UNIT - 1
1. भारत में श्रम विधानों का ऐतिहासिक विकास का वर्णन कीजिए।
2. सामाजिक सुरक्षा क्या है? इसका अर्थ बताते हुए क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
समाज में मनुष्य के ऊपर प्राकृतिक आपदायें आना अवश्यम्भावी हैं। ऐसे समय में वह अपनी जीविका कमाने में असमर्थ होता है। ऐसे आपदाग्रस्त व्यक्तियों की समाज द्वारा जो सहायता दी जाती है या उन्हें जो सुरक्षा दी जाती है, सामान्य रूप से उसे ही सामाजिक सुरक्षा कहा जाता है। श्रमिकों के ऊपर आने वाले संकट एवं असुरक्षा के कई रूप हो सकते हैं। प्रथम आय की असुरक्षा और उससे उत्पन्न संकट। इसी प्रकार उससे सम्बन्धित वह मजदूरी जो उसके जीवनयापन से कम हो सकती है या मजदूरी भुगतान की अनियमितता या उसका गलत ढंग उसे संकट में डाल सकते हैं। कभी-कभी उसकी छंटनी या मजदूरी कटौती और बेकारी से आर्थिक संकट पैदा हो सकता है। दूसरे व्यावसायिक असुरक्षा हो सकती है, जैसे कार्य करने के स्थान की खराब दशायें व उनसे उत्पन्न बीमारियां, अपंगता तथा औद्योगिक दुर्घटनायें आदि हो सकती हैं। तीसरे प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न असुरक्षा हो सकती है, जैसे- असमर्थता वृद्धावस्था में कार्य क्षमता का गिरना, आय कमाने वाले सदस्य की मृत्यु, मातृत्व पीड़ा या बीमारी आदि से उत्पन्न असुरक्षा।
प्राचीनकाल में संयुक्त परिवार, जाति या कुटुम्ब, ग्राम समाज या धार्मिक संस्थाओं द्वारा सुरक्षा का संयुक्त प्रबन्ध किया जाता था। किन्तु संयुक्त परिवारों के बिखराव तथा औद्योगीकरण के विकास के साथ-साथ इसमें परिवर्तन आ गया है। अब ऐसे दायित्व सीधे-सीधे औद्योगिक संस्थानों तथा सरकार पर आ पड़े हैं। श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करना आज समाज का प्रमुख दायित्व बन गया है। इस धारणा के विकास ने सामाजिक सुरक्षा के विचार को बल दिया है।
सामाजिक सुरक्षा का आशय तथा परिभाषा
‘‘सामाजिक सुरक्षा‘‘ की धारणा का विकास सामाजिक दर्शनशास्त्र की एक नवीन घटना है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम एब्राहीम एप्स्टीयो ने किया, जो अमेरिका सोशल सिक्योरिटी एसोसियेशन के सचिव थे। सन् 1935 में अमेरिका के सोशल सिक्योरिटी एक्ट बनाने के साथ इसका प्रचलन बढ़ा और इस शब्द ने राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया । अन्तर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (संगठन) ने अपने एक प्रकाशन में इसे इस प्रकार परिभाषित किया है, ‘‘सामाजिक सुरक्षा वह सुरक्षा है जो कि समाज उचित संगठनों द्वारा समाज के सदस्यों को कुछ आपत्तियों के अवसर पर प्रदान करता है। सुरक्षा एक मानसिक स्थिति है और वास्तविक व्यवस्था है। सुरक्षा प्राप्त होने का अर्थ यह है कि मनुष्य को यह विश्वास हो कि आवश्यकता होने पर सुरक्षा प्राप्त होगी। सुरक्षा गुण तथा परिणाम में सन्तोषजनक भी होनी चाहिये।‘‘
इस प्रकार उक्त परिभाषा सुरक्षा के दो आवश्यक तत्वों की ओर संकेत करती है। प्रथम मानसिक स्थिति अर्थात् सुरक्षित होने का अनुभव और दूसरी वस्तुस्थिति।अर्थात आपत्तिकाल में सहायता का पर्याप्त रूप से प्राप्त होना। मनुष्य के जीवन में बाल्यावस्था तथा वृद्धावस्था ऐसी अवस्थायें हैं जब मनुष्य सामाजिक सहायता पर निर्भर होता है। यद्यपि कभी-कभी है मनुष्य जीवन के बीच में बीमारी आदि के कारण ऐसे अवसर भी आते हैं जब वह जीविका कमाने में असमर्थ होता है। उस समय वह सहायता की आवश्यकता अनुभव करता है। सर वालियम व्यवरीज ने कहा है- ‘‘सामाजिक सुरक्षा से आशय ऐसी प्रणालीयुक्त योजना से है, जिसके द्वारा आवश्यकता, बीमारी, अज्ञानता फिजूलखर्ची और बेकारी, इन पांचों दानवों पर विजय मिले एक फ्रांसीसी लेखक के शब्दों में ‘‘सामाजिक सुरक्षा का तात्पर्य रोजगार की सुरक्षा, आय की सुरक्षा तथा कार्य क्षमता की सुरक्षा से है।‘‘ प्रो. जी. डी. एच. कोल ने इसे इस प्रकार परिभाषित किया है- ‘‘सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य यह है कि समाज के प्रतिनिधि के रूप में सरकार अपने समस्त नागरिकों की कठिनाइयोंके लिये एक न्यूनतम जीवन-स्तर रखने के लिये उत्तरदायी हो।‘‘
इस प्रकार कहा जा सकता है कि सामाजिक सुरक्षा किसी देश के नागरिकों का वह मानवीय अधिकार है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक जोखिमों से सुरक्षा मिले। सामाजिक सुरक्षा के निम्नलिखित तत्व हो सकते हैं-
(क) क्षतिपूर्ति- किसी आर्थिक क्षति का हर्जाना देना। उदाहरण के लिये कोई श्रमिक दुर्घटना में अपंग होकर अपनी आंख, हाथ, पैर खो बैठता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तब उसका परिवार आर्थिक संकट में पड़ता है। ऐसे समय सहायता से उसकी क्षतिपूर्ति होती है।
(ख) पुनर्वास या उद्धार- बीमार या अशक्त व्यक्ति की सहायता कर उसे फिर से कार्य करने योग्य बना देना या बेकार व्यक्ति को फिर से काम पर ला देना उसका पुनर्वास होता है।
(ग) प्रतिरोध- दुर्घटनाओं से बचाना या दुर्घटनायें न होने देने की व्यवस्था, उसके बाद की सहायता से भी अधिक महत्वपूर्ण है। इसके लिए अच्छे औजार देना, प्रशिक्षण देना तथा कार्य की दशाओं में सुधार करना इसी सामाजिक सुरक्षा के अंग होते हैं।
सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता और महत्व
जीवन में बाल्यकाल और वृद्धावस्था के अतिरिक्त भी अनेक ऐसे अवसर आते हैं। जबकि बिना सामाजिक सहायता के व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवित नहीं रह सकता। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सामाजिक रचना में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, जिससे विचारशील व्यक्तियों ने इस सामाजिक सहायता की आवश्यकता का अनुभव किया है-
(क) निर्धनता -मशीनों के प्रयोग ने समाज में श्रमिक वर्ग की आर्थिक कठिनाइयों को अधिक बढ़ाया है। पूंजीवादी समाज में इस वर्ग के पास श्रम करने के अतिरिक्त अन्य कोई साधन नहीं। निर्माताओं द्वारा उनकी इस असहाय अवस्था का शोषण किया गया, जिससे यह सर्वहारा वर्ग निर्धन होता चला गया और आने वाले संकटों से जूझने में असमर्थ हुआ। कर्ज, सम्पत्ति का अभाव, बचतों का न होना उनकी मजबूरियां हो गईं।
(ख) औद्योगिक खतरों का बढ़ना - यांत्रिक प्रणाली के विकास के साथ उपकरणों सम्बन्धी खतरे भी बढ़ गये। शॉर्ट सर्किट से आग लगना, विस्फोट होना, मशीन के फटने से हाथ, पैर जाना आम खतरे बन गये, जो श्रमिकों को क्षति पहुंचाने लगे। इस समय उनकी आर्थिक सहायता अत्यन्त आवश्यक हो गई। अनेक सावधानियों के बाद भी खतरे बने रहते हैं और श्रमिकों को सहायता की आवश्यकता पड़ती है।
(ग) नागरिक जीवन के खतरों में वृद्धि- सफाई, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, दुर्घटनाओं,दंगों आदि के कारण नागरिक जीवन असुरक्षित हो गया है। नागरिक जीवन की यह सामान्य घटनाएं बन गई है। इनसे श्रमिकों की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था उनके जीवन की गारण्टी केलिये अत्यन्त आवश्यक हो गई है।हजारों व्यक्ति इन दुर्घटनाओं के शिकार होते रहते है।
(घ) बेकारी की समस्या - उद्योगों में समृद्धिकाल में मजदूर काम पर बने रहते है किन्तु मंदीकाल में उन्हें हटा दिया जाता है। छंटनी के इस भय से मुक्ति के लिये उन्हें सामाजिक सुरक्षा आवश्यक है।
(ङ) संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन - संयुक्त परिवार प्रथा स्वयं में सामाजिक सहायता तथासामाजिक बीमें का कार्य करती है। इससे सामाजिक सुरक्षा का उद्देश्य पूरा होता था किन्तु आज संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन हो चुका है अतः सामाजिक सुरक्षा जरूरी हो गई है।
(च) मजदूरों का गांवों से प्रवास - औद्योगीकरण के कारण गांव के अधिसंख्य जनसंख्या का नगरों का प्रवास हुआ है उनका गांव व खेतों से संबंध विच्छेद होता जा रहा है। इससे उनकी आधार भूमि समाप्त हो गई है। अतः आश्रय के रूप में उन्हें कुछ सुरक्षा मिलना आवश्यक है।
(छ) मुद्रा की क्रय शक्ति का कम होना -आज भविष्य निधि में किया गया योगदान आवश्यक है। बीमा व पेंशन कुछ वर्ष बाद मुद्रा की क्रयशक्ति घट जाने के कारण आधे रह जायेंगे। इसकी क्षतिपूर्ति केवल सामाजिक सुरक्षा देकर ही की जा सकती है जिससे श्रमिक अपने जीवन-स्तर को यथावत बनाये रख सकता है।
(ज) खराब स्वास्थ्य - औद्योगिक समस्याओं के फलस्वरूप सफाई, स्वास्थ्य तथा बीमारियों की वृद्धि हुई है जिससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हुई है। रोगग्रस्त व्यक्तियों को सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
सामाजिक सुरक्षा का क्षेत्र
‘‘सामाजिक सुरक्षा‘‘ एक अत्यन्त व्यापक शब्द है। इसके अन्तर्गत सामाजिक सहायता, सामाजिक बीमा तथा सामाजिक सेवा को सम्मिलित किया जाता है। सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र का आशय राज्य के पारिवारिक दायित्वों से होता है। जिस प्रकार एक परिवार के प्रधान पर परिवार के समस्त सदस्यों के वर्तमान तथा भावी दायित्वों का भार होता है, ठीक उसी प्रकार राज्य नागरिकों का पालक होने के नाते राष्ट्र के समस्त नागरिकों का उत्तर दायित्व ग्रहण करने को बाध्य होता है। इसे ही सामाजिक सुरक्षा कहते हैं। सभी सामाजिक आकस्मिकताओं (जैसे बुढ़ापा, बीमारी, असमर्थता तथा बेरोजगारी) के विरुद्ध राज्य के सभी नागरिकों को संरक्षण का आश्वासन देना ही सामाजिक सुरक्षा की शर्त है। जैसे-जैसे कल्याणकारी राज्य भावना का विकास हुआ, उसी के अनुसार सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में विस्तार होता गया है। इसके अन्तर्गत देशों के अनुसार भिन्नता भी है। कुछ देशों में इसके अन्तर्गत न केवल औद्योगिक श्रमिक अपितु सम्पूर्ण जनसंख्या को ही सम्मिलित किया गया है।
भारत में सामाजिक सुरक्षा की योजनायें
यद्यपि हमारे देश में अभी तक सामाजिक सुरक्षा का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही हमारे देश की राष्ट्रीय सरकार ने सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। राज्य के नीति-निर्देशक तत्व के रूप में भारतीय संविधान में सामाजिक सुरक्षा के आदर्श को इन शब्दों में स्वीकार किया गया है कि, ‘‘राज्य नागरिकों को सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करके एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय के लिए राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं का सुधार सम्भव हो सके।‘‘ भारत के औद्योगिक श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से सुरक्षा योजना में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-
(i) औद्योगिक दुर्घटना तथा बीमारी की दशा में प्रावधान।
(ii) मातृत्व लाभ।
(iii) स्वास्थ्य बीमा, कर्मचारी प्राविडेण्ड फण्ड।
वर्तमान समय में निम्न अधिनियमों द्वारा सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की गई है।
1. श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम 1923 - यह अधिनियम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक रचनात्मक प्रयास था। यह अधिनियम ऐसे सभी कारखानों जहां 10 या उससे अधिक व्यक्ति कार्य करते हैं तथा शक्ति का प्रयोग होता है एवं ऐसे कारखानों जहां शक्ति प्रयोग तो नहीं होता परन्तु 50 या उससे अधिक श्रमिक काम करते हैं, पर लागू होता है। अधिनियम के अन्तर्गत श्रमिक को काम करते हुए चोट आ जाने, सदैव के लिए अयोग्य हो जाए या काम करते हुए मर जाने पर मालिक को उसको क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है। यह क्षतिपूर्ति की रकम औसत मासिक मजदूरी के आधार पर निकाली जाती है और चोट की प्रकृति के आधार पर निर्धारित होती है। यह उन सभी श्रमिकों पर लागू होता है जो 500 रुपये तक की मासिक आय प्राप्त करते हैं। यह अधिनियम विभिन्न उद्योगों पर लागू होता है, जैसे कारखानों, खानों, चाय बागानों, परिवहन एवं निर्माण रेल एवं अन्य विशिष्ट जोखिम वाले उद्योगों आदि। श्रमिक की कार्य करते समय मृत्यु हो जाने पर श्रमिक के आश्रितों को मुआवजा दिया जाता है अस्थायी अयोग्यता की स्थिति में निर्धारित दरों पर अर्द्ध मासिक भुगतान किये जाते हैं। यह अधिनियम अनेक बार संशोधित हो चुका है स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी यह सन् 1948, 1950, 1951, 1959 एवं 1962 में संशोधित किया जा चुका है।
2. मातृत्व लाभ अधिनियम -कारखानों में काम करने वाली महिला श्रमिकों के लिए सभी राज्यों में प्रसूति लाभ, बच्चा होने से पूर्व तथा बाद में छुट्टी तथा अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई है इस दिशा में सर्वप्रथम बम्बई में सन् 1929 में प्रसूति लाभ अधिनियम स्वीकार किया गया इसके पश्चात् अनेक राज्यों में तत्सम्बन्धी कानून बनाये गये। दरों एवं लाभों में समानता लाने के लिए केन्द्रीय सरकार ने सन् 1961 में, मातृत्व लाभ अधिनियम पारित किया। वर्तमान में यह अधिनियम सभी कारखानों खानों एवं बागानों पर लागू होता है। इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक स्त्री कर्मचारी को जिसने 160 दिन से अधिक समय तक काम किया है, बच्चा होने अथवा गर्भपात होने के दिन के बाद के 6 सप्ताह की छुट्टी मिलती है। 6 सप्ताह की छुट्टी बच्चा पैदा होने की तिथि से पहले भी मिलती है। इस अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी महिला श्रमिक को उसकी औसत मजदूरी से कम राशि नहीं दी जा सकती है।
3. कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948 - सन् 1943 में प्रो. बी.पी. अदारकर स्वास्थ्य बीमा योजना तैयार की थी। सन् 1945 में अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के विशेषज्ञों ने ने अदारकार योजना की जांच की। इन्हीं के सुधारों के आधार पर बाद में ‘कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948 पारित किया गया। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम मौसमी कारखानों को छोड़कर उन सभी उद्योगों पर लागू होता है जहां 20 या 20 से अधिक व्यक्ति काम करते हैं। जिन उद्योगों में शक्ति का उपयोग होता है वहां 10 अथवा 10 से अधिक व्यक्तियों के काम करने की दशा में यह अधिनियम लागू होता है। इस योजना के अन्तर्गत कर्मचारियों को पांच प्रकार की सुविधायें प्रदान की जाती है-
(i) बीमारी लाभ- बीमारी लाभ में बीमित व्यक्ति को चिकित्सा अधिकारी द्वारा प्रमाण पत्र दिये जाने पर नकद लाभ दिया जाता है। यह लाभ 365 दिन के सेवा काल में 56 दिन के लिये देय होता है। बीमारी लाभ की दैनिक दर औसत दैनिक मजदूरी की आधी देय होती है।
(ii) मातृत्व लाभ - स्त्री श्रमिकों को मातृत्व,मातृत्व लाभ अधिनियम के अंतर्गत दिए गए प्रावधानों के अनुरूप दिया जाता है।
(iii) अयोग्यता लाभ - इसके अंतर्गत उन श्रमिकों को लाभ मिलेगा। जो कारखानों में कार्य करते सम किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं या जब किसी कारणवश उनका स्वास्थ्य खराब हो जाता है।
(iv) आश्रितों के लिए लाभ - कारखाने में काम करते यदि किसी श्रमिक कीमृत्यु हो जाये तो श्रमिक की विधवा को आजन्म या पुनर्विवाह की अवधि तक लाभ मिलता है।
(v) चिकित्सा लाभ -प्रत्येक बीमा कर्मचारी के लिए निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्थाजाती है।
4. कर्मचारी प्राविडेन्द्र फण्ड अधिनियम 1952 - इस अधिनियम के अन्तर्गत वे व्यक्ति आते है जो एक वर्ष का सेवाकाल समाप्त कर चुके हैं अथवा पिछले 12 माह की अवधि में कम से कम 240 दिन कार्य कर चुके हो अथवा स्थायी घोषित कर दिये गये हो, इन तीनों में से जो भी पहले हो तथा जिनको एक हजार रुपये मासिक से अधिक वेतन नहीं मिलता हो। यह अधिनियम उन कारखानों एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है, जिनमें
(i) 50 या इससे अधिक श्रमिक कार्य करते हैं तथा जो तीन वर्ष से अधिक से कार्य कर रहे हैं और
(ii) 50 से कम किन्तु 20 से अधिक श्रमिक कार्य करते हैं तथा जो पांच वर्ष सेअधिक समय से कार्य कर रहे हैं इस योजना में कर्मचारी अपने वेतन एवं महंगाई भत्ते का 6 प्रतिशत चन्दे के रूप में देता है। नियोक्ता भी इसी दर से चन्दा देता है। इन्जीनियरिंग, लोहा और इस्पात, कागज एवं सीमेंट आदि उद्योगों में अंशदान की यह दर बढ़ाकर 8 प्रतिशत कर दी गयी है। कर्मचारी को यह राशि ब्याज सहित अवकाश प्राप्त करने पर मृत्यु होने पर उसके उत्तराधिकारियों को अस्थायी, अयोग्यता, छंटनी, विदेश प्रवास या 15 वर्ष के पश्चात नौकरी छोड़ने पर सम्पूर्ण संचित राशि ब्याज समेत लौटा दी जाती है।कोयला खानों, असम चाय बागानों एवं समुद्री कर्मचारियों के लिए प्राविडेन्ड फण्डअधिनियम अलग से पारित हो चुके हैं।
5. पारिवारिक पेन्शन योजना - औद्योगिक कर्मचारियों की अकाल मृत्यु की अवस्था में उनके परिवारों को दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से मार्च सन 1971 से कोयला खान परिवार पेन्शन योजना 1971 तथा ‘कर्मचारी परिवार पेन्शन योजना 1971‘‘ प्रारम्भ की गई। ये योजनाएं उन कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो कोयला खान भविष्य निधि परिवार पेंशन और बोनस योजनाएं अधिनियम सन् 1948 तथा कर्मचारी भविष्य निधि और परिवार पेंशन अधिनियम सन् 1952 के अन्तर्गत आते हैं। किसी सदस्य की मृत्यु होने पर विधवा, विधुर, नाबालिग पुत्र या अविवाहित पुत्री को भी मासिक पेंशन देते हैं।
6. जबरन छुट्टी या छटनी लाभ - नियोक्ताओं द्वारा श्रमिकों को जबरन छुट्टी अथवा छटनी पर रोक लगाने के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में संशोधन कर दिया गया है वर्तमान में लागू औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम 1976 के द्वारा यह व्यवस्था कीगयी है कि 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों को जबरन छुट्टी के दौरान अपने कर्मचारियों को कुल वेतन का आधा देना होगा।
7. ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम -सम्पूर्ण देश में ग्रेच्युटी नियम में समानता लाने के उद्देश्य से 1971 में सरकार ने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम अनुसार निश्चित मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को चाहे वे किसी कारखाने, खाने बागान, तेल क्षेत्र बन्दरगाह तथा तेल कम्पनी में काम करते हों, सेवा निवृत्ति, त्यागपत्र, मृत्यु आदि पर ग्रेेच्युटी दी जाती है। इस सम्बन्ध में शर्त केवल यह है कि यह लाभ केवल 10 अथवा अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों में संलग्न कर्मचारियों को ही मिलेगा। इस अधिनियम के अन्तर्गत कर्मचारियों को सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए 15 दिन का वेतन (अधिक से अधिक 20 माह का वेतन)ग्रेच्युटी के रूप में दिया जाता है।
8. विक्रय सम्बर्द्धन कर्मचारी (रोजगार दशायें) अधिनियम1976 - विभिन्न श्रम अधिनियमों के अन्तर्गत विक्रय सम्बर्द्धन क्रियाओं में संलग्न व्यक्तियों को अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान करता है। रोजगार दशाओं के नियमन के अतिरिक्त सेवा सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी, मातृत्व लाभ, बोनस, ग्रेच्युटी एवं क्षतिपूर्ति का भुगतान आदि से सम्बन्धित श्रम अधिनियमों के लाभ इसके अन्तर्गत दिये जाते हैं।
9. बागान संशोधन अधिनियम 1981 - बागान श्रम अधिनियम 1951 में लागू कियागया था। इसका 1981 का संशोधन जनवरी 1982 से लागू किया गया है। यह उन चाय, कहवा रबर, सिन्कोना एवं इलायची के बागानों पर लागू होता है जिनका क्षेत्रफल 5 हैक्टेयर या उससे अधिक होता है एवं जिसमें 15 या उससे अधिक श्रमिक कार्य कर रहे हो।यह अधिनियम बिहार, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल एवं उत्तर प्रदेश तथा अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूहों में लागू किया गया है.
10. कोल माइन्स प्राविडेण्ड फण्ड अधिनियम - सन् 1949 से लागू इस अधिनियम के द्वारा भारत सरकार को यह अधिकार है कि प्राविडेण्ड फण्ड तथा बोनस के वितरण की यह योजना बनाकर लागू कर सके। इस अधिनियम से कोयले की खान में काम करने वाले प्रत्येक श्रमिक को बोनस तथा प्राविडेण्ड फण्ड का लाभ अनिवार्य रूप से प्राप्त होता है।
11. रेलवे कर्मचारियों के लिए बीमा योजना - सरकार ने हाल ही में रेलवे कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि में जमा राशि के आधार पर बीमा योजना प्रारम्भ की है। इसका प्रावधान 1976-77 के रेलवे बजट में किया गया था। इस योजना के लागू हो जाने से प्रत्येक रेलवे कर्मचारी को कम से कम 5 वर्ष की सेवा के पश्चात् सेवाकाल के दौरान आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर उसका उत्तराधिकारी एक निश्चित राशि पाने का अधिकारी होगा।
3. प्रमुख सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों कावर्णन कीजिए।
4. औद्योगिक समाजकार्य क्या है? चर्चा करें।
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UNIT - 2
1. भारत में औद्योगिक विकास की अवधारणा एवं आवश्यकता का वर्णन करें।औद्योगिक विकास भारत में व्यापक रूप से उद्योग क्षेत्र की स्थापना, विस्तार और समृद्धि को संकेत करता है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की आर्थिक वृद्धि और उन्नति है। औद्योगिक विकास के निम्नलिखित पहलुओं द्वारा इसकी अवधारणा और आवश्यकता को समझा जा सकता है:
रोजगार सृजन: औद्योगिक विकास देश में बड़े पैम्बर स्तर पर रोजगार सृजन करता है। यह उन्नति और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में।
आधुनिकीकरण और तकनीकी प्रगति: औद्योगिक विकास तकनीकी और औद्योगिक अद्यतनीकरण के माध्यम से उद्यमियों को आधुनिक उपकरण और प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाने में मदद करता है।
आर्थिक वृद्धि: औद्योगिक विकास आर्थिक वृद्धि को बढ़ाता है और देश की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक प्रभाव डालता है। यह विकास और व्यापार की बढ़ती मांग का सामर्थ्यकरण करता है।
अनुसंधान और विकास: औद्योगिक विकास नई तकनीकियों, उत्पादों, और सेवाओं के विकास के लिए अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करता है। यह नवाचारों को बढ़ावा देता है और उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार करता है।
समर्थन और प्रोत्साहन: सरकार और निजी क्षेत्र के समर्थन और प्रोत्साहन के माध्यम से औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने का प्रयास करते हैं, जो नये उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण है।
पर्यावरणीय प्रभाव: अच्छी राह पर, औद्योगिक विकास पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रखते हुए सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यह समुदाय की भलाई में सुधार कर सकता है और स्थायी और उन्नत पर्यावरणीय प्रथाओं का समर्थन कर सकता है।
भारत में औद्योगिक विकास की अवधारणा उसके सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर विकसित होती है, जिससे विकास और प्रगति में सुधार होती है और देश की सामर्थ्यवान व्यापारिक संरचना को मजबूती मिलती है।
OR
औद्योगिक विकास
औद्योगिक विकासआधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। सभ्यता के विकास के साथ ही साथ इस शब्द के महत्व में और भी वृद्धि होती जा रही है। यदि इस शब्द का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि इस शब्द की उत्पत्ति उद्योग से हुई है। उद्योग मानव जीवन का आधार है और इसके अभाव में मनुष्य अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता है। वैसे भी उद्योग का साधारण अर्थ है परिश्रम करना या प्रयास करना, आदि। मौलिक प्रश्न यह है कि व्यक्ति परिश्रम क्यों करता है? क्या परिश्रम किए बिना वह जिन्दा नहीं रह सकता है? इसके उत्तर में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि परिश्रम मानव जीवन के लिए अनिवार्य है। मनुष्य की अनेक आवश्यकताएँ होती हैं और वह इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिश्रम करता है। वह जीवनयापन के साधनों को अपनाता है और इन्हीं साधनों को उद्योग के नाम से जाना जाता है।
उद्योगों का सफलतापूर्वक सम्पादन तभी सम्भव हो सकता है जबकि मशीनें और यंत्र हों। इसका परिणाम यह होता है कि उद्योगों में यंत्रों और मशीनों को अपनाने की प्रक्रिया हो जाती है। इसी प्रक्रिया को यंत्रीकरण के नाम से जाना जाता है। वैसे तो प्रत्येक उद्योगों में यंत्रों की आवश्यकता होती है, किन्तु यंत्रीकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके माध्यम से यंत्र ही उद्योगो के आधार होते हैं। औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बड़े पैमाने के नवीन उद्योगों को प्रारम्भ किया जाता है और साथ ही जो छोटे उद्योग होते हैं उन्हें विशाल उद्योगों में परिवर्तित किया जाता है। औद्योगीकरण की पीकागचांग ने इस प्रकार परिभाषा दी है-
‘‘औद्योगीकरण एक प्रक्रिया है। जिसके अन्तर्गत उत्पादन कार्य से सम्बन्धित अनेक परिवर्तन होते रहते है। इसके अन्तर्गत तीन मौलिक परिवर्तन आते है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यावसायिक साहस का यंत्रीकरण, नवीन उद्योगों की स्थापना, नए बाजार की खोज एव नए क्षेत्रों का शोषण होता है। संक्षेप में, औद्योगीकरण एक साधन है, जिसके द्वारा पूँजी का विस्तार एवं विकास किया जाता है।‘‘‘ इस प्रकार ‘‘औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसकी सहायता से नवीन उद्योगों की स्थापना की जातीहै और प्राचीन उद्योगों को विशाल पैमाने में परिवर्तित किया जाता है। इस परिवर्तन के लिए विशाल यंत्रों और मशीनों का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय प्रगति में वृद्धि करना होता है।‘‘
भारत में उद्योगों का विकास
यदि हम भारत में औद्योगीकरण की विवेचना करें तो स्पष्ट होता है कि यहाँ पर औद्योगीकरण की स्थापना 19वीं शताब्दी के मध्य में हुई है। इसके इतिहास का अवलोकन करने से ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में काम करने वाले कर्मचारियों ने जूट और वस्त्र की मिलों की स्थापना सबसे पहले भारत में की थी। भारत के दो प्रमुख नगरों कलकत्ता और बम्बई में सबसे पहले कारखाने की स्थापना की गई। यद्यापि भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया 1850 से ही प्रारम्भ हुई थी, किन्तु प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इस क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई। औद्योगीकरण प्रमुख रूप से दो क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापन से हुआ।
(1) बम्बई और अहमदाबाद में सूत्री वस्त्र मिलों के कारण
(2) कलकत्ता में जूट की मिलों की स्थापना के कारण।
इसी प्रकार 1876 में ‘लाल इमली के नाम से कानपुर में सबसे पहले ऊनी कपड़ों के मिलों की स्थापना की गई। 1882 में पंजाब में धारीवाल नामक मिल की स्थापना की गई थी। इसके साथ ही अनेक नगरों में रेशमी कपड़े के मिलों की स्थापना हुई जैसे मैसूर, सूरत, बम्बई, बेलगाँव वाराणसी, अमृतसर आदि। इसके कारण भी औद्योगीकरण की प्रक्रिया को काफी गति मिली है।
1974 के भारत में औद्योगीकरण अत्यन्त ही तीव्र गति से हुआ है। स्वतंत्रता के बाद अनेक विशाल कारखानों की स्थापना के कारण औद्योगीकरण को काफी गति मिली है।
