UNIT - 1
1. मानव संसाधन प्रबंधन की श्रेणियों का वर्णन करें।
मानव संसाधन की श्रेणियाँसंसाधनों के बिना कोई भी उपक्रम कार्य नहीं कर सकता है। एक संगठन के संसाधनों को मुख्य रूप से निम्न तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है
1.भौतिक संसाधन ¼Physical Resources½ इनमें यंत्र, मशीनें, उपकरण, भूमि, भवन, संयत्र आदि शामिल हैं।
2.वित्तीय संसाधन¼FinancialResources½ इनमें पूँजी, मुद्रा, धनसम्पत्ति, माल, अर्द्धनिर्मित वस्तुऐं आदि शामिल हैं।
3.मानव संसाधन ¼HumanResources½मानव संसाधनों में संगठन में नियुक्त समस्त श्रेणियों के कर्मचारियों, श्रमिक, फोरमैन, इंजीनियर्स, तकनीशियन, कार्यालय कर्मचारी व प्रबंधकों को शामिल किया जाता है।
मानव संसाधन व्यवसाय के सबसे महत्वपूर्ण एवं मूल्यांकन संसाधन होते हैं। व्यक्ति ही व्यवसाय को चलाते हैं। मानव संसाधन व्यवसाय के विशिष्ट संसाधन होते हैं। इसके बिना कोई भी संस्था कार्य नहीं कर सकती।
or
मानव संसाधन प्रबंधन की श्रेणियाँ
मानव संसाधन प्रबंधन की श्रेणियाँ विभिन्न प्रकार के संसाधनों को संगठित और प्रबंधित करने पर केंद्रित होती हैं, जो किसी भी संगठन के संचालन के लिए आवश्यक होते हैं। इन्हें मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
1. भौतिक संसाधन (Physical Resources)
भौतिक संसाधनों में वे सभी भौतिक वस्तुएँ और संपत्तियाँ शामिल हैं, जो किसी संगठन के संचालन के लिए आवश्यक होती हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल होते हैं:
- यंत्र और मशीनें: उत्पादन और संचालन के लिए आवश्यक उपकरण।
- उपकरण: विभिन्न कार्यों के निष्पादन के लिए उपयोगी उपकरण।
- भूमि और भवन: संगठन के संचालन के लिए आवश्यक भौतिक स्थान।
- संयंत्र: उत्पादन के लिए आवश्यक संयंत्र और उसकी स्थापना।
2. वित्तीय संसाधन (Financial Resources)
वित्तीय संसाधन संगठन के आर्थिक संसाधनों को संदर्भित करते हैं, जिनका उपयोग संगठन के कार्यों को वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है। इसमें शामिल हैं:
- पूँजी: निवेश और संचालन के लिए आवश्यक धन।
- मुद्रा: दैनिक लेन-देन और अन्य वित्तीय गतिविधियों के लिए नकद धन।
- धनसम्पत्ति: संगठन की वित्तीय संपत्तियाँ और भंडार।
- माल: संगठन के पास उपलब्ध वस्त्र और उत्पाद।
- अर्द्धनिर्मित वस्तुएँ: उत्पादन प्रक्रिया में उपयोगी वस्तुएँ जो अभी पूर्ण नहीं हुई हैं।
3. मानव संसाधन (Human Resources)
मानव संसाधन संगठन में काम करने वाले सभी लोगों को संदर्भित करते हैं। यह श्रेणी किसी भी संगठन के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि लोग ही व्यवसाय को संचालित करते हैं। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- कर्मचारी: संगठन के विभिन्न विभागों में काम करने वाले लोग।
- श्रमिक: उत्पादन और संचालन में लगे श्रमिक।
- फोरमैन: कार्य स्थलों पर कर्मचारियों के निरीक्षण और मार्गदर्शन के लिए जिम्मेदार व्यक्ति।
- इंजीनियर्स: तकनीकी समस्याओं का समाधान करने और उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने वाले पेशेवर।
- तकनीशियन: विभिन्न तकनीकी कार्यों के लिए जिम्मेदार व्यक्ति।
- कार्यालय कर्मचारी: प्रशासनिक और लेखांकन कार्यों के लिए जिम्मेदार व्यक्ति।
- प्रबंधक: संगठन के विभिन्न स्तरों पर प्रबंधन और संचालन की जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति।
मानव संसाधन प्रबंधन का महत्व
मानव संसाधन किसी भी व्यवसाय के सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान संसाधन होते हैं। व्यक्तियों की प्रभावशीलता और दक्षता संगठन की सफलता को सीधे प्रभावित करती है। मानव संसाधन निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण हैं:
- व्यवसाय का संचालन: व्यक्ति ही व्यवसाय को चलाते हैं और उनकी भूमिका व्यवसाय की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
- कौशल और ज्ञान: मानव संसाधन संगठन में आवश्यक कौशल और ज्ञान लाते हैं, जो व्यवसाय को प्रतियोगिता में बढ़त दिलाते हैं।
- नवाचार और सुधार: मानव संसाधन नवाचार और सुधार के माध्यम से संगठन की प्रगति में योगदान देते हैं।
- संभावित विकास: मानव संसाधन संगठन की क्षमता और संभावनाओं को विकसित करते हैं, जिससे संगठन दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकता है।
इस प्रकार, मानव संसाधन प्रबंधन की श्रेणियाँ और उनके महत्व को समझना संगठन की कार्यक्षमता और सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
2. मानव संसाधन प्रबंधन की प्रकृति कैसी है? बताइए।
मानव संसाधन प्रबंधन (Human Resource Management) की प्रकृति को समझने के लिए हमें इसके विभिन्न पहलुओं और बदलावों पर विचार करना होगा। पिछले दो दशकों में इसमें कई परिवर्तन आए हैं, जो इसकी आधुनिकता और प्रासंगिकता को बढ़ाते हैं। यहां मानव संसाधन प्रबंधन की प्रकृति के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है:
1. व्यवहारवादी और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
मानव संसाधन प्रबंधन अब केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं है। इसमें कर्मचारियों की मानसिक स्थिति, उनके व्यवहार, और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी शामिल किया गया है। यह समझा गया है कि कर्मचारियों की संतुष्टि और मानसिक स्वास्थ्य संगठन की उत्पादकता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2. मानवीय तत्व का महत्व
वर्तमान में उद्योगों और संगठनों में मानवीय तत्व को अधिक महत्व दिया जा रहा है। प्रौद्योगिकी, तकनीकी, कार्य पद्धतियों और उपकरणों की तुलना में मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी जाती है। इसका अर्थ है कि संगठन अपने कर्मचारियों को केवल एक संसाधन के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें एक मूल्यवान मानव के रूप में मान्यता देते हैं।
3. पेशेवर और तकनीकी दृष्टिकोण
मानव संसाधन प्रबंधन अब पेशेवर और तकनीकी दृष्टिकोण को अपनाता है। इसमें नवीनतम तकनीकों, उपकरणों और पद्धतियों का उपयोग किया जाता है ताकि कर्मचारियों की दक्षता और प्रभावशीलता को बढ़ाया जा सके।
4. दार्शनिक और व्यवहारवादी दृष्टिकोण
मानव संसाधन प्रबंधन की प्रकृति अब दार्शनिक और व्यवहारवादी होती जा रही है। इसमें मानवीय संबंधों और मूल्यों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसका उद्देश्य संगठन में सकारात्मक और सहायक वातावरण का निर्माण करना है।
5. प्रबंधकीय और प्रशासनिक कार्य
यद्यपि मानव संसाधन प्रबंधन में व्यवहारवादी और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश हुआ है, फिर भी यह प्रबंधकीय और प्रशासनिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। इसमें कर्मचारियों की भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, विकास, और मूल्यांकन शामिल हैं।
6. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
मानव संसाधन प्रबंधन में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें संगठन की संस्कृति, कर्मचारियों के आपसी संबंध, और संगठनात्मक व्यवहार का विश्लेषण शामिल है। यह दृष्टिकोण संगठन के भीतर समूह गतिशीलता और सामाजिक संबंधों को समझने में सहायक होता है।
निष्कर्ष
मानव संसाधन प्रबंधन की प्रकृति बहुआयामी और आधुनिक है। यह केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय तत्व, व्यवहारवादी दृष्टिकोण, पेशेवर और तकनीकी दृष्टिकोण, और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का समावेश है। इस बदलती प्रकृति ने मानव संसाधन प्रबंधन को अधिक प्रभावी, संवेदनशील, और संगठन के लिए आवश्यक बना दिया है।
3. मानव संसाधन प्रबंधन की विशेषताएं लिखिए।
मानव संसाधन प्रबंधन की विशेषताएँ
मानव संसाधन प्रबंधन (HRM) एक संगठन के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है, जो मानव संसाधनों के प्रबंधन, विकास और लाभकारी उपयोग पर केंद्रित होता है। इसके अंतर्गत कई प्रमुख विशेषताएँ शामिल होती हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है:
व्यवस्थित दृष्टिकोण (Systematic Approach):
HRM एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाता है, जो संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानव संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन और विकास पर ध्यान केंद्रित करता है। यह विभिन्न नीतियों, प्रक्रियाओं और प्रथाओं का उपयोग करके कर्मचारियों के प्रदर्शन और संतुष्टि को बढ़ाने का प्रयास करता है।
लक्ष्य-उन्मुख (Goal-Oriented):
HRM संगठन के उद्देश्यों और लक्ष्यों को ध्यान में रखकर नीतियाँ और योजनाएँ बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी मानव संसाधन गतिविधियाँ संगठन की रणनीतिक दृष्टि और मिशन के साथ संरेखित हों।
संपूर्ण विकास (Holistic Development):
HRM न केवल कर्मचारियों की वर्तमान क्षमताओं और कौशलों को सुधारता है, बल्कि उनके दीर्घकालिक विकास और कैरियर की वृद्धि पर भी ध्यान देता है। इसमें प्रशिक्षण, विकास, प्रदर्शन मूल्यांकन और कैरियर योजना शामिल होती है।
कर्मचारी कल्याण (Employee Welfare):
HRM कर्मचारी कल्याण को प्राथमिकता देता है। यह विभिन्न लाभ कार्यक्रम, स्वास्थ्य सेवाएँ, कार्यस्थल सुरक्षा और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से कर्मचारियों की भलाई सुनिश्चित करता है।
संबंध प्रबंधन (Relationship Management):
HRM का एक महत्वपूर्ण कार्य संगठन में सौहार्दपूर्ण संबंधों को बनाए रखना है। यह कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच विश्वास, पारदर्शिता और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न रणनीतियों और प्रथाओं का उपयोग करता है।
निरंतर सुधार (Continuous Improvement):
HRM संगठन में निरंतर सुधार की संस्कृति को बढ़ावा देता है। यह कर्मचारियों के प्रदर्शन की नियमित समीक्षा, प्रतिक्रिया और प्रशिक्षण के माध्यम से निरंतर विकास सुनिश्चित करता है।
कानूनी अनुपालन (Legal Compliance):
HRM विभिन्न श्रम कानूनों और विनियमों का पालन सुनिश्चित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि संगठन सभी कानूनी आवश्यकताओं का पालन कर रहा है और किसी भी कानूनी विवाद से बचा जा रहा है।
मापनीयता (Measurability):
HRM के कार्य और प्रक्रियाएँ मापनीय होती हैं। यह प्रदर्शन मूल्यांकन, कार्यस्थल संतोष सर्वेक्षण और अन्य मापदंडों के माध्यम से कर्मचारियों और संगठन की प्रगति का मूल्यांकन करता है।
लचीलापन (Flexibility):
HRM संगठन की बदलती आवश्यकताओं और बाहरी पर्यावरण के अनुसार लचीलापन अपनाता है। यह नई नीतियों, प्रक्रियाओं और प्रथाओं को अपनाकर संगठन की प्रतिस्पर्धात्मकता को बनाए रखने का प्रयास करता है।
संवेदनशीलता (Sensitivity):
HRM कर्मचारियों की जरूरतों, समस्याओं और अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील होता है। यह एक समावेशी और सहायक कार्य वातावरण बनाने का प्रयास करता है, जहाँ सभी कर्मचारी सुरक्षित और मान्य महसूस करते हैं।
निष्कर्ष
मानव संसाधन प्रबंधन की इन विशेषताओं के माध्यम से संगठन अपने कर्मचारियों को प्रेरित, विकसित और संतुष्ट रख सकता है। HRM का उद्देश्य न केवल संगठन की उत्पादकता और लाभदायकता बढ़ाना है, बल्कि एक स्वस्थ, प्रेरक और सकारात्मक कार्य वातावरण भी बनाना है। इन विशेषताओं के माध्यम से HRM संगठन की दीर्घकालिक सफलता और स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान देता है
4. मानव संसाधन प्रबंधन के उद्देश्यों को लिखिए।
मानव संसाधन प्रबंधन के उद्देश्य - मानव संसाधन प्रबंधन का उद्देश्य कर्मचारियों का इस प्रकार से प्रबंध करना है, जिससे कि मानवीय साधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हो सके।
आर0 सी0 डेविस ने मानव संसाधन प्रबंधन के उद्देश्यों को दो भागों में बांटा है-
- मूल उद्देश्य (Primary Object)
- गौण उद्देश्य (SecondaryObject)
1.मूल उद्देश्य (Primary Object)- मूल उद्देश्यों के अन्तर्गत वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्माण तथा वितरण सम्मिलित किया जाता है। सेविवर्गीय विभाग उत्पादन, विक्रय, वितरण एवं वित्त विभाग के लिए उचित कर्मचारियों के चुनाव तथा उनकी नियुक्ति में सहायता प्रदान करता है। इस विभाग का कार्य संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक ऐसे कार्य समूह का निर्माण करना है जो योग्यता तथा लगन के साथ कार्य करे। यह विभाग सभी कार्यरत व्यक्तियों में भ्रातरण की भावना जाग्रत करने तथा कर्मचारियों के व्यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति में भी सहायक होते हैं।
