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मानव संसाधन प्रबंधन : दीर्घउत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

UNIT - 1

 1.    मानव संसाधन प्रबंधन को परिभाषित करते हुए उसके महत्व को बताइए।

किसी भी राज्य या राष्ट्र का आर्थिक विकास केवल उसके भौतिक या वित्तीय संसाधनों पर निर्भर नहीं होता, बल्कि वह उसके मानवीय संसाधनों पर भी निर्भर करता है। चूँकि आधुनिक युग मशीनी युग है, स्वचालित मशीनों तथा यन्त्रों का दिनोंदिन विकास हो रहा है, परन्तु बगैर मानवीय प्रयासों के कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता है। भौतिक संसाधनों में भूमि, कच्चा माल, मशीनी उपकरण तथा पूँजी, जबकि मानवीय संसाधनों में श्रम- शक्ति, साहस, कुशलता आदि शामिल होता है। इनकी देखभाल एवं उपयोग के बेहतर तरीकों को प्रबन्धन कहा जाता है। मानवीय संसाधनों के उचित प्रयोग के माध्यम से संस्थान को अधिकाधिक फायदा पहुँचाना, एक बेहतर प्रबन्धन का परिणाम होता है। 

मानव संसाधन प्रबन्धन

मानव संसाधन, व्यवसाय के समस्त संसाधनों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण, सक्रिय, सृजनशील, संवेदनशील एवं अंगभूत साधन है। 

रेन्सिस लिंकर्ट का मत है कि “किसी भी उपक्रम की समस्त क्रियायें उस संस्था में कार्यशील व्यक्तियों द्वारा ही प्रारम्भ एवं निर्धारित की जाती है।”

सेमुअल जाॅनसन का कथन है कि ‘‘मानव संसाधन प्रत्येक संस्था का मूल प्रश्न, मर्म एवं सफलता का रहस्य होते हैं।’’

आधुनिक व्यवसाय में मानव संसाधनों का प्रबन्ध सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है। 

ड्रकर के अनुसार ‘‘व्यक्तियों का प्रबन्ध करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु फिर भी असंभव नहीं है।’’

मानव संसाधन, प्रबंध कार्य के दौरान व्यक्तियों के सम्बन्धों, व्यवहारों, अन्तव्र्यहारों, कार्यसमस्याओं, अभिप्रेरणाओं तथा मानवीय भावनाओं का प्रबंध है। 

मानव संसाधन प्रबंध मानव संसाधन प्रबंधन का आधुनिक स्वरूप है। यह कर्मचारी प्रशासन का व्यवहारवादी आयाम है। 

डेल एस0 बीच लिखते हैं यद्यपि कई शताब्दियों से व्यक्ति अपने पारस्परिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संगठनों का निर्माण करते रहे हैं, किन्तु हाल ही के वर्षो में मानव संसाधन प्रबंध के सिद्धान्तों एवं व्यवहारों का एक व्यवस्थित विकास सम्भव हुआ है।

मानव संसाधन प्रबंध, मानव संसाधन प्रबंधन का आधुनिक स्वरूप, आयाम एवं क्षेत्र है। 

मानव संसाधन की श्रेणियाँसंसाधनों के बिना कोई भी उपक्रम कार्य नहीं कर सकता है। एक संगठन के संसाधनों को मुख्य रूप से निम्न तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है

1.भौतिक संसाधन ¼Physical Resources½ : इनमें यंत्र, मशीनें, उपकरण, भूमि, भवन, संयत्र आदि शामिल हैं।

2.वित्तीय संसाधन¼FinancialResources½  : इनमें पूँजी, मुद्रा, धनसम्पत्ति, माल, अर्द्धनिर्मित वस्तुऐं आदि शामिल हैं। 

3.मानव संसाधन ¼HumanResources½ : मानव संसाधनों में संगठन में नियुक्त समस्त श्रेणियों के कर्मचारियों, श्रमिक, फोरमैन, इंजीनियर्स, तकनीशियन, कार्यालय कर्मचारी व प्रबंधकों को शामिल किया जाता है। 

मानव संसाधन व्यवसाय के सबसे महत्वपूर्ण एवं मूल्यांकन संसाधन होते हैं। व्यक्ति ही व्यवसाय को चलाते हैं। मानव संसाधन व्यवसाय के विशिष्ट संसाधन होते हैं। इसके बिना कोई भी संस्था कार्य नहीं कर सकती। 

मानव संसाधन प्रबंधन का महत्व  एप्पले ने ठीक ही कहा है कि “प्रबंध व्यक्तियों का विकास है न कि वस्तुओं का निर्देशन प्रबंध एवं सेविवर्गीय प्रशासन एक ही है, उन्हें कदापि पृथक नहीं किया जाना चाहिए।”

एल्ड्रिक ने मानव संसाधन प्रबंधन के महत्व को निम्नवत बताया है मानव शरीर में जो स्थान स्नायु तंत्र का है, वही स्थान संगठन में मानव संसाधन प्रबंधन का है। मानव संसाधन प्रबंधन न तो मस्तिष्क है, न पैर है, न रक्तस्त्राव है और न शक्तिदायक तत्व है, वह केवल स्नायु तंत्र है। यह एक नाड़ी है जो कुछ अर्थो में स्वाचालित शक्ति है। यह शक्ति एक शत्रु का रूप धारण कर सकती है, यदि विसंगति हो जाये, तो ढांचा पंगु हो जाता है, यदि यह संतुलन खो दे, तो अस्थायित्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 


OR

एल्ड्रिक का दृष्टिकोण और मानव संसाधन प्रबंधन का महत्व

एल्ड्रिक ने मानव संसाधन प्रबंधन (HRM) की तुलना मानव शरीर के स्नायु तंत्र से की है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि HRM का संगठन में वही स्थान है जो मानव शरीर में स्नायु तंत्र का होता है। इस दृष्टिकोण को समझने के लिए, हमें मानव शरीर और संगठन के बीच एक सादृश्य (analogy) स्थापित करना होगा।

स्नायु तंत्र और HRM की तुलना

स्नायु तंत्र का महत्व:

  1. संचार और समन्वय: स्नायु तंत्र शरीर के विभिन्न अंगों के बीच संचार और समन्वय स्थापित करता है। यह मस्तिष्क से संदेश प्राप्त करता है और उन्हें शरीर के विभिन्न हिस्सों में पहुँचाता है।
  2. स्वचालित क्रियाएँ: स्नायु तंत्र स्वचालित क्रियाओं (जैसे हृदय की धड़कन और श्वसन) को नियंत्रित करता है।
  3. संतुलन और स्थिरता: यह शरीर की स्थिरता और संतुलन बनाए रखता है। यदि स्नायु तंत्र में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो शरीर अस्थिर और पंगु हो सकता है।

HRM का महत्व:

  1. संचार और समन्वय: HRM संगठन के विभिन्न विभागों और कर्मचारियों के बीच संचार और समन्वय स्थापित करता है। यह प्रबंधन की नीतियों और निर्देशों को कर्मचारियों तक पहुँचाता है।
  2. स्वचालित प्रक्रियाएँ: HRM कई स्वचालित प्रक्रियाओं (जैसे वेतन प्रबंधन, प्रदर्शन मूल्यांकन) को नियंत्रित करता है।
  3. संतुलन और स्थिरता: HRM संगठन में संतुलन और स्थिरता बनाए रखता है। यदि HRM में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो संगठन अस्थिर और पंगु हो सकता है।

उदाहरणों के माध्यम से समझाना

  1. संचार और समन्वय का उदाहरण:

    • मानव शरीर: जब आप किसी गर्म वस्तु को छूते हैं, तो स्नायु तंत्र त्वरित संदेश भेजता है और आप अपनी उंगली तुरंत हटा लेते हैं। यह त्वरित संचार और समन्वय का परिणाम है।
    • संगठन: किसी संगठन में, यदि किसी परियोजना में अचानक बदलाव की आवश्यकता होती है, तो HRM यह सुनिश्चित करता है कि सभी संबंधित विभाग और कर्मचारी समय पर सूचित हों और आवश्यक बदलाव किए जाएँ।
  2. स्वचालित प्रक्रियाओं का उदाहरण:

    • मानव शरीर: श्वसन, दिल की धड़कन और पाचन जैसी प्रक्रियाएँ स्वचालित होती हैं और स्नायु तंत्र द्वारा नियंत्रित होती हैं।
    • संगठन: HRM में स्वचालित प्रक्रियाएँ जैसे कर्मचारी भर्ती, वेतन प्रबंधन, और लाभ प्रबंधन होती हैं। ये प्रक्रियाएँ बिना किसी विशेष हस्तक्षेप के सुचारू रूप से चलती हैं।
  3. संतुलन और स्थिरता का उदाहरण:

    • मानव शरीर: यदि स्नायु तंत्र सही ढंग से काम नहीं करता, तो व्यक्ति चलने, खड़े होने और संतुलन बनाए रखने में असमर्थ हो सकता है।
    • संगठन: यदि HRM सही ढंग से काम नहीं करता, तो संगठन में कर्मचारियों की संतुष्टि, प्रेरणा, और प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है, जिससे संगठन की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।

निष्कर्ष

एल्ड्रिक ने बहुत सटीक रूप से यह बताया है कि मानव संसाधन प्रबंधन का संगठन में वही महत्व है जो स्नायु तंत्र का मानव शरीर में है। HRM संगठन की नाड़ी की तरह काम करता है, जो संचार, समन्वय, स्वचालित प्रक्रियाओं और संतुलन को बनाए रखता है। यदि HRM में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो यह संगठन के कार्यों और स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।


    2.     भारत में मानव संसाधन प्रबंधन के विकास पर निबंध लिखिए।

### भारत में मानव संसाधन प्रबंधन का विकास

भारत में मानव संसाधन प्रबंधन (HRM) का विकास एक महत्वपूर्ण और जटिल प्रक्रिया रही है, जिसने समय के साथ कई बदलाव और सुधार देखे हैं। यह निबंध भारत में मानव संसाधन प्रबंधन के विकास को ऐतिहासिक, कानूनी, आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से विश्लेषित करेगा।

#### प्रारंभिक काल

भारत में मानव संसाधन प्रबंधन की शुरुआत स्वतंत्रता से पहले के काल से मानी जा सकती है। उस समय, प्रबंधन का ध्यान मुख्य रूप से श्रमिकों के उपयोग और नियंत्रण पर था। ब्रिटिश शासन के दौरान, उद्योगों में श्रमिकों के अधिकार और सुरक्षा को लेकर कई कानून बनाए गए, जैसे कि फैक्ट्री एक्ट 1881, जिसमें श्रमिकों के कार्य की स्थिति और समय को नियंत्रित करने के नियम बनाए गए।

#### स्वतंत्रता के बाद का दौर

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत में औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास की गति बढ़ी। इसके साथ ही, मानव संसाधन प्रबंधन की अवधारणा में भी बदलाव आया। श्रमिकों के अधिकारों और कल्याण के प्रति अधिक ध्यान दिया जाने लगा। इस दौर में, श्रम कानूनों में सुधार किया गया और नए कानून बनाए गए, जैसे कि मिनिमम वेजेज एक्ट 1948 और बोनस एक्ट 1965, जो श्रमिकों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए थे।

#### उदारीकरण और वैश्वीकरण

1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद, मानव संसाधन प्रबंधन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई। कंपनियों ने प्रतिस्पर्धात्मक बने रहने के लिए अपने मानव संसाधनों को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने की आवश्यकता महसूस की। इस दौर में, मानव संसाधन प्रबंधन का ध्यान केवल श्रमिकों के अधिकारों और कल्याण पर नहीं, बल्कि उनके विकास, प्रशिक्षण और प्रतिभा प्रबंधन पर भी केंद्रित हुआ।

#### आधुनिक युग

आज के समय में, मानव संसाधन प्रबंधन एक महत्वपूर्ण व्यवसायिक रणनीति के रूप में उभर चुका है। मानव संसाधन प्रबंधक अब केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तकनीकी प्रगति, डिजिटलाइजेशन और डेटा एनालिटिक्स ने मानव संसाधन प्रबंधन को और अधिक प्रभावी और कुशल बना दिया है।

#### चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

भारत में मानव संसाधन प्रबंधन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जैसे कि विविधता और समावेश, कर्मचारियों की प्रतिधारण, और कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य। इसके अलावा, नई तकनीकों और ऑटोमेशन के आगमन से भी मानव संसाधन प्रबंधन की भूमिका में बदलाव आ रहा है।

भविष्य में, मानव संसाधन प्रबंधन में और अधिक नवाचार और सुधार की उम्मीद है। कंपनियाँ अपने कर्मचारियों के विकास और कल्याण के लिए अधिक प्रयास करेंगी और मानव संसाधन प्रबंधन को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखेंगी।

 निष्कर्ष

भारत में मानव संसाधन प्रबंधन का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जो समय के साथ बदलती रही है। ऐतिहासिक, कानूनी, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों ने इस विकास को प्रभावित किया है। वर्तमान और भविष्य में, मानव संसाधन प्रबंधन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने वाली है, क्योंकि यह संगठन की सफलता और स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान देता है।


    3.     मानव संसाधन प्रबंधन के विभिन्न प्रारूपों का वर्णन करें।

### मानव संसाधन प्रबंधन के विभिन्न प्रारूप

मानव संसाधन प्रबंधन (HRM) का उद्देश्य संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानव संसाधनों का कुशल प्रबंधन करना है। इसके लिए विभिन्न प्रारूपों और मॉडलों का उपयोग किया जाता है। यहाँ हम मानव संसाधन प्रबंधन के प्रमुख प्रारूपों का वर्णन करेंगे:

#### 1. प्रचालनात्मक मानव संसाधन प्रबंधन (Operational HRM)

प्रचालनात्मक मानव संसाधन प्रबंधन का ध्यान दिनप्रतिदिन के कार्यों और प्रक्रियाओं पर होता है। इसमें कर्मचारी की भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, वेतननिर्धारण, प्रदर्शन मूल्यांकन और अन्य प्रशासनिक कार्य शामिल होते हैं। यह प्रारूप सुनिश्चित करता है कि संगठन के सभी संसाधनों का उचित उपयोग हो और कर्मचारियों की आवश्यकताएँ पूरी हों।

#### 2. रणनीतिक मानव संसाधन प्रबंधन (Strategic HRM)

रणनीतिक मानव संसाधन प्रबंधन संगठन की दीर्घकालिक रणनीतियों और लक्ष्यों के साथ संरेखित होता है। इसमें मानव संसाधन नीतियों और प्रथाओं को संगठन की रणनीतिक दृष्टि के साथ जोड़ना शामिल है। इस प्रारूप में प्रतिभा प्रबंधन, उत्तराधिकार योजना, और कर्मचारियों की विकास योजनाएँ प्रमुख होती हैं।

#### 3. कार्यात्मक मानव संसाधन प्रबंधन (Functional HRM)

कार्यात्मक मानव संसाधन प्रबंधन विभिन्न मानव संसाधन कार्यों को वर्गीकृत और संगठित करता है। इसमें भर्ती और चयन, प्रशिक्षण और विकास, प्रदर्शन प्रबंधन, वेतन और लाभ प्रबंधन, कर्मचारी संबंध, और कानूनी अनुपालन जैसे कार्य शामिल होते हैं। यह प्रारूप प्रत्येक कार्य को एक विशिष्ट कार्यक्षेत्र के रूप में मानता है और उसे कुशलतापूर्वक प्रबंधित करता है।

#### 4. वैश्विक मानव संसाधन प्रबंधन (Global HRM)

वैश्विक मानव संसाधन प्रबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसमें विभिन्न देशों में कार्यरत कर्मचारियों का प्रबंधन शामिल है। इस प्रारूप में विभिन्न संस्कृतियों, कानूनों और व्यापारिक प्रथाओं को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधन नीतियाँ और प्रक्रियाएँ बनाई जाती हैं। वैश्विक मानव संसाधन प्रबंधन में कर्मचारी प्रतिनियुक्ति, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण, और वैश्विक नेतृत्व विकास प्रमुख होते हैं।

#### 5. इलेक्ट्रॉनिक मानव संसाधन प्रबंधन (eHRM)

इलेक्ट्रॉनिक मानव संसाधन प्रबंधन सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके मानव संसाधन प्रक्रियाओं को स्वचालित और कुशल बनाता है। इसमें मानव संसाधन सूचना प्रणाली (HRIS), एचआर एनालिटिक्स, और अन्य डिजिटल टूल्स का उपयोग होता है। इस प्रारूप से डेटा की सही और त्वरित पहुँच, रिपोर्टिंग और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार होता है।

#### 6. परियोजना आधारित मानव संसाधन प्रबंधन (Projectbased HRM)

परियोजना आधारित मानव संसाधन प्रबंधन का उपयोग तब होता है जब संगठन किसी विशिष्ट परियोजना के लिए टीम बनाते हैं। इसमें प्रोजेक्ट की आवश्यकताओं के अनुसार कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, और प्रबंधन किया जाता है। यह प्रारूप सुनिश्चित करता है कि परियोजना की समयसीमा और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सही कौशल और प्रतिभा का उपयोग हो।

#### 7. सामाजिक मानव संसाधन प्रबंधन (Social HRM)

सामाजिक मानव संसाधन प्रबंधन में कर्मचारियों के बीच सहयोग, संचार, और सामुदायिक भावना को बढ़ावा देना शामिल है। इसमें टीम बिल्डिंग, कर्मचारियों की संतुष्टि, और संगठनात्मक संस्कृति को सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न गतिविधियों और कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। सोशल मीडिया और अन्य सामाजिक प्लेटफार्मों का उपयोग इस प्रारूप में प्रमुख होता है।

### निष्कर्ष

मानव संसाधन प्रबंधन के विभिन्न प्रारूपों का उपयोग संगठन की आवश्यकताओं और उद्देश्यों के अनुसार किया जाता है। प्रत्येक प्रारूप अपने आप में महत्वपूर्ण है और संगठन के मानव संसाधन प्रबंधन को कुशल और प्रभावी बनाने में योगदान देता है। इन प्रारूपों का उचित समायोजन और उपयोग संगठन की सफलता और स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


    4.     मानव संसाधन प्रबंधन के प्रकार्योे को बताइए।

### मानव संसाधन प्रबंधन के प्रमुख कार्य

मानव संसाधन प्रबंधन (HRM) के कार्य संगठन की सफलता और स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। निम्नलिखित बिंदुओं में मानव संसाधन प्रबंधन के विभिन्न कार्यों का विवरण दिया गया है:

1. मानव शक्ति नियोजन (Human Resource Planning)

   संगठन की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में मानव शक्ति नियोजन का कार्य होता है। इसमें संगठन की आवश्यकताओं के अनुसार सही संख्या में सही लोगों को सही समय पर सही स्थान पर उपलब्ध कराना शामिल है। यह सुनिश्चित करता है कि संगठन के पास आवश्यक कौशल और प्रतिभा वाले कर्मचारी हों।

2. प्रशिक्षण और विकास (Training and Development)

   कर्मचारियों की वर्तमान और भविष्य की भूमिकाओं के प्रभावी निष्पादन हेतु समुचित प्रशिक्षण और विकास का प्रबंध किया जाता है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों की क्षमताओं को बढ़ाना, नई तकनीकों और प्रक्रियाओं के प्रति उन्हें तैयार करना और उनके पेशेवर विकास को सुनिश्चित करना है।

3. प्रदर्शन मूल्यांकन (Performance Appraisal)

   कर्मचारियों की क्षमताओं, उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं तथा उनमें संभावित सुधार के क्षेत्रों को ज्ञात करने हेतु प्रदर्शन मूल्यांकन किया जाता है। इससे कर्मचारियों की शक्तियों और कमजोरियों का पता चलता है, जिससे उन्हें सुधारने और प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।

4. चयन, भर्ती और पदोन्नति (Selection, Recruitment, and Promotion)

   चयन, भर्ती, कार्य पर नियुक्ति तथा पदोन्नति के द्वारा कर्मचारियों और भूमिकाओं में सामंजस्य बैठाना HRM का एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह प्रक्रिया संगठन को सक्षम और योग्य कर्मचारी प्राप्त करने में मदद करती है।

5. कार्य विश्लेषण (Job Analysis)

   कार्यों को समझने और मानवीय संसाधनों के विकास में उनके महत्व का मूल्यांकन करने हेतु कार्य विश्लेषण किया जाता है। इसमें प्रत्येक कार्य की आवश्यकताओं, जिम्मेदारियों और अपेक्षित कौशल का विश्लेषण किया जाता है।

6. संगठनात्मक विकास (Organizational Development)

   संगठनात्मक स्वास्थ्य, संस्कृति और उत्पादकता को विकसित करने हेतु संगठनात्मक विकास का कार्य किया जाता है। इसमें संगठन की संरचना, प्रक्रियाओं और नीतियों को सुधारने के लिए विभिन्न पहलें शामिल होती हैं।

7. समूहों के साथ समायोजन (Employee Relations)

   कर्मचारियों का समूहों के साथ समायोजन स्थापित करना एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह कर्मचारियों के बीच सहयोग, संचार और सामूहिक भावना को बढ़ावा देने में मदद करता है।

8. प्रेरणा और पुरस्कार (Motivation and Reward Systems)

   कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए पुरस्कार पद्धति को लागू किया जाता है। इसमें कर्मचारियों को उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रशंसा, पुरस्कार और अन्य प्रोत्साहन दिए जाते हैं, जिससे उनकी संतुष्टि और उत्पादकता बढ़ती है।

इन कार्यों के माध्यम से मानव संसाधन प्रबंधन सुनिश्चित करता है कि संगठन के सभी मानव संसाधन पूरी तरह से तैयार, प्रेरित और सक्षम हों, जिससे संगठन के लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्राप्त किया जा सके।

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UNIT - 2


    1.    मानव संसाधन नियोजन को परिभाषित करते हुए उसके उद्देश्य बताइए।

मानव संसाधन नियोजन का अर्थ किसी उपक्रम के सन्दर्भ में, उसके द्वारा कर्मचारियों की मांग एवं पूर्ति में सामन्जस्य स्थापित करना है। यह उपक्रम द्वारा अपनी मानवीय आवश्यकताओं का पूर्वानुमान है। मानव संसाधन नियोजन एक ऐसा कार्यक्रम है, जिसके अन्तर्गत उपक्रम की मानव संसाधन की व्याख्या एवं भावी जरुरतों या आवश्यकताओं का अनुमान प्रस्तुत किया जाता है। 

गोरइन मेकबेथ के अनुसार : मानव संसाधन नियोजन में दो चरण सम्मिलित हैं। प्रथम चरण, ‘‘मानव संसाधन आवश्यकताओं का नियोजन’’ तथा द्वितीय चरण ‘‘मानव संसाधन की पूर्ति का नियोजन’’ 

डेल योडर के अनुसार ‘‘कर्मचारी व्यवस्था सम्बन्धी नीति, सामान्यतयः यह धारणा रखती है कि संगठन की वर्तमान एवं भावी मानवीय आवश्यकताओं की व्याख्या उसके गुण स्तर एवं संस्था के सन्दर्भ में की जायेगी। जहां सम्भव होगा, आवश्यकता का पूर्वानुमान किया जायेगा, ताकि आवश्यकतानुसार मानव संसाधन उपलब्ध हो सके।

मानव संसाधन नियोजन, मानव संसाधन की कमी अथवा आधिक्य दोनों अवस्थाओं से उपक्रम की रक्षा करता है और मानव संसाधन की मांग तथा पूर्ति में ऐसा सन्तुलन स्थापित करने में सहायक होता है, जिससे मानव संसाधन सम्बन्धी लागत में कमी लाकर, उसका अधिकतम उपयोग संभव किया जाता है।

मानव संसाधन नियोजन एक व्यापक शब्द है और इसमें मानव संसाधन का पूर्वानुमान, उसका स्कन्ध या स्टाॅक, एवं विश्लेषण, भर्ती तथा विकास सम्मिलित होता है। यह संगठन के वर्तमान तथा भावी उद्देश्यों की पूर्ति करता है।

मानव संसाधन नियोजन की विशेषतायेंमानव संसाधन नियोजन की प्रमुख विशेषतायें निम्न प्रकार हैं

1.मानव संसाधन नियोजन, मानव संसाधन प्रबन्धन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है।

2.इसके अन्तर्गत मानवीय संसाधनों की जरुरतों एवं उनकी पूर्ति में सामंजस्य स्थापित किया जाता है तथा उनको विकसित करने, उनका उपयोग करने एवं उनका अनुरक्षण करने का प्रयास किया जाता है।

3.यह पूर्वानुमान करने की एक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से एक संगठन यह सुनिश्चित करता है कि उसके पास उचित समय, उचित स्थान, उचित संख्या में, उचित प्रकार के लोग कार्यों को सम्पादित करने हेतु उपलब्ध हैं।

4.मानव संसाधन नियोजन का लक्ष्य योग्य कर्मचारियों की निरन्तर पूर्ति द्वारा एक संगठन के स्थायित्व एवं प्रगति में योगदान देना होता है।

5.मानव संसाधन नियोजन, सम्पूर्ण संगठनात्मक नियोजन के अन्तर्गत एक उपप्रणाली होता है।

मानव संसाधन नियोजन के उद्देश्य

मानव संसाधन नियोजन के उद्देश्य निम्नवत् हैं

1.मानव संसाधन नियोजन का प्रमुख उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं का पूर्वानुमान करना तथा उनकी पूर्ति पर नियन्त्रण स्थापित करना होता है।

2.संगठन की भर्ती, चयन सम्बन्धी नीति निर्माण में मदद करना, जिससे कम लागत में श्रेष्ठ कर्मचारियों की प्राप्ति को सुनिश्चित किया जा सके।

3.मानवीय संसाधनों के आधिक्य अथवा अभाव का निर्धारण करना, तथा उसके अनुसार आवश्यकताओं का निर्धारण करना।

4.मानव संसाधन नियोजन को सम्पूर्ण संगठन के नियोजन के साथ जोड़ना।

5.कार्मिकों की निपुणताओं, ज्ञान, योग्यताओं, अनुशासन सम्बन्धी आवश्यकताओं का पूर्वाभास करना तथा उनमें सुधार करना।

6.संस्थान के लिए आवश्यक कर्मचारियों की संख्या तथा योग्यता के अनुसार भर्ती करना तथा उनका अनुरक्षण करना।

7.मानवीय संसाधनों के मूल्य लागत का आंकलन करना।

8.संस्थान के मानवीय संसाधनों का अनुकूलतम एवं सर्वाेतम उपयोग करना।

9.वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के अनुरुप मानवीय संसाधनों का प्रबन्ध करना।

10.संस्थान की नूतन कार्य योजनाओं एवं परियोजनाओं के लिए मानवीय संसाधनों की लागत का आंकलन करना।

11.संस्थान के अन्तर्गत विकास एवं विवेकीकरण के कार्यक्रमों की आवश्यकता की पूर्ति करना।

12.संस्थान के विभिन्न भागों एवं क्षेत्रों में मानवीय संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करना।


    2.    विभिन्न स्तरों पर मानव संसाधन नियोजन को समझाइए।

 विभिन्न स्तरों पर मानव संसाधन नियोजन

मानव संसाधन नियोजन (HR Planning) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जो यह सुनिश्चित करती है कि संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सही समय पर सही लोगों का सही स्थान पर होना आवश्यक है। इसे विभिन्न स्तरों पर विभाजित किया जा सकता है, जिनका विवरण निम्नलिखित है:

1. राष्ट्रीय स्तर पर (National Level)

राष्ट्रीय स्तर पर मानव संसाधन नियोजन का कार्य केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इसमें संपूर्ण देश के लिए मानव संसाधनों की आवश्यकता और उनकी पूर्ति का पूर्वानुमान लगाया जाता है। यह योजना राष्ट्रीय विकास योजनाओं, श्रम शक्ति सर्वेक्षणों और विभिन्न उद्योगों की आवश्यकताओं के आधार पर बनाई जाती है। उदाहरण के लिए, सरकार विभिन्न क्षेत्रों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, और इंफ्रास्ट्रक्चर में आवश्यक मानव संसाधनों की पहचान करती है और उनकी पूर्ति के लिए नीतियाँ बनाती है।

2. क्षेत्रीय स्तर पर (Regional Level)

क्षेत्रीय स्तर पर मानव संसाधन नियोजन राज्य या क्षेत्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। यह नियोजन क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी क्षेत्र में कृषि प्रमुख है, तो उस क्षेत्र में कृषि संबंधित मानव संसाधनों की आवश्यकता और पूर्ति का अनुमान लगाया जाता है। इसी तरह, औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों की आवश्यकताओं का भी पूर्वानुमान किया जाता है।

3. औद्योगिक स्तर पर (Industry Level)

औद्योगिक स्तर पर मानव संसाधन नियोजन किसी विशेष उद्योग जैसे सीमेंट, वस्त्र, या रासायनिक उद्योग की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। इसमें उस उद्योग के उत्पादन या परिचालनात्मक स्तर को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधन आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, टेक्सटाइल उद्योग में बुनकर, डिज़ाइनर, और तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए योजनाएँ बनाई जाती हैं।

4. इकाई स्तर पर (Unit Level)

इकाई स्तर पर मानव संसाधन नियोजन किसी विशेष संगठन की मानव संसाधन आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। इसमें संगठन की व्यवसाय योजना, दीर्घकालिक लक्ष्य और परिचालन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधन का आँकलन किया जाता है। उदाहरण के लिए, किसी विनिर्माण इकाई को मशीन ऑपरेटर, इंजीनियर, और प्रबंधकीय स्टाफ की आवश्यकता हो सकती है।

5. विभागीय स्तर पर (Departmental Level)

विभागीय स्तर पर मानव संसाधन नियोजन किसी संगठन के एक विशेष विभाग की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। इसमें विभाग की विशेष आवश्यकताओं, लक्ष्यों और कार्यभार को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधनों का पूर्वानुमान लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, वित्त विभाग को अकाउंटेंट, वित्तीय विश्लेषक, और ऑडिटर की आवश्यकता हो सकती है।

6. कार्य स्तर पर (Task Level)

कार्य स्तर पर मानव संसाधन नियोजन संगठन के एक विशेष विभाग के अंतर्गत किसी विशेष कार्य की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। इसमें एक विशेष कार्य जैसे यांत्रिक अभियंता, डेटा विश्लेषक, या सॉफ्टवेयर डेवलपर की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, आईटी विभाग में सॉफ्टवेयर विकास परियोजना के लिए प्रोग्रामर और टेस्टर्स की आवश्यकता हो सकती है।

 निष्कर्ष

मानव संसाधन नियोजन के विभिन्न स्तर यह सुनिश्चित करते हैं कि विभिन्न क्षेत्रों, उद्योगों, संगठनों और विभागों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधनों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन और विकास किया जा सके। यह संगठन की दीर्घकालिक सफलता और स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


3.    किसी कर्मचारी का निष्पादन मूल्यांकन कैसे किया जाता है? वर्णन करें।

रिचर्ड ए. एनिन के अनुसार निष्पादन मूल्यांकन प्रक्रिया

रिचर्ड ए. एनिन के अनुसार, निष्पादन मूल्यांकन (Performance Evaluation) प्रक्रिया में कर्मचारियों की आवश्यकताओं और उनके मूल्यांकन की विधि का ऐसा समन्वय होना चाहिए कि कार्य सुचारू रूप से चल सके। एनिन ने एक अग्र पद्धति का सुझाव दिया है, जिसमें चार मुख्य चरण शामिल हैं:

कार्य का मूल्यांकन प्रतिवेदन (Evaluation Report) तैयार करना:

अधीनस्थ कर्मचारी के कार्य का मूल्यांकन प्रतिवेदन पर्यवेक्षक द्वारा तैयार किया जाना चाहिए। यह प्रतिवेदन कर्मचारी के कार्य निष्पादन, उसकी उपलब्धियों और उसके द्वारा किए गए कार्यों के विश्लेषण पर आधारित होता है।

मूल्यांकन प्रपत्र का पुनरावलोकन:

पर्यवेक्षक मूल्यांकन प्रपत्र को एक समिति के समक्ष प्रस्तुत करता है, जो इसका पुनरावलोकन करती है और आवश्यक संशोधन करती है। यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि मूल्यांकन निष्पक्ष और संतुलित हो।

कर्मचारी के साथ बातचीत:

पर्यवेक्षक या वरिष्ठ अधिकारी को कर्मचारी के मूल्यांकन पर कर्मचारी के साथ एकान्त में बातचीत करनी चाहिए। इस बातचीत का उद्देश्य कर्मचारी को उसकी ताकतों और कमजोरियों के बारे में सूचित करना और सुधार के लिए मार्गदर्शन प्रदान करना है।

कार्य सुधार की योजनाएँ बनाना:

वरिष्ठ अधिकारी और अधीनस्थ कर्मचारी, दोनों को मिलकर कार्य सुधार की दृष्टि से योजनाएँ बनानी चाहिए। यह योजनाएँ कर्मचारी के विकास और उसके कार्य निष्पादन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से बनाई जाती हैं।

मूल्यांकन में शामिल बिंदु

एनिन के अनुसार, मूल्यांकन संक्षिप्त और संशोधन योग्य होना चाहिए, जिसमें निम्नलिखित बातें शामिल होनी चाहिए:

कर्मचारी के विशिष्ट गुण:

कर्मचारी के विशिष्ट गुण क्या हैं, जो उसे दूसरों से अलग बनाते हैं और उसकी भूमिका में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

कार्य निष्पादन में दोष:

कर्मचारी के कार्य निष्पादन में क्या दोष हैं, जिन्हें सुधारा जा सकता है और उस दृष्टि से कर्मचारी का विकास कैसे संभव है।

सामान्य कार्य निष्पादन:

सामान्यतः कर्मचारी का कार्य निष्पादन किस प्रकार का है, क्या वह संगठन की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है या नहीं।

मूल्यांकन के व्यावहारिक पहलू

एनिन की मान्यता है कि मूल्यांकन अधिकतर व्यावहारिक होते हैं, जिससे पर्यवेक्षक द्वारा अपेक्षित कार्यों की तुलना कर्मचारी द्वारा निष्पादित कार्यों से की जाती है। इसके अतिरिक्त, एक लाक्षणिक मूवी (Character Roll) होती है, जिसके आधार पर समयसमय पर कार्य निष्पादन की जाँच की जाती है और कर्मचारी का श्रेणीकरण किया जाता है।

मूल्यांकन में विवाद और समस्याएँ

कई बार नेतृत्व, उत्साह, और विश्वसनीयता के आधार पर जांचकर्ता और कर्मचारी के बीच विवाद हो जाता है, जिससे मूल्यांकन का सही महत्व ज्ञात नहीं हो पाता। यह समस्याएँ मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती हैं।

निष्कर्ष

रिचर्ड ए. एनिन की निष्पादन मूल्यांकन प्रक्रिया एक व्यवस्थित और संरचित दृष्टिकोण प्रदान करती है, जो कर्मचारियों के कार्य निष्पादन का सही मूल्यांकन करने और उन्हें सुधार के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने में सहायक है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि मूल्यांकन निष्पक्ष और संतुलित हो, जिससे संगठन की उत्पादकता और कर्मचारियों की संतुष्टि में वृद्धि हो सके।


    4.    अधिशासी विकास को समझाइए।

अधिशासी विकास

प्रबन्ध के विभिन्न स्तरोंउच्च, मध्यम तथा निम्न का विकास करना अधिशासी विकास के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है। अधिशासी व्यक्तियों के अन्तर्गत वे व्यक्ति शामिल होते हैं, जो कि क्रियाओं का समन्वय एवं निर्देशन करते हैं। ये कर्मचारी प्रशासन को नियन्त्रित करते हैं। जूलियस ने इसकी परिभाषा देते हुए बताया कि अधिशासी विकास एक कार्यक्रम है, जिसके द्वारा वांछित उद्देश्यों की उपलब्धि हेतु अधिशासी क्षमताओं में अभिवृद्धि की जाती है।‘‘ अधिशासी प्रशिक्षण एवं विकास की वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्ति विशेष किसी संगठन का कार्य सुचारु रूप से चलाने एवं प्रभावपूर्ण नियन्त्रण की कला सीखता है। इसके अन्तर्गत कार्य एवं कार्य का ज्ञान सीखने का कार्य साथसाथ होता है।

प्रो. डेल एस. बीच के अनुसार‘‘अधिशासी विकास की एक ऐसी व्यवस्थित विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति कार्य संगठनों का प्रभावपूर्ण प्रबन्ध करने के लिए ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण एवं परिज्ञान प्राप्त करते हैं।‘‘

अधिशासी विकास का नियोजन

अधिशासी विकास कार्यक्रम का नियोजन निम्न प्रकार से होता है

1.विकास आवश्यकताओं का पता लगानाअधिशासी विकास प्रोग्राम बनाते समयमुख्य रूप से यह बात मालूम करनी चाहिए कि उपक्रम को आवश्यकतानुसार कौनसे प्रबन्धकों को जरूरत होगी। भावी पूर्वानुमान लगाते समय भविष्य के परिवर्तनों, जैसे औद्योगिक विकास, नयी उत्पादन विधियाँ, संगठन का सम्भावित आकार आदि का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके अन्तर्गत यह नीति भी स्पष्ट की जानी चाहिए कि भविष्य में निर्मित बड़े पद कम्पनी में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों में से भरे जायेंगे अथवा बाहर के लोगों के द्वारा उन्हें भरा जायेगा।

2.वर्तमान प्रबन्धकों की योग्यताओं का मूल्यांकन अधिशासी विकास के नियोजन का दूसरा चरण उपक्रम के कार्यरत प्रबन्धकों की कार्यक्षमता का मूल्यांकन करता है। इस मूल्यांकन द्वारा यह बात प्रकट हो जाती है कि प्रबन्धकों की वर्तमान क्षमतायें एवं अनुभव क्या क्या है। इसके आधार पर भावी विकास की योजना बनाई जा सकती है।

3.सेविवर्गीय प्रबन्धकों की सूची बनाना अधिशासी विकास नियोजन के अन्तर्गत वर्तमान प्रबन्धकों की योग्यताओं के मूल्यांकन के बाद उनकी जानकारी की सूची बनाई जाती है। इसके अन्तर्गत उनकी सभी व्यक्तिगत सूचनाओं की जानकारी होनी चाहिए।

4.व्यक्तिगत विकास कार्यक्रम नियोजन प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार मानसिक शारीरिक स्तर एवं भावात्मक गुणों में अन्तर होता है। अतः कोई एक कार्यक्रम सभी के लिए सफल नहीं हो सकता। प्रत्येक कार्यक्रम बनाने के पूर्व यह जानकारी कर लेना आवश्यक होता है कि व्यक्ति विशेष की सीमाये क्या है? इस जानकारी के आधार पर ही कार्यक्रम निश्चित किये जाते हैं तथा व्यक्ति विकास हेतु आवश्यकताओं तथा संगठन में उपलब्ध प्रशिक्षण सुविधाओं में समायोजन किया जाता है।

5.प्रशिक्षण तथा विकास कार्यक्रम बनानाअधिशासी विकास योजना की अगली सीढ़ी प्रशिक्षण तथा विकास कार्यक्रमों को तैयार करना है। इसके लिए विस्तृत एवं सुनियोजित कार्यक्रम बनाया जाता है। सधे हुए संक्षिप्त कार्यक्रम विकास कार्यक्रम की जान होते हैं। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत मानवीय सम्बन्धों, गति अध्ययन, सृजनात्मक विचार, स्मरण शक्ति, निर्णय क्षमता, प्रशिक्षण, नेतृत्व क्षमता में वृद्धि आदि शामिल किये जाते हैं। ऐसे कार्यक्रम आयोजकों को प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी तरह से जाँच लेनी चाहिए। ऐसे कार्यक्रम का लेखा एवं प्रमाण संगठन में रखा जाता है।

कार्यक्रम का मूल्यांकनअधिशासी विकास कार्यक्रम के पूरा होने पर उसका मूल्यांकन करना चाहिए। इसमें कार्यक्रम कहाँ तक सफल रहा, इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार के मूल्यांकन की निम्नलिखित विधियों है. 