भारत में औद्योगीकरण की आवश्यकता
औद्योगीकरण प्रत्येक देश के लिए उपयोगी है। इसी कारण भारतवर्ष में भी इसका महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। भारतवर्ष में वास्तविक औद्योगिक की प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद ही प्रारम्भ होती है भारतवर्ष मे निम्न कारणों से औद्योगीकरण की अत्यन्त ही आवश्यकता है-
(1) भारतवर्ष आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश नहीं है। देश के सन्तुलित आर्थिक विकास के लिए औद्योगीकरण की अत्यन्त ही आवश्यकता है।
(2) भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहाँ के हल, बैल, बीज, पशु आदि अत्यन्त ही पिछड़ी अवस्था में हैं। इसके साथ ही भारतीय किसान अत्यन्त ही रूढ़िवादी और अन्धविश्वासी है। इसका कारण भी स्पष्ट है। भारतीय किसान को खेती के लिए कृषि पर आश्रित रहना पड़ता है। इस दृष्टिकोंण से भारत की उन्नति के लिए औद्योगीकरण आवश्यक है।
(3) औद्योगीकरण का जनसंख्या पर भी प्रभाव पड़ता है। भारत में जनसंख्या की जो तीव्र गति से वृद्धि हो रही है उसे रोकने तथा सन्तुलन बनाये रखने के लिए भी औद्योगीकरण आवश्यक है।
(4) भारत में बेरोजगारी प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए औद्योगीकरण ही एकमात्र उपाय है। औद्योगीकरण से अनेक व्यक्तियों को रोजगार दिया जा सकता है।
(5) भारत में प्रति व्यक्ति आय भी अत्यन्त ही कम है। इस आमदनी में वृद्धि के लिए आवश्यक है।कि भारत में औद्योगीकरण को अपनाया जाए।
(6) औद्योगीकरण के द्वारा युद्ध सामग्री का उत्पादन किया जा सकता है। इससे देश की सैनिक शक्ति में वृद्धि होती है। इसलिए सामाजिक दृष्टि से भी भारत में औद्योगीकरण आवश्यक है।
(7) औद्योगीकरण ही एक साधन है जिसके माध्यम से लघु और विशाल उद्योगों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। भारतवर्ष में जहाँ लघु उद्योगों की आवश्यकता है, औद्योगीकरण अत्यन्त ही आवश्यक है।
(8) औद्योगीकरण ही एक ऐसा साधन है जिसकी सहायता से देश का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।
2. भारत में श्रम कल्याण क्षेत्रों का वर्णन करें।
श्रम कल्याण से आशय
श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य उन क्रियाकलापों से होता है। जिनके द्वारा श्रमिकों का जीवन सुखमय हो जाता है और जिनमें श्रमिको की कार्यकुशलता में वृद्धि की जाती है। श्रम कल्याण, कार्य धारणा को विभिन्न अर्थो में प्रयुक्त किया जाता है। और देश कार्य तथा परिस्थितियों के अनुसारइसके महत्व में भी भिन्नता पायी जाती है। वस्तुतः श्रम कल्याण की धारणा उतनी लचीली है कि इसकी परिभाषा देना अत्यन्त कठिन कार्य है।
श्रम कल्याण का अर्थ एवं परिभासएँ :- शाही श्रम आयोग ने लिखा है श्रम कल्याण एक ऐसा शब्द है जो बहुत ही लचीला है। इसका अर्थ एक देश की तुलना में उसकी विभिन्न सामाजिक नीतियों औद्योगिकरण की स्थिति व श्रमिकों की शिक्षा सम्बंधी प्रगति के अनुसार भिन्न भिन्न लगाया जाता है। सर एड वर्ड पेटन के अनुसार श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य श्रम के सुख स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए उपलब्ध की जाने वाली दशाओं से है।
ई० टी० कैली के अनुसार श्रम कल्याण से तात्पर्य किसी प्रतिष्ठान द्वारा श्रमिको के व्यवहारों के लिए कुछ नियमो का अपनाया जाना है।
ई० एम० ग्राउण्ड के अनुसार:- श्रम कल्याण से ताप्पर्य विद्यमान औद्योगिक प्रणाली तथा अपनी फैक्ट्रियो रोजगार की दशाओ को उन्नत करने के लिए मालिको द्वारा किए गए ऐच्छिक प्रयत्नों से है।
एन0 एम0 जोशी के अनुसार श्रम कल्याण के अंतर्गत हम श्रमिको के लाभ के लिए मालिको द्वारा किए गए प्रयत्नो तथा कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कार्य करने की न्यूनतम दशाओं के आदर्श तथा दुर्घटना वृद्वावस्था बेकारी और बीमारी के लिए पास किए गए सामाजिक विधान को सम्मिलित कर सकतें हैं।
श्रम कल्याण कार्य के अंग
1 स्थान की दृष्टि से वर्गीकरण
- कारखाने के अन्दर कल्याणकार्य
- कारखाने के बाहर कल्याणकार्य
2. प्रबंध की दृष्टि से वर्गीकरण
- श्रम कल्याण कानून
- ऐच्छिक श्रम कल्याण
- पारस्परिक श्रम कल्याण
3. प्रदान करने वाले संगठन की दृष्टि से वर्गीकरण
- सेवायोजको द्वारा
- सरकार द्वारा
- मजदूर संघ द्वारा
- समाज की अन्य संस्थाओं द्वारा
1. स्थान की दृष्टि से वर्गीकरण - ब्राउण्ट ने श्रमिक कल्याण के कार्य को दो भागो में बाँटा है।
- कारखाने के अंदर का कल्याण कार्य :- वैज्ञानिक भर्ती श्रमिकों की भर्ती वैज्ञानिक ढंग से करना औद्योगिक प्रशिक्षण विभिन्न कारखानो मे विशिष्ट कार्यों का प्रशिक्षण स्वच्छता प्रकाश तथा वायु का प्रबंध इससे कारखाने में सफाई-पुताई रोशनदानों का प्रबंध, पीने के पानी का प्रबंध, स्नानगृह शौचालय, मूत्रालय आदि की व्यवस्था रोशनी का प्रबंध तथा सर्दी को कम करने की व्यवस्थाएं आती है। दुर्घटनाओं की रोकथाम - इसमें खतरनाक यंत्रो अत्यधिक ताप आदि से बचाव तथा आग बुझाने का प्रबंध आदि सम्मिलित अन्य कार्य जैसे कैण्टीन थकावट दूर करने की व्यवस्था आराम की व्यवस्था आदि।
- कारखाने के बाहर का कल्याणकार्य
- सस्ते तथा पोषक युक्त भोजन की व्यवस्था
- मनोरंजन की सुविधाएँ क्लब, अखाडे, सिनेमा, रेडियो आदि।
- शिक्षा का प्रबंध इसमें प्रौढ शिक्षा सामाजिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा स्त्री पुरुष बालको कोदी जाती है।
- चिकित्सा व्यवस्था इसमें आराम, अवकाश, मुक्त, उपचार, आदि होते हैं।
- उत्तम आवासों की व्यवस्था
2. प्रबंध की दृष्टि से वर्गीकरणः-
- कानूनी श्रम कल्याण - कानूनी श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य उन समस्त कार्यों से है जो श्रमिको के हित के लिए सरकार की ओर से विभिन्न कानूनों के रूप में किये जाते हैं।
- ऐच्छिक श्रम कल्याण - इस वर्ग में वे कल्याण आते है जिनको करनाकानूनन आवश्यक नहीं होता है किन्तु उद्याोगपति इनको सेवा भावना अथवा सार्वजनिक हित के उद्देश्य से स्वयं करते हैं।
- पारस्परिक श्रम कल्याण - कभी कभी उद्योगपति मजदूरी तथा अन्य दल भी परस्पर हित के लिए एक दूसरे की सहायता करके श्रम कल्याण की सेवाओं की व्यवस्था करते है। उद्योगपतियों और मजदूरों और दोनों का बहुधा सहयोग इन कार्यों में होता है
3. प्रदान करने वाले संगठन की दृष्टिसे वर्गीकरणः-
- सेवायोजको द्वारा- मजदूरी के अतिरिक्त ऐच्छिक में दिया जाने वाला लाभ इस वर्ग में आता है। जैसे निवास, जलपान, यातायात आदि की सुविधा।
- सरकार द्वारा- अनेक राज्य सरकारो ने मजदूरों की उन्नति के लिएवयवस्था की है वह इसी श्रेणी की है।
- मजदूर संघ द्वारा- श्रमिक संघों का भी यह कर्तव्य है कि सदस्यों के लिए कुछ कल्याणकारी कार्य करें। कुछ श्रमिक संघ चिकित्सा आदि की भी व्यवस्था करते है।
- समाज की अन्य संस्थाओं द्वारा: अनेको धनी व्यक्ति संस्थाओं आदि भी श्रमिको के लिए शिक्षा अस्पताल आदि खुलवातें है। वे इस वर्ग में आते है।
भारतीय श्रमिकों की प्रमुख समस्याएँ
समस्यायें मानव जीवन के साथ ही हैं। प्रत्येक विकसित और अविकसित देशों में कुछ न कुछ समयस्याएं होती है। भारत में अनेक प्रकार की समस्यायें हैं। इन समस्याओं में श्रमिकों की समस्या भी एक है। श्रमिकों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के कारण श्रमिकों की शारीरिक और मान क्षमता का ह्रास होता है। कार्यक्षमता की कमी चाहे शारीरिक हो या मानसिक उत्पादन को प्रभावित है। इससे उत्पादन में कमी आने से देश के विकास की गति धीमी हो जाती है। भारतवर्ष के श्रमिकों की प्रमुख समस्याओं को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-
(1) प्रवासिता- प्रवासी प्रवृत्ति भारतीय श्रमिकों की मौलिक विशेषता है। प्रवासिता का अर्थ है कि भारतीय श्रमिक जहाँ काम करते हैं, वहाँ के मूलनिवासी नहीं होते हैं। इसके कारण उनका एक से दूसरे स्थान को आना जाना बना रहता है। इसके साथ ही भारतीय श्रमिक फसल और उत्सव के अवसर पर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हैं। इस कारण उन्हें अपना कार्य छोड़ना पड़ता है। भारतीय श्रमिकों में प्रवासिता के कारणों को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-
- कुटीर उद्योगों का पतन,
- जनसंख्या में वृद्धि और
- भूमि पर जनसंख्या का अधिक दबाव।
प्रवासिता के दुष्परिणाम-प्रवासिता के दुष्परिणामों को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-
- कार्य कुशलता में कमी,
- स्वास्थ्य पर बुरा असर,
- अधिक व्यस्तता और मस्तिष्क पर अधिक दबाव,
- स्वस्थ्य मनोरंजन का अभाव और बुरी प्रवृत्तियों का विकास
- मजदूरी में कमी
- काम की अनिश्चितता में वृद्धि,
- औद्योगिक संगठनों पर प्रभाव
(2) श्रमिकों के भर्ती की दोषपूर्ण पद्धति- श्रमिकों की दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या उनके भर्ती की पद्धति से सम्बन्धित है। इन समस्याओं में से कुछ प्रमुख समस्यायें इस प्रकार है- कि
(i) श्रमिकों की भर्ती मध्यस्थों के द्वारा होती है। ये मध्यस्थ अनेक प्रकार की समस्यायें पैदा करते हैं-
(ii) श्रमिकों और नालिकों के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति को जन्म देते हैं।
iii) श्रमिकों की भर्ती में कुशलता और अकुशलता को महत्व नहीं देते है।
(iv) भर्ती में मजदूरों से कमीशन लेते है।
(v) भर्ती के अतिरिक्त श्रमिकों की पदोन्नति के कोई भी सन्तोषजनक नियम नहीं होते हैं। जिससे पदोन्नति के परिणामस्वरूप मजदूरों में असन्तोष की भावना का विकास होता है।
(vi) स्थानान्तरण में भी पक्षपात किया जाता है। इसके कारण से भी श्रमिकों में अनेक प्रकार कीसमस्याओं का जन्म और विकास होता है।
(3) अनुपस्थितता-अनुपस्थितता भारतीय श्रमिकों की तीसरी मौलिक विशेषता है। अनुपस्थितता या अर्थ है निर्धारित समय पर काम पर उपस्थित न होना। जब श्रमिक बिना पूर्व सूचना के काम पर नहीं जाते हैं तो इसे अनुपस्थितता कहा जाता है। अनुपस्थितता से श्रमिकों को निम्न हानियों उठानी पड़ती है-
(i) इससे श्रमिकों को आर्थिक हानि होती हैै।
(ii) अनुपस्थित रहने से श्रमिकों में अनुशासनहीनता की प्रवृत्ति का विकास होता है, जिससे उनकी उन्नति में बाधा उत्पन्न होती है,
(iii) इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप श्रमिकों और मालिकों के बीच में संघर्ष की स्थिति का जन्म और विकास होता है.
(iv) इससे परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
(4) श्रमिकों के हेर-फेर की समस्या- उद्योगों में ऐसा पाया गया है कि कर्मचारियों के कार्यों की प्रकृति में हेर फेर किया जाता है, या परिवर्तन होता रहता है। इस हेर फेर की समस्या का श्रमिकों के ऊपर निम्न कुप्रभाव पड़ता है-
(i) इससे श्रमिकों के संगठन को हानि पहुँचती है।
(ii) श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी आती है,
(iii) सेवाओं में स्थायित्व की कमी के कारण उनके जीवन में उथल पुथल मची रहती है।
(iv) अनिश्चितता के कारण श्रमिक अपने भविष्य के सम्बन्ध में किसी प्रकार की योजना का निर्माण नहीं कर सकते हैं।
(v) श्रमिकों में हेर-फेर या परिवर्तन के कारण श्रम संगठनों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,
(vi) श्रमिकों में हेरफेर की प्रवृत्ति के कारण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता है।
(vii) इसके परिणामस्वरूप मानवीय व भौतिक प्रसाधनों के उपयोग में कठिनाइयां उत्पन्न होती है।
(5) निम्न जीवन-स्तर- जीवन स्तर का सम्बन्ध मनुष्य की आदत से है। जीवन स्तर रहन-सहन के तरीकों को कहते हैं। संक्षेप में, जीवन स्तर का सम्बन्ध मनुष्य की आदतों से हैं, जिनकी तृप्ति का वह आदी हो गया है। जीवन स्तर को सुविधा की दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है-
(i) उच्च जीवन-स्तर और
(ii) निम्न जीवन-स्तर
श्रमिकों के निम्न जीवन स्तर के परिणामस्वरूप उनके जीवन में निम्न समस्याओं का का जन्म होता है-
(i) कार्यकुशलता में कमी,
(ii) अशिक्षा और अज्ञानता में वृद्धि,
(iii) स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,
(iv) असन्तुलित और अपर्याप्त भोजन।
(v) स्वस्थ मनोरंजन का अभाव और जनसंख्या में वृद्धि।
(vi) तंग बस्तियों में निवास ।
(6) ऋणग्रस्तता की समस्या-भारतीय श्रमिकों को सबसे बड़ी समस्या ऋणग्रस्तता की है। मजदूरों की कार्यक्षमता में कमी और उनके निम्न जीवन स्तर का सबसे प्रधान कारण है। शाही श्रम आयोग ने अपने अध्ययन में ऐसा पाया कि औद्योगिक क्षेत्रों के 3/4 श्रमिक ऋणग्रस्त है। औद्योगिक केन्द्रों में श्रमिकों में पाई जाने वाली ऋणग्रस्तता के अनेक कारण हैं। ऋणग्रस्तता का श्रमिकों के जीवन पर निम्न कुप्रभाव पड़ता है-
(i) श्रमिकों की कार्यकुशलता में कमी होती है।
(ii) श्रमिकों के नैतिक चरित्र में गिरावट आती है।
(iii) वर्ग संघर्ष की भावना का जन्म होता है।
(iv) ऋणग्रस्तता श्रमिक की मोल भाव या सौदा करने की शक्ति को कम करती है। इसके परिणामस्वरूप उन्हें वस्तुओं का अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है।
(v) इससे श्रमिकों में आत्म सम्मान की भावना का लोप होता है।
(vi) ऋणग्रस्तता में श्रमिकों के जीवन स्तर में निरन्तर गिरावट होती रहती है.
(vii) ऋणग्रस्तता के परिणामस्वरूप श्रमिकों की समस्त अभिलाषाओं का विनाश होता है।
(7) काम करने की बुरी दशायें-मजदूरों के काम करने की जो दशायें हैं, उनकी विशेषतायें निम्न है-
(i) धूल, धुआं, आदि से सुरक्षा का अभाव।
(ii) कल्याण कार्यों की कमी और इनकी अव्यवस्था.