(क) मौद्रिक अभिप्रेरण -इसके माध्यम से कर्मचारी अधिक उत्पादन कर प्रबंधको को अधिक लाभार्जन में सहायता प्रदान करते हैं, जिससे प्रबंधकों के वेतन एवं भत्ते, स्वयं की मजदूरी तथा भत्ते, भू-स्वामी के लगान तथा अंशधारियों के लाभ तथा ब्याज की राशि बढ़ाती है।
(ख) अमौद्रिक अभिप्रेरण - इसके अन्तर्गत संगठन की प्रतिष्ठा बढ़ाना, ग्राहकों को अच्छी सेवा प्रदान, समाज के प्रति सेवाभाव रखना, समाज के सदस्यों के जीवन स्तर में वृद्धि करना सम्मिलित है।
2.गौण उद्देश्य -गौण उद्देश्यों का लक्ष्य मूल उद्देश्यों की प्राप्ति कम लागत पर कुशलतापूर्वक एवं प्रभावी ढंग से करना है।
उद्योगों में मानव संसाधन प्रबंधन के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि इसके उद्देश्य निम्न है-
(क) कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि करना,
(ख) कर्मचारियों में दलीय भावना का विकास,
(ग) सेविवर्ग का नैतिक उत्थान करना,
(घ) अच्छे मानवीय संबंध तथा अनुशासन बनाये रखना,
(ड़) मानवीय उद्देश्य
(क) कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि करना -प्रबंध अन्य व्यक्तियों से कार्य करवाने की कला है। अतः उपक्रम के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कुशल व्यक्तियों का होना अत्यन्त आवश्यक है। इस दृष्टि से सेविवर्गीय प्रबंधक का कार्य है कि वह साधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए सही व्यक्तियों को सही संख्या में, सही समय पर, सही स्थान पर कार्य प्रदान करे। इसके अतिरिक्त उन कर्मचारियों में कार्य ही पूजा है की भावना को जाग्रत करे जिससे उत्पादन व सेवायें भलीभंति उपलब्ध हो सके। प्रबंध की दृष्टि से कर्मचारियों का प्रबंध, दक्षता का प्रबंध है, जिसमें प्रबंधक से लेकर कर्मचारी एवं श्रमिक तक सभी व्यक्ति सम्मिलित किये जाते हैं।
(ख) कर्मचारियों में दलीय भावना का विकास -व्यवसाय के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि कर्मचारी एकजुट होकर कार्य करें। मानव संसाधन प्रबंधन का उद्देश्य कर्मचारियों में होने वाले मन मुटाव तथा मतभेदों के कारणों को ज्ञात करने, उन्हें दूर करने तथा सभी कार्यकर्ताओं में भाईचारा बनाये रखने का प्रयास करना है, जिससे कि संगठन में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित हो सकें।
(ग) सेविवर्ग का नैतिक उत्थान करना -नैतिकता व्यक्तियों को समीप लाती है, जिससे व्यक्ति मिलकर कार्य करते हैं क्योंकि उन सभी का लक्ष्य एक ही होता है। मानसिक प्रवृत्तियों के विभिन्न होने से तथा विभिन्न दबावों से कर्मचारी निष्ठापूर्वक कार्य करने की कठिनाई अनुभव करते है। यह मुख्यतः तब होता है जबकि श्रमिक अपने आपको अपनी उत्पादित वस्तु से अलग केवल कर्मचारी के रूप में पाता है।
(घ) अच्छे मानवीय संबंध तथा अनुशासन बनाये रखना-अच्छे मानवीय सम्बन्धों के द्वारा संगठन में अनुशासन बनाये रखा जा सकता है। सुदृढ़ औद्योगिक संगठन के लिए अच्छे मानवीय सम्बन्ध एक रामबाण औषधि की तरह है। सेविवर्गीय विभाग सदैव इस बात के लिए प्रयत्न करता है कि कर्मचारियों में आपसी सद्भाव, आत्म सम्मान तथा सद्भावना आदि गुणों का विकास हो तथा प्रबंध वर्ग तथा कर्मचारी वर्ग सहयोग से कार्य करें, साथ ही दोनों वर्ग अच्छे संबंध बनाये रखने के लिए आपस में एक-दूसरे के आर्थिक तथा मनोवैज्ञानिक हितों की रक्षा के लिए सतत् प्रयत्नशील रहें।
(ड़) मानवीय उद्देश्य-एप्पले के अनुसार, कर्मचारी प्रशासन ही प्रबंध है अतः मानव संसाधन प्रबंधन के मानवीय उद्देश्य काफी विस्तृत हैं।
निष्कर्षतयः सेविवर्गीय विभाग का यह उत्तरदायित्व है कि वे अच्छे कार्यकत्र्ताओं का चयन करे तथा उन्हें उचित स्थान पर कार्यरत करें, जिससे संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति हो सके। इसी हेतु संगठन की नीतियाँ निर्धारित करते समय कर्मचारियों की आवश्यकताओं, हितों तथा उनके उद्देश्यों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
5. मानव संसाधन विकास के लक्ष्य एवं उद्देश्य
मानव संसाधन विकास के लक्ष्य एवं उद्देश्य निम्नवत् हैं
1.संगठनों या संस्थानों के अन्तर्गत लोगों को उनकी प्रतिभाओं, आन्तरिक गुणों एवं शक्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करना तथा उसके लिए अनुकूल कार्यात्मक वातावरण को निर्मित करना।
2.संगठनात्मक स्वास्थ्य एवं संस्कृति का विकास करना।
3.प्रत्येक कर्मचारी तथा उसके सेवायोजक के मध्य सौहार्दपूर्ण सम्बन्धों को विकसित करना।
4.राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए कर्मचारियों की उत्पादकता तथा संगठनों की लाभदायकता में वृद्धि करना।
5.संस्थानों एवं संगठनों के अन्तर्गत समस्त कर्मचारियों, समूहों एवं इकाईयों के मध्य सहयोग एवं सहकारिता तथा टीम भावना का विकास करना।
6.वैयक्तिक एवं सामूहिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मानवीय संसाधनों की रचनात्मक क्षमताओं का विकास करना।
OR
मानव संसाधन विकास के लक्ष्य एवं उद्देश्य
मानव संसाधन विकास (HRD) का उद्देश्य संगठनों में कार्यरत लोगों की क्षमताओं को बढ़ाना और उनके विकास के अवसर प्रदान करना है। मानव संसाधन विकास के निम्नलिखित प्रमुख लक्ष्य और उद्देश्य हैं:
प्रतिभाओं, आन्तरिक गुणों एवं शक्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करना:
संगठनों या संस्थानों के अंतर्गत लोगों को उनकी प्रतिभाओं, आंतरिक गुणों एवं शक्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करना तथा उसके लिए अनुकूल कार्यात्मक वातावरण का निर्माण करना। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को उनकी पूरी क्षमता तक पहुँचने के लिए आवश्यक साधन और समर्थन प्रदान करना है।
संगठनात्मक स्वास्थ्य एवं संस्कृति का विकास करना:
संगठनात्मक स्वास्थ्य और संस्कृति का विकास करना, जिससे कार्यस्थल पर एक सकारात्मक और उत्पादक वातावरण बनाए रखा जा सके। यह लक्ष्य सुनिश्चित करता है कि संगठन के मूल्य, दृष्टिकोण और व्यवहार उसके दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ संरेखित हों।
सौहार्दपूर्ण संबंधों का विकास करना:
प्रत्येक कर्मचारी और उसके सेवायोजक के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंधों का विकास करना। यह उद्देश्य कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच विश्वास, सम्मान और समझ को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है, जिससे संगठन में बेहतर संचार और सहयोग हो।
आर्थिक विकास और लाभदायकता में वृद्धि करना:
राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए कर्मचारियों की उत्पादकता और संगठनों की लाभदायकता में वृद्धि करना। मानव संसाधन विकास नीतियाँ और कार्यक्रम इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए कर्मचारियों की कुशलता और कार्यकुशलता को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
सहयोग और टीम भावना का विकास करना:
संस्थानों और संगठनों के अंतर्गत समस्त कर्मचारियों, समूहों और इकाईयों के मध्य सहयोग और सहकारिता तथा टीम भावना का विकास करना। यह लक्ष्य टीम वर्क, समूह की गतिशीलता और सहयोगी प्रयासों को प्रोत्साहित करता है, जिससे संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति में मदद मिलती है।
रचनात्मक क्षमताओं का विकास करना:
व्यक्तिगत और सामूहिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मानवीय संसाधनों की रचनात्मक क्षमताओं का विकास करना। यह उद्देश्य कर्मचारियों को नई विचारों, नवाचारों और समस्याओं के समाधान में रचनात्मक बनने के लिए प्रोत्साहित करता है।
निष्कर्ष
मानव संसाधन विकास के लक्ष्य और उद्देश्य संगठन और उसके कर्मचारियों के समग्र विकास और प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह न केवल कर्मचारियों की व्यक्तिगत और पेशेवर क्षमताओं को बढ़ाता है, बल्कि संगठन की उत्पादकता, लाभदायकता और संस्कृति को भी सुदृढ़ करता है। मानव संसाधन विकास के माध्यम से संगठनों को एक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त होता है, जो उन्हें उनके दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।
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UNIT -2
1. चयन प्रक्रिया क्या है?
चयन प्रक्रिया (Selection Process)
कर्मचारियों की चयन प्रक्रिया योग्य कर्मचारियों के चुनाव की एक लम्बी श्रंखला है, जिसमें उनकी शारीरिक व मानसिक योग्यता व रूचि का विभिन्न प्रकार से परीक्षण किया जाता है तथा योग्य पाने पर ही उनका चुनाव किया जाता है। कुशल एवं उपयुक्त कर्मचारी का चयन एक सरल कार्य नहीं है। अतः चयन प्रक्रिया में आवेदन को विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्रकारों से परखा जाता है।
डेल योडर के अनुसार-“चयन प्रक्रिया को बाधाओं के क्रम के रूप में भी वर्णित किया जाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया के दौरान एक प्रार्थी को एक-एक करके अनेक बाधाओं को पार करना पड़ता है।”
सभी संस्थाओं में समान प्रकार की चयन प्रक्रिया का प्रयोग नही किया जाता है। संस्थायें सामान्यतः अपनी आवश्यकता एवं साधनों के अनुसार ही कर्मचारी की चयन प्रक्रिया को निर्धारित करती है। चयन प्रक्रिया में अनौपचारिक साक्षात्कार से लेकर नियुक्ति एवं कार्य परिचय तक कई स्तर हो सकते हैं। एक सामान्य चयन प्रक्रिया में निम्न चरण हो सकते हैं-
1.नियोजन कार्यालय से प्रार्थी का स्वागत
2.प्रारम्भिक साक्षात्कार
3.रिक्त प्रार्थना-पत्र को भरवाना
4.चयन परीक्षण
5.मुख्य साक्षात्कार
6.संदर्भ जांच
7.चिकित्सा परीक्षा
8.चयन निर्णय एवं नियुक्ति
9.कार्य परिचय
10.परिवीक्षा
1.नियोजन कार्यालय में प्रार्थी का स्वागत-भर्ती के लिए संस्था द्वारा दिए गये विज्ञापन अथवा बुलावे के प्रत्युत्तर में जब कोई प्रार्थी संस्था में आता है तो उसका नियोजन कार्यालय में स्वागत किया जाता चाहिए। चुनाव प्रक्रिया के प्रारम्भ होने की तिथि निश्चित कर दी जाती है। उक्त तिथि को उपस्थित सभी प्रार्थियों को प्रतीक्षा एवं स्वागत कक्ष में बैठने हेतु स्थान उपलब्ध होना चाहिए। प्रार्थी का संस्था में यह प्रथम दिन होता है। अतः उनके आत्म सम्मान को किसी भी प्रकार ठेस नहीं पहुँचने देना चाहिए अन्यथा योग्य प्रार्थी ऐसी संस्था में कार्य करना स्वीकार नहीं करेंगें। चयन के पूर्व एक प्रार्थी संस्था में मेहमान की भाँति होता है।
2.प्रारम्भिक साक्षात्कार-प्रारम्भिक साक्षात्कार का उद्देश्य जहाँ एक ओर अक्षम व अयोग्य व्यक्तियों की छंटनी करना है। वहीं दूसरी ओर योग्य व्यक्तियों को कार्य की प्रकृति, सेवा की शर्ते, वेतन, दायित्व, कत्र्तव्य आदि के बारे में सामान्य जानकारी प्रदान करना है। साथ ही साक्षात्कारकत्र्ता प्रार्थी से उसकी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, उम्र, कार्य, रूचि व अन्य विशिष्ट कार्य-गुणों आदि के बारे में सूचनायें प्राप्त करता है। इस सूचना के आधार पर प्रारम्भिक तौर पर प्रार्थी की योग्यता के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। यह साक्षात्कार किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा लिया जाता है, जो कि लगभग दस मिनट का होता है। इस साक्षात्कार से प्रार्थी की रूचियों, इच्छा, कार्य,लगन, उत्साह, उपयुक्तता आदि के बारे में आधार
2. सूचनायें प्राप्त की जाती है, तथा योग्य प्रार्थियों को आगे की कार्यवाही के लिए रोका जा सकता है, इसलिए इसे छंटनी साक्षात्कार भी कहा जाता है। इससे चयन पर होने वाले व्ययों एवं समय में बचत की जा सकती है।
3.रिक्त प्रार्थना-पत्र भरना-प्रारम्भिक साक्षात्कार में योग्य पाये गये प्रार्थियों से प्रार्थना पत्र फार्म भरवाया जाता है। किर्क पैट्रिक के अनुसार- प्रार्थनापत्र रोजगार प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति द्वारा दिया गया लिखित प्रार्थनापत्र है जो आवेदक की योग्यताओं के बारे में आधार सूचनायें उपलब्ध कराता है। यह उसके वैयक्तिक इतिहास का अभिलेख होता है।
इस प्रार्थनापत्र में दी गई सूचनाओं के आधार पर प्रार्थियों की योग्यताओं की पूर्व निश्चित योग्यताओं से तुलना की जा सकती है। वांछनीय योग्यता न रखने पर ऐसे अयोग्य प्रार्थियों को चयन प्रक्रिया से अलग कर दिया जाता है। प्रारम्भिक साक्षात्कार न रखने की दशा में सभी प्रार्थियों से यह फार्म भरवाया जाता है।
ये फार्म सामान्यतयः छपे हुए होते हैं, जिसे प्रार्थी स्वयं अपने हाथों से भरता है। इस फार्म में सामान्यतयः अग्रांकित सूचनायें मांगी जाती है -
- प्रार्थी का नाम - उपनाम व पूरा पता
- प्रार्थी के पिता का नाम - नाम व पता
- जन्मतिथि व स्थान - जन्मतिथि, स्थान, जाति, धर्म, नागरिकता
- शारीरिक संरचना - वनज, लम्बाई, दृष्टि आदि