¼i½     विभिन्न घटकों के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों की प्रतिक्रिया मालूम करना। उसके सम्बन्ध में आवश्यक सर्वेक्षण करना 

¼ii½     परीक्षण एवं परीक्षाओं द्वारा इस बात का पता लगाना कि प्रशिक्षणार्थी ने कितना सीखा है? अर्थात् उनकी योग्यताओं का पता लगाया जा                 सकता है। 

¼iii½    कार्य प्रणाली परिवर्तन से कार्य पर क्या प्रभाव पड़ा, इसका अध्ययन करना तथा प्रशिक्षणार्थियों, उनके साथियों या अधीनस्थों से पूछताछ             करके जानकारी हासिल करना। 

¼iv½    प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप हुए उन परिवर्तनों की जाँच करना तथा निष्कर्म निकालना, जिनसे उत्पादन लागत, किस्म, परिवेदना तथा                 उत्पादन प्रभावित हुए हो।


अधिशासी विकास का महत्वऔद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप औद्योगिक उपक्रमों की समस्यायें बढ़ गयी हैं। प्राचीन समय में अधिशासी विकास पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। आधुनिक समय में तो अधिशासी विकास सेविवर्गीय का एक महत्वपूर्ण कार्य माना जाने लगा है। बड़ीबड़ी व्यावसायिक उपक्रम तो अपने अधिकारियों के विकास पर भारी धनराशि खर्च करने लगी है। कार्य को बढ़ती हुई जटिलताओं के कारण अधिशासी विकास का महत्व और भी अधिक हो गया है। द्वितीय महायुद्ध के पूर्व अधिशासी विकास कार्यक्रमों का कोई नाम ही नहीं जानता था, परन्तु आज के समय में अधिशासी विकास से अनभिज्ञ व्यक्ति को परम्परागतवादी कहा जाता है। अधिशासी विकास के महत्व को हम निम्न तथ्यों द्वारा स्पष्ट कर सकते है

1.वर्तमान समय में पेशेवर प्रबन्ध का प्रादुर्भाव हो चुका है। डॉक्टर, इन्जीनियर तथा चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट आदि के समान प्रबन्धकों को भी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। जब से यह आर्थिक सत्ता पूंजीपतियों के हाथ से निकल कर पेशेवर प्रबन्धकों के हाथ में आयी है, तब से उनमें अधिक ज्ञान और कौशल की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी है, अतः अधिशासी विकास कार्यक्रमों की विशेष आवश्यकता अनुभव को जाती है।

2.जिस गति से औद्योगिक उपक्रमों की संख्या में वृद्धि हो रही है, उस संख्या में योग्य प्रबन्धकों का विकास नहीं हो रहा है। नवीनतम प्रविधियों तथा यन्त्रों की होड़ लगी है। ऐसी परिस्थितियों में अनुभवी एवं योग्य प्रबन्धकों की प्राप्ति होना कठिन होता है। अतः अधिशासी विकास कार्यक्रमों की आवश्यकता अधिक होती है। 

3.वर्तमान समय में तकनीकी एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में हो रहे क्रान्तिकारी परिवर्तनों ने प्रबन्धकीय कार्यों को भी जटिल बना दिया है। इन प्रबन्धकीय जटिलताओं के साथ समायोजन करने हेतु अधिशासी विकास की आवश्यकता होती है, क्योंकि प्रबन्धकों को परिवर्तनों से अवगत कराना आवश्यक होता है तथा प्रबन्धकों को इस योग्य बनाना होता है, जिससे वे सभी परिस्थितियों में निर्णय ले सकें।

4.वर्तमान समय में व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व की विचारधारा का प्रबल विकास हो चुका है। प्रबन्धकों को उपभोक्ताओं, सेवायोजकों, श्रमिकों, सम्पूर्ण सुमुदाय तथा प्रतिस्पर्धी व्यवसायियों के प्रति अनेक उत्तरदायित्व पूरे करने पड़ते है। प्रबन्धकों को सामाजिक उत्तरदायित्व की विचारधारा से अवगत कराने के लिए अधिशासी विकास कार्यक्रमों की आवश्यकता होती है।

5.वर्तमान समय में साधनों के निर्देशन की अपेक्षा व्यक्तियों के विकास पर अधिकध्यान दिया जाने लगा है। अधिशासियों का विकास करना भी आवश्यक होता है। अधिशासियों में छुपी हुई प्रतिभा को सामने लाने तथा उनकी कार्यक्षमता का विकास करने के लिए अधिशासी विकास करना होता है।

6.प्रत्येक उपक्रम के पास तथा राष्ट्र के पास साधन सीमित मात्रा में ही होते हैं। अतः इन साधनों का सदुपयोग करने हेतु अधिशासी विकास करना होता है। 

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UNIT - 3 

    1.    प्रशिक्षण को परिभाषित करते हुए प्रशिक्षण की आवश्यकता पर चर्चा करें।

प्रशिक्षण मानव संसाधन विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है। किसी भी गत्यात्मक परिवेश तथा विकासशील उपक्रम में कर्मचारियों को स्व-अनुभव अथवा मूल व सुधार के आधार पर कार्य करने के लिए नही छोड़ा जा सकता। 

कर्मचारियों की नई भर्ती, स्थानांतरण, पदोन्नति अथवा तकनीकी परिवर्तनों की दशा में कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। 

किसी भी कार्य को उत्तम रीति से करने के लिए विशिश्ट ज्ञान एवं कौशल की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण किसी कर्मचारी को विशिष्ट कार्य करने के योग्य बनाने की प्रक्रिया है। प्रशिक्षण के द्वारा किसी कार्य को करने के कौशल में वृद्धि हो जाती है। 

बीच-प्रशिक्षण एक ऐसी संगठित कार्य विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति किसी निश्चित उद्देश्य के लिए ज्ञान तथा / अथवा कौशल सीखते हैं। 

फैल्पस एवं वैस्टिंग के अनुसार -स्वयं अनुभव के स्थान पर प्रशिक्षण कर्मचारी को अनुमोदित कार्य विधियों का ज्ञान प्रदान करता है तथा इसके द्वारा कर्मचारी अधिक योग्य एवं कुशल हो जाता है।”

इस प्रकार प्रशिक्षण कर्मचारियों को अनौपचारिक कार्य ज्ञान करवाने की प्रक्रिया है।


प्रशिक्षण की आवश्यकता एवं उद्देश्य- कर्मचारी प्रशिक्षण की आवश्यकता कई कारणों से अनुभव की जाती है। यह कई उद्देश्यों की पूर्ति करता है। ये निम्न हैं-

1.कार्य समस्याओं का ज्ञान- प्रशिक्षण की आवश्यकता कर्मचारियों को उन समस्याओं का ज्ञान कराने के लिए होती है, जो कार्य के दौरान उत्पन्न हो सकती है। प्रशिक्षण काल में समस्याओं के विभिन्न पहलुओं, सम्बन्धित कठिनाईयों तथा उनके वैकल्पिक समाधानों पर विचार किया जाता है। 

2.नये एवं अनुभवहीन कर्मचारी-जब उपक्रम में नये कर्मचारियों की भर्ती की जाती है, तो उन्हें कार्य की तकनीकों, कौशल व कार्य-विधियों का ज्ञान करवाने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है। उन्हें कार्य का विशिष्ट ज्ञान करवाया जाता है, ताकि वे अपने कार्य को कुशलतापूर्वक कर सके। 

3.निम्न लागत पर श्रेष्ठ कार्य-न्यूनतम लागत अपव्यय एवं बर्बादी तथा न्यूनतम पर्यवेक्षण पर श्रेष्ठ ढंग से कार्य करने के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना आवश्यक होता है। 

4.नवीन तकनीकों का ज्ञान-आजकल व्यवसाय में अनेक तकनीकों, प्रौद्योगिकी, यंत्रों व कार्य विधियों का प्रयोग बढ़ गया है। इन नवीन परिवर्तनों से कर्मचारियों का परिचय करवाने तथा बदलते हुए वातावरण के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए श्रमिकों को प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक होता है। 

5.कार्य परिवर्तन की दशा में आवश्यक-जब स्थानांतरण, पदोन्नति, पदावनति अथवा किन्ही अन्य कारणों से कर्मचारी के कार्य में कोई परिवर्तन होता है, तो उसे नवीन कार्य दशाओं में समायोजित करने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक हो जाता है। 

6.दूसरों के दृष्टिकोण की जानकारी-प्रशिक्षण का एक उद्देश्य कर्मचारियों को एक साथ लाकर उन्हें एक-दूसरे के दृष्टिकोण, भावना एवं विचारों से अवगत कराना है तथा एक-दूसरे को समझने का अवसर प्रदान करना ही यह उनके सामूहिक जीवन तथा कार्यो के एकीकरण में सहायक होता है।

 7.संस्थागत सूचनाओं का ज्ञान-प्रशिक्षण का उद्देश्य कर्मचारियों को उपक्रम की सामान्य प्रबन्ध व्यवस्था, उत्पाद, संगठन, ढांचे, सामान्य नीतियों आदि के बारे में सूचनायें प्रदान करना भी होता है। 

8.कार्य आदतों में सुधार- प्रशिक्षण के द्वारा कर्मचारियों को विशेष कार्यो के निस्पादन के लिए विशेष विधियों का ज्ञान करवाया जा सकता है, ताकि उनकी उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सके। कार्य सम्बन्धी आदतों में सुधार होने से यंत्रों, उपकरणों व सामग्री का समुचित उपयोग होता है, कार्य प्रणाली में सुधार होता है, दुर्घटनाओं में कमी होती है तथा कर्मचारी का मनोबल बना रहता है।

9.लक्ष्य निर्धारित-प्रशिक्षण कर्मचारी को अपनी व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुरूप अपने लक्ष्य निर्धारित करने एवं उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहने में सहायक होता है।

10.कार्य समायोजन- प्रशिक्षण काल में प्रत्येक कर्मचारी को अपनी वास्तविक क्षमताओं को समझने का अवसर मिलता है। कर्मचारी आत्म विश्लेषण द्वारा अपनी सामथ्र्य एवं दुर्बलताओं का सही अनुमान कर सकता है तथा यह निर्णय ले सकता है कि वह किस प्रकार एवं किस रूप में उपक्रम में अधिकतम योगदान कर सकता है। इससे कर्मचारी असन्तोष एवं अनुपस्थिति में कमी होती है। 

11.विशिष्टीकरण का प्रयोग-उद्योगों में यंत्रीकरण, प्रभावीकरण एवं विशिष्टीकरण के बढ़ते हुए प्रयोग के कारण उपक्रम के प्रत्येक स्तर पर प्रशिक्षण की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी है। 

अन्य कारण -प्रशिक्षण की आवश्यकता निम्न कारणों से भी अनुभव की जाती है-

  • उपक्रम के सभी स्तरों पर योग्य एवं कुशल कर्मचारियों की व्यवस्था करना 
  • संगठनात्मक लोचशीलता में वृद्धि करना
  • परिवर्तन के प्रति अनुकूलता का वातावरण बनाना 
  • कर्मचारी मनोबल, कौशल तथा उत्पादकता में वृद्धि करना
  • ज्ञान एवं चातुर्य का विकास करना 
  • स्ूाचनायें उपलब्ध कराना
  • अच्छे निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना 
  • आत्म विश्वास करने की योग्यता का विकास करना 
  • नियोजन एवं क्रियान्वयन के अंतर को समाप्त करना 
  • प्रतिस्पर्धा की चुनौतियों को स्वीकार करना
  • मानव संसाधन की क्षमताओं का विकास करना

प्रशिक्षण के प्रकार-प्रशिक्षण का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जा सकता है। प्रशिक्षण के उद्देश्य, विधि, साधन, प्रशिक्षण, प्राप्तकत्र्ता आदि सभी आधारों को सम्मिलित करते हुए प्रशिक्षण के प्रमुख प्रकार निम्न हैं-

  • प्रारम्भिक प्रशिक्षण (OrientationTraining)
  • कार्य प्रशिक्षण (JobTraining)
  • पदोन्नति प्रशिक्षण (TrainingForPromotion)
  • पुर्नअभ्यास प्रशिक्षण (RefresherTraining)
  • मनोवृत्ति प्रशिक्षण (AttitudeTraining)
  • सुरक्षात्मक प्रशिक्षण 
  • बहुमुखी प्रशिक्षण (VersatilityTraining)
  • उपचारात्मक प्रशिक्षण (RemedialTraining)

1.प्रारम्भिक प्रशिक्षण-प्रारम्भिक या प्रवेशात्मक प्रशिक्षण का उद्देश्य कर्मचारियों को उनके कार्य एवं संस्था से परिचित कराना होता है। इसके द्वारा नये कर्मचारी को उपक्रम की नीतियों, उद्देश्यों, संगठन संरचना, उत्पादन प्रणालियों, कार्य-दशाओं आदि की जानकारी दी जाती है। उन्हें अन्य कर्मचारियों तथा प्रबंधकों से परिचित कराया जाता है। यह प्रशिक्षण नये कर्मचारियों में संस्था के प्रति रूचि, निष्ठा एवं आत्मविश्वास उत्पन्न करने तथा संस्था के साथ एकात्मकता स्थापित करने के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार के प्रशिक्षण में कर्मचारी को निम्न बातों का ज्ञान कराया जाता है-

  • उपक्रम का इतिहास, विकास, लक्ष्य, प्रबंध नीतियाँ, योजनायें 
  • उपक्रम की कर्मचारी नीति
  • सेवा की शर्ते, कार्य के घण्टे, पदोन्नति, वेतन, भत्ते आदि 
  • कर्मचारी कल्याण सुविधायें व सामा0 सुरक्षा सुविधायें
  • कार्य सम्बन्धी सूचनायें, कत्र्तव्य, दायित्व आदि 
  • कर्मचारी के कार्य का अन्य कार्यो से सम्बन्ध 
  • प्रबंधकों, पर्यवेक्षको तथा सहयोगी कर्मियों से परिचय 

2.कार्य प्रशिक्षण- कार्य-प्रशिक्षण कर्मचारियों को कार्य विशेष में दक्ष एवं निपुण बनाने तथा कार्य की बारीकियाँ समझने के लिए दिया जाता है, ताकि वे कुशलतापूर्वक अपना कार्य कर सके। इसमें कार्य के विभिन्न पहलुओं, उसमें प्रयुक्त मशीनों व उपकरणों एवं कार्यविधि की जानकारी दी जाती है। इस प्रशिक्षण से कार्यकुशलता एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है। यह प्रशिक्षण नये तथा पुराने दोनों प्रकार के कर्मचारियों को दिया जा सकता है। 

