यमिता के साधन, और व्यापारिक कौशल के विकास का लाभ मिल सकता है।
ये बिंदुगत आवश्यकताएं जनजातीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो उन्हें समाज में समानता, संरक्षण, पहुंच, और स्वायत्तता के प्रत्याशाओं के साथ जीने की संभावनाएं प्रदान करती हैं।
4. संचार सुविधा ग्रामीण विकास के लिए वरदान है संक्षिप्त में बताइये।
संचार सुविधा ग्रामीण विकास के लिए एक महत्वपूर्ण वरदान है। इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में संचार की सुविधा प्राप्त होती है जो विभिन्न क्षेत्रों में प्रासंगिक जानकारी, समाचार, सरकारी योजनाओं, खेल-कूद, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, कृषि विज्ञान, ग्रामीण व्यापार और उद्योग, आपूर्ति श्रृंखला, बैंकिंग सेवाएं और अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों को पहुंचने में मदद करती है।
संचार सुविधाएं ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या को जागरूक और सूचित बनाती हैं, जिससे उन्हें समयगत जानकारी और सुरक्षा सुविधाएं मिलती हैं। इसके द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में नई व्यापारिक अवसरों की सृजनात्मकता बढ़ती है और आर्थिक विकास का मार्ग खुलता है। संचार सुविधा की व्यापकता ग्रामीण क्षेत्रों को उच्चतर शिक्षा, प्रशासनिक सेवाएं और विभिन्न तकनीकी ज्ञान की पहुंच प्रदान करती है।
इसके साथ ही, संचार सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक संगठनों और सरकारी निकायों के बीच संवाद को भी सुगम और द्विपक्षीय बनाती है, जिससे सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए संयुक्त प्रयास किए जा सकते हैं। इसके माध्यम से सरकारी योजनाओं और लाभार्थियों के बीच सीधी संपर्क प्राप्त होता है, जिससे लाभार्थी सुविधाओं और सेवाओं का उचित उपयोग कर सकते हैं।
इस प्रकार, संचार सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और उन्हें आधुनिक सामाजिक-आर्थिक जगत के साथ संपर्क में लाती है।
5. ग्रामीण कल्याण से क्या समझते हैं ?
ग्रामीण कल्याण से एक समुदाय के समृद्धि, सुविधाएं और सामाजिक-आर्थिक उन्नति की परिभाषा होती है। यह संबंध ग्रामीण क्षेत्रों के विकास, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, आवास, जल-संसाधन, कृषि, ग्रामीण रोजगार, स्वच्छता, वाणिज्यिक कार्य, ग्रामीण संगठन, ग्रामीण बाजार, ग्रामीण उद्यमिता और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित होता है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या के सामरिक, आर्थिक और सामाजिक प्रगति को सुनिश्चित करना होता है ताकि ग्रामीण समुदाय की जीवनस्तर और गुणवत्ता सुधारे जा सकें।
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
इकाई द्वितीय :
चिकित्सा सम्बन्धी क्षेत्र में
1. समाज कार्य के महत्व को स्पष्ट करें।
समाज कार्य का महत्व विभिन्न प्रकार के सामाजिक समस्याओं का समाधान करने और समाज के विकास को प्रोत्साहित करने में स्थानीय समुदायों और संगठनों के द्वारा निभाया जाता है। यह कार्य मानवीय दया, सामाजिक न्याय, समरसता, उत्थानवाद, और सामाजिक समावेश के मूल्यों पर आधारित होता है।
समाज कार्य के महत्व का वर्णन कुछ निम्नलिखित प्रमुख कारणों पर आधारित हो सकता है:
1. समाजिक समस्याओं का समाधान: समाज कार्य संगठनों द्वारा समाजिक और आर्थिक विकास के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करने के माध्यम से समाज में उत्थान का कार्य करता है। यह समाज के विभिन्न वर्गों, जैसे गरीब, बेरोजगार, निराश्रित, बाल, महिलाओं आदि की समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करता है।
2. सामाजिक सुरक्षा: समाज कार्य संगठनों के माध्यम से लोगों को आवश्यक सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसमें विकलांग, बुजुर्ग, बाल, महिलाओं, गर्भवती महिलाओं, और बच्चों के लिए सुरक्षा योजनाएं शामिल होती हैं।