- शैक्षणिक योग्यता - डिग्री, डिप्लोमा,अन्य पाठय्क्रम
- कार्यानुभव - विक्रय व अन्य क्षेत्र में, विभिन्न संस्थाओं में
- वेतन - न्यूनतम स्वीकार वेतन, वर्तमान संस्था में प्राप्त वेतन व भत्ते
- पाठयेत्तर गतिविधियाँ- छब्ब्ए छैैए स्काउटिंग, खेलकूद आदि गतिविधियों में योग्यता
- सन्दर्भ - चरित्र, व्यवहार आदि के सम्बन्ध में दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम व पते जिनसे प्रार्थी के विषय में पूछा जा सके।
प्रत्येक संस्था अपनी आवश्यकतानुसार भी सूचनायें मांगती है। यह प्रार्थनापत्र चयन प्रक्रिया का मूलाधार व व्यक्तित्व का समस्त चित्र होता है।
प्रार्थना-पत्र भरते समय ध्यान रखने योग्य बातें-
- प्रार्थनापत्र स्पष्ट व स्वच्छ लेख में भरा जाना चाहिए।
- प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट व स्वच्छ आलेख में भरा जाना चाहिए।
- यदि प्रार्थनापत्र प्रार्थी द्वारा अपने ही हस्तलेख में भरा जाना हो तो ऐसा ही किया जाना चाहिए।
- प्रार्थनापत्र में दिये गये निर्देशों का पूर्णतः पालन किया जाना चाहिए।
- प्रार्थनापत्र में जानबूझकर गलत विवरण नहीं दिया जाना चाहिए।
- अपने सम्बन्ध में लागू न होने वाले विवरण को काट देना चाहिए।
फार्म तैयार करते समय ध्यान रखने योग्य बातें -
- प्रार्थनापत्र में प्रश्नों का दोहराव नहीं होना चाहिए।
- प्रार्थना पत्र संक्षिप्त में होना चाहिए।
- कार्य के संबंध में आवश्यक बातों के ही उत्तर पूछे जाने चाहिए।
- ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाने चाहिए, जिनके उसे गलत उत्तर देने को बाध्य होना पड़े।
- अत्यन्त वैयक्तिक प्रश्न नहीं पूछे जाने चाहिए।
- प्रार्थी का विस्तृत परिचय प्रदान करने वाली सभी बातें पूछी जानी चाहिए।
- जिरह वाले प्रश्न भी पूछे जाने चाहिए, ताकि सत्यता की जांच की जा सके।
- आवश्यक होने पर प्रमाणपत्र संलग्न किये जाने का निर्देश दे देना चाहिए।
4.चयन जांच - चयन जांच अथवा परीक्षण जांच प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है। चयन जांच के द्वारा प्रार्थी की योग्यता, चातुर्य, कार्य की रूचि, स्वभाव आदि का मूल्यांकन किया जाता है। जांच के द्वारा प्रार्थी की अभिरूचि, कार्यक्षमता व कार्य कौशल को परखा जाता है। चयन जांच के कई प्रकार हैं जैसे- योग्यता जांच, व्यक्तिगत जांच, अभिरूचि जांच, उपलब्धि जांच आदि। संस्था आवश्यकतानुसार किसी भी जांच या विभिन्न जांचों को आयोजित करके आवेदक की योग्यता का परीक्षण कर सकता है। जांच के द्वारा सही पद के लिए सही व्यक्ति का चयन किया जाता है।
5.मुख्य साक्षात्कार -जांच में योग्य पाये जाने वाले प्रार्थियों का नियोजन कार्यालय में साक्षात्कार किया जाता है। चयन प्रक्रिया का यह एक महत्वपूर्ण उपकरण है। सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ है कि लगभग 98 प्रतिशत संस्थाओं को चयन पद्धति का मुख्य आधार माना जाता है।
स्टल कंडिक एवं गोवोनी लिखते हैं - साक्षात्कार सर्वाधिक व्यापक रूप से प्रयुक्त चयन कदम है, और कुछ कम्पनियों में तो सम्पूर्ण चयन प्रणाली साक्षात्कार पर ही आधारित होती है।
कई संस्थायें साक्षात्कार करने वाले अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी करता है। साक्षात्कार अपने भावी कर्मचारियों से एक सीधी बातचीत है। नियोजक अपने भावी विक्रेता की नियुक्ति के पूर्व उससे साक्षात्कार करके उसकी सम्प्रेषण, योग्यता, विचार-शैली, आचरण, व्यक्तित्व, वाणी, नेतृत्व क्षमता आदि बातों की जांच कर सकता है। वस्तुतः साक्षात्कार का मुख्य उद्देश्य भावी विक्रेता के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। साक्षात्कार के द्वारा प्रार्थना-पत्र में उल्लेखित बातों की भी जांच संभव है।
6.सन्दर्भ जांच -साक्षात्कार पूर्ण होने के पश्चात प्रार्थी के सन्दर्भ में उसकी शिक्षा, चरित्र, आचार-विचार, पूर्व कार्यानुभव आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है तथा उसके द्वारा उल्लेखित सूचनाओं की सत्यता की जांच की जाती है। यह जांच प्रार्थी के स्कूलों, कालेजों, भूतपूर्व नियोक्ताओं के माध्यम से तथा प्रार्थी द्वारा सन्दर्भ हेतु दिये गये नामों से पत्र-व्यवहार करके की जा सकती है। प्रार्थी के पड़ौसियों, सम्बन्धियों, मित्रों आदि से भी सूचनायें मंगवाई जा सकती है। सन्दर्भ जांच का मुख्य उद्देश्य प्रार्थी के चरित्र, आचरण एवं नैतिक व्यवहार की जांच करना है।
7.चिकित्सा परीक्षण - चिकित्सा परीक्षण के द्वारा कर्मचारी की शारीरिक अक्षमताओं, बीमारियों व अन्य योग्यताओं का पता किया जा सकता है। ऐसे कर्मचारी जो किसी छूत के रोग से ग्रस्त हैं अथवा शारीरिक दुर्बलता के कारण कार्य करने के अयोग्य है, उन्हें अस्वीकार किया जा सकता है। चिकित्सा परीक्षण के पश्चात योग्य पाये गये कर्मचारी का शारीरिक प्रलेख तैयार कर लिया जाता है। ताकि श्रमजीवी क्षतिपूर्ति वाले मामलों में निर्णय किया जा सके।
चिकित्सा परीक्षा के पहले निम्न पहलुओं की जाँच होती है-
- शारीरिक नाप तौल जैसे- ऊँचाई, वजन, सीने व पेट का घेरा
- आँख, नाक, कान, दाँतों, वक्षस्थल आदि की जाँच
- खून, पेशाब आदि की जाँच
- विशेष बोध परीक्षण जैसे- दृष्टि व श्रवण क्षमता की जाँच
- सामान्य परीक्षा जैसे- चर्म, मांसपेशियों आदि की जाँच
- आवश्यक होने पर न्यूरो साइकिट्रिक परीक्षा करना
- प्रार्थी के चिकित्सा इतिहास पर भी विचार किया जाता है।
8.चयन निर्णय एवं नियुक्ति-जिन प्रार्थियों ने चयन सम्बन्धी सभी चरण सफलतापूर्वक पार कर लिये हैं, तो उन्हें अन्तिम रूप से चुन लिया जाता है तथा उन्हें नियुक्ति पत्र दे दिये जाते हैं। नियुक्ति पत्र में निम्न बातों को प्रमुखता दी जाती है। चुने हुए प्रार्थी के पद का नाम, वेतन, श्रंखला तथा अन्य भत्ते, सेवा की प्रमुख शर्ते, परिवीक्षा काल, कार्यभार संभालने हेतु अन्तिम तिथि, स्वीकृति भेजने की तिथि, नियुक्तिकत्र्ता अधिकारी के हस्ताक्षर व तिथि। ऐसे प्रार्थी जो चयन प्रक्रिया में किसी न किसी स्तर पर असफल हो जाते हैं उन्हें खेद पत्र भेजकर न चुने जाने की सूचना दे दी जाती है।
9.कार्य परिचय - नियुक्ति के पश्चात प्रार्थी संस्था का अभिन्न अंग बन जाता है। वस्तुतः वह प्रार्थी से कर्मचारी बन जाता है। नये कर्मचारियों को अपनी संस्था अपने कार्य व अपने वातावरण के साथ जोड़ना आवश्यक होता है ताकि अपने को संस्था में अपरिचित अनुभव न कर सके। कार्य परिचय के द्वारा उन्हें संस्था के साथ समायोजित हो जाने का अवसर मिलता है। सामान्यतयः कार्य परिचय में चयनित कर्मचारी को निम्न बातों के सम्बन्ध में बतलाया जाता है -
- संस्था का इतिहास
- संस्था की सामान्य नीतियाँ व नियम
- उसके विभाग की जानकारी
- विभिन्न विभागों की स्थिति
- वेतन, छुट्टियों व कार्य के घण्टे के सम्बन्ध में नीतियाँ
- निर्मित वस्तुयें व सेवायें
- सामाजिक लाभ योजनायें
- पदोन्नति व स्थानांतरण नीतियाँ
- अनुशासन व शिकायत निवारण प्रक्रिया
- कर्मचारी के दायित्व, कत्र्तव्य व सम्बन्ध
10.परिवीक्षा (Probhation) -नियुक्ति के पश्चात कर्मचारी को 6 माह, एक वर्ष, दो वर्ष परिवीक्षा समय पर रखा जाता है। इस समय में यदि वह कोई अनुशासनहीनता व दुराचरण करता है तो उसे दो सप्ताह के अग्रिम नोटिस के द्वारा पदच्युत या पदावनत किया जा सकता है।
कर्मचारियों के चयन में ध्यान देने योग्य बातें - कर्मचारी संस्था के सबसे अधिक महत्वपूर्ण संसाधन है। इनकी योग्यताव कुशलता पर ही संगठन की सफलता निर्भर करती है। अतः इनके चयन में अनेक तत्वों का ध्यान रखना आवश्यक है।
इन तत्वों को दो भागों में बांटा जा सकता है-
(क) प्रार्थी सम्बन्धी घटक
(ख) नीति सम्बन्धी घटक
(क) प्रार्थी सम्बन्धी घटक-प्रार्थी सम्बन्धी घटकों में निम्नांकित तथ्य सम्मिलित किए जाते हैं-
- पर्याप्त शिक्षा
- कार्य अभिलेख
- सहयोगी प्रकृति
- चरित्र
- अच्छी आदतें
- आयु
- स्वास्थ्य
- कार्य अनुभव
- पारिवारिक स्थिति
- बौद्धिक कुशाग्रता
(ख) नीति सम्बन्धी घटक-नीति सम्बन्धी घटकों में निम्नांकित तथ्य सम्मिलित किए जाते हैं-
- चयन निर्धारण मानकों के अनुसार होना चाहिए
- चयन की विधि वैज्ञानिक व विवेकपूर्ण होनी चाहिए
- चयन प्रक्रिया के प्रत्येक स्तर पर उचित बल दिया जाना चाहिए
- चयन की विधि लोचपूर्ण होनी चाहिए
- चयन नीति संस्था की सामान्य नीति के अनुरूप होनी चाहिए
- व्यक्ति को महत्व न देकर योग्यता को महत्व दिया जाना चाहिए
- चयन कार्य महत्वपूर्ण व उत्तरदायी व्यक्तियों को सौंपना चाहिए
- चयन में बाहय या आन्तरिक स्त्रोतों को अनुचित कार्य नही होना चाहिए
- चयन निष्पक्ष व वैध होना चाहिए
- चयन प्रक्रिया प्रचलित करनी, देश व सनाम की परिस्थितियों सामान्य मान्यताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
2. प्रशिक्षण प्रक्रिया को समझाइए।
प्रशिक्षण प्रक्रिया (Training Process) मानव संसाधन प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह प्रक्रिया कर्मचारियों के कौशल, ज्ञान, और दक्षताओं को बढ़ाने के उद्देश्य से की जाती है। एक प्रभावी प्रशिक्षण प्रक्रिया से कर्मचारी अपनी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को अधिक प्रभावी ढंग से निभा सकते हैं, जिससे संगठन की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार होता है।
प्रशिक्षण प्रक्रिया के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:
आवश्यकता पहचान (Need Identification):
यह पहला चरण है, जहाँ संगठन यह निर्धारित करता है कि किस प्रकार का प्रशिक्षण आवश्यक है। इसमें मौजूदा कौशल, ज्ञान, और प्रदर्शन स्तर का मूल्यांकन किया जाता है और उन क्षेत्रों की पहचान की जाती है जिनमें सुधार की आवश्यकता है।
उदाहरण: एक आईटी कंपनी को पता चलता है कि उसके कर्मचारियों को नई प्रोग्रामिंग भाषा में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे नए प्रोजेक्ट्स को संभाल सकें।
प्रशिक्षण उद्देश्यों की स्थापना (Setting Training Objectives):
इस चरण में, प्रशिक्षण के उद्देश्य और लक्ष्य स्पष्ट रूप से परिभाषित किए जाते हैं। इससे प्रशिक्षण की दिशा और परिणाम की स्पष्टता होती है।
उदाहरण: "कर्मचारियों को नई प्रोग्रामिंग भाषा में सक्षमता प्राप्त कराना ताकि वे आगामी परियोजनाओं को समय पर और कुशलतापूर्वक पूरा कर सकें।"
प्रशिक्षण सामग्री और विधियों का विकास (Developing Training Materials and Methods):
इस चरण में, प्रशिक्षण सामग्री, उपकरण, और विधियों का विकास किया जाता है। इसमें पाठ्यक्रम, मॉड्यूल, और अन्य शैक्षिक संसाधनों को तैयार किया जाता है।
उदाहरण: नई प्रोग्रामिंग भाषा पर एक विस्तृत पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है, जिसमें थ्योरी, प्रैक्टिकल एक्सरसाइज, और केस स्टडी शामिल होते हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन (Organizing Training Program):
यह चरण प्रशिक्षण कार्यक्रम के समय, स्थान, और संसाधनों का आयोजन करने का होता है। इसमें प्रशिक्षकों का चयन, प्रशिक्षण सत्रों का शेड्यूल और आवश्यक लॉजिस्टिक्स का प्रबंध शामिल होता है।
उदाहरण: प्रशिक्षण सत्रों को सप्ताह में दो बार आयोजित करने का निर्णय लिया जाता है और अनुभवी प्रशिक्षकों को कार्यक्रम का संचालन करने के लिए बुलाया जाता है।
प्रशिक्षण का क्रियान्वयन (Implementation of Training):
इस चरण में, वास्तविक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाते हैं। कर्मचारी प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेते हैं और नई जानकारी और कौशल को सीखते हैं।
उदाहरण: कर्मचारियों को नई प्रोग्रामिंग भाषा के सिद्धांत सिखाए जाते हैं, और फिर उन्हें प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स पर काम करने का मौका दिया जाता है।
प्रशिक्षण का मूल्यांकन (Evaluation of Training):
यह अंतिम चरण है, जहाँ प्रशिक्षण कार्यक्रम की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाता है। इसमें कर्मचारियों के प्रदर्शन में सुधार का आकलन किया जाता है और यह देखा जाता है कि क्या प्रशिक्षण ने अपने उद्देश्य पूरे किए हैं।
उदाहरण: प्रशिक्षण के बाद कर्मचारियों को एक टेस्ट दिया जाता है और उनके नए कौशल और ज्ञान का आकलन किया जाता है। इसके अलावा, उनके कार्य प्रदर्शन का भी मूल्यांकन किया जाता है।
निष्कर्ष
प्रशिक्षण प्रक्रिया का हर चरण महत्वपूर्ण है और कर्मचारियों के समग्र विकास में योगदान देता है। एक सुनियोजित और क्रियान्वित प्रशिक्षण प्रक्रिया से कर्मचारियों की कार्यक्षमता में सुधार होता है, जिससे संगठन की उत्पादकता और गुणवत्ता में वृद्धि होती है। प्रशिक्षण के माध्यम से, संगठन अपने कर्मचारियों को निरंतर बदलते कारोबारी वातावरण में आवश्यक कौशल और ज्ञान से सुसज्जित कर सकता है।
3. स्थानान्तरण क्यों और कैसे होते हैं?