3.पदोन्नति प्रशिक्षण-जब कर्मचारियों को पदोन्नत किया जाता है तो उन्हें उच्च पद के कार्य का प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक होता है, ताकि वे अपने नवीन उत्तरदायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह कर सकें। 

4.पुर्न अभ्यास प्रशिक्षण-परिवर्तनशील वातावरण एवं तीव्र तकनीकी विकास के कारण इस प्रशिक्षण का महत्व बढ़ गया है। यही कारण है कि कर्मचारियों को एक बार प्रशिक्षित कर देना ही पर्याप्त नहीं होता है। उत्पादन में नई तकनीकों एवं मशीनों का प्रयोग किये जाने, नई कार्य-प्रणालियों को अपनाये जाने की दशा में कर्मचारियों को पुनः प्रशिक्षित करने की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है। पुराने श्रमिकों के ज्ञान को ताजा करने, उनकी मिथ्या धारणाओं को दूर करने, उन्हें नये सुधारों, नवीन कार्य पद्धतियों से परिचित करवाने तथा उन्हें नवीन परिवर्तनों से अवगत कराने की दृष्टि से यह पुनः प्रशिक्षण आवश्यक होता है। इस प्रकार ज्ञान का नवीनीकरण एवं विकास सूचनाओं का प्रसारण, दृष्टिकोण में परिवर्तन, कार्यशैलियों में बदलाव तथा वैयक्तिक विकास इस प्रशिक्षण के मुख्य उद्देश्य है। 

5.मनोवृत्ति प्रशिक्षण-मनोवृत्ति प्रशिक्षण का उद्देश्य कर्मचारियों में संस्था के प्रति सहयोग, अपनत्व, निष्ठा, सहिश्वास, स्वामि भक्ति, सकारात्मक दृष्टिकोण, हितकारी चिन्तन एवं रचनात्मक मनोवृत्ति का विकास करना होता है। इस प्रशिक्षण की प्रक्रिया सतत् चलती रहती है। इसके लिए परिसंवाद, अध्ययन गोष्ठी, सभाओं, व्याख्यानों, मार्गदर्शन, सामूहिक परिचर्चा आदि का प्रबंध करके सद्आचरण, व्यवहार एवं प्रवृत्तियों का निर्माण करने में कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाता है।

6.सुरक्षात्मक प्रशिक्षण-इस प्रशिक्षण में कर्मचारी को स्वयं की सुरक्षा, उपक्रम की सम्पत्तियों की सुरक्षा तथा अन्य सामान्य सुरक्षा व्यवस्था में योगदान देने के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान की जाती है जैसे प्राथमिक उपचार, अग्नि शमन यंत्रों का प्रयोग आदि।

 7.बहुमुखी प्रशिक्षण- इस प्रशिक्षण में कर्मचारियों को कई प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित किया जाता है। कई अवसरों पर विशेषज्ञ श्रमिकों की अपेक्षा विविध योग्यता रखने वाले तथा विविध कौशल में प्रवीण श्रमिकों की अधिक आवश्यकता होती है। विशेषकर व्यवसायिक समृद्धि तथा मंदीकाल में बहुमुखी प्रशिक्षित श्रमिक अधिक उपयोगी होता है। मंदीकाल में कार्य में कमी हो जाने पर ऐसे श्रमिकों को दूसरे कार्यो में लगाया जा सकता है।

 8.उपचारात्मक प्रशिक्षण-कई बार अधिक समय हो जाने पर कुछ कर्मचारी अपने कार्य के प्रति लापरवाह होने लगते हैं। वे कम्पनी नियमों का उल्लंघन करते हैं, वे अपने दायित्वों की उपेक्षा करने लगते हैं तथा उनके कार्य निष्पादन में गिरावट आ जाती है। ऐसे कर्मचारी कई बार कार्य-स्थल पर गंभीर नहीं होते। वे कार्य पर कम टिकते हैं अथवा अन्य प्रकार से अपने कत्र्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाते है। अतः ऐसे कर्मचारियों के लिए उपचारात्मक प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है, ताकि उन्हें पुनः कार्य के प्रति सचेत, जागरूक एवं उत्तरदायी बनाया जा सके। इस प्रशिक्षण के द्वारा उनकी कार्य में पुनः रूचि उत्पन्न हो जाती है तथा उन्हें कार्य पर सक्रि बनाया जाता है। 




    2.    योग्यता अंकन क्या है? इसकी आवश्यकता क्यों होती है?'

3.2 योग्यता अंकन का अर्थ

सामान्य शब्दों में योग्यता अंकन से आशय कर्मचारी का मूल्यांकन करने से है अर्थात् कृत्य से सम्बन्धित कर्मचारी की विभिन्न योग्यताओं का पता लगाने से है। अन्य शब्दों में योग्यता अंकन के अन्तर्गत कर्मचारी की व्यक्तिगत क्षमताओं, विशेषताओं एवं गुणों आदि का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार एक उपक्रम में किसी कर्मचारी द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की उपयोगिता का पता लगाना ही योग्यता अंकन कहलाता है। योग्यता अंकन को भी कार्य मूल्याकंन की भाँति विभिन्न नामों से पुकारा गया है। 

योग्यता अंकन की परिभाषा-योग्यता अंकन की कुछ परिभाषायें इस प्रकार है
(1)     स्कॉट क्लोथियर एवं स्प्रीगल के अनुसार, ‘‘योग्यता अंकन कृत्य की पूर्वाश्यकताओं के सन्दर्भ में कर्मचारी के कार्य-निष्पादन के मूल्यांकन करने की प्रक्रिया है।‘‘
(2)     अलफोर्ड एवं बीटी के अनुसार, ‘‘कर्मचारी या कार्मिक अंकन किसी व्यक्ति की अपने कृत्य पर की जाने वाली सेवाओं का कम्पनी को होने वाले सापेक्षिक लाभ का अंकन या मूल्यांकन है।
(3)     जॉन ए. शुबिन के अनुसार, ‘‘योग्यता अंकन, कृत्य पर कर्मचारी के व्यक्तित्व शील-गुणों एव कार्य निष्पादन का एक व्यवस्थित मूल्यांकन और फर्म के लिए कर्मचारी के योगदान एवं सापेक्षित मूल्य के निर्धारण का ढाँचा है। 
(4)     एडविन वी. फिलप्पो के अनुसार, ‘‘योग्यता अंकन किसी कर्मचारी की विशिष्टता या श्रेष्ठता का उसके वर्तमान कृत्य और उसके श्रेष्ठतर कृत्य सम्भावनों के सम्बन्ध में व्यवस्थित, सामयिक और जहाँ तक मानवीय ढंग से सम्भव हो, एक निष्पक्ष अंकन है। 

विशेषतायें

  • योग्यता अंकन एक प्रक्रिया है, जिसमें कर्मचारियों की योग्यताओं, क्षमताओं एवं कार्य के निष्पादन का निरन्तर मूल्यांकन किया जाता है।
  • ऐसा मूल्यांकन किसी कार्य के निष्पादन के लिए योग्यताओं एवं क्षमताओं की उपयोगिता को आंकने के लिए किया जाता है। 
  • ऐसा मूल्यांकन सामान्यतः निकटस्थ अधिकारी के द्वारा किया जाता है 
  • ऐसे मूल्यांकन से प्राप्त निष्कर्षो/सूचनाओं का उपयोग कार्मिकों से सम्बन्धितविभिन्न विषयों यथा चयन, प्रशिक्षण, स्थानान्तरण, पदोन्नति, पदावनति, वेतन, निर्धारण आदि के सम्बन्ध में नीति निर्धारण में किया जाता है।

योग्यता अंकन क्यों?

(1)     योग्यता अंकन वेतन दरों और मजदूरी सीमाओं के भीतर पारिश्रमिक वृद्धि के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रस्तुत करता है।
(2)     योग्यता अंकन स्थानान्तरण एवं जबरी छुट्टियों के लिए एक आधार प्रस्तुत करता है। (3) यह कर्मचारी मन्त्रणा का आधार है।
(4)     यह कर्मचारियों को दिये जाने वाले लाभांश के अनुपात का निर्धारण करता है। 
(5)     यह कार्मिक कार्यक्रमों जैसे कार्मिक जांच के मूल्यांकन का आधार है
(6)     यह कर्मचारियों को छिपी हुई विशिष्ट योग्यताओं एवं गुणों का पता लगाता है।
(7)     यह कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और कार्य पर लगाने आदि के प्रभावों की जाँच करता है।
(8)     जब कर्मचारियों को गलत कार्य पर लगा दिया जाता है तो योग्यता अंकन उसे सही कार्य पर लगाने के लिए एक आधार प्रस्तुत करता है। 
(9)     योग्यता अंकन व्यक्तियों के विकास के लिए आवश्यक भावनाओं या इच्छाओं को विकसित करता है।
(10)     यह कर्मचारियों को अपने स्वतः विकास के लिए जहाँ एक ओर मार्ग प्रशस्त करता है वहाँ दूसरी ओर सहायता भी प्रदान करता है।


OR

योग्यता अंकन का अर्थ

योग्यता अंकन का मतलब कर्मचारी के मूल्यांकन से है, यानी उनके कार्य से संबंधित विभिन्न योग्यताओं और क्षमताओं का पता लगाना। इसमें कर्मचारी की व्यक्तिगत क्षमताओं, विशेषताओं और गुणों का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन किया जाता है। इसका उद्देश्य कर्मचारी द्वारा संगठन को प्रदान की जाने वाली सेवाओं की उपयोगिता को समझना है।

योग्यता अंकन की आवश्यकता 

योग्यता अंकन की आवश्यकता विभिन्न कारणों से होती है और यह संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यहाँ कुछ मुख्य कारण दिए जा रहे हैं:

1. कार्यकर्ताओं के कौशल और योग्यताओं का मूल्यांकन

योग्यता अंकन के माध्यम से संगठन के कार्यकर्ताओं के कौशल, योग्यताएं, और प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाता है। यह मानव संसाधन प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है ताकि संगठन को यह जानने में मदद मिले कि किस कार्यकर्ता के पास कौन-कौन से कौशल और योग्यताएं हैं। इससे संगठन के लिए सही लोगों का चयन करना संभव होता है और स्थानांतरण, पदोन्नति, और विकास के लिए सही नीतियां तैयार की जा सकती हैं।

2. कार्मिक कार्यक्रमों की योजना और प्रबंधन

योग्यता अंकन से यह पता लगता है कि कौन-कौन से कर्मिक कार्यक्रमों की योजना बनाई जानी चाहिए और उन्हें कैसे प्रबंधित किया जाना चाहिए। यह उन कार्मिक कार्यक्रमों के मूल्यांकन का भी माध्यम बनता है जो संगठन की विभिन्न नीतियों और लक्ष्यों के साथ संगठित होते हैं, जैसे कि प्रशिक्षण, पदोन्नति, और प्रगति कार्यक्रम।

3. कार्मिक प्रबंधन और निर्धारण

योग्यता अंकन से यह स्पष्ट होता है कि कौन-कौन से कार्मिक प्रबंधन के निर्धारण होंगे। यह निर्धारित करने में मदद करता है कि किस कार्यकर्ता को किस पद पर लगाया जाए, उनका वेतन कैसे निर्धारित किया जाए, और किस प्रकार की प्रोत्साहना और सहायता प्रदान की जाए। यह निर्धारण करने में मदद करता है कि कौन से कार्मिक उपक्रम कैसे प्रबंधित किए जाएं जैसे कि स्थानांतरण, वेतन निर्धारण आदि।

4. कार्मिक संबंधों के प्रबंधन में मदद

योग्यता अंकन संगठन के कार्मिक संबंधों के प्रबंधन में भी मदद करता है। यह निश्चित करता है कि किस कर्मचारी को किस प्रकार की संबंधित जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, उनके साथ योग्य संबंध बनाए रखने के लिए क्या कार्यवाही की जानी चाहिए और किस प्रकार के संबंध उनके लिए उपलब्ध किए जाएं।

5. कार्मिक प्रदर्शन की गुणवत्ता और सुधार

योग्यता अंकन कर्मचारियों के कार्य प्रदर्शन की गुणवत्ता को मापने और समझने में मदद करता है। इसके माध्यम से संगठन उन कार्मचारियों को पहचान सकता है जिन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है और जिन्हें सम्मानित किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि कार्मचारी अपनी क्षमताओं और कौशलों को सुधारते रहें और संगठन के उत्कृष्टता को बढ़ावा देने में मदद करता है।

इस प्रकार, योग्यता अंकन संगठन के स्वास्थ्य और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और संगठन के लिए सही व्यक्तियों का चयन और उनके विकास में मदद करता है।


        3.    प्रशिक्षण एवं विकास में क्या संबंध है? बताइए।


    मानव संसाधन प्रबंधन में प्रशिक्षण और विकास दोनों ही महत्वपूर्ण अंग होते हैं और इनका संबंध एक अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया में देखा जाता है। ये दोनों एक साथ कार्य करते हैं ताकि कर्मचारियों की योग्यता, कौशल, और प्रदर्शन में सुधार किया जा सके और संगठन को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में मदद मिल सके।