3. सामाजिक समरसता के संरक्षण: समाज कार्य संगठन विभिन्न समाजिक समूहों के बीच समरसता और समानता को स्थापित करने में मदद करता है। इसके माध्यम से समाज में न्याय, समानता, और गैर-भेदभाव के मूल्यों को प्रमोट किया जाता है।
4. सामाजिक उत्थान का समर्थन: समाज कार्य संगठनों द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल विकास, कृषि, ग्रामीण विकास, और उद्यमिता के क्षेत्र में कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। यह सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने में सहायता प्रदान करता है।
5. संघटित समाज का निर्माण: समाज कार्य संगठनों के माध्यम से समाज में विभिन्न समुदायों और संगठनों को एकत्रित किया जाता है। इससे समाज में सामूहिक उत्पादन, साझा संसाधनों का उपयोग, सामूहिक समाधान, और सामुदायिक विकास के लिए सहयोग का मार्ग खुलता है।
समाज कार्य का महत्व सामाजिक सुधार, समाजिक न्याय, समरसता, और विकास को प्रोत्साहित करने के लिए अद्यतन और प्रभावी तरीकों का प्रयोग करता है। यह समाज में सबके लिए समानता, सुरक्षा, और समृद्धि की भावना को स्थापित करता है और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए संगठनित कार्य करता है।
2. वृद्धावस्था की प्रमुख समस्याओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
वृद्धावस्था के साथ आने वाली कुछ प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हैं:
1. स्वास्थ्य समस्याएं: वृद्धावस्था में शारीरिक समस्याएं बढ़ जाती हैं। यह शामिल हो सकती हैं दिल की बीमारियाँ, मधुमेह, अर्थराइटिस, तंत्रिका विकार, विषाणुजन्य संक्रमण आदि।
2. मानसिक समस्याएं: वृद्धावस्था में मानसिक समस्याएं भी आम होती हैं। यह शामिल हो सकती हैं आक्रोश, अकेलापन, डिप्रेशन, चिंता, भ्रम, और मनोवैज्ञानिक रोगों के लक्षण।
3. संबंध समस्याएं: वृद्धावस्था में संबंध समस्याएं भी उभरती हैं। इसमें समाजिक अलगाव, परिवार संबंधों की कमजोरी, साथी की मृत्यु, अकेलापन आदि शामिल हो सकते हैं।
4. आर्थिक समस्याएं: धन संबंधी समस्याएं वृद्धावस्था में एक मुख्य चिंता होती हैं। इसमें आय की कमी, पेंशन या सामाजिक सुरक्षा की अभाव, वित्तीय असुरक्षा आदि शामिल हो सकती हैं।
5. समाजिक छूट: वृद्धावस्था में लोगों को समाज में उचित सम्मान और स्थान नहीं मिलता है, जिसके कारण वे अलगाव महसूस करते हैं और समाजिक छूट का सामना करते हैं।
ये समस्याएं वृद्धावस्था में आमतौर पर देखी जाती हैं, और इनका समाधान करने के लिए समाज कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य पेशेवरों, परिवार के सदस्यों और समाज के साथी लोगों की एक संयुक्त प्रयास की जरूरत होती है।
3. महिला एवं बालकों हेतु परामर्श की आवश्यकता क्यों होती है?
महिला और बालकों के लिए परामर्श की आवश्यकता कई कारणों से होती है। यहां कुछ मुख्य कारण दिए गए हैं:
1. संरक्षण: महिलाओं और बालकों को अपनी सुरक्षा और सुरक्षा के बारे में जागरूक रहना आवश्यक होता है। परामर्श के माध्यम से, उन्हें सुरक्षित रहने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और संसाधनों के बारे में बताया जा सकता है।
2. स्वास्थ्य और पोषण: महिलाओं और बालकों के स्वास्थ्य और पोषण की देखभाल बहुत महत्वपूर्ण होती है। परामर्श के माध्यम से, उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा, साफ पानी, स्वच्छता आदि के बारे में जागरूकता दी जा सकती है।
3. शिक्षा और विकास: परामर्श विशेषतः महिलाओं और बालकों के शिक्षा और विकास के मामले में महत्वपूर्ण होता है। उन्हें उच्चतर शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, नौकरी के अवसर, व्यापार संचालन, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के लिए परामर्श की आवश्यकता होती है।
4. सामाजिक समस्याओं का समाधान: महिलाओं और बालकों को सामाजिक समस्याओं के बारे में जागरूक और सक्रिय होने के लिए परामर्श की आवश्यकता होती है। इसके माध्यम से, उन्हें जनसंख्या नियंत्रण, संबंधी विवादों का समाधान, सामाजिक उत्थान, जेंडर समानता, बाल श्रम, बाल अपराध, संबंधों की स्वतंत्रता, बाल विवाह, शून्य अनाधिकृतता आदि के बारे में जागरूकता दी जा सकती है।