स्थानांतरण(TRANSFER)
स्थानांतरण से आशय कर्मचारी को समान स्तर, समान उत्तरदायित्व, समान वेतन, समान कार्यकारी दशा और समान प्रतिष्ठा के पदों पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना है। कर्मचारियों की इस क्षैतिजीय गति को ही स्थानांतरण कहते हैं।
डेल योडर के अनुसार-स्थानांतरण में किसी कर्मचारी का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण किया जाता है, ऐसे कार्य परिवर्तन से कर्मचारी के उत्तरदायित्व अथवा क्षतिपूर्ति में कोई अंतर नहीं पड़ता है।
डेल योडर ने स्थानांतरण की विस्तृत परिभाषा देते हुए कहा है कि इससे पदोन्नति एवं पद-अवनति के परिणामस्वरूप होने वाले कार्य परिवर्तन भी सम्मिलित हैं।
स्थानांतरण के कारण -
1.प्रशासकीय कारण
2.तकनीकी कारण
3.कर्मचारी सुविधा
4.औद्योगिक सम्बन्ध
1.प्रशासकीय कारण -
(क) कर्मचारियों की कमी से विभागीय फेरबदल
(ख) विभागीय प्रगति के कारण विभागीय फेरबदल
(ग) प्रशासकीय नियंत्रण की दृष्टि से प्रायः कर्मचारी को एक विभाग में निर्धारित समय से अधिक समय तक नहीं रखा जाता।
2.तकनीकी कारण -
(क) विशिष्ट तकनीकी योग्यता वाले कर्मचारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया जाता है, जिससे विभागीय कार्य ठीक प्रकार से चलता रहे।
(ख) कई बार कर्मचारी को कार्य आरम्भ के समय अनुपयूक्त स्थान पर नियुक्त किया जाता है बाद में कार्य विश्लेषण के आधार पर स्थानांतरित किया जाता है।
(ग) कर्मचारियों को प्रशिक्षण के लिए भी स्थानांतरित किया जाता है।
3.कर्मचारी सुविधा -
(क) कर्मचारी के कार्य पर संतुष्ट न होने पर
(ख) कर्मचारी की बीमारी के कारण
(ग) कर्मचारियों की मांग पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर
(घ) कर्मचारी की रूचि में परिवर्तन होने पर उपयुक्त स्थान पर
4.औद्योगिक सम्बन्ध -
(क) संगठन में अच्छे औद्योगिक सम्बन्ध बनाये रखने के लिए स्थानांतरण किया जाता है।
(ख) कर्मचारी समूहों में पारस्परिक विवाद हो जाने पर कर्मचारी का स्थानांतरण करना आवश्यक हो जाता है।
(ग) कर्मचारी स्वयं सामाजिक प्राणी होने के कारण सदैव मैत्रीपूर्ण वातावरण में रहना चाहता है। अतः उसकी मांग के अनुसार यथासंभव समायोजन का प्रयास किया जाता है।
उपयुक्त कारणों के अतिरिक्त पदोन्नति अथवा पद-अवनति के समय भी स्थानांतरण किया जाता है।
स्थानांतरण नीति -स्थानांतरण के फलस्वरूप कर्मचारी को कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। उसे नये वातावरण, नये समूह, नये यंत्रों व उपकरणों तथा नये प्रबंधकों के साथ कार्य करना पड़ता है। अनावश्यक एवं अवांछनीय स्थानांतरण से कर्मचारी चिड़चिड़ा होता है, अतः प्रत्येक संगठन में स्थानांतरण की नीति स्पष्ट होनी चाहिए।
स्थानांतरण नीति में निम्न बातों का समावेश होना चाहिए-
(क) नीति पक्षपात रहित होनी चाहिए तथा इसकी जानकारी सभी कर्मचारियों को होनी चाहिए।
(ख) स्थानांतरण नीति सभी विभागों में समान रूप से लागू होनी चाहिए।
(ग) स्थानांतरण सम्बन्धी नीति के अन्तर्गत स्थानांतरण के कारणों का उल्लेख होना चाहिए।
(घ) स्थानांतरण सम्बन्धी सभी स्थान स्पष्ट होने चाहिए।
(ड़) स्थानांतरण के परिणामस्वरूप किसी कर्मचारी के वेतन, प्रतिष्ठा एवं उत्तरदायित्व की कमी नहीं होनी चाहिए।
स्थानांतरण के प्रकार - स्थानांतरण के दो प्रकार होते हैं -
1.उद्देश्य के आधार पर
2.इकाई के आधार पर
1.उद्देश्य के आधार पर -
(क) उत्पादन स्थानांतरण-इसके अन्तर्गत एक ही प्रकार के कार्य में संलग्न कर्मचारियों को आवश्यकतानुसार विभिन्न विभागों में कार्य सौंपा जाता है। यदि किसी विभाग में कार्य बढ़ जाता है तो दूसरे विभागों के कर्मचारियों का स्थानांतरण कर दिया जाता है। किसी विभाग में कमी हो जाने पर कर्मचारियों को जबरी-छुट्टी (Lag-off) से बचाने के लिए भी इस प्रकार का स्थानांतरण किया जाता है।
(ख) प्रतिस्थापन स्थानांतरण -प्रतिस्थापन स्थानांतरण का मुख्य उद्देश्य वरिष्ठ कर्मचारियों को कार्यरत रखना है। प्रतिस्थापन स्थानांतरण भी उत्पादन स्थानांतरण की भांति ही है। इसमें कर्मचारी को एक कार्य से हटाकर दूसरे स्थान पर लगाया जाता है, जहाँ पहले से या तो कोई नया व्यक्ति कार्य कर रहा था, या निम्न पद का व्यक्ति कार्य कर रहा था। प्रतिस्थापन स्थानांतरण कई बार अस्थायी व्यवस्था के लिए भी किया जाता है।
(ग) कार्य परिवर्तन हेतु स्थानांतरण-समस्तरीय कर्मचारियों को समय-समय पर विभिन्न विभागों में रखकर सभी कार्यो के लिए उन्हें उपयुक्त बनाया जाता है। ऐसे कार्य जिनकी प्रकृति एक सी होती है, किन्तु जिसमें विभिन्न क्रियायें की जाती है, इस प्रकार के स्थानांतरण का कारण बनते हैं।
(घ) पारी स्थानांतरण-वे प्रतिष्ठान जहाँ दो अथवा तीन पारियों में कार्य होता है, वहाँ समानता के आधार पर कर्मचारियों को बारी-बारी से दिन अथवा रात्रि पारी में स्थानांतरण किया जाता है। कुछ कारखानों में यह व्यवस्था नियमित रूप से लागू होती है। जहाँ ये नियम नहीं होते वहाँ स्थानांतरण द्वारा पारी परिवर्तन किया जाता है।
(ड़) निदानात्मक स्थानांतरण-कर्मचारी समूह के आपसी मनमुटाव को कम करने के लिए अथवा कर्मचारी की पर्यवेक्षक से झड़प हो जाने से अथवा कर्मचारी का स्वास्थ्य किसी स्थान विशेष पर ठीक नहीं रहने से अथवा किसी कर्मचारी को अनुशासन की दृष्टि से स्थानांतरण करना ही निदानात्मक स्थानांतरण है।
(च) उपचारात्मक स्थानांतरण-उपचारात्मक स्थानांतरण कर्मचारी को सीख देने की दृष्टि से किये जाते हैं। निदान और उपचार दोनों एक ही उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। निदान के लिए की गई कार्यवाही का उद्देश्य अव्यवस्था को समाप्त करना है तथा उपचार का उद्देश्य भी अव्यवस्था को समाप्त करना है। उपचार हेतु किये गये स्थानांतरण में कर्मचारी को कुछ कष्टप्रद स्थिति का सामना करना पड़ता है। उसे प्रतिकूल स्थान पर कार्य करने को कहा जाता है।
2.इकाई के आधार पर -
(क) विभागीय स्थानांतरण-एक इकाई में कई विभाग होते हैं। इनमें प्रायः कर्मचारियों का एक विभाग से दूसरे विभाग में स्थानांतरण किया जा सकता है। जैसे - उत्पादन विभाग से विक्रय विभाग में या क्रय विभाग में या परिवहन विभाग में स्थानांतरण।
(ख)अन्तः संयंत्र स्थानांतरण -यह स्थानांतरण एक ही संगठन एवं प्रबंध के अधीन कई संयंत्र, कई इकाईयाँ अथवा कई कार्यालय हो सकते हैं। उनमें भिन्न-भिन्न इकाईयों में स्थानांतरण ही अन्तः संयंत्र स्थानांतरण कहा जाता है।
इकाई के आधार पर स्थानांतरण में विशेषतः अन्तः संयंत्र स्थानांतरण में कर्मचारी को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता हो सकती है। अतः स्थानांतरण करते समय इन बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
4. पदावनति के कारणों को बताइए।
पदोन्नति एक ओर आवश्यक है तो दूसरी ओर हानिप्रद भी है। अयोग्य व्यक्ति की पदोन्नति कर दिये जाने पर अथवा मूल्यांकन में त्रुटि रह जाने पर टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। प्रत्येक कर्मचारी पदोन्नति के लिए प्रयत्न्न करता है तथा उसे अपना अधिकार मानता है। पदोन्नति सही नहीं होने पर मूल सुधार बहुत कठिन है, क्योंकि उस दशा में पदोन्नत व्यक्ति की पद-अवनति अथवा निष्कासन दो ही उपाय रह जाते है।
पदावनति-पद-अवनति से आशय कर्मचारी को एक ऐसा पद प्रदान करने से है, जो कम उत्तरदायित्व एवं प्रतिष्ठा वाला हो।”
पद-अवनति किसी प्रकार सराहनीय कार्य नहीं कहा जा सकता। प्रबंधक द्वारा इसका अनुकरण इन स्थितियों में किया जाता है-
1.जब कर्मचारी वर्तमान पद पर ठीक तरह से कार्य नहीं कर रहा हो।
2.उसने नियम भंग किया हो तथा उसे दण्ड स्वरूप अवनति दी जाती है।
3.उच्च पद किसी कारणवश समाप्त होने पर भी कर्मचारी को रोजगार से बचाने के लिए निम्न उत्तरदायित्व वाला पद सौंपा जाता है। सरकारी प्रतिष्ठानों में अथवा सरकारी विभागों में किसी कारखाने या विभाग के बंद हो जाने पर उसके कर्मचारियों को अन्यत्र कम उत्तरदायित्व, कम वेतन एवं कम प्रतिष्ठा वाले पदों पर रखा जाता है।
4.अनेक बार पदोन्नति दोषपूर्ण होती है, उसे ठीक करने के लिए भी पद अवनति दी जाती है।
5.पदोन्नति के पश्चात् यदि प्रशिक्षण काल में कर्मचारी का कार्य संतोषप्रद नहीं रहता हो तो भी उसे पुनः निम्न पद पर भेज दिया जाता है।
किसी कर्मचारी के लिए पद-अवनति एक गंभीर दण्ड ही नहीं है बल्कि सामाजिक व नैतिक जीवन पर गहरा लांछन भी है। ऐसे कर्मचारी को सह-कर्मचारी, पर्यवेक्षक तथा समाज भी हीन भावना से देखते है, जिससे वह कुण्ठाग्रस्त हो जाता है।
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UNIT -3
1. प्रशिक्षण की आावश्यकता क्यों होती है?
