UNIT - 1
1. अच्छे मानवीय संबंध किसी संगठन में क्यों जरूरी हैं?
(घ) अच्छे मानवीय संबंध तथा अनुशासन बनाये रखना-अच्छे मानवीय सम्बन्धों के द्वारा संगठन में अनुशासन बनाये रखा जा सकता है। सुदृढ़ औद्योगिक संगठन के लिए अच्छे मानवीय सम्बन्ध एक रामबाण औषधि की तरह है। सेविवर्गीय विभाग सदैव इस बात के लिए प्रयत्न करता है कि कर्मचारियों में आपसी सद्भाव, आत्म सम्मान तथा सद्भावना आदि गुणों का विकास हो तथा प्रबंध वर्ग तथा कर्मचारी वर्ग सहयोग से कार्य करें, साथ ही दोनों वर्ग अच्छे संबंध बनाये रखने के लिए आपस में एक-दूसरे के आर्थिक तथा मनोवैज्ञानिक हितों की रक्षा के लिए सतत् प्रयत्नशील रहें।
2. मानव संसाधन प्रबंधन के कौनकौन से क्षेत्र हैं?
मानव संसाधन प्रबन्धन का क्षेत्र (Scope of Human Resource Management)
मानव संसाधन प्रबन्ध का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। एक कर्मचारी के कार्यकारी जीवन की सभी प्रमुख गतिविधियाँ (उसके संगठन में प्रवेश से लेकर सेवानिवृत्ति तक), मानव संसाधन प्रबन्धन के क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित की जाती हैं। मानव संसाधन प्रबन्धन के क्षेत्र निम्न प्रकार हैं-
1.मानव संसाधन नियोजन (Human Resource Planning)
2.कर्मचारियों की भर्ती, चयन एवं नियुक्ति(Recruitment, Selection & Placement of Employees)
3.कर्मचारियों का विकास (Developmentof Employees)
4.मजदूरी एवं वेतन प्रशासन(Wage & Salary Administration)
5.कर्मचारी कल्याण (Employees Welfare)
6.स्वास्थ्य एवं सुरक्षा (Health & Safety)
7.अनुशासन (Discipline)
8.श्रम सम्बन्ध (Industrial Relation)
9.सेविवर्गीय शोध (Personnel Research)
10.संगठन विकास(Organisational Devlopment)
11.अभिलेखन रखना (Record Keeping)
12.जन सम्पर्क (Public Relation)आदि।
3. मानव संसाधन विकास के कुछ लक्षण लिखिए।
मानव संसाधन विकास के लक्षण
मानव संसाधन विकास के लक्षण निम्नवत् हैं-
1.मानव संसाधन विकास, मानव संसाधन प्रबन्धन के अन्तर्गत एक सकारात्मक अवधारणा है।
2.मानव संसाधन विकास एक प्रणाली है, जो अनेकानेक उप- प्रणालियों जैसे- अधिप्राप्ति, मूल्याँकन तथा विकास आदि से युक्त हैं।
3.मानव संसाधन विकास, संगठनों के अन्तर्गत लोगों को विकसित करने की एक नियोजित एवं सुव्यवस्थित प्रक्रिया है।
4.मानव संसाधन विकास एक व्यापक अवधारणा है, जो वृहत् एवं सूक्ष्म दोनों स्तरों पर लागू होती है।
5.मानव संसाधन विकास, कर्मचारियों के लिए केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण संगठन को विकसित, परिवर्तित एवं उत्कृष्ट करने की एक प्रक्रिया है।
6.मानव संसाधन विकास के अन्तर्गत संस्थानों एवं संगठनों के प्रत्येक व्यक्ति के बहुमुखी विकास पर बल दिया जाता है।
4. मानव संसाधन प्रबंधन की एक परिभाषा लिखिए।
मानव संसाधन, व्यवसाय के समस्त संसाधनों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण, सक्रिय, सृजनशील, संवेदनशील एवं अंगभूत साधन है।
रेन्सिस लिंकर्ट का मत है कि “किसी भी उपक्रम की समस्त क्रियायें उस संस्था में कार्यशील व्यक्तियों द्वारा ही प्रारम्भ एवं निर्धारित की जाती है।”
सेमुअल जाॅनसन का कथन है कि ‘‘मानव संसाधन प्रत्येक संस्था का मूल प्रश्न, मर्म एवं सफलता का रहस्य होते हैं।’’
आधुनिक व्यवसाय में मानव संसाधनों का प्रबन्ध सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है।