इन सभी कारणों से, महिला और बालकों के लिए परामर्श आवश्यक होता है ताकि उन्हें अपने अधिकारों, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास के मामले में सक्षम बनाने में मदद मिल सके।
4. परिवार परामर्श केन्द्र के प्रमुख कार्यों को लिखिए।
परिवार परामर्श केन्द्र निम्नलिखित प्रमुख कार्यों का संचालन करता है:
1. परिवारों को संबंधित मुद्दों पर सलाह देना: परिवार परामर्श केन्द्र में परामर्शकार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जहां परिवारों को संबंधित मुद्दों पर सलाह दी जाती है। इसमें विवाह, तलाक, संबंध समस्याएं, पति-पत्नी के बीच संबंधों के मामले, पालन-पोषण, शिक्षा, संघर्ष, आर्थिक मुद्दे, सामाजिक न्याय, संबंधी हिंसा, विरासत, धर्म, धर्मांतरण आदि शामिल हो सकते हैं।
2. सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन: परिवार परामर्श केन्द्र द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिनमें परिवार के सदस्यों को संबंधों, संघर्षों, खुशहाली, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक महत्वपूर्णता, उत्सव, मनोरंजन आदि के बारे में जागरूकता और ज्ञान प्रदान किया जाता है।
3. न्यायालयीक परामर्श: परिवार परामर्श केन्द्र न्यायालयीक परामर्श भी प्रदान करता है। यहां परिवारों को कानूनी मामलों, विवादों, तलाक, संपत्ति विवाद, अधिकार, कर और आय के मामलों, संबंधित कानूनों और कानूनी उपायों के बारे में सलाह दी जाती है।
4. संसाधन प्रबंधन: परिवार परामर्श केन्द्र बच्चों, महिलाओं, वृद्धों और अन्य संबंधित व्यक्तियों के लिए संसाधनों का प्रबंधन करता है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सहायता, योजनाएं, नौकरी के अवसर, गर्भावस्था देखभाल, बाल विकास, परिवार की आयोजन आदि शामिल हो सकते हैं।
5. सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम: परिवार परामर्श केन्द्र में सामाजिक जागरूकता के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसमें स्वच्छता, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण, वाणिज्यिक मनोवैज्ञानिक बिंदुओं पर जागरूकता, महिला शक्ति, बाल संरक्षण, बालिका शिक्षा, सुरक्षा, सामुदायिक उत्थान आदि शामिल हो सकते हैं।
परिवार परामर्श केन्द्र अपने कार्यक्रमों के माध्यम से परिवारों को सामाजिक, प्राधिकारिक, आर्थिक और मानसिक सहायता प्रदान करता है ताकि वे समृद्ध, स्वस्थ, सुरक्षित और संतुष्ट जीवन जी सकें।
5. प्रमुख आपदाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
प्रमुख आपदाएं असामान्य प्राकृतिक परिस्थितियों, मानविकी दुर्घटनाओं और सामाजिक अस्थिरताओं के कारण हो सकती हैं। यहां कुछ प्रमुख आपदाओं का संक्षिप्त वर्णन है:
1. प्राकृतिक आपदाएं: इसमें भूकंप, तूफान, बाढ़, जलप्रलय, भूस्खलन, भूस्वामित्व, अवांछित बारिश, आग, भूमि के फटने, ज्वालामुखी विस्फोट आदि शामिल होती हैं। ये आपदाएं विशेष रूप से जीवन, संपत्ति और पर्यावरण को प्रभावित कर सकती हैं।
2. मानविकी आपदाएं: इसमें आतंकवादी हमले, युद्ध, संघर्ष, बांधक बंदी, दंगा, सांस्कृतिक दुर्भावना, आपराधिकता, उपेक्षा, सामाजिक असंतुलन, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं आदि शामिल होती हैं। इन आपदाओं के कारण मानवीय संबंध, सुरक्षा, न्याय, विश्वास, समरसता आदि प्रभावित हो सकते हैं।
3. सामाजिक आपदाएं: इसमें गरीबी, बेरोजगारी, नस्लभेद, आदिवासी हिंसा, दलित अत्याचार, समाज में स्थितिगत असंतुलन, दहेज प्रथा, बाल श्रम, महिला शोषण, अशिक्षा, संबंधित अवसरों की कमी आदि शामिल होती हैं। ये आपदाएं सामाजिक न्याय, समरसता, सभ्यता, शिक्षा आदि को प्रभावित कर सकती हैं।
ये संक्षिप्त वर्णन आपदाओं के प्रमुख पहलुओं को दर्शाता है, हालांकि इसकी सूची पूर्णता से पूरी नहीं है और आपदाएं विभिन्न कारणों से हो सकती हैं।