प्रशिक्षण मानव संसाधन विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है। किसी भी गत्यात्मक परिवेश तथा विकासशील उपक्रम में कर्मचारियों को स्व-अनुभव अथवा मूल व सुधार के आधार पर कार्य करने के लिए नही छोड़ा जा सकता।
कर्मचारियों की नई भर्ती, स्थानांतरण, पदोन्नति अथवा तकनीकी परिवर्तनों की दशा में कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।
किसी भी कार्य को उत्तम रीति से करने के लिए विशिश्ट ज्ञान एवं कौशल की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण किसी कर्मचारी को विशिष्ट कार्य करने के योग्य बनाने की प्रक्रिया है। प्रशिक्षण के द्वारा किसी कार्य को करने के कौशल में वृद्धि हो जाती है।
फैल्पस एवं वैस्टिंग के अनुसार -स्वयं अनुभव के स्थान पर प्रशिक्षण कर्मचारी को अनुमोदित कार्य विधियों का ज्ञान प्रदान करता है तथा इसके द्वारा कर्मचारी अधिक योग्य एवं कुशल हो जाता है।”
इस प्रकार प्रशिक्षण कर्मचारियों को अनौपचारिक कार्य ज्ञान करवाने की प्रक्रिया है।
प्रशिक्षण की आवश्यकता एवं उद्देश्य- कर्मचारी प्रशिक्षण की आवश्यकता कई कारणों से अनुभव की जाती है। यह कई उद्देश्यों की पूर्ति करता है। ये निम्न हैं-
1.कार्य समस्याओं का ज्ञान- प्रशिक्षण की आवश्यकता कर्मचारियों को उन समस्याओं का ज्ञान कराने के लिए होती है, जो कार्य के दौरान उत्पन्न हो सकती है। प्रशिक्षण काल में समस्याओं के विभिन्न पहलुओं, सम्बन्धित कठिनाईयों तथा उनके वैकल्पिक समाधानों पर विचार किया जाता है।
2.नये एवं अनुभवहीन कर्मचारी-जब उपक्रम में नये कर्मचारियों की भर्ती की जाती है, तो उन्हें कार्य की तकनीकों, कौशल व कार्य-विधियों का ज्ञान करवाने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है। उन्हें कार्य का विशिष्ट ज्ञान करवाया जाता है, ताकि वे अपने कार्य को कुशलतापूर्वक कर सके।
3.निम्न लागत पर श्रेष्ठ कार्य-न्यूनतम लागत अपव्यय एवं बर्बादी तथा न्यूनतम पर्यवेक्षण पर श्रेष्ठ ढंग से कार्य करने के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना आवश्यक होता है।
4.नवीन तकनीकों का ज्ञान-आजकल व्यवसाय में अनेक तकनीकों, प्रौद्योगिकी, यंत्रों व कार्य विधियों का प्रयोग बढ़ गया है। इन नवीन परिवर्तनों से कर्मचारियों का परिचय करवाने तथा बदलते हुए वातावरण के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए श्रमिकों को प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक होता है।
5.कार्य परिवर्तन की दशा में आवश्यक-जब स्थानांतरण, पदोन्नति, पदावनति अथवा किन्ही अन्य कारणों से कर्मचारी के कार्य में कोई परिवर्तन होता है, तो उसे नवीन कार्य दशाओं में समायोजित करने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक हो जाता है।
6.दूसरों के दृष्टिकोण की जानकारी-प्रशिक्षण का एक उद्देश्य कर्मचारियों को एक साथ लाकर उन्हें एक-दूसरे के दृष्टिकोण, भावना एवं विचारों से अवगत कराना है तथा एक-दूसरे को समझने का अवसर प्रदान करना ही यह उनके सामूहिक जीवन तथा कार्यो के एकीकरण में सहायक होता है।
7.संस्थागत सूचनाओं का ज्ञान-प्रशिक्षण का उद्देश्य कर्मचारियों को उपक्रम की सामान्य प्रबन्ध व्यवस्था, उत्पाद, संगठन, ढांचे, सामान्य नीतियों आदि के बारे में सूचनायें प्रदान करना भी होता है।
8.कार्य आदतों में सुधार- प्रशिक्षण के द्वारा कर्मचारियों को विशेष कार्यो के निस्पादन के लिए विशेष विधियों का ज्ञान करवाया जा सकता है, ताकि उनकी उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सके। कार्य सम्बन्धी आदतों में सुधार होने से यंत्रों, उपकरणों व सामग्री का समुचित उपयोग होता है, कार्य प्रणाली में सुधार होता है, दुर्घटनाओं में कमी होती है तथा कर्मचारी का मनोबल बना रहता है।
9.लक्ष्य निर्धारित-प्रशिक्षण कर्मचारी को अपनी व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुरूप अपने लक्ष्य निर्धारित करने एवं उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहने में सहायक होता है।
10.कार्य समायोजन- प्रशिक्षण काल में प्रत्येक कर्मचारी को अपनी वास्तविक क्षमताओं को समझने का अवसर मिलता है। कर्मचारी आत्म विश्लेषण द्वारा अपनी सामथ्र्य एवं दुर्बलताओं का सही अनुमान कर सकता है तथा यह निर्णय ले सकता है कि वह किस प्रकार एवं किस रूप में उपक्रम में अधिकतम योगदान कर सकता है। इससे कर्मचारी असन्तोष एवं अनुपस्थिति में कमी होती है।
11.विशिष्टीकरण का प्रयोग-उद्योगों में यंत्रीकरण, प्रभावीकरण एवं विशिष्टीकरण के बढ़ते हुए प्रयोग के कारण उपक्रम के प्रत्येक स्तर पर प्रशिक्षण की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी है।
2. प्रशिक्षण के लाभ एवं महत्व बताइए।
प्रशिक्षण मानव संसाधन विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है। किसी भी गत्यात्मक परिवेश तथा विकासशील उपक्रम में कर्मचारियों को स्व-अनुभव अथवा मूल व सुधार के आधार पर कार्य करने के लिए नही छोड़ा जा सकता।
कर्मचारियों की नई भर्ती, स्थानांतरण, पदोन्नति अथवा तकनीकी परिवर्तनों की दशा में कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।
किसी भी कार्य को उत्तम रीति से करने के लिए विशिश्ट ज्ञान एवं कौशल की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण किसी कर्मचारी को विशिष्ट कार्य करने के योग्य बनाने की प्रक्रिया है। प्रशिक्षण के द्वारा किसी कार्य को करने के कौशल में वृद्धि हो जाती है।
फैल्पस एवं वैस्टिंग के अनुसार -स्वयं अनुभव के स्थान पर प्रशिक्षण कर्मचारी को अनुमोदित कार्य विधियों का ज्ञान प्रदान करता है तथा इसके द्वारा कर्मचारी अधिक योग्य एवं कुशल हो जाता है।”
इस प्रकार प्रशिक्षण कर्मचारियों को अनौपचारिक कार्य ज्ञान करवाने की प्रक्रिया है।
परिभाषायें -
बीच-प्रशिक्षण एक ऐसी संगठित कार्य विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति किसी निश्चित उद्देश्य के लिए ज्ञान तथा / अथवा कौशल सीखते हैं।
फिलप्पो-प्रशिक्षण किसी विशेष कार्य को करने हेतु कर्मचारी के ज्ञान एवं कौशल में अभिवृद्धि करने की एक क्रिया है।
कीथ डेविस -प्रशिक्षण किसी व्यक्ति को नवीन अनुभव प्रदान करता है, जो उसके ज्ञान, कौशल एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन द्वारा उनके आचरण में परिवर्तन लायें।
प्लान्टी, पैक्कार्ड तथा एफरसन -प्रशिक्षण सभी स्तर के कर्मचारियों के उस ज्ञान, कौशल एवं व्यवहारों का सतत् तथा विधिवत विकास है, जो स्वयं उनके तथा उपक्रम के कल्याण में योगदान करते हैं।
आर0सी0डेविस -प्रशिक्षण तथ्यों, सिद्धान्तों तथा कार्य विधियों के संगठित समूह के प्रति एक समझ विकसित करने की प्रक्रिया है।
प्रोक्टर तथा थोरन्टन -प्रशिक्षण सचेत रूप से किया जाने वाला वह कार्य है, जो किसी कार्य को सीखने के लिए साधन प्रदान करता है।
जूसियस-प्रशिक्षण एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा विशिष्ट कार्य के लिए कर्मचारियों का अभिरूचि, चातुर्य एवं योग्यता में अभिवृद्धि हो जाती है
प्रशिक्षण के लाभ एवं महत्व -
1.उत्पादकता में वृद्धि
2.लागत व बर्बादी में कमी
3.दुर्घटनाओं में कमी
4.यंत्रों की टूट-फूट में कमी
5.उच्च मनोबल एवं संतुष्टि
6.औद्योगिक सम्बन्धों में सुधार
7.समन्वय में सुविधा
8.प्रत्यायोजन में सहायक
9.निरीक्षण लागत में कमी
10.पदोन्नति के अवसर
11.स्थिरता एवं लोच
12.विस्तार संभावनाओं में वृद्वि
13.मानव शक्ति का सदुपयोग
14.समय की बचत
15.स्व-अनुशासन
16.श्रम मूल्य में वृद्वि
17.उत्तम निर्णय
18.पारस्परिक सहयोग में वृद्धि
19.आत्म निरीक्षण
20.मानव शक्ति अपराध में कमी
21.वैयक्तिक विकास
3. वैज्ञानिक चरण की प्रक्रिया क्या है?
मानव संसाधन प्रबंधन (Human Resource Management) में वैज्ञानिक चरण की प्रक्रिया (Scientific Approach) को लागू करने का मुख्य उद्देश्य संगठन में कार्य को अधिकतम कुशलता और उत्पादकता के साथ पूरा करना होता है। यह प्रक्रिया वैज्ञानिक और तर्कसंगत तरीकों का उपयोग करती है ताकि कर्मचारियों के काम को अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सके। इस प्रक्रिया को चरणों में विभाजित किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं:
1. कार्य विश्लेषण (Job Analysis)
कार्य विश्लेषण से तात्पर्य है कि किसी विशेष कार्य को करने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल, और योग्यताओं का अध्ययन करना। यह चरण निम्नलिखित गतिविधियों को शामिल करता है:
कार्य विवरण (Job Description): इसमें कार्य की जिम्मेदारियों, आवश्यकताओं और परिस्थितियों का विवरण होता है।
कार्य विनिर्देशन (Job Specification): इसमें कार्य को करने के लिए आवश्यक योग्यताओं और अनुभव का विवरण होता है।
2. कर्मचारी चयन (Employee Selection)
कर्मचारी चयन का चरण यह सुनिश्चित करता है कि सही व्यक्ति को सही कार्य के लिए चुना जाए। इसमें निम्नलिखित गतिविधियाँ शामिल होती हैं:
आवेदन पत्र की समीक्षा (Application Review): उम्मीदवारों के आवेदन पत्रों की जांच करना।
साक्षात्कार (Interviews): उम्मीदवारों का साक्षात्कार लेना ताकि उनकी योग्यता और कौशल का मूल्यांकन किया जा सके।
परीक्षण (Testing): उम्मीदवारों की क्षमताओं और ज्ञान का परीक्षण करना।
3. प्रशिक्षण और विकास (Training and Development)
प्रशिक्षण और विकास चरण का उद्देश्य कर्मचारियों को उनकी भूमिकाओं के लिए तैयार करना और उनके कौशल को बढ़ाना होता है। इसमें शामिल हैं:
प्रारंभिक प्रशिक्षण (Initial Training): नए कर्मचारियों को उनकी भूमिका और जिम्मेदारियों के बारे में सिखाना।
निरंतर प्रशिक्षण (Ongoing Training): कर्मचारियों को नवीनतम तकनीकों और प्रक्रियाओं के बारे में अद्यतन रखना।
कैरियर विकास (Career Development): कर्मचारियों को उनके कैरियर में उन्नति के अवसर प्रदान करना।
4. निष्पादन मूल्यांकन (Performance Evaluation)
निष्पादन मूल्यांकन का उद्देश्य कर्मचारियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना और उन्हें फीडबैक प्रदान करना है। इसमें शामिल हैं:
निष्पादन मानक (Performance Standards): कर्मचारियों के लिए मानक और लक्ष्य निर्धारित करना।
मूल्यांकन प्रणाली (Evaluation System): कर्मचारियों के प्रदर्शन का नियमित मूल्यांकन करना।
फीडबैक (Feedback): कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के बारे में फीडबैक देना और सुधार के सुझाव देना।
5. पुरस्कार और मान्यता (Rewards and Recognition)
पुरस्कार और मान्यता का चरण कर्मचारियों को प्रेरित करने और उनकी उत्पादकता बढ़ाने का कार्य करता है। इसमें शामिल हैं:
आर्थिक पुरस्कार (Financial Rewards): बोनस, वेतन वृद्धि, और अन्य वित्तीय लाभ।
गैर-आर्थिक पुरस्कार (Non-Financial Rewards): प्रशंसा पत्र, प्रमोशन, और अन्य मान्यता।
6. कर्मचारी सम्बन्ध (Employee Relations)
कर्मचारी सम्बन्ध चरण का उद्देश्य संगठन और कर्मचारियों के बीच स्वस्थ और सकारात्मक संबंध बनाए रखना है। इसमें शामिल हैं:
संचार (Communication): कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच खुले संचार को बढ़ावा देना।
विवाद समाधान (Conflict Resolution): कर्मचारियों के विवादों को सुलझाना और एक सकारात्मक कार्य वातावरण बनाना।
नियंत्रण (Control): संगठन की नीतियों और प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष
मानव संसाधन प्रबंधन में वैज्ञानिक चरण की प्रक्रिया संगठनों को यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि वे अपने कर्मचारियों के कौशल और क्षमताओं का अधिकतम उपयोग कर सकें। इस प्रक्रिया के माध्यम से संगठन कर्मचारियों के चयन, प्रशिक्षण, मूल्यांकन, और प्रेरणा को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सकते हैं, जिससे संगठन की उत्पादकता और प्रभावशीलता में वृद्धि होती है।
4. योग्यता मूल्यांन का क्या अर्थ है?