ड्रकर के अनुसार -‘‘व्यक्तियों का प्रबन्ध करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु फिर भी असंभव नहीं है।’’
मानव संसाधन, प्रबंध कार्य के दौरान व्यक्तियों के सम्बन्धों, व्यवहारों, अन्तव्र्यहारों, कार्य-समस्याओं, अभिप्रेरणाओं तथा मानवीय भावनाओं का प्रबंध है।
मानव संसाधन प्रबंध मानव संसाधन प्रबंधन का आधुनिक स्वरूप है। यह कर्मचारी प्रशासन का व्यवहारवादी आयाम है।
डेल एस0 बीच लिखते हैं- यद्यपि कई शताब्दियों से व्यक्ति अपने पारस्परिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संगठनों का निर्माण करते रहे हैं, किन्तु हाल ही के वर्षो में मानव संसाधन प्रबंध के सिद्धान्तों एवं व्यवहारों का एक व्यवस्थित विकास सम्भव हुआ है।
UNIT -2
1. मानव संसाधन नियोजन की कोई दो परिभाषा लिखिए।
मानव संसाधन नियोजन का अर्थ किसी उपक्रम के सन्दर्भ में, उसके द्वारा कर्मचारियों की मांग एवं पूर्ति में सामन्जस्य स्थापित करना है। यह उपक्रम द्वारा अपनी मानवीय आवश्यकताओं का पूर्वानुमान है। मानव संसाधन नियोजन एक ऐसा कार्यक्रम है, जिसके अन्तर्गत उपक्रम की मानव संसाधन की व्याख्या एवं भावी जरुरतों या आवश्यकताओं का अनुमान प्रस्तुत किया जाता है।
गोरइन मेकबेथ के अनुसार-मानव संसाधन नियोजन में दो चरण सम्मिलित हैं। प्रथम चरण, ‘‘मानव संसाधन आवश्यकताओं का नियोजन’’ तथा द्वितीय चरण ‘‘मानव संसाधन की पूर्ति का नियोजन’’
डेल योडर के अनुसार- ‘‘कर्मचारी व्यवस्था सम्बन्धी नीति, सामान्यतयः यह धारणा रखती है कि संगठन की वर्तमान एवं भावी मानवीय आवश्यकताओं की व्याख्या उसके गुण स्तर एवं संस्था के सन्दर्भ में की जायेगी। जहां सम्भव होगा, आवश्यकता का पूर्वानुमान किया जायेगा, ताकि आवश्यकतानुसार मानव संसाधन उपलब्ध हो सके।
2. कार्य पर नियुक्ति क्या है?
चयन प्रक्रिया के माध्यम से जब किसी अभ्यर्थी का अन्तिम रुप से चयन कर लिया जाता है तथा उसके नियुक्ति आदेश प्रदान कर दिया जाता है, अगली प्रक्रिया के रुप में उसकी ‘कार्य पर नियुक्ति’ की जाती है। जब नवनियुक्त कर्मचारी कार्य करने के लिए उपस्थित होता है तो संस्थान को उसे उस कार्य पर, जिसके लिए उसका चयन किया गया है, नियुक्त करना होता है।अतएव सही कार्यों पर नव नियुक्त कर्मचारियों को स्थापित करना ही कार्य पर नियुक्ति कहलाती है। वस्तुतः कार्य पर नियुक्ति का अर्थ नव- नियुक्त कर्मचारियों को निर्धारित कार्यों को सौंपना है।
पाॅल पिंगर्स एवं चाल्र्स ए0 मेयर्सके अनुसार- ‘‘कार्य पर नियुक्ति से आशय चयनित अभ्यर्थी को सौंपें जाने वाले कार्य का निर्धारण करना तथा वह कार्य उसे सौंपना है।’’
मानव संसाधन प्रबन्धन के अन्तर्गत कार्य पर नियुक्ति एक महत्वपूर्ण क्रिया होती है, क्योंकि इसके ठीक प्रकार से सम्पन्न किए जाने से कर्मचारी परिवर्तन, अनुपस्थितता, दुर्घटनाओं में कमी होती है तथा कर्मचारियों के मनोबल एवं कार्यक्षमताओं में वृद्धि होती है।
3. आगमन प्रक्रिया क्या है?
नवनियुक्त कर्मचारी, कार्य के प्रारम्भ में कुछ कठिनाई अनुभव कर सकता है, किन्तु यदि उसे कार्य के बारे में भली भांति पर्याप्त जानकारी दी जाये तो वह सुचारू रूप से कार्य कर सकता है। इस प्रकार कार्य परिचय “व्यक्ति को कार्य के बारे में जानकारी देने तथा सन्निहित समस्याओं को समझाने की प्रक्रिया है।” यह नये कर्मचारी की उत्सुकता को कम करने में सहायक होता है, जो उसे नये कार्य की जानकारी के लिए होती है।
4. मानव संसाधन नियोजन की अवधारणा क्या है?