6. परामर्श की प्रमुख तकनीकियों का वर्णन करें।
परामर्श करने के लिए कई तकनीकें हैं जो व्यक्तियों या समुदायों को सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करने में मदद करती हैं। यहां कुछ प्रमुख परामर्श तकनीकों का वर्णन है:
1. सुनना: परामर्शग्राहक को सुनने की तकनीक महत्वपूर्ण है। सुनने के माध्यम से परामर्शग्राहक की बातें, समस्याएं और आवश्यकताएं समझी जाती हैं। परामर्शग्राहक के विचारों और भावनाओं को समझना, उनके लिए सही समाधान ढूंढने में मदद करता है।
2. प्रश्न पूछना: परामर्शग्राहक के समस्याओं को समझने के लिए प्रश्न पूछना महत्वपूर्ण है। सटीक और मुख्य प्रश्न पूछकर विशेष जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जिससे सही सलाह दी जा सकती है।
3. संवाद कौशल: परामर्शग्राहक के साथ संवाद रखने का कौशल महत्वपूर्ण है। सही तरीके से संवाद रखने से उनकी विश्वासिता बढ़ती है और समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग मिलता है। संवाद में संवेदनशीलता, समझदारी और संवेदनशील सुनवाई शामिल होती है।
4. सहयोग करना: परामर्शग्राहक को सहयोग करना उचित होता है। सहायता करने के लिए उन्हें साथ देना, विकल्पों की पेशकश करना और सही दिशा में मार्गदर्शन करना शामिल होता है।
5. संभावित समाधान की पेशकश: परामर्शग्राहक को संभावित समाधानों की पेशकश करना महत्वपूर्ण है। विभिन्न समाधानों के विचार करने और विकल्पों को प्रस्तुत करने से उन्हें सही मार्गदर्शन मिल सकता है।
ये कुछ प्रमुख परामर्श तकनीकें हैं, जो एक परामर्शकर्ता को अपने परामर्श कार्य में सहायता प्रदान कर सकती हैं।
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
इकाई तृतीया
परिवार कल्याण
1. परिवार कल्याण सेवाओं का स्वरूप बताइए
परिवार कल्याण सेवाएं समाज में परिवारों के कल्याण और सुरक्षा की देखभाल करने के लिए सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं। इन सेवाओं में विवाह, गर्भावस्था, जन्म नियंत्रण, बाल संरक्षण, मातृ और शिशु स्वास्थ्य, नवजात शिशु की देखभाल, बच्चों की शिक्षा और पोषण, परिवार योजना, महिला एवं बाल विकास, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां और परिवारों की सहायता शामिल होती हैं। इन सेवाओं का मुख्य उद्देश्य परिवारों के सुरक्षित और सुखी जीवन की सुनिश्चित करना होता है। इसमें परिवार की सामाजिक, आर्थिक, वैयक्तिक, और सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति, बाल, महिला, और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, विकास कार्यक्रम, जीविका संबल, आरोग्य सेवाएं, शिक्षा, योग्यता विकास, और सामाजिक सुरक्षा की विभिन्न सेवाएं शामिल होती हैं।
2. अनैतिक व्यापार में संलग्न महिलाओं की प्रमुख समस्याओं का वर्णन करें
अनैतिक व्यापार में संलग्न महिलाओं की प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हो सकती हैं:
- संलग्न महिलाओं के लिए काम की कम संभावना और अवसरों की कमी
- भुगतान के मामले में अन्यायपूर्णता और समान वेतन की अभाविता
- अवैध और अनुचित काम की शर्तें
- मानसिक और शारीरिक हिंसा
- महिलाओं की गोद लेने और यौन शोषण का खतरा
- श्रमिक सुरक्षा की कमी: महिलाओं को न्यूनतम वेतन, काम की सुरक्षा, स्वस्थ्य और बाल पालन सुविधाएं, और कार्य समय की सुविधा की कमी का सामना करना पड़ता है।
- दाहिनी पक्ष के अभाव: महिलाएं व्यापारिक संरचना में समान अवसरों और प्रतियोगिता की कमी के कारण अक्सर अनैतिक व्यापार में कम प्रतिष्ठित कर्मियों के रूप में शामिल होती हैं।
- दुर्भाग्यपूर्ण श्रमिकों का शोषण: अनैतिक व्यापार में, कुछ महिलाएं अत्याचार, श्रमिक सुरक्षा के उल्लंघन, और शोषण का शिकार होती हैं।
- सामाजिक उपेक्षा: समाज में महिलाओं की अवस्था और प्रतिष्ठा की कमी उन्हें व्यापारिक संरचना में स्थानांतरित होने से रोकती है।
3. तंग बस्तियों के रहवासियों की मुख्य समस्याएँ एवं समाधान को संक्षिप्त में बताइए