(iii) स्वच्छता का अभाव।
(iv) सुरक्षा का अभाव (यन्त्रों से)।
(v) स्वच्छ वायु और प्रकाश की कमी।
(vi) काम के अधिक घण्टे आदि।
कारखाने में इन बुरी दशाओं में रहकर श्रमिकों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इस कठिन परिश्रम के कारण उनकी कार्यक्षमता में कमी होती है, स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है और ऋणग्रस्तता में वृद्धिहोती है।
(8) पाली व्यवस्था के दोष- प्रायः सभी देशों और सभी उद्योगों में पाली अथवा शिफ्ट की प्रथा पाई जाती है। इस पाली की प्रथा के कारण मजदूरों को निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता
(i) रात्रि पालियाँ स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती हैं और इससे श्रमिकों की आयु सीमा कम होती है
(ii) कार्य के घण्टे फैले हुए होने के कारण मजदूरों को असुविधा का अनुभव होता है।
(iii) रात्रि पाली से पति पत्नी अलग रहते हैं और इससे अनैतिकता में वृद्धि होती है.
(iv) शिफ्ट प्रणाली के कारण मजदूरों को अनेक प्रकार की दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है।
(v) कुछ शिफ्ट ऐसे समय में प्रारम्भ और समाप्त होते हैं कि न तो समय पर खाना ही मिल पाता है और न नींद ही पूरी होती है।
(9) काम करने के अधिक घण्टे- काम करने के अधिक घण्टे भारतीय श्रमिकों की अगली महत्वपूर्ण करना समस्या है। काम के घण्टों में अधिकता के कारण श्रमिकों को निम्न समस्याओं का सामना पड़ता है-
(i) सामाजिक जीवन के कार्यों की उपेक्षा।
(ii) कार्यक्षमता में कमी।
(iii) स्वास्थ्य में गिरावट।
(10) स्वास्थ्य की समस्यायें- श्रमिकों की अन्य समस्याओं की तुलना में स्वास्थ्य की समस्या - अधिक महत्वपूर्ण है। आज का औद्योगिक काम अनेक खतरों और जोखिमों से भरा पड़ा है। उन्हें अत्यन्त ही दयनीय परिस्थितियों में कार्य करना पड़ता है। श्रमिकों की स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रमुख समस्यायें हैं-
(i) कार्यस्थल का दोषपूर्ण वातावरण।
(ii) हानिकरण पदार्थों का प्रयोग।
(iii) आवास की कमी।
(iv) चिकित्सा सुविधाओं का अभाव।
(11) दोषपूर्ण प्रबन्ध की समस्या- इसके अन्तर्गत निम्न समस्यायें आती हैं।
(i) मालिक का व्यवहार।
(ii) काम का दोषपूर्ण विभाजन
(iii) शिक्षा का अभाव और मजदूरों की अज्ञानी प्रकृति।
(iv) रूढ़िवादिता और परम्परा प्रेम।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा (K) के अनुसार औद्योगिक विवाद वे विवाद हैं जो ‘‘नियोक्ता और नियोक्ता के मध्य, नियोक्ता तथा कर्मचारियों के मध्य एवं श्रमिक तथा श्रमिक के मध्य विवाद अथवा मतभेद के रूप में प्रकट होते हैं, तथा जो रोजगार की शर्तों, कार्य की दशाओं तथा बेरोजगारी से सम्बन्धित होते हैं।
औद्योगिक विवाद के आवश्यक तत्व
(1) कर्मचारी तथा नियोक्ता में संविदाजनित सम्बन्ध विद्यमान होने चाहिए। इनमें सेवा सम्बन्धी आपसी अनुबन्ध होना चाहिए तथा श्रमिक वास्तव में कार्यरत होना चाहिए।
(2) विवाद श्रमिकों द्वारा अथवा उनके संगठनों द्वारा प्रस्तुत किये गये हों, किन्तु नियोक्ता द्वारा उन पर विचार न किया गया हो।
(3) यह विवाद नियोक्ताओं के मध्य हो सकता है (जैसे मजदूरी की दर में स्पर्द्धा) श्रमिकों एवं नियोक्ताओं के मध्य हो सकता है (जैसे वर्गीकरण में उत्पन्न विवाद तथा कार्य आबंटन के समय उत्पन्न विवाद तथा श्रमिकों एवं श्रमिकों के मध्य हो सकता है।
(4) विवाद नियोजन अथवा अनियोजन से सम्बन्धित भी हो सकता है तथा नियोजन की शर्तों एवं दशाओं से भी। अधिकारियों एवं प्रबन्धकों में कार्य की शर्तों एवं दशाओं सम्बन्धी विवाद को औद्योगिक विवाद नहीं कहा जाता।
(5) विवाद ऐसे उद्योगों में प्रस्तुत किये जाने चाहिए जो कार्यरत हैं। अधिनियम एवं वैधानिक निर्णय के आधार पर औद्योगिक विवाद निम्न किसी भी बात को लेकरउत्पन्न हो सकते हैं
- स्थायी आदेशों के औचित्य के सम्बन्ध में विवाद
- छँटनी (नियोक्ता द्वारा श्रमिक को बिना किसी दण्ड अथवा अभियोग के सेवा से पृथक करना) जो व्यवसाय बन्द करने पर की जाती है (व्यवसाय बन्द करने का अर्थ किसी स्थान विशेष में व्यवसाय को बन्द करना नहीं, वरन सम्पूर्ण व्यवसाय की सामप्ति से है)। जबरी छुट्टी (कच्चे माल, ईंधन तथा पूँजी के अभाव, अधिक माल जमा होना अथवा ऐसे ही अन्य किसी कारण से नियोक्ता द्वारा श्रमिक को कार्य देने में असमर्थता प्रकट करना सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत श्रमिक को कार्य मुक्त कर दिया जाता है), निलम्बित श्रमिक को पुनः कार्य पर लेना, उसे निकालना अथवा तत्सम्बन्धी क्षतिपूर्ति के प्रश्न को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है।आदि।
- किसी सरकारी घोषणा, निर्णय या विवाद के प्रतिफल का लाभ श्रमिक को देने से मना करनेपर सामयिक नियुक्ति वाले श्रमिक को सामयिक भत्ता देने से इन्कार करना।
- मजदूरी की न्यूनतम दर निर्धारित करने, भुगतान विधि तथा श्रमिक के किसी अधिकार का हनन करने के प्रश्न पर।
- तालाबन्दी (जय नियोजक श्रमिक को कार्य देने से मना कर दे तथा उन्हें कार्य स्थल पर जाने की अनुमति न दें। क्षतिपूर्ति के दावे सम्बन्धी तथा किसी हड़ताल को अवैध घोषित करने कीसमस्या को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है।
- नगरपालिकाओं एवं उनके कर्मचारियों के मध्य हुए विवाद।
- प्रतिस्पर्दी संगठनो के मध्य विवाद।
- कर्मचारी एवं नियोक्ता के मध्य विवाद।
औद्योगिक विवादों के समाधान पर विचार करते हुए, इसके मुख्य समाधान निम्नलिखित हो सकते हैं:
समझौता और समन्वय: विवाद समाधान के लिए समझौता और समन्वय का माध्यम हो सकता है। इसमें श्रमिक संगठन और नियोक्ता के बीच वार्ता की प्रक्रिया शामिल होती है ताकि उन्होंने समस्याओं का समाधान ढूंढ सकें।
मध्यस्थता और समाधान प्रक्रिया: अक्सर विवादों को समाधान के लिए मध्यस्थता का सहारा लिया जाता है। तीसरी पक्ष की मध्यस्थता से विवाद परिषद का गठन किया जा सकता है जो समस्याओं को न्यायिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखती है।
कानूनी राहत: कानूनी राहत की प्रक्रिया उपयुक्त मानी जा सकती है जिसमें कई बार विवाद स्थायी और गहराई से विचार किए जाते हैं। यह विधि विवादों के लिए समाधान प्रदान करने में मदद करती है।
सामजिक और सांस्कृतिक समझौता: विवादों को समझाने और समाधान के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक समझौता और सहमति की आवश्यकता होती है। इससे विवाद परिषद और सामूहिक समन्वय को सुधारा जा सकता है।
प्रतिस्पर्धी और सहयोगी समय की व्यवस्था: कई बार यह देखा गया है कि औद्योगिक संघर्षों का समाधान स्थायी समय में सम्पन्न किया जा सकता है। सहयोगी समय की व्यवस्था और संघर्षों को संभालने के लिए संगठनों के बीच गठबंधन और साझेदारी की जरूरत हो सकती है।
इन समाधानों के माध्यम से, औद्योगिक विवादों को समाधान करने में सहायक हो सकता है और विभिन्न पक्षों के बीच समझौते का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (Q) के अनुसार, ‘‘व्यक्तियों के समूह द्वारा, जो मिलकर कार्य करते हैं, सामूहिक रूप से कार्य नहीं करना अथवा एकमत होकर कार्य करने से मना करना, हड़ताल कहलाता है।
‘‘श्रमिक श्रमिकों के लिए हड़ताल अत्यधिक शक्तिशाली अस्त्र है जिसके द्वारा वे नियोक्ता को अपनी मांगे मनवाने के लिए बाध्य करते हैं। यह श्रमिक द्वारा स्वतः कार्य मुक्ति है। इसका आयोजन सामूहिक कल्याण तथा वर्तमान कार्य की दशाओं में सुधार की दृष्टि से किया जाता है।‘‘
UNIT - 3
1. श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
योग्यताएँ:- कोई व्यक्ति कल्याण अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक पात्र नहीं होगा जब तक उसके पास- (ए) सामाजिक विज्ञान या किसी विश्वविद्यालय से कानून में डिग्री न होय (बी) विशेष विषय के रूप में श्रम कल्याण को कवर करने वाले औद्योगिक संबंध और कार्मिक प्रबंधन में डिग्री या डिप्लोमा,
कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत कुद कर्त्तव्य और जिम्मेदारियां निर्धारित हैं
1. बातचीत करने वाले अधिकारी के रूप में कार्यकरना।
2. लेबर ऑयल को आकार देना और उसे तैयार करना।
3. संपर्क स्थापित करना।
4. मजदूरी एव रोजगार की स्थितियों से निपटना।
5. असामाजिक गतिविधियों से बचाव करना।
6. शांतिपूर्ण समाधान निकालना।
7. कारखाने के प्रावधानों का अनूपालन करवाना।
8. कारखाने, मजदूर, कर्मचारी एवं बाह्य मानव संसाधन के मध्य संबंधों को बढ़ावा देना।
9. समितियों के गठन को प्रोत्साहन देना।
10. छुट्टियों के नियमन में कारखाना प्रबंधन को मदद करना।
11. कल्याणकारी प्रावधानों को सुरक्षित करना।
12. कारखाना प्रबंधन को समय-समय पर सलाह देना।
श्रम कल्याण कार्य के उद्देश्य-
1. श्रमिकों को कार्यस्थल पर मानवीय दशाएं उपलबध करना।
2. श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि करना।
3. श्रमिकों में नागरिकता की भावना का ज्ञान कराना।
4. श्रमिकों, मालिकों एवं सरकार के मध्य स्वस्थ संबंधों का निर्माण करना।
5. राष्ट्रीय उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए तैयारी करना।
OR
श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति विभिन्न अधिकारियों द्वारा विकसित किए गए प्रावधानों के अंतर्गत की जाती है, जो कार्यस्थल में कर्मचारियों के हित और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से होते हैं। इन प्रावधानों की समझ और प्रतिबंधन निमित्तों के बारे में जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके माध्यम से कर्मचारियों को सम्मान, सुरक्षा, और समान अधिकारों का अनुभव करने में सहायता मिलती है।
2. किसी कारखाने में श्रम कल्याण अधिकारी के कार्यों और उत्तरदायित्वों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
श्रम कल्याण अधिकारी के कर्त्तव्य एवं जिम्मेदारियां
कल्याण अधिकारियों की संख्या:- प्रत्येक कारखाने का मालिक जहां 500 या अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, 2000 श्रमिकों तक कम से कम एक कल्याण अधिकारी और प्रत्येक 1000 पर एक अतिरिक्त कल्याण अधिकारी नियुक्त करेगा। एक महिला कल्याण अधिकारी, जिसमें 500 महिला श्रमिक कार्यरत हैं।
योग्यताएँ:- कोई व्यक्ति कल्याण अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक पात्र नहीं होगा जब तक उसके पास- (ए) सामाजिक विज्ञान या किसी विश्वविद्यालय से कानून में डिग्री न होय (बी) विशेष विषय के रूप में श्रम कल्याण को कवर करने वाले औद्योगिक संबंध और कार्मिक प्रबंधन में डिग्री या डिप्लोमा,
कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत कुद कर्त्तव्य और जिम्मेदारियां निर्धारित हैं
1. बातचीत करने वाले अधिकारी के रूप में कार्यकरना।
2. लेबर ऑयल को आकार देना और उसे तैयार करना।
3. संपर्क स्थापित करना।
4. मजदूरी एव रोजगार की स्थितियों से निपटना।
5. असामाजिक गतिविधियों से बचाव करना।
6. शांतिपूर्ण समाधान निकालना।
7. कारखाने के प्रावधानों का अनूपालन करवाना।
8. कारखाने, मजदूर, कर्मचारी एवं बाह्य मानव संसाधन के मध्य संबंधों को बढ़ावा देना।
9. समितियों के गठन को प्रोत्साहन देना।
10. छुट्टियों के नियमन में कारखाना प्रबंधन को मदद करना।
11. कल्याणकारी प्रावधानों को सुरक्षित करना।
12. कारखाना प्रबंधन को समय-समय पर सलाह देना।
श्रम कल्याण कार्य के उद्देश्य-
1. श्रमिकों को कार्यस्थल पर मानवीय दशाएं उपलबध करना।
2. श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि करना।
3. श्रमिकों में नागरिकता की भावना का ज्ञान कराना।
4. श्रमिकों, मालिकों एवं सरकार के मध्य स्वस्थ संबंधों का निर्माण करना।
5. राष्ट्रीय उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए तैयारी करना।
श्रम कल्याण अधिकारी की भूमिका
इनकी भूमिका श्रम अधिकारी से अधिक व्यापक होती है। इन्हें न केवल यह सुनिश्चित करना है कि अधिनियम के सभी प्रवधानों का अनुुपालन किया जाता है, बल्कि श्रमिकों के मनोरंजन के लिए गतिविधियां और कल्याणकारी सुविधाओं की व्यवस्था करना भी है। प्रबन्ध और श्रमिकों के सामान्य हित के विवादों को हल करना और उनकी शिकायतों का समाधान करना। ठेकेदार/ प्रमुख नियोंक्ता को सूचित करना ताकि उन्हें अपनी कंपनी द्वारा किसी भी कानूनी और अवैध हड़ताल या तालाबंदी से बचा जा सके। श्रम कल्याण अधिकारी वह होता है जो श्रमिकों के कल्याण, आवास, परिवहन, लाभ, विश्राम कक्ष, वाशरूम आदि की देखभाल करता है।
श्रम कल्याण अधिकारियों के उत्तर दायित्व
(i) फैक्ट्री प्रबंधन और श्रमिकों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने की दृष्टि से संपर्क स्थापित करना और परामर्श करना।
(ii) श्रमिकों की व्यक्तिगत और सामूहिक शिकायतों को फैक्ट्री प्रबंधन के ध्यान में लाना, ताकि उनका शीघ्र निवारण सुनिश्चित किया जा सके और प्रबंधन और श्रम के बीच संपर्क अधिकारी के रूप में कार्य किया जा सके।
(iii) फैक्ट्री प्रबंधन को श्रम नीतियों को आकार देने और बनाने में मदद करने के लिए श्रम के दृष्टिकोण का अध्ययन करना और समझना और श्रमिकों को इन नीतियों की उस भाषा में व्याख्या करना जिसे वे समझ सकें।
(iv) फैक्ट्री प्रबंधन के संबंधित विभागों द्वारा वैधानिक या अन्यथा फैक्ट्री अधिनियम, 1948 के प्रावधानों और उसके तहत बनाए गए नियमों के आवेदन के संबंध में दायित्वों की पूर्ति पर सलाह देना और फैक्ट्री इंस्पेक्टर केसाथ संपर्क स्थापित करना, और कर्मचारियों की चिकित्सा जांच, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, खतरनाक नौकरियों की निगरानी, बीमार दौरे और स्वास्थ्य लाभ, दुर्घटना की रोकथाम और सुरक्षा समितियों की निगरानी, व्यवस्थित संयंत्र निरीक्षण, सुरक्षा शिक्षा, दुर्घटनाओं की जांच, मातृत्व लाभ और श्रमिकों के मुआवजे से संबंधित चिकित्सा सेवाएं।
(v) काम के घंटों के विनियमन, मातृत्व लाभ, चोटों और बीमारी के मुआवजे और अन्य कल्याण और सामाजिक लाभ उपायों के संबंध में प्रबंधन और कारखाने के संबंधित विभागों द्वारा उनके दायित्वों, वैधानिक या अन्यथा की पूर्ति पर सलाह देना।