मानव संसाधन नियोजन (Human Resource Planning) एक संगठित प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य संगठन की वर्तमान और भविष्य की मानव संसाधन आवश्यकताओं को पूरा करना है। यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि संगठन के पास सही समय पर, सही संख्या में, सही कौशल वाले कर्मचारी हों, जो संगठन के लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम हों। मानव संसाधन नियोजन संगठन की रणनीतिक योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके बिना संगठन अपने उद्देश्यों को कुशलतापूर्वक प्राप्त नहीं कर सकता।
मानव संसाधन नियोजन की प्रमुख अवधारणाएँ
मांग और आपूर्ति का पूर्वानुमान (Forecasting Demand and Supply):
मानव संसाधन नियोजन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संगठन को अपने भविष्य की मानव संसाधन आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाना होता है। इसमें संगठन की वृद्धि, विस्तार, तकनीकी उन्नति, और बाजार की स्थिति को ध्यान में रखा जाता है। इसके साथ ही, वर्तमान कर्मचारियों की उपलब्धता और उनकी कौशल का आकलन भी किया जाता है।
- उदाहरण: एक सॉफ्टवेयर कंपनी अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए कितने सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, टेस्टर्स, और प्रोजेक्ट मैनेजर्स की आवश्यकता होगी, इसका पूर्वानुमान लगाती है।
कौशल विश्लेषण (Skill Analysis):
संगठन को यह जानना जरूरी है कि उसके वर्तमान कर्मचारियों के पास कौन-कौन से कौशल हैं और कौन-कौन से कौशल भविष्य में आवश्यक होंगे। इसके लिए कौशल विश्लेषण किया जाता है, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि किस प्रकार का प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए।
- उदाहरण: कंपनी में वर्तमान में काम कर रहे डेवलपर्स के कौशल का विश्लेषण किया जाता है और यह तय किया जाता है कि उन्हें नई प्रोग्रामिंग भाषाओं में प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
प्राप्ति और चयन (Recruitment and Selection):
मानव संसाधन नियोजन के अंतर्गत आवश्यक मानव संसाधनों की प्राप्ति और चयन भी शामिल है। इसमें नए कर्मचारियों की भर्ती और चयन की प्रक्रिया का निर्धारण किया जाता है।
- उदाहरण: कंपनी ने यह निर्धारित किया है कि उसे 10 नए डेवलपर्स की आवश्यकता है, तो वह एक भर्ती अभियान चलाती है और उपयुक्त उम्मीदवारों का चयन करती है।
प्रशिक्षण और विकास (Training and Development):
भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कर्मचारियों का प्रशिक्षण और विकास किया जाता है। इससे कर्मचारी नए कौशल सीखते हैं और संगठन की बदलती जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होते हैं।
- उदाहरण: नई प्रोग्रामिंग भाषा के लिए कर्मचारियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
कार्य और उत्तरदायित्व का निर्धारण (Job and Responsibility Allocation):
संगठन में विभिन्न कार्य और उत्तरदायित्वों का उचित निर्धारण किया जाता है ताकि प्रत्येक कर्मचारी अपने कार्य को सही ढंग से समझ सके और संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में योगदान कर सके।
- उदाहरण: हर डेवलपर को उनकी विशेषज्ञता के अनुसार प्रोजेक्ट्स आवंटित किए जाते हैं।
निगरानी और मूल्यांकन (Monitoring and Evaluation):
मानव संसाधन नियोजन की प्रक्रिया की निगरानी और मूल्यांकन किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से काम कर रही है और संगठन की आवश्यकताओं को पूरा कर रही है।
- उदाहरण: प्रोजेक्ट्स के दौरान कर्मचारियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाता है और आवश्यकतानुसार सुधार किए जाते हैं।
निष्कर्ष
मानव संसाधन नियोजन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो संगठन को उसके लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करती है। यह प्रक्रिया संगठन की मानव संसाधन आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाती है, आवश्यक कौशल का निर्धारण करती है, और कर्मचारियों की भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, और विकास का प्रबंधन करती है। मानव संसाधन नियोजन के माध्यम से संगठन अपने संसाधनों का सही उपयोग कर सकता है और प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त कर सकता है।
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UNIT -3