    प्रशिक्षण (Training)
    • क्षमता विकास: प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य होता है कर्मचारियों की क्षमताओं को विकसित करना। यह उन्हें नए ज्ञान, कौशल, और तकनीकी जानकारी से परिचित कराता है जो उनके कार्यक्षमता को सुधारती हैं।
    • संगठन के लिए योगदान: प्रशिक्षण संगठन को उन कौशलों और ज्ञान के साथ युक्त करता है जो कर्मचारियों को संगठन के लक्ष्यों और मिशन के लिए अधिक उपयुक्त बनाते हैं।
    • प्रदर्शन में सुधार: अच्छे प्रशिक्षण से कर्मचारी का प्रदर्शन सुधारता है, जिससे उनकी कार्य प्रवृत्ति, गुणवत्ता, और उत्पादकता में सुधार होती है।
    • मनोबल में सुधार: अच्छे प्रशिक्षण से कर्मचारी का मनोबल भी बढ़ता है और उन्हें उनके कौशलों के प्रति आत्म-विश्वास मिलता है। इससे वे अपने कार्य में अधिक सकारात्मक और प्रभावशाली रहते हैं।
    विकास (Development)
    • पेशेवर विकास: विकास का उद्देश्य होता है कर्मचारियों को उनके पेशेवर जीवन में आगे बढ़ने के लिए तैयार करना। यह उन्हें नए रोल और जिम्मेदारियों के लिए तैयार करता है और उनकी करियर प्रगति को समर्थन प्रदान करता है।
    • लीडरशिप विकास: विकास कार्यक्रम लीडरशिप कौशलों को विकसित करने में मदद करते हैं ताकि कर्मचारी नेतृत्व भूमिकाओं में अधिक सक्षम हो सकें।
    • करियर प्रोग्रेश: विकास कार्यक्रम के माध्यम से कर्मचारियों का करियर प्रगति में मार्गदर्शन किया जाता है। यह उन्हें नए और अधिक उत्कृष्ट स्तर तक पहुंचने में मदद करता है।
    • संगठनात्मक संवाद: विकास कार्यक्रम कर्मचारियों के बीच संगठनात्मक संवाद बढ़ाते हैं और संगठन की सांस्कृतिक और सामाजिक माहौल को सुधारते हैं।
    संबंध
    प्रशिक्षण और विकास दोनों ही प्रक्रियाओं का लक्ष्य यही होता है कि कर्मचारी संगठन के लिए अधिक उपयुक्त, सक्रिय, और प्रभावी बने। जब तक कर्मचारियों को नए योग्यताओं और पेशेवर क्षमताओं का प्रदान किया जाएगा और उनकी व्यक्तिगत विकास को समर्थन मिलेगा, तब तक संगठन का सफलता और स्थिरता सुनिश्चित होती है। इसलिए, प्रशिक्षण और विकास संबंधित होते हैं और उन्हें संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।




        4.    अभिप्रेरणा क्या है? किसी उद्योग के कर्मचाारियों के लिए यह क्यों आवश्यक है।

    ‘अभिप्रेरण‘ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘मोटिवेशन‘ ¼Motivation½ शब्द का हिन्दी रूपान्तर है, जो लेटिन भाषा के ‘मूवियर‘¼Movere½ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘गतिशील होना‘ ¼To Move½ है। इस प्रकार, शाब्दिक दृष्टिकोण से अभिप्रेरित करने  का अर्थ गतिशील बनाना, अर्थात् सक्रिय करना है। अतः, अभिप्रेरण से तात्पर्य किसी व्यक्ति की इच्छा एवं तत्परता को जाग्रत करने से है जो उसे कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है। हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता होती है, परन्तु कार्य करने की क्षमता तथा कार्य करने की इच्छा दो अलग-अलग तत्व हैं। कोई व्यक्ति कितना ही योग्य, अनुभवी एवं क्षमतावान क्यों न हो, यदि उसमें कार्य करने की इच्छा एवं तत्परता नहीं है तो इन सभी तत्वों का कोई महत्व नहीं होता है। अतः आवश्यकता इस बात की होती है कि उस व्यक्ति की क्षमता के अनुसार उसमें कार्य करने की इच्छा एवं तत्परता को जाग्रत किया जाये। इस प्रकार, किसी व्यक्ति की कार्य करने की इच्छा एवं तत्परता को जाग्रत करने हेतु उसे प्रेरित करना पड़ता है, जिसे अभिप्रेरण कहा जाता है। संक्षेप में, अभिप्रेरण एक ऐसी शक्ति है जो व्यक्तियों में प्रयासों को जाग्रत करती है तथा निश्चित लक्ष्यों की ओर उन प्रयासों को संचालित करती है।

    अभिप्रेरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो किसी शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक कमी या आवश्यकता के साथ प्रारम्भ होती है, जो कि व्यवहार अथवा चालक को उत्तेजित करती है तथा जो किसी लक्ष्य अथवा प्रेरक के लिए प्रयत्न करती है। इस प्रकार, अभिप्रेरण की प्रक्रिया आवश्यकताओं, चालकों तथा प्रेरकों के बीच सम्बन्धों पर आश्रित होती है। अतः इन अवधारणाओं को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है, जो इस प्रकार हैंः-

    आवश्यकतायें, किसी अभाव अथवा कमी को कहते है। जब कोई शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक असन्तुलन हो जाता है तो व्यक्ति की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है। चालक से तात्पर्य दिशा सहित कमी से है ये कार्य अभिमुखी होते हैं तथा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एक धक्का अथवा प्रहार प्रदान करते हैं। प्रेरक, वह आन्तरिक उद्दीपक है जो व्यक्ति को कोई क्रिया करने के लिए प्रोत्साहित करता है। 

    अभिप्रेरण को विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से पारिभाषित किया है। इसकी कुछ प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित प्रकार से है:-

    1.जे. एल. ग्रे एवं एफ. ए. स्टार्क के अनुसार,‘‘अभिप्रेरण एक व्यक्ति की आन्तरिक अथवा बाहृय प्रक्रियाओं व परिणाम होता है, जो कि एक निश्चित कार्यावधि के लिए कार्य करने हेतु उसके उत्साह एवं लगन को उत्तेजित करता है।” 

    2.फ्रेड लुथान्स के अनुसार,‘‘अभिप्रेरण एक प्रक्रिया है, जो किसी शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक कमी या आवश्यकता के साथ प्रारम्भ होती है,जो व्यवहार अथवा एक चालक को उत्तेजित करती है तथा जो किसी लक्ष्य अथवाप्रेरक के लिए प्रयत्न करती है।‘‘ 



        5.    अभिप्रेरणा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।

    अभिप्रेरणा के सिद्धांतों का वर्णन

    अभिप्रेरणा (Motivation) वह प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित होते हैं। यह कार्य को करने की दिशा और दृढ़ता को प्रभावित करती है। विभिन्न विद्वानों ने अभिप्रेरणा को समझने और उसे बढ़ाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इन्हें परम्परागत और आधुनिक सिद्धांतों में विभाजित किया जा सकता है।

    I. परम्परागत सिद्धान्त

    1. भय एवं दण्ड सिद्धान्त (Theory of Fear and Punishment):

      • यह सिद्धांत मानता है कि व्यक्ति को भय और दण्ड के माध्यम से प्रेरित किया जा सकता है। यह सिद्धांत प्रबंधकों द्वारा कर्मचारियों को अनुशासन में रखने और कार्य को समय पर पूरा कराने के लिए उपयोग किया जाता है।
      • उदाहरण: किसी कंपनी में समय पर काम पूरा न करने वाले कर्मचारियों को वेतन कटौती या नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।
    2. पुरस्कार सिद्धान्त (Theory of Reward):

      • इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को पुरस्कार देकर प्रेरित किया जा सकता है। जब व्यक्ति को अच्छे कार्य के लिए पुरस्कार मिलता है, तो वे अधिक मेहनत और उत्साह से कार्य करते हैं।
      • उदाहरण: किसी कंपनी में उच्च प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को बोनस और प्रमोशन देकर प्रोत्साहित किया जाता है।
    3. कैरेट एवं स्टिक सिद्धान्त (Carrot and Stick Theory):

      • इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को प्रेरित करने के लिए पुरस्कार (कैरेट) और दण्ड (स्टिक) दोनों का उपयोग किया जाता है। यह सिद्धांत मानता है कि व्यक्ति को सही दिशा में रखने के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की प्रेरणा की आवश्यकता होती है।
      • उदाहरण: एक प्रबंधक अपने कर्मचारियों को अच्छे प्रदर्शन पर बोनस देने का वादा करता है और खराब प्रदर्शन पर दण्ड देने की धमकी भी देता है।

    II. आधुनिक सिद्धान्त

    (अ) सन्तुष्टि सिद्धान्त (Content Theories)

    1. मैस्लो का आवश्यकता की क्रमबद्धता का सिद्धान्त (Maslow's Hierarchy of Needs Theory):

      • अब्राहम मैस्लो के अनुसार, मानव आवश्यकताएँ एक क्रमबद्ध पिरामिड में व्यवस्थित होती हैं। सबसे निचले स्तर पर भौतिक आवश्यकताएँ होती हैं और सबसे उच्च स्तर पर आत्म-साक्षात्कार की आवश्यकता होती है। एक स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद ही व्यक्ति अगले स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित होता है।
      • उदाहरण: एक कर्मचारी सबसे पहले अपनी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे वेतन और सुरक्षा की पूर्ति चाहता है। जब ये आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं, तो वह उच्च स्तर की आवश्यकताओं जैसे मान्यता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रेरित होता है।
    2. हर्जवर्ग का द्वि घटक सिद्धान्त (Herzberg's Two-Factor Theory):

      • फ्रेडरिक हर्जवर्ग के अनुसार, कार्यस्थल पर संतुष्टि और असंतोष के दो अलग-अलग सेट होते हैं: प्रेरक कारक (Motivators) और स्वच्छता कारक (Hygiene Factors)। प्रेरक कारक, जैसे कि उपलब्धि, पहचान, और कार्य की प्रकृति, कर्मचारियों को संतुष्टि और प्रेरणा प्रदान करते हैं। वहीं, स्वच्छता कारक, जैसे कि वेतन, कार्य की स्थिति, और कंपनी की नीतियाँ, असंतोष को रोकते हैं लेकिन स्वयं में प्रेरणा प्रदान नहीं करते।
      • उदाहरण: एक कर्मचारी को प्रमोशन और नई जिम्मेदारियाँ मिलने से प्रेरणा मिलती है (प्रेरक कारक), लेकिन अगर कार्यालय की स्थिति खराब है तो उसे असंतोष हो सकता है (स्वच्छता कारक)।
    3. एल्डरफर का ई. आर. जी. सिद्धान्त (Alderfer's ERG Theory):

      • क्लेटन एल्डरफर ने मैस्लो के सिद्धांत को संशोधित करके ERG सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसमें तीन मुख्य आवश्यकताएँ होती हैं: अस्तित्व (Existence), संबंध (Relatedness), और विकास (Growth)। इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित होता है और ये आवश्यकताएँ एक ही समय में पूरी हो सकती हैं।
      • उदाहरण: एक कर्मचारी एक ही समय में वेतन, संबंध, और कैरियर विकास की आवश्यकता महसूस कर सकता है।
    4. मैक्लीलैण्ड का तीन आवश्यकता सिद्धान्त (McClelland's Three Needs Theory):

      • डेविड मैक्लीलैण्ड के अनुसार, तीन प्रमुख आवश्यकताएँ होती हैं: उपलब्धि (Need for Achievement), संबद्धता (Need for Affiliation), और शक्ति (Need for Power)। व्यक्ति इनमें से किसी एक या अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित होता है।
      • उदाहरण: एक प्रबंधक को अपने पद पर बने रहने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है, जबकि एक टीम सदस्य को समूह में अपने संबंधों को बनाए रखने के लिए संबद्धता की आवश्यकता होती है।
    5. मैकग्रेगर का एक्स-बाई सिद्धान्त (McGregor's Theory X and Theory Y):

      • डगलस मैकग्रेगर ने दो अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए: थ्योरी एक्स और थ्योरी वाई। थ्योरी एक्स के अनुसार, लोग स्वाभाविक रूप से कार्य नहीं करना चाहते और उन्हें कार्य करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। थ्योरी वाई के अनुसार, लोग स्वाभाविक रूप से कार्य करना चाहते हैं और उन्हें आत्म-नियंत्रण और आत्म-निर्देशन की अनुमति देनी चाहिए।
      • उदाहरण: एक प्रबंधक जो थ्योरी एक्स को मानता है, वह अपने कर्मचारियों को नियंत्रित करने और निगरानी करने के लिए सख्त नीतियाँ लागू करेगा। जबकि थ्योरी वाई को मानने वाला प्रबंधक अपने कर्मचारियों को स्वतंत्रता और स्वायत्तता देगा।

    (ब) प्रक्रिया सिद्धान्त (Process Theories)

    1. वूम का प्रत्याशा सिद्धान्त (Vroom's Expectancy Theory):

      • विक्टर वूम के अनुसार, व्यक्ति यह समझकर प्रेरित होता है कि उसके प्रयास से उसे अच्छा परिणाम मिलेगा और वह परिणाम उसे वांछित इनाम प्रदान करेगा। इस सिद्धांत में तीन मुख्य घटक होते हैं: अपेक्षा (Expectancy), साधन (Instrumentality), और महत्व (Valence)।
      • उदाहरण: एक कर्मचारी यह सोचता है कि अगर वह अधिक मेहनत करेगा, तो उसे प्रमोशन मिलेगा और प्रमोशन से उसे अधिक वेतन और सम्मान मिलेगा।
    2. एडम्स का समानता सिद्धान्त (Adams' Equity Theory):

      • जॉन स्टेसी एडम्स के अनुसार, लोग अपने योगदान और इनाम की तुलना अपने सहकर्मियों के साथ करते हैं। अगर वे इसे समान पाते हैं, तो वे संतुष्ट होते हैं, अन्यथा वे असंतोष महसूस करते हैं।
      • उदाहरण: एक कर्मचारी यह महसूस करता है कि उसे उसी कार्य के लिए उतना ही वेतन मिलना चाहिए जितना उसके सहकर्मी को मिलता है।

    (स) प्रबलीकरण सिद्धान्त (Reinforcement Theory)