(vi) ऐसे कारखानों में, जहां धारा के तहत सक्षम प्रावधानों के तहत एक सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति की आवश्यकता नहीं है, व्यक्तिगत चोटों की रोकथाम और सुरक्षित कार्य वातावरण बनाए रखने के संबंध में वैधानिक या अन्यथा अपने दायित्वों की पूर्ति में प्रबंधन को सलाह देना और सहायता करना।
(vii) कार्यों और संयुक्त उत्पादन समितियों, सहकारी समितियों और कल्याण समितियों के गठन को प्रोत्साहित करना और उनके कार्यों की निगरानी करना।
(viii) कैंटीन, आराम के लिए आश्रय, क्रेच, पर्याप्त शौचालय सुविधाएं, पानी, बीमारी और परोपकारी योजना भुगतान, पेंशन और सेवानिवृत्ति निधि, ग्रेच्युटी भुगतान, ऋण देने और श्रमिकों को कानूनी सलाह जैसी सुविधाओं के प्रावधान को प्रोत्साहित करना।
(ix) वेतन के साथ छुट्टी के अनुदान को विनियमित करने में फैक्ट्री प्रबंधन की मदद करना और श्रमिकों को वेतन के साथ छुट्टी और अन्य अवकाश विशेषाधिकारों से संबंधित प्रावधानों को समझाना और अधिकृत अनुपस्थिति को विनियमित करने के लिए आवेदन जमा करने के मामले में श्रमिकों का मार्गदर्शन करना।
(x) कल्याणकारी सुविधाओं जैसे आवास सुविधाएं, खाद्य समाग्री, सामाजिक और मनोरंजक सुविधाएं, स्वच्छता, व्यक्तिगत समस्याओं और बच्चों की शिक्षा पर सलाह देना।
(xi) नए शुरुआतकर्ताओं, प्रशिक्षुओं, स्थानांतरण और पदोन्नति पर श्रमिकों, प्रशिक्षकों और पर्यवेक्षकों के प्रशिक्षण से संबंधित प्रश्नों पर फैक्ट्री प्रबंधन को सलाह देना। नोटिस बोर्ड और सूचना बुलेटिन का पर्यवेक्षण और नियंत्रणय श्रमिकों की शिक्षा को आगे बढ़ाना और तकनीकी संस्थानों में उनकी उपस्थिति को प्रोत्साहित करना।
(xii) ऐसे उपाय सुझाना जो श्रमिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने और सामान्य तौर पर उनकी भलाई को बढ़ावा देने में मदद करेंगे।
(xiii) कल्याण अधिकारी श्रमिकों के खिलाफ अनुशासनात्मक मामलों से नहीं निपटेंगे या प्रबंधन की ओर से पेश नहीं होंगेः- कोई भी कल्याण अधिकारी किसी कर्मचारी के खिलाफ किसी अनुशासनात्मक मामले से नहीं निपटेगाया किसी सुलह कार्यालय या अदालत या न्यायाधिकरण के सामने कर्मचारियों की ओर से पेश नहीं होगा। फैक्ट्री प्रबंधन किसी भी कर्मचारी या श्रमिक के खिलाफ।
3. किसी औद्योगिक संगठन में श्रमिकों एवं कर्मचारियों के कल्याण हेतु समाजकार्य पद्धतियों का प्रयोग कैसे करेंगे।
श्रम कल्याण में समाजकार्य पद्धतियों का प्रयोग
किसी भी कारखाने में श्रमिक एक मानव संसाधन के रूप में महत्वपूर्ण घटक है। श्रमिक की निपुणताएँ, उसके द्वारा किया जा रहा कार्य, कार्य का वातावरण, भावनाएं, संवेग आदि कई स्थितियाँ श्रमिकां कोे प्रभावित करती हैं। कारखाने में श्रमिक एक व्यक्ति भी है, समूह का सदस्य भी है और श्रमिक समुदायके अंतर्गत उसका सदस्य भी है। एक व्यक्ति के रूप में हम वैयक्तिक सेवा कार्य के माध्यम से उसके साथ कार्य कर सकते हैं। कार्य पर आने वाली समस्याएँ, समस्याओं से श्रमिकों का प्रभावित होना और समस्याओं के कारण उसमें मनोवैज्ञानिक स्थितियों में बदलाव होना ये महत्वपूर्ण तथ्य है।
वैयक्तिक सेवा कार्य मे हम श्रमिक की मनोदशाएँ कार्य भार, कार्य का प्रकार, कार्य में आने वाली बाधाएं, श्रमिक का कार्य के प्रति समर्पण, या उसकी समस्याएँ जैसे असमायोजन, कार्य में जटिलता, समाधान न होना, शारीरिक एवं मानसिक थकान, उत्पादन पर प्रभाव आदि कई नकारात्मकस्थितियाँ भी आ सकती हैं। इस विधि के इस विधि के अंतर्गत श्रमिकों की कार्यवातावरण के अंतर्गत आने वाली सभी स्थितियों-परिस्थितियों से उसका उसका समायोजन बनाना, उसका मनोबल उच्च रखना, दुश्चिन्ताओं को दूर करना ये सभी कार्य हम वैयक्तिक सेवा कार्य से कर सकते हैं।
द्वितीय विधि सामूहिक सेवा कार्य है इसमें समूह के माध्यम से व्यक्ति में परिवर्तन लाया जाता है उसके वयक्तित्व को परिमार्जित किया जाता है। समूह एक ऐसा माध्यम है जिसमें किसी व्यक्ति को सम्पूर्ण रूप से एक समर्पित वयक्ति बनाया जाता है एक श्रमिक जब अपने साथियों के साथ कार्य करता है तो उसमें कई परिवर्तन आते हैं उसके व्यक्तित्व विकास, परितार्जन के साथ-साथ उसमें कार्य के प्रति समर्पण भी आता है। अन्य रमिकों के साथ-साथ कर्मचारियों के मध्य कार्य करने से एक श्रमिक में कई परिवर्तन आते हैं। वह कार्य करना सीखता है कार्य को निर्धारित समय में कैसे पूरा करना है? किय तरह से पूरा करना है? अपने अन्य साथियों का सहयोग कैसे लेना है। विभाग एवं कारखाने के लख्य को किस प्रकार प्राप्त करना है यह समूह के मध्य कार्य करने से सीखा जा सकता है। इस प्रकार एक अकेला श्रमिक धीरे-धीरे समूह का सक्रिय सदस्य बन जाता है और प्रेरणा, अभिप्रेरणा पाकर अपने कार्य को बहुत अच्छे से संपर्क करता है। इस प्रकार समूह के अच्छे सदस्य के रूप में वह कारखाने का श्रेष्ठ कर्मचारी बन जाता है। इसलिए समह कार्य के माध्यम से श्रमिकों एवं कर्मचारियों के मध्य कार्य किया जाता है।
तृतीय विधि जो सीधे समुदाय एवं समुदाय के सदस्यों से संबंधित है जिसमें एक समुदाय के सदस्य के रूप में संगठित होकर समस्याओं का समाधान करते हुए कैसे विकास किया जाता है, यह समझा जा सकता है। श्रमिकों का वर्ग एक समुदाय है यह समुदाय कारखाने के अन्दर एक कार्यरत एवं लक्ष्य केन्द्रित समुदाय है जो नियमों परिनियमों के तहत उत्पादन कार्य में संलगन है। जिससे कारखाने के उन्नति होने के साथ-साथ सम्पूर्णं श्रमिक एवं कर्मचारी समुदाय की भी प्रगति होती है। और यह संगठित समुदाय पर ही निर्भर है। एक औद्योगक समुदाय के सदस्य होने के नाते संगठित होकर वे कारखाने के कार्य एवं वातावरण को बहुत अच्छा बना सकते हैं, अधिक गुणवत्तापूर्ण उत्पादन कर सकते हैं। संगठन के लक्ष्यों को पूरा कर सकते हैं साथ ही अगर प्रबंधन से कोई शिकायत हो तो वैधानिक प्रक्रिया के तहत वे सामुदायिक रूप से संगठित होकर उसकी मांग कर सकते हैं। इस प्रकार सामुदायिक संगठन विधि का श्रमिकों कर्मचारियों के मध्य बहुत ही सकारात्मक सहयोग है।
चतुर्थ विधि सामाजिक शोध है यह विधि सीधे तौर से तो रमिकों कर्मचारियों से संबंधित नहीं है किन्तु प्रबंधन के सहयोग से कर्मचारियों, श्रमिकों का कार्य वातावरण के परिप्रेक्ष्य में ऑकलन किया जा सकता है। कार्य को प्रभावित करने वाले कारकों का ऑकलन, पड़ने वाले प्रभावों की स्थिति, मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से श्रमिक कर्मचारियों का ऑकलन, थकान, ऊबाउपन, निरसता, उत्पादन वृद्धि, उपस्थिति, अनुपस्थिति, श्रमिकों के कार्य छोड़ने की दर, कार्य के प्रति समर्पण, उत्पादन दर कम होने के कारण आदि कई विषयों पर आंकडे़ एकत्र कर स्थितियों की समीक्षा की जा सकता है। आंकड़ों के आधार पर उनका विश्लेषण कर सही निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं तथा उस अनुसार कारखाना प्रबंधन कहां और कैसे उचित कदम उठाकर कार्य वातावरण अच्छा कर सकता है। इसमें सामाजिक शोध का बहुत योगदान है।
पांचवी विधि समाज कल्याण प्रशासन है अर्थात श्रमिकों कर्मचारियों के लिए राज्य एवं केन्द्रशासन की ओर से जो भी कल्याणकारी योजनाएं बनती हैं। उन्हें किस तरह लागू करना ये शामिल होता है। वेतन, मजदूरी भत्ते, अनुसांगिक लाभ, कार्य पर सुविधाएं, कारखाना अधिनियम के अंतर्गत उपलब्ध लाभ ये सब कल्याण कार्यक्रम के अंतर्गत आते हैं। सम कल्याण प्रशासन, श्रम आयुक्त, सहायक श्रम आयुक्त, श्रम अधिकारी, रम कल्याण अधिकारी, श्रम निरीक्षक सभी इसी के भाग होते हैं।
अंतिम एवं छंठवी विधि सामाजिक क्रिया होती है जब कभी श्रमिक कर्मचाारियों के बीचख् की वे समस्याएं जो मुद्दे बन चुकी हैं या बन जाती हैं निका निराकरण वैधानिक तरीके से ही संभव है वहां सामाजिक क्रिया लागू होती है। बोनस, ग्रेच्युटी, प्राविडेण्ड फंड, वेतन, मजदूरी, छुट्टियां, कल्याणकारी उपाय इनये संबंधित जो भी समस्याएं जो वृह्द सतर पर हों सीाी कारखानों पर एक ही समय में प्रभाविमत करती हों वहां सामाजिक क्रिया का उपयोग किया जाता है।
OR
आपने विभिन्न सामाजिक सेवा पद्धतियों के माध्यम से श्रमिकों और कर्मचारियों के कल्याण के विषय में विस्तार से बताया है। यह सभी पद्धतियाँ उनके व्यक्तिगत, सामूहिक और समुदायिक स्तर पर उनकी समस्याओं और जरूरतों को समझने और समाधान करने में मदद करती हैं। मैं इसे अधिक स्पष्ट और संरचित रूप से प्रस्तुत करने की कोशिश करूंगा:
4. श्रम कल्याण अधिकारी के लिए अपने कार्य क्ष्ेत्र में आने वाली चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
श्रम कल्याण अधिकारी के लिए संभावित चुनौतियां
1. श्रम कल्याण अधिकारी कर्मचारी, श्रमिक एवं प्रबंधन के बीच एक कड़ी का कार्य करता है और तीनों के मध्य संतुलन बनाए रखना एक चुनौती है।
2. श्रम कल्याण अधिकारी का कार्य प्रबंधन और श्रमिकों के मध्य सूचनाओं का आदान प्रदान करना भी होता है और सूचनाओं को सही रूप से पहुंचाना और उस पर आई गई प्रतिक्रियाओं को सही रूप से प्रस्तुत करना भी एक चुनौती है
3. कारखाने के समस्त मानव संसाधनों के मध्य संबंधों को बनाए रखना भी एक चुनौती है।
4. कल्याणकारी प्रावधानों को सुरक्षित रखते हुए उनका अनुपालन करना भी एक चुनौती है।
5. कारखाना प्रबंधक द्वारा रखी गई बातों को श्रमिकों के मध्य रखना और उस पर सहमती का वातावरण बनाना भी कल्याण अधिकारी के लिए एक चुनौती है।
6. किसी समस्या का मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए शांतिपूर्ण समाधान निकालना भी एक चुनौती है।
7. कारखानों कारखाने के प्रावधानों का श्रमिकों एवं कर्मचारियों के मध्य अनुपालन करवाना भी एक चुनौतीप होता है।
8. कारखाना मालिकों, प्रबंधन एवं श्रमिककर्मचारियों के मध्य स्वास्थ संबंधों की स्थानाना करना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
OR
श्रम कल्याण अधिकारी का काम श्रमिकों के हित में कार्य करना होता है। ये अधिकारी उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं जो अपने काम में किसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे होते हैं। उनका प्रमुख काम श्रम संबंधी मुद्दों को हल करना, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना, और उन्हें समर्थन प्रदान करना होता है। इसके अलावा, उनकी विशेष भूमिका इस प्रकार होती है:
मुद्दों का समाधान: श्रम कल्याण अधिकारी उन श्रमिकों की समस्याओं का समाधान करने में सहायक होते हैं जो काम के दौरान किसी प्रकार की अन्यायिकता, या अन्य समस्याओं का सामना करते हैं। उन्हें शिकायतों की सुनवाई करनी होती है और न्यायिक और विधिक समाधान प्रदान करना होता है।
शिकायतों की सुनवाई: श्रमिकों के द्वारा दी गई शिकायतों की सुनवाई करना उनका मुख्य कार्य होता है। वे श्रमिकों के साथ मिलकर उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढते हैं और उन्हें सही रास्ते पर लाने का प्रयास करते हैं।
कानूनी सलाह और गाइडेंस: श्रम कल्याण अधिकारी श्रमिकों को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में सलाह देते हैं और उन्हें उन अधिकारों का उपयोग करने के तरीकों की गाइडेंस प्रदान करते हैं।
श्रम संबंधी शिक्षा: उन्हें श्रमिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में शिक्षा देना भी होता है। वे श्रम संबंधी कानून और नियमों के बारे में जागरूकता बढ़ाते हैं और श्रमिकों को उनके अधिकारों का लाभ उठाने में मदद करते हैं।
समाजिक संबंधों का प्रबंधन: वे श्रम संबंधी समस्याओं के समाधान में समाजिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए काम करते हैं। यह उन्हें श्रम समूहों, नियोक्ताओं और समाज के अन्य स्तरों के साथ सहयोग और समझौते की आवश्यकता को समझने में मदद करता है।
कार्य स्थान की निगरानी: श्रम कल्याण अधिकारी को कार्य स्थान पर निगरानी और प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण बनाए रखना भी होता है। यह उन्हें कार्य स्थान पर सुरक्षित और उचित वातावरण के लिए मदद करता है।
समस्याओं के माध्यम से समाधान: उन्हें श्रमिकों के बीच उत्थान हेतु किसी विवाद समाधान में यह करना होता है।
श्रम कल्याण अधिकारी का कार्य विभिन्न स्तरों पर विविध चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन चुनौतियों को निम्नलिखित प्रकार से विस्तार से समझा जा सकता है:
1. कड़ी कार्यकर्ता, श्रमिक और प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना: श्रम कल्याण अधिकारी का मुख्य कार्य होता है कि वे कारखाने के कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच संतुलन और समझौता स्थापित करें। इसमें समस्त पक्षों की सुनी-समझी करने, विवादों को समाधान करने और संघर्ष की आपेक्षिकता को समझने की क्षमता शामिल है।
2. सूचनाओं का आदान-प्रदान: श्रम कल्याण अधिकारी को समस्त सूचनाओं को सही रूप से पहुंचाना और समस्याओं का समाधान ढूंढना एक महत्वपूर्ण कार्य होता है। यह सही वक्त पर सूचनाओं का प्रस्तुत करने के लिए उनकी क्षमता और तत्परता को आवश्यक बनाता है।
3. मानव संसाधनों के संबंधों को बनाए रखना: श्रम कल्याण अधिकारी को कारखाने के समस्त मानव संसाधनों के संबंधों को स्थिर रखने का काम करना पड़ता है। इसमें कामकाजी, उत्पादकता, सुरक्षा, और कानूनी पात्रता जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं।
4. कल्याणकारी प्रावधानों का अनुपालन: श्रम कल्याण अधिकारी को कारखाने में निर्धारित और कल्याणकारी प्रावधानों का सुनिश्चित करना पड़ता है, जैसे कि श्रमिकों के लिए अच्छे शर्तें, स्वास्थ्य और सुरक्षा मानक, और सामाजिक सुरक्षा।
5. संघर्ष से सुलझाव निकालना: विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाना और शांतिपूर्ण समाधान निकालना भी एक महत्वपूर्ण कार्य होता है। इसमें सहमति और सहयोग का माहौल बनाए रखना शामिल है।
6. प्रावधानों के अनुपालन की स्थानाना: कारखाना मालिकों, प्रबंधन और श्रमिक कर्मचारियों के बीच स्वास्थ्य संबंधों की स्थानाना करना भी श्रम कल्याण अधिकारी के लिए एक चुनौती है। इसमें सभी पक्षों को एक साथ लाने और समस्याओं का समाधान ढूंढने की क्षमता शामिल है।
इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए श्रम कल्याण अधिकारी को विशेष योग्यताएं और तत्परता की आवश्यकता होती है, जिससे वे श्रमिकों के हित में समाधान प्रस्तुत कर सकें।
5. श्रमिकों को परामर्श देना जरूरी होता है? अपने उत्तर को तर्कपूर्णं रूप से प्रस्तुत कीजिए।
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UNIT - 4
1. श्रमिक सघों को परिभाषित करते हुए इनके प्रकारों का वर्णन करें।
श्रमिक संघों का परिभाषा और उनके प्रकार
2. श्रमिक संघ कैसे कार्य करते हैं? उनका वर्गीकरण करें।
श्रम संघों के कार्यों को समय-समय पर विभिन्न विचारधाराओं ने प्रभावित किया है। आधुनिक श्रम काफी विकसित है तथा उसका कार्य-क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। श्रम संघों का मूल उद्देश्य अपने सदस्यों के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना तथा उनको कार्य के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके अतिरिक्त श्रम शिक्षा, शोध, कल्याणकारी कार्य बीमा योजनाएँ, मनोरंजन सुविधाएँ, आदि संघो के कार्यों में सम्मिलित किये जाते हैं।
(1) डॉ. ब्राउटन का वर्गीकरण- डॉ बाउटन ने श्रम संघों के कार्यो को तीन भागों में वर्गीकृतकिया है
(i) अन्तर्मुखी कार्य- इसके अन्तर्गत प्रतिष्ठानों में होने वाली कल्याणकारी क्रियाएं सम्मिलित की जाती है। इन कार्यों से श्रमिकों के रोजगार सम्बन्धी कार्य दशाओ में सुधार होता है जैसे कार्य के घण्ट,े मजदूरी, अवकाश, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्था में सुधार तथा रोजगार में नियमितता
(ii) बहिर्मुखी कार्य-इन कार्यों के अन्तर्गत ऐसी योजनाएँ सम्मिलित की जाती है जिनके द्वारा श्रमिकों की आवश्यकता के समय सहायता प्रदान की जा सके (जैसे शैक्षणिक मनोरंजन और आवासीय सुविधा दुर्घटनाओं के समय आर्थिक सहायता
(iii) राजनीतिक कार्य- यह कार्य समाज में व्याप्त आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए किये जाते हैं जिससे कालान्तर में वर्गहीन समाज की स्थापना कीजा सके।
इस प्रकार भारत में श्रम संघों के मुख्य कार्य हैं।
(1) श्रमिकों के लिए उचित मजदूरी, अच्छी कार्य की दशाएँ तथा अच्छी रहन-सहन की दशाएँ प्राप्त करना
(2) श्रमिकों द्वारा उद्योग पर नियन्त्रण स्थापित करना।
(3) व्यक्तिगत रूप में श्रमिकों की क्षमता में वृद्धि करना तथा आकस्मिक दुर्घटनाओं के समय में सामूहिक रूप से संगठित प्रबन्धकीय षडसंत्रों के विरुद्ध कार्यवाही करना तथा अन्याय को समाप्त करने के लिए वातावरण तैयार करना।
(4) श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि करके उन उद्योग में सहभागी के रूप में तथा समाज में भद्र नागरिक के रूप में स्थान दिलाना,
(5) श्रमिक में यह आत्मबल जागृत करना कि वह उद्योगों में केवल मशीन का पुर्जा मात्र नहीं है।
(6) श्रमिकों के अनुशासन तथा उत्तरदायित्व वहन करने की योग्यता का विकास करना।
(7) श्रमिकों का नैतिक उत्थान करने की दृष्टि से कल्याणकारी कार्य करना।
मजदूर संघ कानून, 1926 में मजदूर संघों के पंजीकरण की व्यवस्था है। मजदूर संघ के सात या उससे ज्यादा सदस्य संघ के नियमों का समर्थन करके और पंजीकरण के बारे में कानून की व्यवस्थाओं का पालन करते हुए मजदूर संघ कानून के अन्तर्गत मजदूर संघ के पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। कानून के अन्तर्गत पंजीकृत मजदूर संघों को कुछ मामलों में दीवानी और फौजदारी कार्यवाही के खिलाफ संरक्षण प्राप्त है। मजदूर संघों की सदस्यतामजदूर संघों को अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन सहित राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर त्रिपक्षीय सलाहकार समितियों, विकास परिषदों और बोर्ड आदि में प्रतिनिधित्व देने के लिए मुख्य आयुक्त कार्यालय केन्द्रीय मजदूर संघ संगठनों की सदस्यता की जाँच पड़ताल करता है। 31 दिसम्बर, 1968 तक के लिए चार केन्द्रीय मजदूर संघ संगठनों से सम्बद्ध संघों की सदस्यता की आम जाँच पड़ताल 1969 के दौरान की गयी थी। ये संगठन भारतीय राष्ट्रीय मजदूर संघ कांग्रेस, अखिल भारतीय मजदूर संघ काग्रेस, हिन्द मजदूर सभा और संयुक्त मजदूर संघ कांग्रेस इसके बाद से देश में अनेक नये मजदूर संघ संगठन बने हैं जो अखिल भारतीय स्वरूप और सदस्यता का दावा करते हैं। अतः दस केन्द्रीय मजदूर संघ संगठनों से सम्बद्ध संघों की 31 दिसम्बर, 1977 और 31 दिसम्बर, 1979 तक की सदस्यता की जाँच-पड़ताल करने का फैसला किया गया। ये संगठन हैं-
1. भारतीय राष्ट्रीय मजदूर संघ (एल. एस.)
2. अखिल भारतीय मजदूर संघ कांग्रेस (एटक)
3. हिन्द मजदूर सभा (एच. एम. एस.)
4. यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटक)
5. सेंटर ऑफ इण्डियन ट्रेड यूनियन (सीटू)
6. भारतीय मजदूर संघ (बी. एम. एस.)
7. यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटक) (एल. एस.)
8. नेशनल फ्रंट ऑफ इण्डियन ट्रेड यूनियन (एन.एफ.आई.टी.यू.)
9. ट्रेड यूनियन कोआर्डीनेशन सेंटर (टी.यू.सी.सी.),
10. राष्ट्रीय श्रम संगठन (एन एल. ओ.)
श्रमिक संघों के प्रकार:
क्राफ्ट यूनियन (Craft Union):
- ये संघ विशेष प्रकार के कौशल या व्यापार के श्रमिकों को संगठित करते हैं। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मैकेनिक आदि।
- क्राफ्ट यूनियन का मुख्य उद्देश्य उनके सदस्यों के कौशल और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार करना होता है।
इंडस्ट्रियल यूनियन (Industrial Union):
- यह संघ एक संपूर्ण उद्योग के सभी प्रकार के श्रमिकों को संगठित करता है, चाहे उनके कौशल और कार्य की प्रकृति कुछ भी हो।
- उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के सभी श्रमिकों का संघ।
जनरल यूनियन (General Union):
- यह संघ विभिन्न प्रकार के उद्योगों और व्यवसायों के श्रमिकों को संगठित करता है।
- इसमें विभिन्न प्रकार के कार्य करने वाले श्रमिक शामिल हो सकते हैं, जैसे कि सेवा क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र, आदि।
फेडरेशन और कंफेडरेशन (Federation and Confederation):
- ये संगठन विभिन्न श्रमिक संघों का एक समूह होते हैं, जो एक साथ मिलकर एक बड़ा संघ बनाते हैं।
- इसका उद्देश्य व्यापक स्तर पर श्रमिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना होता है।
ऑफिसर्स यूनियन (Officers Union):
- यह संघ कार्यालय में काम करने वाले उच्च श्रेणी के कर्मचारियों के लिए होता है, जैसे कि प्रबंधक, अधिकारी, और प्रशासनिक कर्मचारी।
- इनका उद्देश्य उनके विशेष हितों और अधिकारों की रक्षा करना होता है।
श्रमिक संघों के उद्देश्य:
सामूहिक सौदेबाजी:
- वेतन, बोनस, अवकाश, और अन्य लाभों के लिए सामूहिक रूप से बातचीत करना।
कार्य स्थितियों में सुधार:
- कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य, और सुविधा संबंधी सुधार की मांग करना।
कानूनी सहायता:
- कानूनी विवादों में श्रमिकों को सहायता प्रदान करना।
शिक्षा और प्रशिक्षण:
- श्रमिकों के लिए कौशल विकास और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
सामाजिक सुरक्षा:
- पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करना।
निष्कर्ष:
श्रमिक संघ कर्मचारियों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे सामूहिक सौदेबाजी के माध्यम से श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार करते हैं और उन्हें उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने में मदद करते हैं। विभिन्न प्रकार के श्रमिक संघ विभिन्न उद्योगों और व्यवसायों के श्रमिकों की विशेष आवश्यकताओं और हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करते हैं, जिससे श्रमिकों का संपूर्ण विकास और कल्याण सुनिश्चित हो सके।
भारतीय श्रम संघों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो उनकी विकास और संघर्ष में बाधाएं प्रस्तुत करती हैं। ये चुनौतियां उनके सामर्थ्य और प्रभाव को प्रभावित करती हैं, जिससे उन्हें अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों को पूरा करने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
अधिकृतता की कमी: श्रम संघों की एक मुख्य चुनौती यह होती है कि वे अधिकृतता से वंचित हो सकते हैं। अधिकृतता के अभाव में, उन्हें सरकार और उद्योगपतियों के साथ वार्ता करने में कठिनाई हो सकती है, जिससे उनकी आवाज सही समय पर सुनी नहीं जा सकती।
अधिकृतता की कमी एक महत्वपूर्ण चुनौती है जो श्रम संघों को सामना करना पड़ता है। उदाहरण के रूप में, कई छोटे उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के संगठन को अधिकृत रूप से पंजीकृत कराने में दिक्कतें आ सकती हैं। इससे उनकी सरकार और उद्योगपतियों के साथ वार्ता करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।विभाजन: भारत में श्रम संघों का समूहीकरण राज्यों और व्यावसायिक क्षेत्रों के आधार पर होता है, जिससे उनकी एकता और शक्ति पर प्रतिबंध लगता है। विभिन्न विचारधाराओं और हितों के बीच विभाजन उनकी अधिकतम प्रभावक्षमता को कम कर सकता है।
भारत में श्रम संघों का समूहीकरण राज्यों और व्यावसायिक क्षेत्रों के आधार पर होता है। इसके परिणामस्वरूप, विभिन्न विचारधाराओं, हितों, और राजनीतिक पक्षों के बीच विभाजन हो सकता है जो संघों की एकता और शक्ति को कमजोर कर सकता है।विवादों का समाधान: श्रम संघों के बीच विवादों का समाधान करना विशेष रूप से मुश्किल हो सकता है, जो उनकी एकता और प्रभाव को प्रभावित कर सकता है। इसमें समस्या समाधान और संघर्ष से समझौता प्राप्त करने की क्षमता शामिल है।
कानूनी चुनौतियां: श्रम संघों को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि संघ के पंजीकरण, वित्तीय पारदर्शिता, और श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा। कानूनी दायरे में रहकर उन्हें अपने सदस्यों के हित में काम करना होता है।
श्रम संघों को कई बार कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि संघ के पंजीकरण, वित्तीय पारदर्शिता, और श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा। इसमें संघों को कानूनी मामलों में सजग रहना पड़ता है ताकि वे अपने सदस्यों के हित में प्रभावी रूप से काम कर सकें।
व्यवस्थापनिक कठिनाई: श्रम संघों को व्यवस्थापनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि संघ की वित्तीय स्थिति का प्रबंधन, सदस्यों के लिए उपयुक्त सुविधाओं का प्रबंधन, और आरामदायक वातावरण का निर्माण।
इन चुनौतियों का सामना करते हुए, भारतीय श्रम संघों को सशक्तिकरण, समर्थन, और संघर्षपूर्ण संघर्ष से गुजरना पड़ता है ताकि वे श्रमिकों के हित में प्रभावी रूप से काम कर सकें।
UNIT - 5
भारत में श्रम विधानों का ऐतिहासिक विकास
भारत में श्रम विधानों का विकास एक लंबी और महत्वपूर्ण प्रक्रिया रही है, जो देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के साथ विकसित हुई है। इन विधानों का उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना, उनके कार्य स्थितियों में सुधार लाना, और उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना रहा है। निम्नलिखित निबंध में हम भारत में श्रम विधानों के ऐतिहासिक विकास को समझने का प्रयास करेंगे।
प्रारंभिक काल और औपनिवेशिक काल
भारत में श्रम विधानों की शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान, 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में विभिन्न श्रम कानून बनाए गए। इन विधानों का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश उद्योगपतियों के हितों की रक्षा करना और औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों को सुदृढ़ करना था।
प्रारंभिक श्रम कानून:
- फैक्ट्री अधिनियम, 1881: यह पहला महत्वपूर्ण श्रम कानून था, जिसका उद्देश्य कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों की कार्य स्थितियों में सुधार करना था। इस अधिनियम के तहत बच्चों और महिलाओं के काम करने के घंटे निर्धारित किए गए और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित किया गया।
- प्लांटेशन लेबर एक्ट, 1863: इस कानून का उद्देश्य चाय, कॉफी और इंडिगो के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना था।
स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता के बाद का काल
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी आवाज उठाई। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान ने श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए। इसके तहत विभिन्न श्रम कानून बनाए गए, जिनका उद्देश्य श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार लाना और उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना था।
महत्वपूर्ण श्रम कानून:
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947: यह अधिनियम श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था। इसके तहत औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए त्रिपक्षीय तंत्र की स्थापना की गई।
- मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936: इस अधिनियम का उद्देश्य श्रमिकों को समय पर और उचित वेतन का भुगतान सुनिश्चित करना था।
- न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948: इस अधिनियम के तहत विभिन्न उद्योगों के श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन दरें निर्धारित की गईं।
आधुनिक काल और उदारीकरण
1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद, श्रम विधानों में भी महत्वपूर्ण बदलाव आए। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में, श्रमिकों के अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए नई चुनौतियाँ सामने आईं। इसके साथ ही, श्रम बाजार में लचीलापन लाने और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए भी सुधार किए गए।