1. अभिप्रेरणा को परिभाषित कीजिए। अभिप्रेरण का अर्थ एवं परिभाषायें अभिप्रेरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो किसी शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक कमी या आवश्यकता के साथ प्रारम्भ होती है, जो कि व्यवहार अथवा चालक को उत्तेजित करती है तथा जो किसी लक्ष्य अथवा प्रेरक के लिए प्रयत्न करती है। इस प्रकार, अभिप्रेरण की प्रक्रिया आवश्यकताओं, चालकों तथा प्रेरकों के बीच सम्बन्धों पर आश्रित होती है। अतः इन अवधारणाओं को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है, जो इस प्रकार हैंः- आवश्यकतायें, किसी अभाव अथवा कमी को कहते है। जब कोई शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक असन्तुलन हो जाता है तो व्यक्ति की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है। चालक से तात्पर्य दिशा सहित कमी से है ये कार्य अभिमुखी होते हैं तथा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एक धक्का अथवा प्रहार प्रदान करते हैं। प्रेरक, वह आन्तरिक उद्दीपक है जो व्यक्ति को कोई क्रिया करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अभिप्रेरण को विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से पारिभाषित किया है। इसकी कुछ प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित प्रकार से है:- 1.जे. एल. ग्रे एवं एफ. ए. स्टार्क के अनुसार,‘‘अभिप्रेरण एक व्यक्ति की आन्तरिक अथवा बाहृय प्रक्रियाओं व परिणाम होता है, जो कि एक निश्चित कार्यावधि के लिए कार्य करने हेतु उसके उत्साह एवं लगन को उत्तेजित करता है।” 2.फ्रेड लुथान्स के अनुसार,‘‘अभिप्रेरण एक प्रक्रिया है, जो किसी शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक कमी या आवश्यकता के साथ प्रारम्भ होती है,जो व्यवहार अथवा एक चालक को उत्तेजित करती है तथा जो किसी लक्ष्य अथवाप्रेरक के लिए प्रयत्न करती है।‘‘ 2. योग्यता अंकन को परिभाषित कीजिए। योग्यता अंकन की परिभाषा-योग्यता अंकन की कुछ परिभाषायें इस प्रकार है (1) स्कॉट क्लोथियर एवं स्प्रीगल के अनुसार, ‘‘योग्यता अंकन कृत्य की पूर्वाश्यकताओं के सन्दर्भ में कर्मचारी के कार्य-निष्पादन के मूल्यांकन करने की प्रक्रिया है।‘‘ (2) अलफोर्ड एवं बीटी के अनुसार, ‘‘कर्मचारी या कार्मिक अंकन किसी व्यक्ति की अपने कृत्य पर की जाने वाली सेवाओं का कम्पनी को होने वाले सापेक्षिक लाभ का अंकन या मूल्यांकन है। (3) जॉन ए. शुबिन के अनुसार, ‘‘योग्यता अंकन, कृत्य पर कर्मचारी के व्यक्तित्व शील-गुणों एव कार्य निष्पादन का एक व्यवस्थित मूल्यांकन और फर्म के लिए कर्मचारी के योगदान एवं सापेक्षित मूल्य के निर्धारण का ढाँचा है। (4) एडविन वी. फिलप्पो के अनुसार, ‘‘योग्यता अंकन किसी कर्मचारी की विशिष्टता या श्रेष्ठता का उसके वर्तमान कृत्य और उसके श्रेष्ठतर कृत्य सम्भावनों के सम्बन्ध में व्यवस्थित, सामयिक और जहाँ तक मानवीय ढंग से सम्भव हो, एक निष्पक्ष अंकन है। 3. पुरस्कार क्या है? मानव संसाधन प्रबंधन में पुरस्कार (Rewards) का मतलब कर्मचारियों को उनके कार्यों, प्रयासों और योगदान के लिए पहचान देना और उन्हें प्रोत्साहित करना होता है। पुरस्कार प्रणाली का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को प्रोत्साहित करना, उनकी उत्पादकता बढ़ाना, और संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करना है। एक प्रभावी पुरस्कार प्रणाली से कर्मचारियों की संतुष्टि, प्रेरणा, और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा बढ़ती है। 4. कार्य मूल्यांकन का अर्थ बताइए।
कार्य मूल्यांकन कार्य का वह अध्ययन है जिसके द्वारा एक कार्य की अन्य कार्यो से तुलना की जाती है। जब कार्य विश्लेषण द्वारा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कार्य-विवरण निर्धारित कर लिये जाते हैं, तो कार्य मूल्यांकन का आरंभ कर दिया जाता है। योडर ने इसे एक व्यवहार की संज्ञा दी है। जिसके द्वारा किसी एक संगठन में अथवा समरूपी कई संगठनों में किये जा रहे कार्य का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः कार्य मूल्यांकन, कार्य के वर्गीकरण से सम्बन्धित क्रिया है। कार्य के वर्गीकरण के पश्चात विभिन्न कर्मचारियों द्वारा किये जा रहे कार्यो में अंतर ज्ञात कर लिया जाता है। तथा उत्पादन की मात्रा कम होने के कारणों का पता लगाया जाता है। इसी के आधार पर मजदूरी की दर की गणना की जाती है। तथा व्यक्ति की कुशलता, अनुभव, उत्तरदायित्व तथा पहल करने की क्षमता का पता लगाया जा सकता है इतना ही नहीं कार्य मूल्यांकन नई भर्तियों, कार्य प्रणाली में सुधार तथा परिवाद निवारण प्रणाली में आधार का कार्य करता है। 5. प्रशिक्षण के प्रकार लिखिए। प्रशिक्षण के प्रकार-प्रशिक्षण का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जा सकता है। प्रशिक्षण के उद्देश्य, विधि, साधन, प्रशिक्षण, प्राप्तकत्र्ता आदि सभी आधारों को सम्मिलित करते हुए प्रशिक्षण के प्रमुख प्रकार निम्न हैं-