योग्यता अंकन का अर्थ
सामान्य शब्दों में योग्यता अंकन से आशय कर्मचारी का मूल्यांकन करने से है अर्थात् कृत्य से सम्बन्धित कर्मचारी की विभिन्न योग्यताओं का पता लगाने से है। अन्य शब्दों में योग्यता अंकन के अन्तर्गत कर्मचारी की व्यक्तिगत क्षमताओं, विशेषताओं एवं गुणों आदि का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार एक उपक्रम में किसी कर्मचारी द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की उपयोगिता का पता लगाना ही योग्यता अंकन कहलाता है। योग्यता अंकन को भी कार्य मूल्याकंन की भाँति विभिन्न नामों से पुकारा गया है।
or
अभिप्रेरणा के सिद्धांतों का वर्णन
अभिप्रेरणा (Motivation) वह प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित होते हैं। यह कार्य को करने की दिशा और दृढ़ता को प्रभावित करती है। विभिन्न विद्वानों ने अभिप्रेरणा को समझने और उसे बढ़ाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इन्हें परम्परागत और आधुनिक सिद्धांतों में विभाजित किया जा सकता है।
I. परम्परागत सिद्धान्त
भय एवं दण्ड सिद्धान्त (Theory of Fear and Punishment):
यह सिद्धांत मानता है कि व्यक्ति को भय और दण्ड के माध्यम से प्रेरित किया जा सकता है। यह सिद्धांत प्रबंधकों द्वारा कर्मचारियों को अनुशासन में रखने और कार्य को समय पर पूरा कराने के लिए उपयोग किया जाता है।
उदाहरण: किसी कंपनी में समय पर काम पूरा न करने वाले कर्मचारियों को वेतन कटौती या नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।
पुरस्कार सिद्धान्त (Theory of Reward):
इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को पुरस्कार देकर प्रेरित किया जा सकता है। जब व्यक्ति को अच्छे कार्य के लिए पुरस्कार मिलता है, तो वे अधिक मेहनत और उत्साह से कार्य करते हैं।
उदाहरण: किसी कंपनी में उच्च प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को बोनस और प्रमोशन देकर प्रोत्साहित किया जाता है।
कैरेट एवं स्टिक सिद्धान्त (Carrot and Stick Theory):
इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को प्रेरित करने के लिए पुरस्कार (कैरेट) और दण्ड (स्टिक) दोनों का उपयोग किया जाता है। यह सिद्धांत मानता है कि व्यक्ति को सही दिशा में रखने के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की प्रेरणा की आवश्यकता होती है।
उदाहरण: एक प्रबंधक अपने कर्मचारियों को अच्छे प्रदर्शन पर बोनस देने का वादा करता है और खराब प्रदर्शन पर दण्ड देने की धमकी भी देता है।
II. आधुनिक सिद्धान्त
(अ) सन्तुष्टि सिद्धान्त (Content Theories)
मैस्लो का आवश्यकता की क्रमबद्धता का सिद्धान्त (Maslow's Hierarchy of Needs Theory):
अब्राहम मैस्लो के अनुसार, मानव आवश्यकताएँ एक क्रमबद्ध पिरामिड में व्यवस्थित होती हैं। सबसे निचले स्तर पर भौतिक आवश्यकताएँ होती हैं और सबसे उच्च स्तर पर आत्म-साक्षात्कार की आवश्यकता होती है। एक स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद ही व्यक्ति अगले स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित होता है।
उदाहरण: एक कर्मचारी सबसे पहले अपनी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे वेतन और सुरक्षा की पूर्ति चाहता है। जब ये आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं, तो वह उच्च स्तर की आवश्यकताओं जैसे मान्यता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रेरित होता है।
हर्जवर्ग का द्वि घटक सिद्धान्त (Herzberg's Two-Factor Theory):
फ्रेडरिक हर्जवर्ग के अनुसार, कार्यस्थल पर संतुष्टि और असंतोष के दो अलग-अलग सेट होते हैं: प्रेरक कारक (Motivators) और स्वच्छता कारक (Hygiene Factors)। प्रेरक कारक, जैसे कि उपलब्धि, पहचान, और कार्य की प्रकृति, कर्मचारियों को संतुष्टि और प्रेरणा प्रदान करते हैं। वहीं, स्वच्छता कारक, जैसे कि वेतन, कार्य की स्थिति, और कंपनी की नीतियाँ, असंतोष को रोकते हैं लेकिन स्वयं में प्रेरणा प्रदान नहीं करते।
उदाहरण: एक कर्मचारी को प्रमोशन और नई जिम्मेदारियाँ मिलने से प्रेरणा मिलती है (प्रेरक कारक), लेकिन अगर कार्यालय की स्थिति खराब है तो उसे असंतोष हो सकता है (स्वच्छता कारक)।
एल्डरफर का ई. आर. जी. सिद्धान्त (Alderfer's ERG Theory):
क्लेटन एल्डरफर ने मैस्लो के सिद्धांत को संशोधित करके ERG सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसमें तीन मुख्य आवश्यकताएँ होती हैं: अस्तित्व (Existence), संबंध (Relatedness), और विकास (Growth)। इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित होता है और ये आवश्यकताएँ एक ही समय में पूरी हो सकती हैं।
उदाहरण: एक कर्मचारी एक ही समय में वेतन, संबंध, और कैरियर विकास की आवश्यकता महसूस कर सकता है।
मैक्लीलैण्ड का तीन आवश्यकता सिद्धान्त (McClelland's Three Needs Theory):
डेविड मैक्लीलैण्ड के अनुसार, तीन प्रमुख आवश्यकताएँ होती हैं: उपलब्धि (Need for Achievement), संबद्धता (Need for Affiliation), और शक्ति (Need for Power)। व्यक्ति इनमें से किसी एक या अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित होता है।
उदाहरण: एक प्रबंधक को अपने पद पर बने रहने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है, जबकि एक टीम सदस्य को समूह में अपने संबंधों को बनाए रखने के लिए संबद्धता की आवश्यकता होती है।
मैकग्रेगर का एक्स-बाई सिद्धान्त (McGregor's Theory X and Theory Y):
डगलस मैकग्रेगर ने दो अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए: थ्योरी एक्स और थ्योरी वाई। थ्योरी एक्स के अनुसार, लोग स्वाभाविक रूप से कार्य नहीं करना चाहते और उन्हें कार्य करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। थ्योरी वाई के अनुसार, लोग स्वाभाविक रूप से कार्य करना चाहते हैं और उन्हें आत्म-नियंत्रण और आत्म-निर्देशन की अनुमति देनी चाहिए।
उदाहरण: एक प्रबंधक जो थ्योरी एक्स को मानता है, वह अपने कर्मचारियों को नियंत्रित करने और निगरानी करने के लिए सख्त नीतियाँ लागू करेगा। जबकि थ्योरी वाई को मानने वाला प्रबंधक अपने कर्मचारियों को स्वतंत्रता और स्वायत्तता देगा।
(ब) प्रक्रिया सिद्धान्त (Process Theories)
वूम का प्रत्याशा सिद्धान्त (Vroom's Expectancy Theory):
विक्टर वूम के अनुसार, व्यक्ति यह समझकर प्रेरित होता है कि उसके प्रयास से उसे अच्छा परिणाम मिलेगा और वह परिणाम उसे वांछित इनाम प्रदान करेगा। इस सिद्धांत में तीन मुख्य घटक होते हैं: अपेक्षा (Expectancy), साधन (Instrumentality), और महत्व (Valence)।
उदाहरण: एक कर्मचारी यह सोचता है कि अगर वह अधिक मेहनत करेगा, तो उसे प्रमोशन मिलेगा और प्रमोशन से उसे अधिक वेतन और सम्मान मिलेगा।
एडम्स का समानता सिद्धान्त (Adams' Equity Theory):
जॉन स्टेसी एडम्स के अनुसार, लोग अपने योगदान और इनाम की तुलना अपने सहकर्मियों के साथ करते हैं। अगर वे इसे समान पाते हैं, तो वे संतुष्ट होते हैं, अन्यथा वे असंतोष महसूस करते हैं।
उदाहरण: एक कर्मचारी यह महसूस करता है कि उसे उसी कार्य के लिए उतना ही वेतन मिलना चाहिए जितना उसके सहकर्मी को मिलता है।
(स) प्रबलीकरण सिद्धान्त (Reinforcement Theory)
व्यवहार संशोधन सिद्धान्त (Behavior Modification Theory):
यह सिद्धांत बी.एफ. स्किनर द्वारा प्रतिपादित किया गया था और यह मानता है कि व्यवहार को सकारात्मक और नकारात्मक प्रबलकों के माध्यम से संशोधित किया जा सकता है। सकारात्मक प्रबलक (Positive Reinforcement) का मतलब अच्छे व्यवहार के लिए पुरस्कार देना है और नकारात्मक प्रबलक (Negative Reinforcement) का मतलब बुरे व्यवहार के लिए दण्ड देना है।
उदाहरण: एक कंपनी अपने कर्मचारियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए बोनस देती है और खराब प्रदर्शन के लिए वेतन कटौती करती है।
(द) अन्य सिद्धान्त (Other Theories)
मानवीय सम्बन्ध सिद्धान्त (Human Relations Theory):
यह सिद्धांत मानता है कि कर्मचारियों के बीच अच्छे मानवीय संबंध, संचार, और सहयोग से संगठन में उत्पादकता बढ़ती है।
उदाहरण: एक प्रबंधक अपने कर्मचारियों के साथ नियमित रूप से बैठकें आयोजित करता है और उनकी समस्याओं का समाधान करता है।
भागीदारी सिद्धान्त (Participation Theory):
इस सिद्धांत के अनुसार, कर्मचारियों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने से उनकी संतुष्टि और उत्पादकता बढ़ती है।
उदाहरण: एक कंपनी अपने कर्मचारियों को नए प्रोजेक्ट्स की योजना बनाने में शामिल करती है और उनकी राय लेती है।
निष्कर्ष
अभिप्रेरणा के विभिन्न सिद्धांत यह समझाने का प्रयास करते हैं कि व्यक्ति को किस प्रकार से प्रेरित किया जा सकता है। परम्परागत सिद्धांत भय और दण्ड, पुरस्कार, और कैरेट एवं स्टिक के माध्यम से प्रेरणा की बात करते हैं, जबकि आधुनिक सिद्धांत संतुष्टि, प्रक्रिया, प्रबलीकरण, और अन्य सिद्धांतों के माध्यम से प्रेरणा की गहरी समझ प्रदान करते हैं। इन सिद्धांतों के अध्ययन से संगठनों को अपने कर्मचारियों को बेहतर ढंग से प्रेरित करने की रणनीतियाँ विकसित करने में मदद मिलती है।
5. अभिप्रेरणा के किन्हीं दो सिद्धांतों का वर्णन करें।
अभिप्रेरण के सिद्धान्त- समय- समय पर विभिन्न विद्वानों ने अभिप्रेरण के सम्बन्ध में किये गये अपने अध्ययनों के आधार पर अनेक सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया है। अभिप्रेरण के इन सिद्धान्तों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित करके समझा जा सकता है।
¼I½ परम्परागत सिद्धान्त-
1. भय एवं दण्ड सिद्धान्त
2. पुरस्कार सिद्धान्त
3. कैरेट एवं स्टिक सिद्धान्त
¼II½आधुनिक सिद्धान्त
(अ) सन्तुष्टि सिद्धान्त
1. मैस्लो का आवश्यकता की क्रमबद्धता का सिद्धान्त
2. हर्जवर्ग का द्वि घटक सिद्धान्त
3. एल्डरफर का ई. आर. जी. सिद्धान्त
4. मैक्लीलैण्ड का तीन आवश्यकता सिद्धान्त
5. मैकग्रेगर का एक्स-बाई सिद्धान्त
(ब) प्रक्रिया सिद्धान्त
1. वूम का प्रत्याशा सिद्धान्त
2. एडम्स का समानता सिद्धान्त
(स) प्रबलीकरण सिद्धान्त
1. व्यवहार संशोधन सिद्धान्त
(द) अन्य सिद्धान्त
1. मानवीय सम्बन्ध सिद्धान्त
2. भागीदारी सिद्धान्त
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UNIT - 4
1. औद्योगिक या संगठनात्मक संघर्ष क्या है?