आधुनिक श्रम सुधार:
- सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: इस संहिता के तहत सामाजिक सुरक्षा के विभिन्न कानूनों को एकीकृत किया गया और श्रमिकों को विभिन्न प्रकार की सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करने की व्यवस्था की गई।
- श्रम संहिता, 2020: इस संहिता के तहत चार प्रमुख श्रम कोड (वेज कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड) बनाए गए, जिनका उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल बनाना और श्रमिकों के हितों की रक्षा करना है।
निष्कर्ष
भारत में श्रम विधानों का विकास एक सतत प्रक्रिया रही है, जो समय के साथ बदलती परिस्थितियों और चुनौतियों के अनुरूप विकसित हुई है। आज, भारत में श्रम कानूनों का एक व्यापक ढांचा है, जो श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा, उनकी कार्य स्थितियों में सुधार, और उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है। भविष्य में भी, श्रम कानूनों में सुधार और नवाचार की आवश्यकता बनी रहेगी, ताकि श्रमिकों के हितों की रक्षा और देश के आर्थिक विकास को संतुलित किया जा सके।
2. श्रमिक संविधानों का वर्गीकरण कीजिए।
श्रमिक संविधानों (Labour Legislations) का वर्गीकरण विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जा सकता है। इन्हें मुख्यतः निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
सामाजिक सुरक्षा संबंधी संविधान (Social Security Legislations):
- ये संविधान श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
- कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 (Employees' Provident Funds and Miscellaneous Provisions Act, 1952)
- कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (Employees' State Insurance Act, 1948)
- मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961)
- कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 (Employees' Compensation Act, 1923)
- ये संविधान श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
श्रमिकों के अधिकार और हितों की सुरक्षा संबंधी संविधान (Legislations for Protection of Workers' Rights and Interests):
- ये संविधान श्रमिकों के अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947)
- ट्रेड यूनियनों अधिनियम, 1926 (Trade Unions Act, 1926)
- वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act, 1936)
- न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948)
- ये संविधान श्रमिकों के अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
कार्य शर्तों और सुरक्षा संबंधी संविधान (Legislations regarding Working Conditions and Safety):
- ये संविधान श्रमिकों के कार्य शर्तों और सुरक्षा के मानकों को निर्धारित करते हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
- फैक्ट्री अधिनियम, 1948 (Factories Act, 1948)
- भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (नियमन और रोजगार सेवा) अधिनियम, 1996 (Building and Other Construction Workers (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act, 1996)
- ठेका श्रमिक (नियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970 (Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1970)
- ये संविधान श्रमिकों के कार्य शर्तों और सुरक्षा के मानकों को निर्धारित करते हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
विशेष वर्गों के श्रमिक संविधान (Special Category Legislations):
- ये संविधान विशेष वर्ग के श्रमिकों के लिए बनाए गए हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
- बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986)
- बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 (Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976)
- महिला श्रमिक संबंधी संविधान, जैसे कि समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 (Equal Remuneration Act, 1976)
- ये संविधान विशेष वर्ग के श्रमिकों के लिए बनाए गए हैं। इनमें मुख्यतः निम्नलिखित संविधान शामिल हैं:
इस प्रकार, श्रमिक संविधानों का वर्गीकरण विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जा सकता है, जो श्रमिकों की विभिन्न आवश्यकताओं और अधिकारों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
श्रम संघ अधिनियम 1926
यद्यपि यह अधिनियम 1926 में पास हुआ था, लेकिन यह देश में 1 जून 1927 से लागू हुआ। इस अधिनियम द्वारा श्रम संघों को वैधानिक मान्यता प्रदान की गयी। समस्त रजिस्टर्ड श्रमिक संघों को वैधानिक मान्यता प्रदान की गयी। उनको कुछ अधिकार दिये गये था उनके कर्त्तव्य भी निर्धारित किये गये । रजिस्ट्रेशन ऐच्छिक था, लेकिन अधिकारों के कारण भी श्रम संघों ने अपने को रजिस्टर्ड करवाना उचित समझा ।
श्रम संघ अधिनियम के उद्देश्य
श्रम संघ अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. श्रम संघों का रजिस्ट्रेशन करना तथा रजिस्टर्ड श्रम संघों के लिये नियम बनाना।
2. मजदूरों को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक दशाओं में सुधार करना।
3. पूँजीवादी शोषण से मजदूरों को बचाने के लिये उन्हें श्रम संघों के रूप मेंसंगठित करना।
4. मालिकों के साथ सेवा शर्ते तथा अन्य महत्त्वपूर्ण मामलों को तय करने में श्रमिकों के अन्दर सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति उत्पन्न करना।
5. श्रमिकों के हितों को संरक्षण प्रदान करना।
6. श्रमिकों एवं नियोक्ताओं के बीच सदभाव और विश्वास का वातावरण उत्पन्न करना ताकि औद्योगिक विकास शान्ति से सुलझाये जा सकें।
श्रम संघ अधिनियम के प्रावधान
श्रम संघ अधिनियम 1926 के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं-
श्रम संघ की परिभाषा
1. श्रम संघ अधिनियम 1926 की धारा 2(h) के अनुसार श्रम संघ से आशय ऐसे किसी स्थायी या अस्थायी संगठन से है जो मूलतः श्रमिकों और नियोजकों के बीच, श्रमिकों और श्रमिकों के बीच तथा नियोजकों एवं नियोजकों के बीच सम्बन्ध नियमित करने अथवा किसी व्यापार या व्यवसाय के निर्वाध आचरण पर प्रतिबन्ध लगाने की दृष्टि से बनाया गया हो। इसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक श्रम संघों के फेडरेशन भी शामिल किये जाते हैं किन्तु निम्नलिखितको श्रम संघ के रूप में मान्यता नहीं दी गई है-
- नियोक्ताओं एवं उनके द्वारा नियुक्त व्यक्तियों के बीच नियोजन सम्बन्धीकोई समझौता।
- सहभागियों, साझेदारों के मध्य व्यवसाय सम्बन्धी कोई समझौता।
- ख्याति, विक्रय अथवा किसी व्यवसाय, व्यापार या दस्तकारी के सम्बन्धमें कोई समझौता।
2. इस अधिनियम के अन्तर्गत श्रमिक और नियोक्ताओं श्रमिकों और श्रमिकों तथा नियोक्ताओं और नियोक्ताओं के मध्य सम्बन्धों का नियमन करने के लिये बनाये गये किसी भी संघ की रजिस्ट्री की जा सकती है।
3. प्रत्येक श्रम संघ में सदस्यों को न्यूनतम संख्या सात होनी आवश्यक है।
4. श्रम संघों के सदस्यों की उम्र कम से कम 15 वर्ष और कार्यकारिणी के सदस्यों की उम्र कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिये तथा कार्यकारिणी में कम से कम 50 प्रतिशत सदस्य ऐसे होने चाहिये जो उद्योग में कार्यरत हों।
5. प्रत्येक रजिस्टर्ड श्रम संघ का अपना विधान होना चाहिये जिसमें उसका नामतथा उद्देश्य आदि का उल्लेख किया गया हो।
6. रजिस्टर्ड श्रम संघों को अपने सदस्यों की सूची दिखानी आवश्यक है।
7. श्रमिक संघ के साधारण कोष का रुपया केवल सदस्यों हेतु निर्धारित उद्देश्यों पर ही खर्च किया जा सकता है। लेकिन श्रमिक संघ को राजनीतिक उद्देश्य के लिये विशेष कोष एकत्रित करने का अधिकार है।
8. श्रम संघों के लिये रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य नहीं है, लेकिन रजिस्टर्ड श्रम संघों को विशेष अधिकार प्रदान किये गये हैं।
9. एक रजिस्टर्ड श्रम संघ के पदाधिकारियों पर जो संघ के वैधानिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये कार्य करते हों, षडयन्त्र रचने के लिये मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसी प्रकार किसी पदाधिकारी या सद्स्य पर नौकरी करने का समझौता तोड़ने के लिये किसी भी दीवानी अदालत में दावा नहीं किया जा सकता।
10. इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार यद्यपि श्रम संघ को मान्यता दी जा सकती है। लेकिन नियोक्ताओं पर ऐसा कोई बन्धन नहीं है कि वे इन रजिस्टर्ड श्रम संघों को मान्यता प्रदान करें।
11. इस अधिनियम के अन्तर्गत भारत में श्रम संघों का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य नहीं है। बिना रजिस्ट्रेशन कराये भीश्रम गैरकानूनी नहीं होते हैं। यह अधिनियम 1926 से लेकर अब तक पिछले 62 वर्षों में अनेक बार संशोधित किया गया। सन् 1928, 1937, 1960, 1964 एवं 1970 के संशोधन मामूली थे और सन 1947 का संशोधन व्यापक एवं क्रांतिकारी होते हुए भी लागू नहीं होने के कारण प्रभावहीन रहा।
4. औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के मुख्य प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
नया केन्द्रीय सरकार ने 1929 के व्यवसाय विवाद अधिनियम को निरस्त कर 1947 में एक नया अधिनियम पारित किया, जो ‘औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947‘ के नाम से जाना जाता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 1947 से लागू किया गया। शुरू में यह जम्मू काश्मीर को छोड़कर संपूर्ण भारत में लागू था, पर 1 सितंबर 1947 से यह जम्मू काश्मीर में भी लागू होगया। इस अधिनियम का संक्षिप्त ब्योरा इस प्रकार है-
1. औद्योगिक विवाद का अर्थ- इस अधिनियम की धारा 2(K) के अनुसार, ‘‘नियोक्ता के मध्य, नियोक्ता तथा कर्मचारियों के मध्य तथा श्रमिक तथा श्रमिक के मध्य विवाद अथवा मतभेद जो रोजगार की शर्तों कार्य की दशाओं तथा बेरोजगारी से संबंधित हो औद्योगिक विवाद कहलाते हैं।‘‘
2. अधिनियम का उद्देश्य-इस अधिनियम का मूल उद्देश्य मजदूरों तथा नियोक्ताओं के मध्य मधुर संबंधों को विकसित करना है। साथ ही ऐसी प्रणाली का निर्माण करना है, जिससे विवाद का निपटारा हो सके और श्रमिकों व उद्योग संचालकों के बीच विवाद उत्पन्न होने के अवसर पैदा न होवें। अगर विवादों का समाधान या निवारण समय पर नहीं किया जाये, तो औद्योगिक शांति को खतरा पैदा हो सकता है तथा इससे औद्योगिक व आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो सकती है।
3. अधिनियम के अंतर्गत अधिकारीगण- औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अंतर्गत विभिन्न अधिकारियों तथा यंत्रों की व्यवस्था की गई है, जो औद्योगिक विवादों को रोकने और निपटारे के लिए उत्तरदायी है-
(i) कार्य समितियां इस अधिनियम के अंतर्गत उन सब औद्योगिक प्रतिष्ठानों मेंकार्य समितियों की स्थापना करना आवश्यक है, जिनमें 100 या इससे ज्यादा कर्मचारी कामकरते हों। इन समितियों में श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों के प्रतिनिधि होते हैं।
(ii) समझौता अधिकारी इस अधिनियम के अंतर्गत समझौता कराने की विस्तृतव्यवस्था भी की गई है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उपयुक्त सरकार को समझौता अधिकारी नियुक्त करने का भी अधिकार प्रदान किया गया है। ये अधिकारी दोनों पक्षों में समझौता कराने का प्रयास करते हैं तथा यथानुसार सरकार को रिपोर्ट प्रेषित करते हैं।
(iii) समझौता मंडल- इस अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत संबंधित सरकार औद्योगिक विवादों को निपटाने के लिए समझौता मंडल की स्थापना कर सकती है। नियोक्ता श्रमिकों के दो-दो या चार-चार प्रतिनिधियों को लेकर जैसा भी उचित तथा आवश्यक हो, मंडल का गठन किया जा सकता है। मंडल का एक सभापति होगा, जो स्वतंत्र व्यक्ति होगा। मंडल दोनों पक्षों में समझौता कराने का प्रयास करता है। इसे निर्धारित अवधि (जो करीब दो माह की होती है) के अंदर अपनी रिपोर्ट सरकार को देनी होती है।
(iv) जांच न्यायालय-इस अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत संबंधित सरकार यदि आवश्यक समझे तो उपस्थित औद्योगिक विवाद के प्रकरण की जांच के लिए जांच न्यायालय नियुक्त कर सकती है। न्यायालय में एक या एक से ज्यादा व्यक्ति नियुक्त किये जा सकते हैं। अधिक व्यक्ति होने पर उसमें से एक व्यक्ति सभापति नियुक्त किया जाता है। सभी व्यक्ति स्वतंत्रव्यक्ति होते हैं। न्यायालय को जांच हेतु सुपुर्द किये गये विवाद की रिपोर्ट संबंधित सरकार को 6 माह के अंदर दे देनी चाहिए।
(v) श्रम न्यायालय- इस अधिनियम के अनुसार जब कोई विवाद का निबटारा नहीं हो पाता है, तो संबंधित सरकार राजपत्र में प्रकाशित करके उसका फैसला करने के लिए श्रम न्यायालय नियुक्त कर सकती है। ये विवाद अनुसूची 2 में दिये गये किसी भी विषय से संबंधित होने चाहिए। इसमें केवल एक ही व्यक्ति होता है। यह कार्य किसी ऐसे व्यक्ति को सौंपा जाता है, जिसे न्याय क्षेत्र का कम से कम 7 वर्ष का अनुभव हो अथवा श्रम न्यायालय के कार्य का 5 वर्ष का अनुभव हो ।
(vi) औद्योगिक अधिकरण-धारा 7 (अ) के अनुसार संबंधित सरकार दूसरी या तीसरी है अनुसूची में दिये गये मामलों से संबंधित औद्योगिक विवाद पर राजपत्र में सूचना प्रकाशित का औद्योगिक अधिकरण का गठन कर सकती है। अधिकरण में केवल एक व्यक्ति ही नियुक्त होगा। अधिकरण के अध्यक्ष पद पर उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकता है जो कि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या वह कम से कम दो वर्ष तक औद्योगिक विवाद (अपीलेट ट्रिब्यूनल) अधिनियम 1950 के अंतर्गत नियुक्त श्रम अपीलेट अधिकरण का सभापति रह चुका हो। यदि उपयुक्त सरकार उचित समझे तो अधिकरण के समक्ष कार्यवाही के संबंध में सलाह देने के लिए दो व्यक्तियों को न्याय सहायकों के रूप में नियुक्त कर सकती है।