- प्रारम्भिक प्रशिक्षण (OrientationTraining)
- कार्य प्रशिक्षण (JobTraining)
- पदोन्नति प्रशिक्षण (TrainingForPromotion)
- पुर्नअभ्यास प्रशिक्षण (RefresherTraining)
- मनोवृत्ति प्रशिक्षण (AttitudeTraining)
- सुरक्षात्मक प्रशिक्षण
- बहुमुखी प्रशिक्षण (VersatilityTraining)
- उपचारात्मक प्रशिक्षण (RemedialTraining) NOT मानव संसाधन प्रबंधन में पुरस्कार (Rewards in Human Resource Management) मानव संसाधन प्रबंधन में पुरस्कार (Rewards) का मतलब कर्मचारियों को उनके कार्यों, प्रयासों और योगदान के लिए पहचान देना और उन्हें प्रोत्साहित करना होता है। पुरस्कार प्रणाली का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को प्रोत्साहित करना, उनकी उत्पादकता बढ़ाना, और संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करना है। एक प्रभावी पुरस्कार प्रणाली से कर्मचारियों की संतुष्टि, प्रेरणा, और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा बढ़ती है। पुरस्कार के प्रकार वित्तीय पुरस्कार (Financial Rewards): उदाहरण: बोनस, वेतन वृद्धि, लाभांश, प्रोत्साहन भुगतान (Incentives) आदि। विवरण: वित्तीय पुरस्कार कर्मचारियों को आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं और उन्हें अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, एक कंपनी अपने कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर वार्षिक बोनस देती है। गैर-वित्तीय पुरस्कार (Non-Financial Rewards): उदाहरण: प्रशंसा पत्र, पुरस्कार प्रमाणपत्र, ट्रॉफी, सार्वजनिक मान्यता, अतिरिक्त छुट्टियाँ आदि। विवरण: गैर-वित्तीय पुरस्कार कर्मचारियों को सामाजिक और मानसिक संतुष्टि प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, एक कंपनी अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कर्मचारी को "कर्मचारी of the Month" का पुरस्कार देती है। लाभ और सुविधाएँ (Benefits and Perks): उदाहरण: स्वास्थ्य बीमा, पेंशन योजनाएँ, यात्रा भत्ता, आवास सुविधा, प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि। विवरण: ये पुरस्कार कर्मचारियों को दीर्घकालिक सुरक्षा और अतिरिक्त सुविधाएँ प्रदान करते हैं, जिससे वे अपने कार्य और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक कंपनी अपने कर्मचारियों को स्वास्थ्य बीमा और पेंशन योजनाओं का लाभ देती है। प्रगति और विकास के अवसर (Career Advancement and Development Opportunities): उदाहरण: प्रोमोशन, ट्रेनिंग प्रोग्राम, मेंटरशिप, कार्यस्थल पर शिक्षा के अवसर आदि। विवरण: ये पुरस्कार कर्मचारियों को उनके करियर में आगे बढ़ने और नई कौशल सीखने के अवसर प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, एक कंपनी अपने कर्मचारियों को उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता और समय की सुविधा प्रदान करती है। पुरस्कार प्रणाली का महत्व प्रेरणा और संतुष्टि (Motivation and Satisfaction): पुरस्कार प्रणाली कर्मचारियों को उनके कार्य में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती है और उनकी नौकरी से संतुष्टि बढ़ाती है। इससे उनकी उत्पादकता में वृद्धि होती है। उदाहरण: एक सॉफ्टवेयर कंपनी अपने सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को साल के अंत में बोनस देती है, जिससे अन्य कर्मचारी भी प्रेरित होते हैं। निष्ठा और प्रतिबद्धता (Loyalty and Commitment): पुरस्कार प्रणाली कर्मचारियों को संगठन के प्रति निष्ठावान और प्रतिबद्ध बनाती है, जिससे वे लंबे समय तक संगठन के साथ जुड़े रहते हैं। उदाहरण: एक कंपनी अपने दीर्घकालिक कर्मचारियों को विशेष लाभ और पुरस्कार देती है, जिससे वे कंपनी के प्रति और भी निष्ठावान हो जाते हैं। प्रतिभा आकर्षण और प्रतिधारण (Talent Attraction and Retention): एक प्रभावी पुरस्कार प्रणाली उच्च प्रतिभा को आकर्षित करने और बनाए रखने में मदद करती है। इससे संगठन की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। उदाहरण: एक कंपनी अपनी नौकरी विज्ञप्ति में लाभ और पुरस्कार योजनाओं का उल्लेख करती है, जिससे उच्च