औद्योगिक संघर्ष का अर्थ:
औद्योगिक संघर्ष से तात्पर्य उपक्रमों में उत्पन्न होने वाले ऐसे विवादों या मतभेदों से है जो धीरे-धीरे बढ़कर संघर्ष का रूप धारण कर लेते हैं। यह संघर्ष अक्सर श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच होता है, लेकिन यह नियोक्ताओं और नियोक्ताओं के बीच या श्रमिकों के समूहों के बीच भी हो सकता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(ज्ञ) के अनुसार, "औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय सेवायोजकों एवं सेवायोजकों के मध्य या सेवायोजकों एवं श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों के मध्य उत्पन्न किसी विवाद या मतभेद से है जो किसी भी व्यक्ति के रोजगार या रोजगार की भर्ती या कार्य की दशाओं से सम्बन्धित है।"
परिभाषाएँ:
- डेल योडर ने औद्योगिक विवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है कि "औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय कर्मचारियों के ऐसे व्यवहार से है जो कार्य के प्रति विद्यमान असन्तोष को व्यक्त करता है तथा यह एक ऐसी भावना है जो रोजगार सम्बन्धी व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं तथा कर्मचारियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही हैं।"
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि औद्योगिक संघर्ष से आशय श्रमिकों एवं नियोक्ताओं के मध्य उत्पन्न ऐसा असन्तोष या मतभेद है जिससे दोनों पक्षों द्वारा परस्पर विरोधी भावनायें रखी जाती हैं। इसमें हड़ताल, तालाबन्दी, घेराव, धीरे काम करो आदि बातों को सम्मिलित किया जाता है।
सारांश:
औद्योगिक संघर्ष उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ श्रमिक और नियोक्ता या श्रमिकों के समूहों के बीच असहमति या विवाद होता है। यह असहमति कार्य की शर्तों, वेतन, कार्यस्थल की सुरक्षा, और अन्य रोजगार संबंधित मुद्दों पर हो सकती है। ऐसे संघर्ष के परिणामस्वरूप हड़ताल, तालाबंदी, या अन्य विरोधात्मक कार्यवाहियाँ हो सकती हैं।
2. संगठनात्मक संघर्ष के क्या कारण हैं?
औद्योगिक विवादों के कारण-
1. मजदूरी भत्ता और बोनस की मांग-पारिश्रमिक का प्रश्न विवादों का सबसे प्रबल कारण रहा है। नियोजन काल में सरकार द्वारा अपनायी गई हीनार्थ प्रबन्धन की नीति तथा दूसरे कारणों से स्फीतिक दबाव की स्थिति उत्पन्न हुई है, किन्तु मजदूरी की दर में बढ़ती हुई कीमतों के अनुसार वृद्धि नहीं हो पाई है, तथा श्रमिकों का जीवनयापन कष्टप्रद हो गया है। उद्योगपति स्वेच्छानुसार बोनस देते थे, किन्तु अब श्रमिक बोनस को अपनी सामान्य मजदूरी का हिस्सा मानते हैं। अब श्रमिक उद्योग के लाभ में से अधिकाधिक हिस्सा पाना चाहते हैं इन्हीं प्रश्नों को लेकर समय-समय पर हड़ताल और तालाबन्दी की घटनायें उपस्थित होती रहती हैं।
2. कार्य-दशाओं में सुधार की मांग-बहुत से झगड़े काम की दशाओं में सुधार, जैसे-काम के घन्टे और काम के भार में कमी, कारखाने के भीतर अधिक सुरक्षा के उपाय, कैण्टीन की सुविधा, सवैतनिक अवकाश, आदि की मांग को लेकर होते हैं।
3. वैयक्तिक समस्यायें-अनेक झगड़े श्रमिकों की वैयक्तिक समस्याओं, जैसे अभिनवीकरण के कारण कुछ श्रमिकों की छंटनी अथवा किसी श्रमिक की अनुशासनहीनता के कारण उसका निलम्बन या निष्कासन, आदि के कारण होते हैं। ऐसे झगड़े श्रमिकों में अपने सहयोगियों के प्रति सहानुभूति के प्रतीक होते हैं।
4. भर्ती की दोषपूर्ण प्रणाली- अधिकांश संस्थाओं में श्रमिकों की भर्ती में मध्यस्थों का हाथ रहता है, जो नौकरी दिलाने के लिए श्रमिकों से घूस लेते हैं। मध्यस्थों की शोषक प्रवृत्ति से तंग आकर कभी-कभी श्रमिको को हड़ताल करनी पड़ती है।
5. प्रबन्धकों का दुर्व्यवहार-कारखाने की दोषपूर्ण प्रबन्ध व्यवस्था अथवा श्रम-नेताओंको प्रबन्धन में भागीदार न बनाने या प्रबन्धकों द्वारा श्रम-नेताओं को अपमानित किये जाने के कारणभी बहुत से झगड़े होते हैं। नियोक्ता द्वारा श्रम संगठनों को मान्यता न दिये जाने पर भी श्रमिकहड़ताल या घेराव के अस्त्र का प्रयोग करते हैं।
6. स्वार्थपूर्ण नेतृत्व और राजनीति-अधिकांश श्रम संघों का नेतृत्व ऐसे राजनीतिज्ञों के हाथ में है, जो राजनैतिक और आर्थिक परिस्थितियों में ठीक-ठीक अन्तर नहीं कर पाते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना भी राजनीति से प्रेरित है। श्रम संगठनों के नेता बहुधा राजनैतिक स्वार्थों की सिद्धि हेतु श्रमिकों को बहकाकर हड़ताल कराते रहते हैं।
7. सामूहिक सौदेबाजी का अभाव-भारत में श्रम संघों की स्थिति सुदृढ नहीं है। श्रमिकों के प्रति नियोक्ताओं का दृष्टिकोण दूराग्रहपूर्ण एवं संकुचित रहा है। फलतः देश मेंसामूहिक सौदेबाजी का अधिक प्रचलन नहीं हो पाया है, जिसका परिणाम हड़तालों और तालाबन्दियों के रूप में व्यक्त होता है।
3. संघर्षोे की रोकथाम को समझााइए।
औद्योगिक संघर्षो को रोकने सम्बन्धी उपाय- औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न ही न हो इस सम्बन्ध में निम्न प्रयास किये गये हैं-
(1) अनुशासन संहिता-भारतीय श्रम सम्मेलन 1957 में एक अनुशासन संहिता सम्बन्धी प्रस्ताव पारित किया गया जिसका उद्देश्य यह था कि श्रमिक और नियोक्ता पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा अपनी समस्याओं एवं मतभेदों का समाधान करेंगे।
(2) संयुक्त प्रबन्ध परिषदें-श्रमिकों को प्रबन्ध में भाग देने की योजना लागू करने के सन्दर्भ में अनेक औद्योगिक उपक्रमों में संयुक्त प्रबन्ध परिषदों की स्थापना की गयी।
(3) संयुक्त विचार-विमर्श-पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा एक-दूसरे पक्ष की स्थिति और कठिनाई समझने तथा आपसी द्वेष एवं सन्देह को समाप्त करने के लिए संयुक्त विचार-विमर्शकी प्रथा प्रारम्भ की गयी। राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के बोर्ड की स्थापना सन् 1952 में ‘‘Joint Consultative Board of Industry and Labour‘‘ के नाम से की गयी।
(4) मजदूरी मण्डल-औद्योगिक संघर्षो का महत्वपूर्ण कारण मजदूरी व भत्ते की समस्या है। अतः सन् 1957 के भारतीय श्रम सम्मेलन में देश के प्रमुख उद्योगों में मजदूरी मण्डलों की स्थापना का निश्चय किया गया। देश के प्रमुख उद्योगों में मजदूरी मण्डल स्थापित किये जा चुके हैं।
(5) ऐच्छिक मध्यस्थता-ऐच्छिक मध्यस्थता द्वारा औद्योगिक संघर्षो को निपटाने की भी व्यवस्था की गयी विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय पंच निर्णय प्रोत्साहन मण्डल एवं मध्यस्थता प्रोत्साहन मण्डलों की स्थापनायें हुई।
6) जवरी छुट्टी और छटनी पर प्रतिबन्ध- सरकार ने 1947 के नियमों में जबरी छुट्टी एवं छटनी के लिए सन 1976 में संशोधन करके इस पर आवश्यक प्रतिबन्ध लगाया है। अब किसी भी उपक्रम में जिसमें 300 या अधिक श्रमिक कार्य कर रहे हो उसमें बगैर 3 माह पूर्व अनुमति लिए जबरी छुट्टी या छटनी या मिल बन्द नहीं हो सकेगी।
(7) औद्योगिक विभ्रान्ति प्रस्ताव-नवम्बर, 1962 में नियोजक एवं श्रमिकों द्वारा एक संयुक्त बैठक में औद्योगिक विभ्रान्ति का प्रस्ताव किया गया। इस प्रस्ताव में उत्पादन कार्य में विघ्न न डालने, उत्पादन को अधिकतम करने, प्रतिरक्षा प्रयासों को प्रोत्साहित करने का संकल्प किया गया।
(8) आवश्यक सेवा अध्यादेश, 1981- जुलाई सन् 1981 में केन्द्रीय सरकार ने सेवाओं में हड़तालों पर रोक लगाने, गैर-कानूनी हड़ताल करने अथवा ऐसी हड़ताल करने के लिए भड़काने वाले व्यक्तियों को दण्ड देने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से एक अध्यादेश पास करके उसे अधिनियम का रूप दे दिया गया है। इस अधिनियम के माध्यम से सरकार आवश्यक सेवाओं पर प्रतिबन्ध लगा सकती है।
‘औद्योगिक विवादों से आशय एवं परिभाषा- प्रमुख औद्योगिक विवादों से आशय उद्योगों में उत्पन्न होने वाले उन मतभेदों से है जो कि धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक विवाद का रूप धारण कर लेते हैं जिससे औद्योगिक शान्ति समाप्तहोने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। भारतीय औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अनुसार नियोजक एवं नियोज के बीच नियोजक एवं श्रमिकों के बीच नियोजन की शर्तों काम करने की दशाओं और बेरोजगारी सम्बन्धित किसी विवाद अथवा मतभेद को औद्योगिक विवाद कहते हैं। औद्योगिक विवाद प्रायः चार रूपों में प्रकट होते हैं (प) श्रमिक हड़ताल कर दें और काम पर ना
4. संगठनात्मक संघर्ष की अवधारणा बताइए।
औद्योगिक संघर्ष से आशय
औद्योगिक संघर्ष से तात्पर्य उपक्रमों में उत्पन्न होने वाले ऐसे विवादों या मतभेदों से है जो धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक संघर्ष का रूप धारण कर लेते हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(ज्ञ) के अनुसार ‘औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय सेवायोजकों एवं सेवायोजकों के मध्य या सेवायोजको एवं श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों के मध्य उत्पन्न किसी विवाद या मतभेद से है जोकिसी भी व्यक्ति के रोजगार या रोजगार की भर्ती या कार्य की दशाओं से सम्बन्धित है।’’डेल योडर ने औद्योगिक विवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है कि’’औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय कर्मचारियों के ऐसे व्यवहार से है जो कार्य के प्रति विद्यमान असन्तोष को व्यक्त करता है तथा यह एक ऐसी भावना है जो रोजगार सम्बन्धी व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं तथा कर्मचारियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहें हैं।
इस प्रकार हम कह कि औद्योगिक संघर्ष से आशय श्रमिकों एवं के मध्य उत्पन्न ऐसा असन्तोष या मतभेद है जिससे दोनों पक्षों द्वारा परस्पर विरोधी भावनायें रखी जाती है। इसमें हड़ताल, तालाबन्दी, घेेराव, धीरे काम करो आदि बातों को सम्मिलित किया जाता है।
औद्योगिक संघों के प्रभाव अथवा दुष्परिणाम एवं सुपरिणाम
औद्योगिक संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम हड्ताल तथा तालाबन्दी होता है। हड़ताल एवं तालाबन्दी से उत्पादक श्रमिक तथा राष्ट्र सभी वर्गों को हानि होती है, जैसा कि निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होता है-
(A) उत्पादकों को हानि
(1) उत्पादकों की यात्रा में कमी-जब किसी उद्योग में हड़ताल या तालाबन्दी हो जाती है तो उत्पाद कार्य में रुकावट आती है, जिससे उत्पादन की मात्रा में कमी आ जाती है, और राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय का स्तर गिर जाता है।
(2) अनुशासनहीनता-हड़तालग्रस्त उद्योग में अनुशासन व्यवस्था समाप्त हो जाती है। हड़ताल द्वारा उत्पन्न अनिश्चित वातावरण में अनैतिकता को प्रोत्साहन मिलता है।
(3) सहायक खचों की कमी-औद्योगिक संघर्षों के कारण उत्पादन को एक ओर तो सम्भावित लाभ से वंचित रहना पड़ता है और दूसरी ओर सहायक खर्चे, जैसे- कारखाने का किराया, पूँजी का ब्याज, उच्च पद पर कार्य करने वाले कर्मचारियों का वेतन आदि भी देना पड़ता है।
(4) श्रम व पूँजी के मध्य घृणा-हड़ताल के कारण सेवायोजक श्रमिक को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं जिससे श्रम व पूँजी के बीच की खाई और भी अधिक गहरी हो जाती है।
(B) श्रमिकों के लिए हानि
(1) मजदूरों की कमी- श्रमिकों को हड़ताल अथवा तालाबन्दी की अवधि में मजदूरी नहीं दी जाती है, जिससे उनकी मजदूरी में कमी आ जाती है।
(2) स्वास्थ्य पर कुप्रभाव- श्रमिकों को मजदूरी के अभाव में भरपेट खुराक नहीं मिल पाती है, जिससे उनके स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता पर कुभाव पड़ता है।
(3) हड़ताल की असफलता के भयानक परिणाम-जब कभी की हाल कल हो जाती है, तो उन्हें इसके भयानक परिणाम भुगतने होते हैं। सेवायोजक अधिक मनमानी करने लगते हैं।
(C) समाज व राष्ट्र के लिए हानि
(1)सामाजिक अव्यवस्था-हड़ताली व तालाबन्दियों के परिणामस्वरूप सामाजिक दूषित होता है और समाज में अनिश्चितता तथा असुरक्षा की भावना का उदय हो हो जाता है।