(vii) राष्ट्रीय अधिकरण- इस अधिनियम की धारा 7 (ब) के अनुसार जब कोई औद्योगिक विवाद एक से अधिक राज्यों से संबंधित हो या केन्द्रीय सरकार की दृष्टि से राष्ट्रीय महत्व का हो, तो राजपत्र (गजट) में सूचना प्रकाशित करके राष्ट्रीय अधिकरण की नियुक्ति कर सकती है। इस अधिकरण में केवल एक ही व्यक्ति होगा, जो उपयुक्त सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा। इसमें भी उच्च न्यायालय के न्यायालय के समकक्ष व्यक्ति ही नियुक्त किया जाता है।
(viii) पंच निर्णय- जहां कोई औद्योगिक विवाद विद्यमान है या पैदा होने की संभावना है और नियोक्ता तथा श्रमिक उसे पंच निर्णय हेतु सुपुर्द करने को सहमत होते हैं, तो वे ऐसे विवाद (धारा 10) के अंतर्गत) किसी श्रम न्यायालय अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को सौंपने के पूर्व किसी भी समय एक लिखित समझौते द्वारा उसे पंच निर्णय के लिए निर्देशित कर सकतेहैं। ऐसा निर्देशन पंच निर्णय समझौते में निर्देशित पंच या पंचों के समक्ष किया जाएगा। संशोधित अधिनियम 1964 के अनुसार अगर पंच निर्णय समझौतों में पंचों की संख्या बराबर हो, तो समझौते में मध्यस्थ निर्णायक की नियुक्ति का प्रावधान है। पंच विवाद की जांच-पड़ताल करने के बाद अपना फैसला हस्ताक्षर कर उपयुक्त सरकार को प्रस्तुत करेंगे ।
अधिनियम के अंतर्गत सरकार को जनोपयोगी सेवाओं में होने वाले सभी विवादों को समझौते के लिए अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है तथा अन्य मामलों में सरकार निर्णय स्वयं ही कर सकती है। सार्वजनिक उपयोगी सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारी 6 सप्ताह की निश्चित रूपमें पूर्व सूचना दिये बिना हड़ताल नहीं कर सकते। उसी प्रकार इन सेवाओं में तालाबंदी करनाभी अवैध माना जाएगा। समझौता कार्यवाही चलने की अवधि में भी हड़ताल व तालाबंदी नहींहो सकती। अवैध हड़ताल व तालाबंदी करने वाले या भाग लेने वालों को या इन कार्यों कीसहायता करने वालों को 6 माह तक का कारावास या 1000 रुपये जुर्माना या दोनों ही हो सकतेहैं। अवैध हड़तालों में भाग लेने से इंकार करने वाले श्रमिकों को भी इस अधिनियम में सुरक्षाप्रदान की गई है।
5. कारखाना अधिनियम 1948 के मुख्य प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
कारखाना अधिनियम 1948
ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित कारखाना अधिनियम, 1934 में श्रमिकों के सम्बन्ध मेंपर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया और देश में कल्याणकारीराज्य की स्थापना की नीति के अन्तर्गत श्रमिकों की दशा सुधारने तथा लघु उद्योगों को आवश्यक कानूनी संरक्षण प्रदान करने के लिए नवम्बर 1947 में विधानसभा में कारखाना अधिनियम बिल प्रस्तुत किया गया जो 18 अगस्त 1948 को पारित हुआ। भारतीय कारखाना अधिनियम 1948 में कुल 120 धाराये हैं जिसके कुछ मुख्य प्रावधान निम्नलिखित है-
(1) अधिनियम के क्षेत्र- यह अधिनियम जम्मू और कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में उन सभी संस्थानों पर लागू होगा जिनमें शक्ति प्रयोग करने की दशा में 10 या इससे अधिक शक्ति न प्रयोग करने की दशा में 20 या इससे अधिक श्रमिक कार्य करते हो। राज्य सरकारोंको यह अधिकार है कि वह इस अधिनियम को अन्य कारखानों पर भी लागू कर सकती है चाहे उनमें श्रमिकों की संख्या कितनी भी हो।
(2) कारखानों की स्वीकृति- अनुज्ञापन तथा पंजीयन इस अधिनियम के लागू हो जाने के पश्चात् कारखानों की स्वीकृति, अनुज्ञापन तथा पंजीयन कराने की व्यवस्था की गई। नये कारखानों की स्थापना से पूर्व उनके प्लान व ले-आउट प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया। इससे कारखानों पर सरकार का अधिक प्रभावशाली नियन्त्रण हो गया।
(3) स्वास्थ्य सुरक्षा एवं कल्याण- इस अधिनियम में श्रमिकों के स्वास्थ्य सुरक्षा एवंकल्याण सम्बन्धी सुविधायें देने का प्रावधान दिया गया। निष्प्रयोज्य तथा बेकार माल को समाप्त करने, कारखाने में धूल नियन्त्रित करने, थूकदान उपलब्ध करने तथा ताप नियन्त्रण आदि के लिये प्रावधान किये गये। स्वास्थ्य सम्बन्धी बातों के अन्तर्गत
- कारखाने की नियमित सफाई कूड़ा-करकट व गन्दे पदार्थ हटाने की व्यवस्था,
- पर्याप्त प्रकाश, स्वच्छ वायु, रोशनदान, पीने का स्वच्छ पानी, शौचालय एवं मूत्रालय आदि की विशेष व्यवस्था की गई।
- दुर्घटनाओं को न्यूनतम करने तथा श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिये अधिनियम के अन्तर्गत विभिन्न सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधानों का समावेश किया गया। अधिनियम के विशिष्ट कल्याण कार्यों की व्यवस्था की गई, जैसे स्नानगृह, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, अल्पाहार गृह, विश्राम स्थल, शिशु गृह आदि।
(4) श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति- इस अधिनियम के अन्तर्गत यह व्यवस्थाकी गई कि 500 या इससे अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाले कारखानों में एक श्रम कल्याणअधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य रूप से की जाये।
(5) कार्य के घण्टे- इस अधिनियम में श्रमिकों के कार्य करने के घण्टों में कमी की गई। इसके अनुसार वयस्क व्यक्तियों के लिये कार्य के घण्टे प्रति सप्ताह 48 तथा प्रतिदिन 9 निश्चित किये गये। दैनिक कार्य विस्तार 10 1/2 घण्टे रखा गया। प्रत्येक वयस्क श्रमिक को 5 घण्टे कार्य करने के उपरान्त कम से कम डेढ़ घण्टे का विश्राम मिलना चाहिये। 14 वर्ष से कम के बालक को कारखानों में कार्य करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। बालक श्रमिक के लिये अधिकतम 4 घण्टे नियमित कर दिये गये स्त्री श्रमिक किसी भी दिन 8 घण्टे से अधिक कार्य नहीं करेगी। सायं 7 बजे से प्रातः 6 बजे तक शिशु एवं स्त्री श्रमिक से कार्य लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
(6) नैत्विक एवं मौसमी के भेद की समाप्ति- कारखाना अधिनियम, 1948 के लागू के पश्चात् नैत्यिक व मौसमी कारखानों में भेद को समाप्त कर दिया गया।
(7) अधि-समय के लिये पारिश्रमिक- अधि समय कार्य के लिये श्रमिकों को उनकी मजदूरी का सामान्य दर से दो गुना भुगतान करने का प्रावधान किया गया।
(8) सवेतन अवकाश- अधिनियम में साप्ताहिक अवकाश के अतिरिक्त उपार्जितअवकाश का प्रावधान किया गया है। अधिनियम के अनुसार अमिकों को 12 के उपरान्त निम्नलिखित दर से अवकाश मिलना चाहिये।
- वयस्क प्रत्येक श्रमिक को 20 दिन कार्य करने पर 1 दिन का सवेतन अवकाश न्यूनतम 10 दिन के प्रावधान सहित ।
- 1954 के एक संशोधन के अन्तर्गत 12 माह से अर्थ कम से कम 240 दिन के कार्यकाल से है।
(9) व्यावसायिक बीमारियाँ- कारखाना प्रबन्धक का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी दुर्घटना अथवा व्यावसायिक बीमारी की सूचना दे। श्रमिक की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक को भी बीमारी की सूचना तुरन्त दी जानी चाहिये। दुर्घटना की जाँच के लिये अधिकारी भी नियुक्त किये जा सकते हैं।
(10) दण्ड की व्यवस्था- इस अधिनियम का पालन न करने पर दण्ड की भी व्यवस्था है। अधिक से अधिक 1,000 रुपये आर्थिक दण्ड तथा 6 माह की सजा से दण्डित किया जा सकता है।
कारखाना अधिनियम 1948 में महत्त्वपूर्ण संशोधन- भारतीय कारखाना अधिनियम1945 में अनेक महत्त्वपूर्ण संशोधन अगस्त 1976 में किये गये जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं-
- निर्माण प्रक्रिया के क्षेत्र को अधिक व्यापक कर दिया है।
- भवनों के रख-रखाव का प्रावधान किया गया है।(धारा 40A)
- ऐसे समस्त कारखानों में जहाँ 1,000 या इससे अधिक कर्मचारी कार्य करते हैं,उनमें सुरक्षा अधिकारी को नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया गया है। धारा 40B)
मातृत्व लाभ अधिनियम 1961- कतिपय अवधियों के दौरान महिलाओं का नियोजन अथवा उनके द्वारा काम का किया जाना प्रतिषेधित अधिनियम की धारा 4 में इस संबंध में निम्न उपबंध किये गये हैं-
(1) कोई भी नियोजक किसी महिला को उसके प्रसव अथवा उसके गर्भपात के दिन से लेकर पश्चावर्ती छह सप्ताह के दौरान किसी स्थापन में जानते हुए नियोजित न करेगा।
(2) कोई भी महिला अपने प्रसव अथवा अपने गर्भपात के दिन से लेकर पश्चातवर्ती छह सप्ताह के दौरान किसी स्थापन में काम नहीं करेगी।
(3) धारा 6 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने बिना किसी भी गर्भवती महिला से इस निमित्त उसके द्वारा आवेदन किये जाने पर, धारा 4 (4) में निर्दिष्ट अवधि के दौरान उसके नियोजक द्वारा ऐसा कोई काम करने की अपेक्षा नहीं की जायेगी जो कठिन प्रकृति का हो या जिसमें दीर्घकाल तक खड़ा रहना जरूरी हो अथवा जिससे उसके गर्भवतित्व से या भू्रण के सामान्य विकास में किसी भी तरह का विघ्न होने की सम्भावना हो अथवा जिससे उसका गर्भपात कारित होना याअन्यथा उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना हो।
(4) धारा 4(3) में निर्दिष्ट अवधि निम्नलिखित होगी-
(क) उसके प्रत्याशित प्रसव की अवधि के पूर्व के छह सप्ताह की अवधि से पूर्ववर्ती एक मास की अवधि ।
(ख) उक्त छह मास की अवधि के दौरान की कोई अवधि जिसके लिए वह गर्भवती महिला अनुपस्थिति के अवकाश का उपयोग धारा 6 के अधीन नहीं करती।
भारत के श्रम संघ और अन्य श्रम कानूनों का नाम और संशोधन वर्ष (तालिका प्रारूप में)
| क्रम संख्या | अधिनियम का नाम | लागू होने का वर्ष | संशोधन के वर्ष |
|---|---|---|---|
| 1 | श्रमिक संघ अधिनियम, 1926 (Trade Unions Act, 1926) | 1926 | 1947, 1960, 1982, 2001 |
| 2 | कारखाना अधिनियम, 1948 (Factories Act, 1948) | 1948 | 1954, 1976, 1987 |
| 3 | मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act, 1936) | 1936 | 1947, 1957, 1976 |
| 4 | न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948) | 1948 | 1957, 1961, 1976 |
| 5 | औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947) | 1947 | 1953, 1964, 1971, 1982 |
| 6 | मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961) | 1961 | 1976, 1988, 2017 |
| 7 | बोनस अधिनियम, 1965 (Bonus Act, 1965) | 1965 | 1976, 1985, 2015 |
| 8 | श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 (Workmen's Compensation Act, 1923) | 1923 | 1933, 1962, 1976, 2009 |
| 9 | बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986) | 1986 | 2016 |
| 10 | कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 (Employees' Provident Funds and Miscellaneous Provisions Act, 1952) | 1952 | 1971, 1988, 1996 |
| 11 | ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972 (Payment of Gratuity Act, 1972) | 1972 | 1984, 1994, 2010 |
| 12 | अप्रेंटिस अधिनियम, 1961 (Apprentices Act, 1961) | 1961 | 1973, 1986, 2014 |
| 13 | अंतरराज्यीय प्रवासी कार्यmen (नियमन और रोजगार शर्तें) अधिनियम, 1979 (Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act, 1979) | 1979 | 1985 |
| 14 | भवन और अन्य निर्माण कर्मकार (नियमन का रोजगार और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1996 (Building and Other Construction Workers (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act, 1996) | 1996 | 2013 |
| 15 | बीड़ी और सिगार कर्मकार (रोजगार की स्थिति) अधिनियम, 1966 (Beedi and Cigar Workers (Conditions of Employment) Act, 1966) | 1966 | 1976, 1993 |
| 16 | खदान अधिनियम, 1952 (Mines Act, 1952) | 1952 | 1959, 1983 |
| 17 | मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स अधिनियम, 1961 (Motor Transport Workers Act, 1961) | 1961 | 1976, 1982 |
| 18 | पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा शर्तें और गलत प्रथाओं का उन्मूलन) अधिनियम, 1955 (Working Journalists and Other Newspaper Employees (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Act, 1955) | 1955 | 1974, 1989 |
| 19 | राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (National Rural Employment Guarantee Act, 2005) | 2005 | 2009, 2010 |
| 20 | अनियमित कार्यmen (नियोजन और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1979 (Unorganized Workers' Social Security Act, 2008) | 2008 | 2012 |
| 21 | अधीनस्थ श्रम (नियोजन और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1979 (Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976) | 1976 | 1985 |
| 22 | कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (Employees' State Insurance Act, 1948) | 1948 | 1951, 1966, 1975, 1984 |
| 23 | महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act for Women Workers, 1961) | 1961 | 1976, 1988, 2017 |
| 24 | समान वेतन अधिनियम, 1976 (Equal Remuneration Act, 1976) | 1976 | 1987 |
| 25 | मजदूर कल्याण कोष अधिनियम, 1987 (Labour Welfare Fund Act, 1987) | 1987 | 1995 |
| 26 | खान मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Mines Maternity Benefit Act, 1961) | 1961 | 1976 |
| 27 | अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवा लाभ) नियम, 1958 (All India Services (Death-cum-Retirement Benefits) Rules, 1958) | 1958 | 1993 |
| 28 | भवन और अन्य निर्माण कर्मकार कल्याण सेस अधिनियम, 1996 (Building and Other Construction Workers' Welfare Cess Act, 1996) | 1996 | 2002 |
सारांश
ये प्रमुख श्रम विधानों का सारांश है, जिनका उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा, उनकी कार्य स्थितियों में सुधार, और उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। इन कानूनों में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं ताकि वे बदलते समय और परिस्थितियों के अनुरूप बने रहें।
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