योग्यताधारी उम्मीदवार आकर्षित होते हैं। सकारात्मक कार्य संस्कृति (Positive Work Culture): पुरस्कार प्रणाली संगठन में सकारात्मक और प्रोत्साहनमूलक कार्य संस्कृति को बढ़ावा देती है। उदाहरण: एक कंपनी नियमित रूप से अपने कर्मचारियों के छोटे-छोटे योगदान को पहचानती है और उन्हें धन्यवाद कहती है, जिससे कार्यस्थल का वातावरण सकारात्मक बनता है। निष्कर्ष मानव संसाधन प्रबंधन में पुरस्कार प्रणाली कर्मचारियों की प्रेरणा, संतुष्टि, और निष्ठा बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक प्रभावी पुरस्कार प्रणाली से संगठन अपनी प्रतिभा को आकर्षित कर सकता है, बनाए रख सकता है और अपनी उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार कर सकता है। पुरस्कार प्रणाली का सही उपयोग संगठन के दीर्घकालिक विकास और सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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UNIT - 4
1. संगठनात्मक संघर्ष को परिभाषित करें।
औद्योगिक संघर्ष से तात्पर्य उपक्रमों में उत्पन्न होने वाले ऐसे विवादों या मतभेदों से है जो धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक संघर्ष का रूप धारण कर लेते हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(ज्ञ) के अनुसार ‘औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय सेवायोजकों एवं सेवायोजकों के मध्य या सेवायोजको एवं श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों के मध्य उत्पन्न किसी विवाद या मतभेद से है जोकिसी भी व्यक्ति के रोजगार या रोजगार की भर्ती या कार्य की दशाओं से सम्बन्धित है।’’डेल योडर ने औद्योगिक विवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है कि’’औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय कर्मचारियों के ऐसे व्यवहार से है जो कार्य के प्रति विद्यमान असन्तोष को व्यक्त करता है तथा यह एक ऐसी भावना है जो रोजगार सम्बन्धी व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं तथा कर्मचारियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहें हैं।
2. संघर्षों के कोई तीन कारणबताइए।
भारत में औद्योगिक संघर्ष- भारत में औद्योगिक संघर्षों के इतिहास से स्पष्ट है कि वे यहां बहुत ही सामान्य होते हैं। इनका मुख्य कारण उद्योगपतियों व श्रमिकों के बीच पाये जाने वाले आपसी मतभेद हैं। इन मतभेदों के बहुत से कारण हैं, जिनमें से कुछ आर्थिक कुछ मनोवैज्ञानिक हैं, कुछ राजनीतिक व सामाजिक हैं, और कुछ प्रबन्ध सम्बन्धी हैं। औद्योगिक संघर्ष के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं-
(1) कम मजदूरी- भारतीय उद्योगों में श्रमिक की मजदूरी की दर बहुत ही कम है। यह दर इतनी कम रही है कि इससे श्रमिक अपनी जीवन सम्बन्धी आवश्यकता की भी पूर्ति करने में असमर्थ रहे हैं। फलस्वरूप वे अपनी मजदूरी को बढ़वाने के लिए हड़तालें करते हैं। यहीउनके पास एक महत्वपूर्ण हथियार है।
(2) बोनस तथा महँगाई आदि- बहुत से औद्योगिक संघर्ष बोनस व महँगाई आदि से सम्बन्धित होते हैं। कुछ फर्म या उद्योगपति अपने श्रमिकों को वार्षिक लाभ में कुछ भाग बोनसके रूप में बाँट देते हैं। ऐसा करने से एक तो श्रमिकों की आय में वृद्धि हो जाती है। और दूसरा उनका फर्म या उद्योग के साथ लगाव हो जाता है, परन्तु अधिकतर उद्योगपति की इस लाभ को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। परिणामस्वरूप श्रमिक उसकी माँग करते हैं। मांग को पूर्ति न दिखाई देने पर श्रमिक हड़तालें कर बैठते हैं। इस प्रकार महंगाई भत्ता आदि कोे बढ़ाने के लिए कभी-कभी हड़ताले कर बैठते हैं।
(3) काम करने के घण्टे- कुछ औद्योगिक संषर्घों का कारण काम करने के घंटे भी हैं। बहुत से उद्योगपति की धारणा है कि अधिक घंटो तक काम से लाभ होता है या नहीं यह तो दूसरा प्रश्न है, परन्तु इस बात से श्रमिकों के बीच असन्तोष फैलता है और वे काम के घण्टे कम करने के लिए हड़ताले करते हैं।
(4) काम की दशा- बहुत से औद्योगिक संघर्ष काम करने की दशाओं से सम्बन्धित काम होते हैं। प्रायः देखने में आता है कि कारखानों के अन्दर-बाहर इतनी गन्दगी रहती है कि श्रमिकों का स्वास्थ्य खराब होने का भय रहता है। कारखाने के अन्दर न विश्रामगृह का उचित प्रबन्ध रहता है और न कैंटीन, पाखाना, पेशाबघर तथा स्नानघर आदि का। ऐसी परिस्थिति में श्रमिक उचित माँग करते हैं और उन्हें यह काम हड़तालों की सहायता से करना पड़ता है।