    1. व्यवहार संशोधन सिद्धान्त (Behavior Modification Theory):
      • यह सिद्धांत बी.एफ. स्किनर द्वारा प्रतिपादित किया गया था और यह मानता है कि व्यवहार को सकारात्मक और नकारात्मक प्रबलकों के माध्यम से संशोधित किया जा सकता है। सकारात्मक प्रबलक (Positive Reinforcement) का मतलब अच्छे व्यवहार के लिए पुरस्कार देना है और नकारात्मक प्रबलक (Negative Reinforcement) का मतलब बुरे व्यवहार के लिए दण्ड देना है।
      • उदाहरण: एक कंपनी अपने कर्मचारियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए बोनस देती है और खराब प्रदर्शन के लिए वेतन कटौती करती है।

    (द) अन्य सिद्धान्त (Other Theories)

    1. मानवीय सम्बन्ध सिद्धान्त (Human Relations Theory):

      • यह सिद्धांत मानता है कि कर्मचारियों के बीच अच्छे मानवीय संबंध, संचार, और सहयोग से संगठन में उत्पादकता बढ़ती है।
      • उदाहरण: एक प्रबंधक अपने कर्मचारियों के साथ नियमित रूप से बैठकें आयोजित करता है और उनकी समस्याओं का समाधान करता है।
    2. भागीदारी सिद्धान्त (Participation Theory):

      • इस सिद्धांत के अनुसार, कर्मचारियों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने से उनकी संतुष्टि और उत्पादकता बढ़ती है।
      • उदाहरण: एक कंपनी अपने कर्मचारियों को नए प्रोजेक्ट्स की योजना बनाने में शामिल करती है और उनकी राय लेती है।

    निष्कर्ष

    अभिप्रेरणा के विभिन्न सिद्धांत यह समझाने का प्रयास करते हैं कि व्यक्ति को किस प्रकार से प्रेरित किया जा सकता है। परम्परागत सिद्धांत भय और दण्ड, पुरस्कार, और कैरेट एवं स्टिक के माध्यम से प्रेरणा की बात करते हैं, जबकि आधुनिक सिद्धांत संतुष्टि, प्रक्रिया, प्रबलीकरण, और अन्य सिद्धांतों के माध्यम से प्रेरणा की गहरी समझ प्रदान करते हैं। इन सिद्धांतों के अध्ययन से संगठनों को अपने कर्मचारियों को बेहतर ढंग से प्रेरित करने की रणनीतियाँ विकसित करने में मदद मिलती है।



    UNIT - 4


        1.    संगठनात्मक संघर्ष का क्या अर्थ है, इसके क्या कारण हैं?


    औद्योगिक संघर्ष से आशय

    औद्योगिक संघर्ष से तात्पर्य उपक्रमों में उत्पन्न होने वाले ऐसे विवादों या मतभेदों से है जो धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक संघर्ष का रूप धारण कर लेते हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(ज्ञ) के अनुसार ‘औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय सेवायोजकों एवं सेवायोजकों के मध्य या सेवायोजको एवं श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों के मध्य उत्पन्न किसी विवाद या मतभेद से है जोकिसी भी व्यक्ति के रोजगार या रोजगार की भर्ती या कार्य की दशाओं से सम्बन्धित है।’’डेल योडर ने औद्योगिक विवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है कि’’औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय कर्मचारियों के ऐसे व्यवहार से है जो कार्य के प्रति विद्यमान असन्तोष को व्यक्त करता है तथा यह एक ऐसी भावना है जो रोजगार सम्बन्धी व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं तथा कर्मचारियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहें हैं।

    इस प्रकार हम कह कि औद्योगिक संघर्ष से आशय श्रमिकों एवं के मध्य उत्पन्न ऐसा असन्तोष या मतभेद है जिससे दोनों पक्षों द्वारा परस्पर विरोधी भावनायें रखी जाती है। इसमें हड़ताल, तालाबन्दी, घेेराव, धीरे काम करो आदि बातों को सम्मिलित किया जाता है।

    औद्योगिक संघों के प्रभाव अथवा दुष्परिणाम एवं सुपरिणाम
    औद्योगिक संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम हड्ताल तथा तालाबन्दी होता है। हड़ताल एवं तालाबन्दी से उत्पादक श्रमिक तथा राष्ट्र सभी वर्गों को हानि होती है, जैसा कि निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होता है-

    (A) उत्पादकों को हानि

    (1) उत्पादकों की यात्रा में कमी-जब किसी उद्योग में हड़ताल या तालाबन्दी हो जाती है तो उत्पाद कार्य में रुकावट आती है, जिससे उत्पादन की मात्रा में कमी आ जाती है, और राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय का स्तर गिर जाता है।

    (2) अनुशासनहीनता-हड़तालग्रस्त उद्योग में अनुशासन व्यवस्था समाप्त हो जाती है। हड़ताल द्वारा उत्पन्न अनिश्चित वातावरण में अनैतिकता को प्रोत्साहन मिलता है।

    (3) सहायक खचों की कमी-औद्योगिक संघर्षों के कारण उत्पादन को एक ओर तो सम्भावित लाभ से वंचित रहना पड़ता है और दूसरी ओर सहायक खर्चे, जैसे- कारखाने का किराया, पूँजी का ब्याज, उच्च पद पर कार्य करने वाले कर्मचारियों का वेतन आदि भी देना पड़ता है।

    (4) श्रम व पूँजी के मध्य घृणा-हड़ताल के कारण सेवायोजक श्रमिक को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं जिससे श्रम व पूँजी के बीच की खाई और भी अधिक गहरी हो जाती है।

    (B) श्रमिकों के लिए हानि

    (1) मजदूरों की कमी- श्रमिकों को हड़ताल अथवा तालाबन्दी की अवधि में मजदूरी नहीं दी जाती है, जिससे उनकी मजदूरी में कमी आ जाती है।

    (2) स्वास्थ्य पर कुप्रभाव- श्रमिकों को मजदूरी के अभाव में भरपेट खुराक नहीं मिल पाती है, जिससे उनके स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता पर कुभाव पड़ता है। 

    (3) हड़ताल की असफलता के भयानक परिणाम-जब कभी की हाल कल हो जाती है, तो उन्हें इसके भयानक परिणाम भुगतने होते हैं। सेवायोजक अधिक मनमानी करने लगते हैं।

    (C) समाज व राष्ट्र के लिए हानि

    (1)सामाजिक अव्यवस्था-हड़ताली व तालाबन्दियों के परिणामस्वरूप सामाजिक दूषित होता है और समाज में अनिश्चितता तथा असुरक्षा की भावना का उदय हो हो जाता है।

    (2) जनसाधारण के लिए संकट-जब कभी जनोपयोगी सेवा जैसे, रेल, डाक, तार, पानी, बिजली आदि संस्थाओं में हड़ताल अथवा तालाबन्दी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इससे जनसाधारण को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ये जीवन की अनावश्यक सेवायें हैं, इनके बिना मनुष्य का जीवन सामान्य गति से नहीं चल सकता।

    औद्योगिक संघर्षो के सुपरिणाम

    औद्योगिक संघर्षो के उपर्युक्त दुष्परिणामों के अतिरिक्त कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आते हैं, जैसे औद्योगिक संघर्षों के श्रमिकों में पारस्परिक सहयोग एवं एकता को भावना का विकास होता है, श्रमिकों को आवश्यक मजदूरी, बोनस व अन्य सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं, उनकी कार्य सम्बन्धी दशाओं में सुधार हो जाता है, आदि।





        2.    औद्योगिक शन्ति की आवश्यकताएं एवं उपायों को बताइए।

    औद्योगिक शान्ति की स्थापना के लिए उपाय-

    औद्योगिक विवाद अधिनियम में औद्योगिक शान्ति की स्थापना के लिए निम्न व्यवस्था है-

    (1)     कार्य समितियाँ- प्रत्येक कारखाने में जिसमें 100 या इससे अधिक श्रमिक काम करते हैं, कार्य समिति की स्थापना होनी चाहिए जिनमें श्रमिकों के प्रतिनिधियों की संख्या नियोक्ताओं के प्रतिनिधियों की संख्या से कम नहीं होनी चाहिए। इन समितियों द्वारा उद्योगपति एवं श्रमिकों को अपने मतभेद दूर करने में सहायता मिलती है तथा उनमें पारस्परिक सद्भावना का विकास होता है।

    (2)     समझौता अधिकारी- विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा समझौता अधिकारी नियुक्त किये गये हैं। जहाँ स्थायी व्यवस्था नहीं है, वहाँ समय-समय पर किसी संघर्ष के लिए या किसी उद्योग विशेष के लिए ऐसे अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं, जो दोनों पक्षों में मतभेद दूर कराने एवं समझौता कराने का प्रयत्न करते हैं। 

    (3)     समझौता बोर्ड- सरकार आवश्यकता पड़ने पर समझौता बोर्ड की नियुक्ति कर सकती है। इसमें एक निष्पक्ष अध्यक्ष के अतिरिक्त दोनों पक्षों की ओर से एक, एक या अधिक सदस्य हो सकते हैं, बोर्ड दोनों पक्षों में समझौता कराने का प्रयत्न करता है तथा साधारणतः दो महीने के अन्दर सरकार को अपनी रिपोर्ट दे देता है। 

    (4)    जाँच न्यायालय-राज्य सरकार किसी विवाद को किसी जाँच न्यायालय के सुपुर्द कर सकती है। इसके लिए एक या एक से अधिक व्यक्ति नियुक्त किये जा सकते हैं। यदि इनमेंएक से अधिक सदस्य हैं तो उनमें से एक का अध्यक्ष होना आवश्यक है। जांच न्यायालय कोसामान्यतः 6 महीने के अन्दर अपनी रिपोर्ट सरकार को देनी होती है। 

    (5)     श्रम न्यायालय-यह न्यायालय यथाशीघ्र अपनी कार्यवाही को पूरा करके अपना निर्णय सरकार को देता है। किसी संघर्ष सम्बन्धित किसी वैधानिक पहलू पर विचार करने यास्थिति से अवगत होने के लिए राज्य सरकार इस प्रकार के श्रम न्यायालय नियुक्त कर सकती है।

    (6)     औद्योगिक न्यायालय- अनिवार्य रूप से संघर्ष निपटाने के लिए सरकार एक न्यायालय भी नियुक्त कर सकती है, जिसमें एक या दो उच्च न्यायालय या जिला के जज होंगे। इस न्यायालय की नियुक्ति तब होती है जब समझौता बोर्ड संघर्ष निपटाने असफल हो जाता है। इस न्यायालय का निर्णय दोनों पक्षों को मान्य होता है। 

    (7)    समझौता तथा निर्णय अवधि में हड़ताल करना या मिल में ताला लगाना वर्जित कर दिया गया। 

    (8)    लोक-हित सेवा वाले उद्योगों में हड़ताल घोषित करने से पूर्व 6 सप्ताह की सूचना अनिवार्य कर दिया।

    (9)    अवैध हड़तालों में सम्मिलित होने वालों तथा आर्थिक सहायता देने वालों के लिए की दण्ड की व्यवस्था कर दी गयी है। 

    श्रम न्यायालय- यह न्यायालय श्रमिकों को काम पर से अलग करने या हटाने, हड़ताल या तालाबन्दी होने तथा श्रमिकों की काम करने की दशाओं आदि के झगड़ों को तय करेगा।

    औद्योगिक न्याय सभा- इस न्याय सभा में निम्नलिखित झगड़े सुलझाये जायेंगे-
    ¼i½ 100 से अधिक श्रमिकों को प्रभावित करने वाले झगड़े।
    ¼ii½ मजदूरी सम्बन्धी झगड़े। 
    ¼iii½ क्षतिपूर्ति तथा अन्य भत्ते सम्बन्धी झगड़े ।
    ¼iv½ बोनस तथा प्राविडेण्ट फण्ड सम्बन्धी झगड़े 
    ¼v½ मजदूरों की छटनी सम्बन्धी झगड़े।
    ¼vi½ अनुशासन एवं विवेकीकरण सम्बन्धी झगड़े।

    राष्ट्रीय न्यायालय-यह न्यायलय भी राष्ट्रीय महत्व के झगड़ों निर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी।

    औद्योगिक संघर्षो को रोकने सम्बन्धी उपाय- औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न ही न हो इस सम्बन्ध में निम्न प्रयास किये गये हैं-

    (1)     अनुशासन संहिता-भारतीय श्रम सम्मेलन 1957 में एक अनुशासन संहिता सम्बन्धी प्रस्ताव पारित किया गया जिसका उद्देश्य यह था कि श्रमिक और नियोक्ता पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा अपनी समस्याओं एवं मतभेदों का समाधान करेंगे।

    (2)     संयुक्त प्रबन्ध परिषदें-श्रमिकों को प्रबन्ध में भाग देने की योजना लागू करने के सन्दर्भ में अनेक औद्योगिक उपक्रमों में संयुक्त प्रबन्ध परिषदों की स्थापना की गयी। 

    (3)    संयुक्त विचार-विमर्श-पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा एक-दूसरे पक्ष की स्थिति और कठिनाई समझने तथा आपसी द्वेष एवं सन्देह को समाप्त करने के लिए संयुक्त विचार-विमर्शकी प्रथा प्रारम्भ की गयी। राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के बोर्ड की स्थापना सन् 1952 में ‘‘Joint Consultative Board of Industry and Labour‘‘ के नाम से की गयी। 

    (4)     मजदूरी मण्डल-औद्योगिक संघर्षो का महत्वपूर्ण कारण मजदूरी व भत्ते की समस्या है। अतः सन् 1957 के भारतीय श्रम सम्मेलन में देश के प्रमुख उद्योगों में मजदूरी मण्डलों की स्थापना का निश्चय किया गया। देश के प्रमुख उद्योगों में मजदूरी मण्डल स्थापित किये जा चुके हैं। 