तंग बस्तियों के रहने वाले लोगों की मुख्य समस्याएं निम्नलिखित हो सकती हैं: तंग बस्तियों के रहवासियों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे कि
- घरों की घटियां या अवैध रहने की स्थिति
- प्रदूषित पानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
- बेरोजगारी और अयोग्यता के कारण आर्थिक समस्याएं
- अवसाद, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और मादक पदार्थों की आदिक्ति
- बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
- आवास की अभाव: ये बस्तियां आवास की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाती हैं, जिसके कारण लोग घर के लिए अपेक्षित मानक से वंचित रहते हैं।
- स्वच्छता की कमी: तंग बस्तियों में सामान्यतः स्वच्छता की स्थिति अधिक बुरी होती है, जिससे रहवासियों को स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- बेरोजगारी: तंग बस्तियों में बेरोजगारी की दशा पायी जाती है, क्योंकि लोगों को उचित रोजगार के अवसरों की कमी होती है।
- शिक्षा की कमी: तंग बस्तियों में शिक्षा की सुविधा कम होती है, जिसके कारण लोगों का विकास और समृद्धि रुक जाती है।
4. दिव्यांगजनों की प्रमुख सामाजिक एवं मनावैज्ञानिक समस्याओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए
दिव्यांगजनों की प्रमुख सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं निम्नलिखित हो सकती हैं:
- विकलांगता के कारण उन्नति और रोजगार के अवसरों की कमी
- समाज में संघर्ष और भेदभाव का अनुभव करना
- शारीरिक सुविधाओं की कमी और पहुंच की कमी
- मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
- सामाजिक अपवाद और अस्वीकृति का अनुभव करना
- विभिन्नता की अभाव: समाज में विभिन्नता के कारण दिव्यांगजनों को समाजिक और मानसिक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता है।
- स्वास्थ्य सेवाओं की कमी: दिव्यांगजनों को उचित स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पाती हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं।
- सामाजिक प्रतिबंधों का दबाव: दिव्यांगजनों को सामाजिक प्रतिबंधों का दबाव महसूस होता है, जो उनकी स्वतंत्रता और समानता को प्रभावित करता है।
5. बाल कल्याण से सम्बन्धित विभिन्न कार्यक्रमों का वर्णन करें
बाल कल्याण से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं: बाल संरक्षण कार्यक्रम: इसमें शिशु स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण, अन्नप्राप्ति, नवजात शिशु की देखभाल, और बच्चों की सुरक्षा शामिल होती है। बाल शिक्षा कार्यक्रम: यह बालों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने, स्कूली सामग्री, शिक्षकों, और शिक्षा संसाधनों की उपलब्धता की सुनिश्चित करने, बाल-मजदूरी को रोकने और शिक्षा की उपलब्धता का सुनिश्चित करने के लिए होता है। बाल संरक्षा कानून कार्यक्रम: इसका उद्देश्य बाल श्रम, बाल विवाह, और बाल शोषण जैसे बालों के अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण है। बाल उद्धार कार्यक्रम: इसमें बाल श्रमिकों, बाल विकास संगठनों, और सरकारी अभियांत्रिकी के माध्यम से बालों को श्रम से मुक्त करने, उन्नति सुनिश्चित करने, और सामाजिक आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की सहायता करने का प्रयास किया जाता है।
शिशु सुरक्षा कार्यक्रम: इसका उद्देश्य नवजात शिशुओं की सुरक्षा, पोषण, आरोग्य, और विकास की सुरक्षित प्रदान करना होता है।
बाल श्रम निषेध कार्यक्रम: इसका मुख्य उद्देश्य बाल मजदूरी को रोकना, बच्चों के शिक्षा और विकास को प्रोत्साहित करना होता है।
बाल विवाह निषेध कार्यक्रम: इसका लक्ष्य बाल विवाह को रोकना, बालिकाओं की शिक्षा और विकास को सुनिश्चित करना होता है।
बाल गणित कार्यक्रम: इसका उद्देश्य बालों की मूल्यांकन, संख्या पढ़ाई, मानकीकरण, और गणितीय कौशल का विकास करना होता है।