(5) श्रमिक की छटनी- विवेकीकरण या किसी भी कारण से प्रभावित होकर जब कभी उद्योगपति श्रमिकों की छटनी करने लगते हैं, तो इस बेरोजगारी के युग में श्रमिकों को बड़ी कठिनाई हो जाती है। फलस्वरूप वे अपनी रक्षा के हेतु हड़ताल रूपी शस्त्र को ग्रहण करते हैं और उद्योगपतियों को बाध्य करते हैं कि वे उन्हें काम से न निकालें।
(6) प्रबन्धकों का व्यवहार-भारतीय प्रबन्धक, जिनमें निरीक्षक आदि सम्मिलित हैं, श्रमिकों को सदैव निम्न स्तर के समझते रहे हैं। उनसे सम्मान के साथ बात करना या सहृदयता के साथ किसी प्रकार के सुझाव देना अपना अपमान समझते हैं। छोटी छोटी बातों में श्रमिकों को परेशान करना या बुरे शब्दों का प्रयोग करना तथा इस व्यवहार पर शिकायत करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार करना, उनके ऊपर जुर्माना करना आदि के परिणामस्वरूप श्रमिकों को इन व्यवहारों से बचने के लिए हड़ताल रूपी अस्त्र ग्रहण करना पड़ता है।
(7) श्रमिकों की भर्ती की पद्धति- औद्योगिक संघर्ष का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण कारखानों तथा अन्य उद्योगों में श्रमिकों की भर्ती करने की अत्यन्त दोषपूर्ण पद्धति है। श्रमिकों श्री भर्ती ठेकेदार, मिस्त्रियों और जमींदारों आदि मध्यस्थों द्वारा होती है। ये श्रमिकों से घूस आदि लेते हैं और उनका मनचाहे ढंग से शोषण करना चाहते हैं। इनके दुर्व्यवहारों तथा शोषण की प्रवृत्ति से परेशान होकर श्रमिक हड़ताल करते हैं और औद्योगिक शान्ति भंग हो जाती है।
(8) श्रमिकों की अशिक्षा एवं अज्ञानता-भारतीय श्रमिक अधिकतर अशिक्षित एवं अनभिज्ञ होते हैं। वे अपनी अच्छाई-बुराई को स्वयं नहीं सोच सकते हैं वे दूसरों के द्वारा बहलाये हुए मार्ग को ही अपना लेते हैं। उनकी दशा का अनुचित लाभ उठाते हुए कुछ स्वार्थी व्यक्तियों ने उनमें कटुता व वैमनस्य की भावना जागृत कर दी है। इससे संघर्ष को बढ़ावा मिलता है।
(9) असंतोषजनक भावना- कम अवकाश या विश्राम के कम अवसर मिलने के कारण श्रमिकों में असन्तोषजनक भावना उत्पन्न हो जाती है। इस असन्तोष की भावना को उद्योगपतियों के अनेक निन्दनीय व्यवहार जैसे महीने में केवल दो ही अपने कार्य देना, श्रमिकों को नौकरी में अस्थिरता बनाये रखना इत्यादि और अधिक बढ़ा देते हैं। परिणामतः संघर्ष इस असन्तोष के कारण हो जाया करते हैं।
(10) श्रम संघ-औद्योगिक अशान्ति का एक मुख्य कारण श्रम संघ की स्थापना उनका विकास है। श्रम संघों को इसके लिए उत्तरदायी बताया जाता है, क्योंकि इनकी स्थापना तथा विकास के पूर्व औद्योगिक संघर्ष केवल नाममात्र के थे। उद्योगपति इनको अपने अधिकारों के प्रति चुनोती समझते हैं इसलिए वे इनके विकास में बाधा उपस्थित करने का प्रयत्न करते हैं और परिणामस्वरूप संघर्ष उत्पन्न होता है।
(11) राजनीतिक कारण-भारत में औद्योगिक संघर्ष का एक कारण राजनीतिक भी है। कुछ वर्ष पूर्व देश ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था तथा यहाँ के श्रम आन्दोलन का देश के राष्ट्रीय आन्दोलन से बहुत निकट का सम्बन्ध था। सन् 1908 में मुम्बई में हुई बड़ी हड़ताल का कारण भी लोकमान्य तिलक को 6 वर्ष का कारावास था। असहयोग एवं नागरिक अवज्ञा आन्दोलन के परिणामस्वरूप भी अनेक हड़तालें संगठित की गयी थीं। राजनीतिक नेताओं के मुकदमों में भाग लेने के कारण श्रमिकों को निकाले जाने या उनके प्रति अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के विरोध में भी हड़तालों का आयोजन किया जाता रहा है। विदेशी माल के बहिष्कार, राजनीतिक प्रदर्शनों में भाग लेने, यूरोपीय मैनेजरों का अपमान करने पर श्रमिकों को दण्ड दिया जाना तथा उनके द्वारा विरोध किया जाना भी अनेक हड़तालों का कारण बन चुका है।
(12) साम्यवादी विचारधारा-औद्योगिक संघर्ष का एक मुख्य कारण साम्यवादी विचारधारा का विकास है। इस विचारधारा का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों को अधिकार देना है। इस विचारधारा वाले नेता श्रमिकों के लिए नाना प्रकार की सुविधाओं तथा उनके अधिकारों की माँग करते हैं। उदाहरण के लिए इन लोगों का कहना है कि औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों को प्रबन्ध करने में भाग लेने का अधिकार मिलना चाहिए। इस प्रकार से ये लोग चाहते हैं कि श्रमिकों को लाभ में से भाग मिलना चाहिए आदि। ये लोग पूँजीपतियों को अपना दुश्मन मानते हैं। इन सब भावनाओं से प्रेरित होकर श्रमिक हड़ताल करबैठते हैं और औद्योगिक शान्ति भंग हो जाती है।
3. संघर्षों के समाधान में सामाजिक कार्यकर्ता कौन-कौन सी विधियाँ इस्तेमाल करता है?
संघर्षों के समाधान में सामाजिक कार्यकर्ता कौन-कौन सी विधियाँ इस्तेमाल करता है?