(2) जनसाधारण के लिए संकट-जब कभी जनोपयोगी सेवा जैसे, रेल, डाक, तार, पानी, बिजली आदि संस्थाओं में हड़ताल अथवा तालाबन्दी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इससे जनसाधारण को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ये जीवन की अनावश्यक सेवायें हैं, इनके बिना मनुष्य का जीवन सामान्य गति से नहीं चल सकता।
औद्योगिक संघर्षो के सुपरिणाम
औद्योगिक संघर्षो के उपर्युक्त दुष्परिणामों के अतिरिक्त कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आते हैं, जैसे औद्योगिक संघर्षों के श्रमिकों में पारस्परिक सहयोग एवं एकता को भावना का विकास होता है, श्रमिकों को आवश्यक मजदूरी, बोनस व अन्य सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं, उनकी कार्य सम्बन्धी दशाओं में सुधार हो जाता है, आदि।
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UNIT-5
1. उद्योगों में मानवीय संबंधों का महत्व बताइए।
मानवीय सम्बन्धों का महत्त्व
1. निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए
2. श्रम शक्ति के सदुपयोग एवं उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए
3. मानवीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए
4. मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए
5. मनोबल बढ़ाने के लिए:
6. न्यूनतम लागत पर अधिक उत्पादन के लिए
7. प्रबन्ध कार्यों को प्रभावी ढंग से सम्पन्न करने के लिए
8. सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए
9. श्रम संघों का विकास
मानवीय सम्बन्धों का महत्त्व
मानवीय सम्बन्धों का संगठनात्मक और औद्योगिक वातावरण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये सम्बन्ध न केवल व्यक्तिगत और समूह की उत्पादकता को बढ़ाने में सहायक होते हैं, बल्कि संगठन की समग्र सफलता में भी योगदान करते हैं। मानवीय सम्बन्धों का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है:
1. निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए:
- टीमवर्क और सहयोग: अच्छे मानवीय सम्बन्ध टीमवर्क को बढ़ावा देते हैं, जिससे संगठन के लक्ष्य अधिक प्रभावी और तेजी से प्राप्त किए जा सकते हैं।
- स्पष्ट संवाद: बेहतर संचार और सहयोग के माध्यम से लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
2. श्रम शक्ति के सदुपयोग एवं उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए:
- प्रेरणा: मानवीय सम्बन्धों के माध्यम से कर्मचारियों को प्रेरित किया जा सकता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
- समन्वय: श्रमिकों के बीच समन्वय और सहयोग से श्रम शक्ति का सदुपयोग होता है।
3. मानवीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए:
- व्यक्तिगत विकास: मानवीय सम्बन्धों के माध्यम से कर्मचारियों की व्यक्तिगत आकांक्षाओं और विकास की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।
- संतोष और संतुष्टि: कर्मचारियों को आत्म-संतोष और संगठनात्मक संतुष्टि मिलती है।
4. मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए:
- समस्या समाधान: अच्छे मानवीय सम्बन्धों के माध्यम से संगठनात्मक समस्याओं और संघर्षों का समाधान किया जा सकता है।
- सुनवाई: कर्मचारियों की समस्याओं और शिकायतों को सुना और समझा जा सकता है।
5. मनोबल बढ़ाने के लिए:
- प्रशंसा और समर्थन: कर्मचारियों की प्रशंसा और समर्थन से उनका मनोबल बढ़ता है।
- सकारात्मक वातावरण: सकारात्मक कार्य वातावरण से कर्मचारियों का आत्मविश्वास और मनोबल ऊँचा रहता है।
6. न्यूनतम लागत पर अधिक उत्पादन के लिए:
- उत्पादकता: मानवीय सम्बन्धों के माध्यम से कर्मचारियों की उत्पादकता में वृद्धि होती है।
- कम श्रम लागत: अच्छे सम्बन्धों के माध्यम से न्यूनतम लागत पर अधिक उत्पादन संभव हो पाता है।
7. प्रबन्ध कार्यों को प्रभावी ढंग से सम्पन्न करने के लिए:
- नेतृत्व और प्रबंधन: प्रबंधकों और कर्मचारियों के बीच अच्छे सम्बन्ध प्रबंधन कार्यों को प्रभावी बनाते हैं।
- निर्णय लेने की प्रक्रिया: निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुगमता और प्रभावशीलता आती है।
8. सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए:
- समुदाय का विकास: मानवीय सम्बन्धों के माध्यम से संगठन अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर सकता है।
- सामाजिक सामंजस्य: समाज में सामंजस्य और सहयोग बढ़ता है।
9. श्रम संघों का विकास:
- संघों का समर्थन: मानवीय सम्बन्धों के माध्यम से श्रम संघों को संगठनात्मक समर्थन मिलता है।
- समानता और न्याय: श्रम संघों के विकास से श्रमिकों को समानता और न्याय मिलता है।
निष्कर्ष:
मानवीय सम्बन्ध संगठन की सफलता और स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह न केवल कर्मचारियों की उत्पादकता और संतोष को बढ़ाते हैं, बल्कि संगठन को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी मदद करते हैं। इसके अलावा, मानवीय सम्बन्ध संगठनात्मक समस्याओं के समाधान, मनोबल बढ़ाने, और न्यूनतम लागत पर अधिक उत्पादन को संभव बनाते हैं।
2. मानवीय संबंधों का प्रबंधन कैसे करंेगे।
मानवीय संबंधों का प्रबंधन:
मानवीय संबंधों का प्रबंधन संगठनों और कार्यसमूहों में लोगों के बीच संबंधों को संरचित और प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने का विशेष महत्व रखता है। एक संगठन या कंपनी में सही मानवीय संबंधों का होना, जैसे कि संवाद, समझौता, और सहयोग, उसकी सफलता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होता है।
मानवीय संबंधों के प्रबंधन में कई महत्वपूर्ण पहलू होते हैं:
कर्मचारी का सम्मान और स्थिरता: अच्छे संबंधों के बिना कर्मचारी आत्मविश्वास खो सकते हैं और उनकी प्रदर्शन क्षमता पर असर पड़ सकता है। संगठन में उच्च स्तर की मोटिवेशन और संस्थागत स्थिरता के लिए, सही संबंधों का होना आवश्यक है।
संगठनात्मक संघर्ष की कमी: अगर संगठन के अंदर संबंधों में समस्याएँ होती हैं, तो यह संगठन के कार्य प्रणाली और उत्पादकता पर असर डाल सकता है। अच्छे संबंध समस्याओं को समाधान करने में मदद कर सकते हैं और संगठन को सामूहिक रूप से आगे बढ़ने में सहायक हो सकते हैं।
सही संवाद और समझौता: सही संवाद और समझौता के बिना, कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस्यता और समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। संगठन में स्पष्ट, सकारात्मक, और सही संवाद को बढ़ावा देना प्राथमिक है ताकि समस्याओं का समाधान और नई विचारधारा का विकास हो सके।
कार्य संगठन और सम्पन्नता: मानवीय संबंधों का अच्छा प्रबंधन संगठन के कार्य संगठन और सम्पन्नता में सुधार कर सकता है। यह कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास, सहयोग, और समर्थन को बढ़ावा देता है, जिससे वे अपने काम में महारत हासिल कर सकते हैं।
इस प्रकार, मानवीय संबंधों का उचित प्रबंधन संगठन के विकास और सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को बताइए।
सामूहिक सौदेबाजी के महत्व:
4. मानवीय संबंध के दर्शन को समझाइए।
मानवीय सम्बन्धों का दर्शन-श्री अर्ल बंटिंग‘ ने मानवीय सम्बन्धों के दर्शन को निम्न प्रकार से व्यक्त किया है-
(1)उद्योग व्यक्तियों के लिए है, न कि व्यक्ति उद्योग के लिए उद्योग में मानव का महत्त्वपूर्ण स्थान है, संगठन या संस्था का नहीं।
(2) प्रत्येक उपक्रम को, अपनी क्रियाओं में मानव की एक कर्मचारी के रूप में, एक स्कन्धारी के रूप में, एक उपभोक्ता के रूप में और समाज के एक सदस्य के रूप में सामाजिक भावनात्मक एवं आर्थिक आवश्यकताओं का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
(3)कम्पनी को सुद्ध सेविवर्गीय नीतियों एवं पद्धतियों से कर्मचारियों के अधिकारों, हितों एवं कल्याण आदि की सुरक्षा एवं विकास होना चाहिए।
(4) उपक्रम एवं कर्मचारियों के मध्य अच्छे सम्बन्धों की स्थापना करना एक आधारभूत आवश्यकता है, चाहे उपक्रम में श्रम संघ हो अथवा नहीं। सरकार, श्रम संगठनों एवं प्रबन्धकों की औद्योगिक सम्बन्धों के क्षेत्र में नीतियों एवं क्रियाओं का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे आधारभूत सम्बन्धों को विकसित करती है अथवा नहीं।
(5)एक कर्मचारी का उसकी इकाई में हित तथा उसकी एक श्रम संघ की सदस्यता की स्वीकृति के मध्य कोई आधारभूत असंगति या परस्पर विरोध नहीं है। कर्मचारी को अपनी संस्था के प्रति सदैव कर्तव्य निष्ठ होना चाहिए।
(6)संस्था में कर्मचारी का सहयोग प्राप्त किया जाना चाहिए। यह सहयोग दबाव के आधार पर नहीं, अपितु स्वेच्छा से प्राप्त किया जाना चाहिए।
(7)सेवानियोजकों को जहाँ तक उनके नियंत्रण में है, कर्मचारियों के हित में कार्य करना चाहिए और कर्मचारियों को अधिकतम आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना चाहिए।
(8) प्रत्येक कर्मचारी उसकी प्रतिष्ठा, अधिकार, विकास की सम्भावनाओं, आर्थिक कल्याण आदि के सन्दर्भ में अपरिहार्य रूप से संस्था की सफलता के साथ जुड़ा होता है।
(9) प्रबन्धकों को या श्रमिकों की ऐसी कोई भी नीति जो कर्मचारियों के अधिकारों को समाप्त करती है और स्वतन्त्रता का हनन करती है, एक स्वतन्त्र समुदाय में अधिक समय तक सफल नहीं हो सकती है।
(10) एक स्वतन्त्र समाज का यह नैतिक दायित्व है कि वह व्यक्तियों (कर्मचारियों) के अधिकारों एवं छूटों की रक्षा करें तथा इस बात का ध्यान रखे कि राष्ट्रीय नीति में इस सिद्धान्त का प्रभावकारी रूप में पालन किया जाय।
5. सामूहिक समझौते के क्षेत्रों का वर्णन करें।
सामूहिक सौदेबाजी का क्षेत्र: सामूहिक सौदेबाजी आपसी एवं सद्भाव पर निर्भर है। यह सामूहिक अनुबन्धों का रूप है सामूहिक समझौते आर्थिक अथवा राजनैतिक व्यवस्था से सम्बन्धित हो सकते हैं। आर्थिक समझौते के अन्तर्गत कर्मचारियों की प्रत्येक श्रेणी हेतु वेतन की दरें कार्य की शर्तें व दशाओं से सम्बन्धित होते हैं। राजनैतिक व्यवस्था संघ एवं प्रबन्ध के अधिकारों, संघ द्वारा भाग लेने की सीमा अथवा प्रबन्ध द्वारा लिए गये निर्णय को चुनौती की सीमा का निर्धारण है।
जर्मनी के सम्मेलन में एक आदर्श सामूहिक अनुबन्ध सौदेबाजी के अन्तर्गत निम्नलिखित मदें शामिल की गई है।
(1) साधारण कार्य घण्टे,
(2) अतिरिक्त रात्रिकालीन कार्य,
(3) अतिरिक्त कार्य दरे,
(4) कार्य घण्टों का निर्धारण /स्टेण्ड बाई कार्य घण्टे,
(5) रोजगार दुर्घटनाएं,
(6) मजदूरी एवं मजदूरी श्रेणियाँ,
(7) खतरनाक कार्यों हेतु बोनस,
(8) परिणाम द्वारा भुगतान,
(9) वेतन सहित अवकाश,
(10) रोजगार अनुबन्धों की समाप्ति
अमेरिका और कनाडा में सौदेबाजी संगठन के स्तर पर होती हैं। पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्रों में अनुबन्ध साधान्यता सेवानियोजन व कर्मचारी संघों के बीच स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर पर होता है। भारतीय सन्दर्भ में सामूहिक सौदेबाजी के क्षेत्रमें अनेकों मदों को शामिल किया जाता है।
(1) कर्मचारी संघ की मान्यता,
(2) कार्य के घण्टे अवकाश व त्योहार की छुट्टी,
(3) मजदूरी एवं भत्ते
(4) वरिष्ठता,
(5) बोनस एवं लाभभागिता योजनाएं,
(6) छटनी एवं ले-आफ सम्बन्धित मामले
(7) नियोजन एवं विकास कार्यक्रम,
(8) अवकाश प्राप्त योजनाएं,
(9) परिवेदना पद्धति एवं निवारण,
(10) अनुशासन एवं अनुशासनहीनता निवारण
(11) कार्य की दशाएँ, सुरक्षा एवं दुर्घटना रोकथाम,
(12) कर्मचारी सुविधाएं,
(13) श्रमिकों को प्रबन्ध में भागीदारी,
(14) पदोन्नति,
(15) तकनीकी प्रविधियाँ,
(16) अन्य, जैसे कर्मचारियों को क्षतिपूर्ति, स्थिरता आदि के अनुबन्ध,
विशिष्ट उदाहरण के साथ "समूहिक समझौता" उस संवाद है जो किसी कामगार या कामगार संघ द्वारा उनके निर्माता या उनके प्रतिनिधियों (आमतौर पर श्रम संघ) के साथ वेतन, कार्यकाल, कार्यशर्तें, और रोजगार की अन्य शर्तों पर होने वाली वार्ता को कहते हैं।
उदाहरण: एक विनिर्माण कंपनी में, श्रम संघ जो कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करता है, प्रबंधन से समूहिक समझौते में लिया जाता है ताकि कामगारों के लिए बेहतर वेतन स्केल्स और सुरक्षा उपायों की सुधार की जा सके। इन समझौतों के माध्यम से, दोनों पक्षों का लक्ष्य होता है कि एक सहमति तैयार की जाए जो कामगारों और निर्माता के हितों को संतुलित करे।
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