ये कार्यक्रम सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, और विकास की दिशा में बाल कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए अपनाए जाते हैं।
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
इकाई चतुर्थ :
नेतृत्व के साथ समाज कार्य
1. ग्रामीण नेतृत्व की अवधारणा स्पष्ट करें:
ग्रामीण नेतृत्व एक प्रकार का नेतृत्व है जो ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर स्थापित होता है। इसमें स्थानीय समुदाय के व्यक्तियों द्वारा नेतृत्व की भूमिका निभाई जाती है और वे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रभाव डालते हैं। ग्रामीण नेतृत्व विभिन्न ग्रामीण संगठनों, पंचायतों और सामाजिक समूहों के माध्यम से स्थानीय समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करता है। यह नेतृत्व स्थानीय स्तर पर ग्रामीण समुदाय के सदस्यों की सक्रियता, साझेदारी और समावेश पर आधारित होता है।
2. कुछ समाज सुधार आंदोलनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए:
स्वदेशी आंदोलन: यह आंदोलन भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा था जो भारतीयों को विदेशी वस्त्रों और वस्त्रों के उत्पादों के बदले भारतीय उत्पादों का प्रयोग करने को प्रोत्साहित किया।
महिला सुधार आंदोलन: यह आंदोलन महिलाओं की समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार करने के लिए संघर्ष करता है। इसमें महिलाओं की शिक्षा, सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाएं, महिला अधिकार और महिला सुरक्षा को मजबूत करने का प्रयास किया जाता है।
जाति सुधार आंदोलन: यह आंदोलन जाति विच्छेद, जातिवाद और असामाजिकता के खिलाफ लड़ता है। इसमें दलित, आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता को प्रमोट करने का प्रयास किया जाता है।
पर्यावरण सुधार आंदोलन: यह आंदोलन पर्यावरणीय संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और बाढ़, जलवायु परिवर्तन और वनों की संरक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है।
3. प्रजातांत्रिक नेतृत्व क्या है? बताइए:
प्रजातांत्रिक नेतृत्व एक नेतृत्व प्रणाली है जिसमें नेता जनमत के आधार पर चुने जाते हैं और जनता की इच्छा के अनुसार सरकारी निर्णय लेते हैं। इस प्रणाली में नागरिकों को मतदान का अधिकार होता है और नेताओं को लोकतंत्र के माध्यम से निर्वाचित किया जाता है। प्रजातंत्रिक नेतृत्व न्याय, सामान्यता, विचारशीलता और सामाजिक समानता पर आधारित होता है।
4. धार्मिक नेतृत्व की आवश्यकता क्यों है? क्या यह नेतृत्व आवश्यक है?
धार्मिक नेतृत्व धार्मिक समुदायों के नेता द्वारा निभाया जाने वाला नेतृत्व है। यह नेतृत्व धार्मिक मार्गदर्शन, सभ्यता और आदर्शों को प्रचारित करता है। धार्मिक नेतृत्व संगठन, मंदिर, गुरुकुल, धार्मिक आचार्य और धार्मिक आदर्शों के माध्यम से समाज को आध्यात्मिकता, मानवीयता, नैतिकता और सामाजिक न्याय के मूल्यों पर जोड़ता है। धार्मिक नेतृत्व समाज को आध्यात्मिक और मानवीय उद्धार की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है। धार्मिक नेतृत्व की आवश्यकता समाज के मध्यस्थता, मानसिक शांति, एकता, और धार्मिक संघर्षों के नियंत्रण में साझा की जाती है। हालांकि, यह नेतृत्व आवश्यक होने के बावजूद, यह विभिन्न सामाजिक और आध्यात्मिक संघर्षों के बीच विचारशीलता और विवादों का कारण भी बन सकता है।
5. निरंकुश एवं प्रजातांत्रिक नेतृत्व में अंतर बताइए:
निरंकुश तथा प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में अन्तर
नेतृत्व की विधियों, उद्देश्यों और प्रकृति के आधार पर निरंकुश तथा प्रजातान्त्रिक नेतृत्व के अन्तर को निम्नांकित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है:
| क्र.सं. | निरंकुश नेतृत्व | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व |