मध्यस्थता (Mediation):
- सामाजिक कार्यकर्ता दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करते हैं, जिससे वे एक समझौते पर पहुंच सकें।
- यह प्रक्रिया तटस्थ और निष्पक्ष होती है, और इसका उद्देश्य संघर्ष को हल करना होता है।
समूह चर्चा (Group Discussion):
- विवादित पक्षों को एक साथ लाकर समूह चर्चा कराई जाती है।
- इस विधि में सभी पक्षों को अपनी समस्याओं और विचारों को साझा करने का मौका मिलता है।
संवाद और संचार (Communication and Dialogue):
- सामाजिक कार्यकर्ता खुले और स्पष्ट संवाद को प्रोत्साहित करते हैं।
- इस विधि से गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है और समझ में सुधार हो सकता है।
समझौता (Negotiation):
- दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की प्रक्रिया।
- इसमें समाधान के लिए दोनों पक्षों को कुछ रियायतें देनी पड़ती हैं।
प्रशिक्षण और विकास (Training and Development):
- संघर्ष प्रबंधन, संचार कौशल और टीम वर्क में प्रशिक्षण प्रदान करना।
- इससे कर्मचारियों की क्षमता और सहयोग को बढ़ावा मिलता है।
परामर्श (Counseling):
- व्यक्तिगत या समूह परामर्श सत्र आयोजित करना।
- इससे भावनात्मक समर्थन और संघर्ष के कारणों की गहरी समझ मिलती है।
4. संगठनात्मक संघर्षों का नकारात्मक पक्ष क्या है?
औद्योगिक विवादों के दुष्परिणाम
हड़ताल व तालाबन्दी का देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रो. पीगू के अनुसार, ‘‘इन झगड़ों के फलस्वरूप देश की पूंजी व श्रम शक्ति बेकार पड़ी रहती है जिससे उत्पादन की मात्रा, राष्ट्रीय आय तथा सामाजिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।‘‘ औद्योगिक विवादों के दुष्परिणाम निम्नलिखित है-
1. श्रमिकों पर प्रभाव- श्रम संघर्ष से सबसे अधिक हानि श्रमिकों को होती है। उन्हें हड़ताल या तालाबन्दी के समय की मजदूरी नहीं मिलती। हड़ताल समाप्त होने के बाद मिल मालिक श्रमिकों को परेशान करते हैं और उन पर अनेक प्रकार के दोष लगाकर उन्हें निकालने का प्रयत्न करते हैं।
2. उद्योगपतियों को हानि- औद्योगिक झगड़ों के समय उद्योग में लगी पूंजी बेकार पड़ी रहती है तथा उत्पादन बन्द रहता है किन्तु पूंजी से समाज व कर्मचारियों का वेतन तो देना ही पड़ता है अतः उद्योगपतियों को हानि होती है।
3. उपभोक्ताओं को हानि- औद्योगिक झगड़ों के समय कारखाने बन्द हो जाते हैं तथा उत्पादन घट जाता है। इस कारण बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है जिससे उपभोक्ताओंको ऊंचे मूल्य चुकाने पड़ते हैं।
4. उत्पादन में कमी- औद्योगिक झगड़ों के समय कारखाना बन्द हो जाने से उत्पादन कम हो जाता है जिसका राष्ट्रीय आय व प्रति व्यक्ति आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
5. अन्य प्रभाव-
(i) हड़तालग्रस्त उद्योगों में अनुशासन व्यवस्था समाप्त हो जाती है,
(ii) समाज में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है,
¼iii) सरकार की आय घट जाती है
(iv) रेल, डाक, संचार, बिजली से सम्बन्धित संस्थाओं में हड़ताल जनता के लिए बड़ी कष्टदायी होती है।
UNIT - 5
1. संगठनात्मक संघर्ष को परिभाषित करें।
संगठनात्मक संघर्ष वह स्थिति है जिसमें संगठन के भीतर के व्यक्तियों या समूहों के बीच मतभेद, तनाव या असहमति उत्पन्न होती है। यह विभिन्न कारणों से हो सकता है, जैसे संसाधनों की कमी, व्यक्तिगत मतभेद, या कार्यों और भूमिकाओं में अस्पष्टता।
2. संघर्षों के कोई तीन कारण बताइए।
- संसाधनों की कमी: सीमित संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा से संघर्ष उत्पन्न हो सकता है।
- व्यक्तिगत मतभेद: व्यक्तियों के बीच व्यक्तिगत मतभेद, जैसे व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और मूल्य संघर्ष का कारण बन सकते हैं।
- कार्य भूमिकाओं की अस्पष्टता: कार्य भूमिकाओं और जिम्मेदारियों की अस्पष्टता के कारण भी संघर्ष हो सकता है, क्योंकि यह भ्रम और गलतफहमी पैदा कर सकता है।
3. संघर्षों के समाधान में सामाजिक कार्यकर्ता कौन-कौन सी विधियाँ इस्तेमाल करता है?
- मध्यस्थता: तटस्थ तीसरे पक्ष के रूप में मध्यस्थता करके।
- समझौता और सहयोग: दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने और सहयोग को बढ़ावा देकर।
- संवाद और संचार: खुले और स्पष्ट संवाद को प्रोत्साहित करके जिससे गलतफहमियों को दूर किया जा सके।
4. संगठनात्मक संघर्षों का नकारात्मक पक्ष क्या है?
- उत्पादकता में कमी: संघर्षों से ध्यान भटकता है और कार्यक्षमता कम हो जाती है।
- मनोरंजन और मनोबल में गिरावट: लगातार संघर्ष से कर्मचारियों का मनोबल गिर सकता है।
- संगठनात्मक वातावरण पर प्रभाव: संघर्षों से संगठनात्मक माहौल नकारात्मक हो सकता है, जिससे कार्य के प्रति असंतोष और तनाव बढ़ता है।
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