| (1) | निरंकुश नेतृत्व में नेता स्वेच्छाचारी होता हैं। वह समूह की सभी नीतियों का निर्धारण स्वयं ही करता है जिसमें वह अपने हितों को सर्वोच्च स्थान देता है। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में नीतियों का निर्धारण समूह द्वारा होता है। नेता तो केवल एक प्रतिनिधि के रूप में इन नीतियों की रूपरेखा मात्र बनाता है। |
| (2) | निरंकुश नेता के लिए किसी की भी प्रशंसा या आलोचना करने लिए कारण बताना आवश्यक नहीं है। उसका दृष्टिकोंण व्यक्तिवादी होता है। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में तथ्यों और प्रमाणों का विशेष महत्व होता हे। कोई भी बात प्रमाण की अनुपस्थिति में नहीं की जा सकती। |
| (3) | निरंकुश नेता कार्य की समपूर्ण योजना एक बार में नहीं बनाता बल्कि एक-एक कार्य का आदेश देता जाता है। इस प्रकार यह अनिश्चित नेतृत्व होता है। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में विचार-विमर्शों द्वारा जो नीति निर्धारण की जाती हैउसके आधार पर भविश्य में किए जाने वले कार्य की समपूर्ण योजना पहले ही बना ली जाती है। इससे नेतृत्व में निश्चितता आ जाती है। |
| (4) | निरंकुश नेतृत्व भय, निराशा और निर्भरता को बढ़ावा देकर निहित स्वार्थों को पूरा करने का एक साधन है। इस प्रकार यह एक प्रकार का ’आत्म-प्रचार’ Self-Propaganda) है। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व उत्साह, प्रवीणता और विवेक पर आधारित हैयह सम्पूर्णं समूह के कल्याण में अधिक सहायक होता है। |
| (5) | निरंकुश नेतृत्व ’विभाजन के द्वारा शासन (Divide and rule) के सिद्धान्त पर आधारित है। इसलिए ऐसे नेतृत्व में सदस्यों के पाररूपरिक सम्पर्क को हतोत्साहित किया जाता है। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व का अंतिम उद्देश्य समपूर्ण समूह को एकता के सूत्र में बांधना है। इसके लिए सदस्यों को पारस्परिक सम्पर्क बढ़ाने के लिए अधिक -से-अधिक प्रेरणा दी जाती है। |
| (6) | निरंकुश नेतृत्व में सत्ता का केन्द्रीकरण कियी एक व्यक्ति या समूह में हो जाता है तथा यह प्रयत्न किया जाता है सत्ता का दूसरे समूह में हस्तान्तरण न हो | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में वास्तविक सत्ता सम्पूर्णं समूहों के हाथों में होती है। साथ ही कार्यकुशल और परिश्रमी व्यक्तियों के बीच सत्ता सदैव हस्तान्तरित होती रहती है। |
| (7) | निरंकुश नेतृत्व एक पंगु और पराश्रित समाज का निर्माण करता है जिसमें नेता के निर्देशों के बिना समूह एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में वास्तविक सत्ता सम्पूर्णं समूहों के हाथों में होती है। साथ ही कार्यकुशल और परिश्रमी व्यक्तियों के बीच सदैव हस्तान्तरित होती रहती है। |
| (8) | परिणाम के दृष्टिकोंण से निरंकुश नेतृतव समूह में चापलूसी, आलस्य, तनाव, भय और संकेतग्राह्राता (Suggestibility) को बढ़ावा देता है। | प्रजातान्त्रिक नेतृत्व में तत्परता, साहस, आत्मनिर्भरता, कार्यशीलता और मित्रता जैसे गुणों की वृद्धि होती है। |
अथवा
निरंकुश एवं प्रजातांत्रिक नेतृत्व में अंतर बताइए:
निरंकुश नेतृत्व: निरंकुश नेतृत्व वह नेतृत्व है जो अनियमितता, तानाशाही और न्याय विरोधी तत्वों के साथ संपन्न होता है। इसमें नेताओं का अधिकार प्रभुत्व, सत्ता का अधिकार और समाज के साधारण नागरिकों पर बाध्यता के मामले में अनुचित उपयोग होता है। यह नेतृत्व विशेषाधिकार, उच्चाधिकार और न्यायाधीशों की अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण संघर्षों, विरोध और सामाजिक असंतुलन का कारण बनता है।
प्रजातांत्रिक नेतृत्व: प्रजातांत्रिक नेतृत्व वह नेतृत्व है जो न्याय, समानता, लोकतंत्र और जनहित के मूल्यों पर आधारित होता है। यह नेतृत्व जनता की इच्छा और मताधिकार के माध्यम से चुने गए नेताओं द्वारा प्रदान किया जाता है। प्रजातांत्रिक नेतृत्व सामान्यता, विचारशीलता, सामाजिक न्याय, और संघर्षों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है और सामरिकता और सभ्यता के माध्यम से समाज को संघर्षों से बाहर निकालने का प्रयास करता है।
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
- नियमित खेलकूद कक्षाएं आयोजित करें जहां बच्चे विभिन्न खेलों में भाग ले सकें।
- खेल के माध्यम से सहयोग, साझेदारी, टीमवर्क, नेतृत्व और संयम जैसे महत्वपूर्ण गुणों को समझाएं।
- खेल स्पर्धाओं और विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करें ताकि बच्चे अपनी रूचियों को विकसित कर सकें।
- खेल के माध्यम से विद्यार्थियों को स्वतंत्र विचार, समस्या समाधान, नवीनता, निर्णायक तर्क और नेतृत्व कौशल का विकास करें।
- खेल-कूद को महत्वपूर्ण और आवश्यक अंश के रूप में स्थापित करना।
- खेल सुविधाओं को सुनिश्चित करना, जैसे कि खेल मैदान, स्पोर्ट्स किट, खेलने के औजार, आदि।
- खेल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना और विभिन्न शैक्षणिक क्षेत्रों के साथ इंटीग्रेट करना।
- खेल के माध्यम से टीमवर्क, नेतृत्व, सहनशीलता, सामरिक भावना, और समन्वय की प्रभावी शिक्षा प्रदान करना।
- खेल और शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से स्वतंत्र चिंतन, समस्या समाधान, और सहभागिता कौशल का विकास करना।
- बाल चिकित्सा सेवाएं, जैसे वैक्सीनेशन, नियमित चिकित्सा जांच, और स्वस्थ शिशु की देखभाल।
- स्वास्थ्य परामर्श, जहां विभिन्न स्वास्थ्य मुद्दों पर जानकारी और सलाह प्रदान की जाती है।
- स्वास्थ्य संचार कार्यक्रम, जैसे स्वास्थ्य शिविर, शिक्षण कार्यक्रम, और स्वास्थ्य जागरूकता के आयोजन।
- पौष्टिक भोजन और शिशु आहार की सुविधा।
- स्वच्छता और स्वच्छ जल की व्यावस्था, जैसे सामान्य स्वच्छता, साफ पानी सप्लाई, और सुविधाएं।
- वैक्सीनेशन और नियमित रूप से चिकित्सा जांच की सुविधा
- आवश्यक दवाओं की व्यवस्था और आपूर्ति
- स्वच्छ पानी की उपलब्धता और स्वच्छता की सुनिश्चितता
- जनसंख्या स्वास्थ्य परामर्श और जागरूकता कार्यक्रम
- मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाएं, जैसे गर्भावस्था देखभाल, नवजात देखभाल, और पोषण सलाह
- प्राथमिक स्वास्थ्य शिक्षा और सामुदायिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम
- वे अपने शारीरिक, जनसंख्या, और विचारशक्ति के विकास के अवधारणाओं के साथ प्रभावित होते हैं।
- वे अपने स्वास्थ्य और रूचियों के क्षेत्र में उचित जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
- वे नई सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों के साथ सामंजस्य बनाना सीखते हैं।
- उन्हें अधिकार, कर्तव्य, स्वतंत्रता, और संबंधों के मामले में जागरूकता होती है।
- वे शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक न्याय के बारे में सही गाइडेंस की आवश्यकता होती है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पहुंच और उच्च गुणवत्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
- मातृ और शिशु स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना और बाल स्वास्थ्य, प्राथमिक चिकित्सा, और जनसंख्या परिवार नियोजन सेवाओं को सुनिश्चित करना।
- सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना, जैसे मलेरिया नियंत्रण, पथरों के नियंत्रण, और स्वच्छता अभियान।
- स्वास्थ्य संसाधनों की प्रभावी उपयोगिता, प्रशिक्षण, और प्रबंधन की सुविधा प्रदान करना।
- शिक्षागत अपराध, जैसे छात्र के बीच हिंसा, छेड़खानी, छल-कपट, या छात्र के अधिकारों की उल्लंघना।
- शारीरिक अपराध, जैसे बच्चे के बीच हिंसा, संगठित अपराधी गुटों के साथ जुड़ना, या छात्र के स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान न देना।
- सामाजिक अपराध, जैसे छात्र के बीच नफरत फैलाना, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होना, या सामाजिक मोर्चों के खिलाफ जुड़ना।
- अधिकारिक अपराध, जैसे छात्र के बीच चोरी, धोखाधड़ी, या योजनाओं के उल्लंघन करना।
- संभावित आपराधिक आचरण, जैसे नशीली पदार्थों का सेवन करना, छात्र के बीच अश्लील सामग्री का प्रसार करना, या किसी अपराधी समूह के साथ जुड़ना।
Comments
Post a Comment