    (5)     ऐच्छिक मध्यस्थता-ऐच्छिक मध्यस्थता द्वारा औद्योगिक संघर्षो को निपटाने की भी व्यवस्था की गयी विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय पंच निर्णय प्रोत्साहन मण्डल एवं मध्यस्थता प्रोत्साहन मण्डलों की स्थापनायें हुई।

    6)     जवरी छुट्टी और छटनी पर प्रतिबन्ध- सरकार ने 1947 के नियमों में जबरी छुट्टी एवं छटनी के लिए सन 1976 में संशोधन करके इस पर आवश्यक प्रतिबन्ध लगाया है। अब किसी भी उपक्रम में जिसमें 300 या अधिक श्रमिक कार्य कर रहे हो उसमें बगैर 3 माह पूर्व अनुमति लिए जबरी छुट्टी या छटनी या मिल बन्द नहीं हो सकेगी।

    (7)     औद्योगिक विभ्रान्ति प्रस्ताव-नवम्बर, 1962 में नियोजक एवं श्रमिकों द्वारा एक संयुक्त बैठक में औद्योगिक विभ्रान्ति का प्रस्ताव किया गया। इस प्रस्ताव में उत्पादन कार्य में विघ्न न डालने, उत्पादन को अधिकतम करने, प्रतिरक्षा प्रयासों को प्रोत्साहित करने का संकल्प किया गया।

    (8)     आवश्यक सेवा अध्यादेश, 1981- जुलाई सन् 1981 में केन्द्रीय सरकार ने सेवाओं में हड़तालों पर रोक लगाने, गैर-कानूनी हड़ताल करने अथवा ऐसी हड़ताल करने के लिए भड़काने वाले व्यक्तियों को दण्ड देने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से एक अध्यादेश पास करके उसे अधिनियम का रूप दे दिया गया है। इस अधिनियम के माध्यम से सरकार आवश्यक सेवाओं पर प्रतिबन्ध लगा सकती है। 
    ‘औद्योगिक विवादों से आशय एवं परिभाषा- प्रमुख औद्योगिक विवादों से आशय उद्योगों में उत्पन्न होने वाले उन मतभेदों से है जो कि धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक विवाद का रूप धारण कर लेते हैं जिससे औद्योगिक शान्ति समाप्तहोने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। भारतीय औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अनुसार नियोजक एवं नियोज के बीच नियोजक एवं श्रमिकों के बीच नियोजन की शर्तों काम करने की दशाओं और बेरोजगारी सम्बन्धित किसी विवाद अथवा मतभेद को औद्योगिक विवाद कहते हैं। औद्योगिक विवाद प्रायः चार रूपों में प्रकट होते हैं (प) श्रमिक हड़ताल कर दें और काम पर ना आयें। (पप) श्रमिक प्रियोक्ता अथवा प्रबन्धकों का घेराव करें। (पपप) श्रमिक धीरे-धीरे काम करने की नीति अपनायें एवं (पअ) नियोक्ता मिल में ताला डाल दें और श्रमिकों को काम पर आने से रोक दें।


    OR

    औद्योगिक शांति की आवश्यकताएं एवं उपाय

    औद्योगिक शांति से तात्पर्य उन स्थितियों से है जहाँ श्रमिकों और प्रबंधन के बीच संघर्ष और विवाद नहीं होते हैं, और दोनों पक्षों के बीच सहयोग और समन्वय बना रहता है। औद्योगिक शांति का महत्व इसलिए है क्योंकि यह उत्पादन, उत्पादकता, और श्रमिकों के कल्याण को बढ़ावा देती है।

    औद्योगिक शांति की आवश्यकताएं

    1. प्रभावी संवाद और संचार:

      • प्रबंधन और श्रमिकों के बीच नियमित संवाद स्थापित करना।
      • समस्याओं और मुद्दों को स्पष्ट और खुलकर चर्चा करना।
    2. न्यायपूर्ण वेतन और भत्ते:

      • श्रमिकों को उनके कार्य के अनुरूप उचित वेतन और भत्ते प्रदान करना।
      • वेतन संरचना में पारदर्शिता बनाए रखना।
    3. बेहतर कार्य परिस्थितियां:

      • सुरक्षित और स्वस्थ कार्यस्थल सुनिश्चित करना।
      • उचित उपकरण और संसाधनों की उपलब्धता।
    4. श्रमिकों की भागीदारी:

      • प्रबंधन के निर्णयों में श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा देना।
      • श्रमिक संगठनों और यूनियनों के साथ सहयोग।
    5. प्रशिक्षण और विकास:

      • श्रमिकों को नियमित प्रशिक्षण और विकास के अवसर प्रदान करना।
      • कौशल उन्नयन और कैरियर विकास पर ध्यान देना।
    6. न्याय और निष्पक्षता:

      • सभी श्रमिकों के साथ न्याय और निष्पक्षता का पालन करना।
      • विवादों के निपटारे के लिए निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करना।
    7. अच्छे श्रम-संवाद संबंध:

      • श्रमिक संघों और प्रबंधन के बीच अच्छे संबंध बनाए रखना।
      • श्रमिकों की शिकायतों को समय पर और प्रभावी तरीके से हल करना।

    औद्योगिक शांति के उपाय

    1. संयोजन और मध्यस्थता:

      • संयोजन और मध्यस्थता के माध्यम से विवादों का समाधान करना।
      • तटस्थ मध्यस्थ की नियुक्ति।
    2. संयुक्त परामर्श:

      • श्रमिकों और प्रबंधन के बीच नियमित संयुक्त परामर्श बैठकें आयोजित करना।
      • मुद्दों पर सामूहिक चर्चा और समाधान निकालना।
    3. श्रमिक कल्याण योजनाएं:

      • श्रमिकों के कल्याण के लिए योजनाएं और कार्यक्रम लागू करना।
      • स्वास्थ्य, सुरक्षा, और शिक्षा की सुविधा प्रदान करना।
    4. शिकायत निवारण प्रणाली:

      • प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करना।
      • श्रमिकों की शिकायतों को त्वरित और प्रभावी तरीके से निपटाना।
    5. श्रमिक संघों की मान्यता:

      • श्रमिक संघों की मान्यता और सहयोग को प्रोत्साहित करना।
      • संघों के साथ नियमित संवाद और सहयोग।
    6. उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही:

      • अनुशासनात्मक कार्यवाही में न्याय और निष्पक्षता का पालन करना।
      • अनुशासनात्मक कार्रवाईयों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नीतियाँ।
    7. सामाजिक सुरक्षा:

      • श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं लागू करना।
      • श्रमिकों को पेंशन, बीमा, और अन्य सुरक्षा प्रदान करना।

    निष्कर्ष

    औद्योगिक शांति बनाए रखने के लिए श्रमिकों और प्रबंधन दोनों पक्षों के बीच सहयोग, संवाद, और समन्वय आवश्यक है। उचित वेतन, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ, श्रमिकों की भागीदारी, और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से औद्योगिक शांति को सुनिश्चित किया जा सकता है। साथ ही, विवादों को संयोजन, मध्यस्थता, और संयुक्त परामर्श के माध्यम से प्रभावी ढंग से निपटाना आवश्यक है। इन उपायों को अपनाकर उद्योगों में उत्पादकता, कार्य संतोष, और समग्र आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है।






        3.     औद्योगिक संघर्ष से आप क्या समझते हैं? इसके दुष्परिणाम लिखिए।


    औद्योगिक संघर्ष से आशय

    औद्योगिक संघर्ष से तात्पर्य उपक्रमों में उत्पन्न होने वाले ऐसे विवादों या मतभेदों से है जो धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक संघर्ष का रूप धारण कर लेते हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(ज्ञ) के अनुसार ‘औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय सेवायोजकों एवं सेवायोजकों के मध्य या सेवायोजको एवं श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों के मध्य उत्पन्न किसी विवाद या मतभेद से है जोकिसी भी व्यक्ति के रोजगार या रोजगार की भर्ती या कार्य की दशाओं से सम्बन्धित है।’’डेल योडर ने औद्योगिक विवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है कि’’औद्योगिक विवाद या संघर्ष से आशय कर्मचारियों के ऐसे व्यवहार से है जो कार्य के प्रति विद्यमान असन्तोष को व्यक्त करता है तथा यह एक ऐसी भावना है जो रोजगार सम्बन्धी व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं तथा कर्मचारियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहें हैं।

    इस प्रकार हम कह कि औद्योगिक संघर्ष से आशय श्रमिकों एवं के मध्य उत्पन्न ऐसा असन्तोष या मतभेद है जिससे दोनों पक्षों द्वारा परस्पर विरोधी भावनायें रखी जाती है। इसमें हड़ताल, तालाबन्दी, घेेराव, धीरे काम करो आदि बातों को सम्मिलित किया जाता है।

    औद्योगिक संघों के प्रभाव अथवा दुष्परिणाम एवं सुपरिणाम
    औद्योगिक संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम हड्ताल तथा तालाबन्दी होता है। हड़ताल एवं तालाबन्दी से उत्पादक श्रमिक तथा राष्ट्र सभी वर्गों को हानि होती है, जैसा कि निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होता है-


    औद्योगिक विवादों के दुष्परिणाम

    हड़ताल व तालाबन्दी का देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रो. पीगू के अनुसार, ‘‘इन झगड़ों के फलस्वरूप देश की पूंजी व श्रम शक्ति बेकार पड़ी रहती है जिससे उत्पादन की मात्रा, राष्ट्रीय आय तथा सामाजिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।‘‘ औद्योगिक विवादों के दुष्परिणाम निम्नलिखित है-

    1.     श्रमिकों पर प्रभाव- श्रम संघर्ष से सबसे अधिक हानि श्रमिकों को होती है। उन्हें हड़ताल या तालाबन्दी के समय की मजदूरी नहीं मिलती। हड़ताल समाप्त होने के बाद मिल मालिक श्रमिकों को परेशान करते हैं और उन पर अनेक प्रकार के दोष लगाकर उन्हें निकालने का प्रयत्न करते हैं।

    2.     उद्योगपतियों को हानि- औद्योगिक झगड़ों के समय उद्योग में लगी पूंजी बेकार पड़ी रहती है तथा उत्पादन बन्द रहता है किन्तु पूंजी से समाज व कर्मचारियों का वेतन तो देना ही पड़ता है अतः उद्योगपतियों को हानि होती है।

    3.     उपभोक्ताओं को हानि- औद्योगिक झगड़ों के समय कारखाने बन्द हो जाते हैं तथा उत्पादन घट जाता है। इस कारण बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है जिससे उपभोक्ताओंको ऊंचे मूल्य चुकाने पड़ते हैं।

    4.     उत्पादन में कमी- औद्योगिक झगड़ों के समय कारखाना बन्द हो जाने से उत्पादन कम हो जाता है जिसका राष्ट्रीय आय व प्रति व्यक्ति आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

    5.     अन्य प्रभाव- 

    (i) हड़तालग्रस्त उद्योगों में अनुशासन व्यवस्था समाप्त हो जाती है, 

    (ii) समाज में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है,

    ¼iii) सरकार की आय घट जाती है

    (iv) रेल, डाक, संचार, बिजली से सम्बन्धित संस्थाओं में हड़ताल जनता के लिए बड़ी कष्टदायी होती है।



        4.    हड़ताल एवं तालाबंदी को समझाइए।


    हड़ताल और तालाबंदी की समझ

    हड़ताल और तालाबंदी दो महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं, जो श्रम और प्रबंधन के बीच उत्पन्न विवादों को प्रदर्शित करती हैं। ये दोनों ही औद्योगिक संघर्ष के प्रमुख रूप हैं।

    हड़ताल (Strike)

    हड़ताल से तात्पर्य श्रमिकों द्वारा काम को रोकने के लिए सामूहिक रूप से उठाए गए कदमों से है। यह श्रमिकों द्वारा नियोजकों के खिलाफ एक विरोध प्रकट करने का तरीका है, जो विभिन्न कारणों से हो सकता है, जैसे वेतन बढ़ोतरी, कार्य की स्थितियों में सुधार, नौकरी की सुरक्षा आदि।

    हड़ताल के प्रमुख कारण:

    1. मजदूरी और भत्ते: श्रमिकों की वेतन वृद्धि और भत्तों में सुधार की मांग।
    2. कार्य की स्थिति: बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और सुरक्षित कार्यस्थलों की मांग।
    3. कार्य के घंटे: कार्य के घंटों को घटाने या नियमित करने की मांग।
    4. नौकरी की सुरक्षा: नौकरी की सुरक्षा और स्थायित्व की मांग।
    5. प्रबंधन नीतियां: प्रबंधन की नीतियों और प्रक्रियाओं में सुधार की मांग।

    हड़ताल के प्रकार:

    1. सामान्य हड़ताल: सभी श्रमिक सामूहिक रूप से कार्य बंद कर देते हैं।
    2. प्रतीकात्मक हड़ताल: एक निर्धारित समय के लिए हड़ताल की जाती है।
    3. रोलिंग हड़ताल: विभिन्न विभागों में बारी-बारी से हड़ताल की जाती है।
    4. धमकी हड़ताल: श्रमिक केवल धमकी देकर ही अपने हितों की रक्षा करने की कोशिश करते हैं।

    तालाबंदी (Lockout)

    तालाबंदी से तात्पर्य नियोजक द्वारा औद्योगिक प्रतिष्ठान को बंद करने के लिए उठाए गए कदमों से है। यह आमतौर पर श्रमिकों के विरोध या हड़ताल के जवाब में किया जाता है। तालाबंदी का उद्देश्य श्रमिकों पर दबाव डालना और उन्हें अपनी मांगों को छोड़ने के लिए मजबूर करना होता है।

    तालाबंदी के प्रमुख कारण:

    1. श्रमिकों की अनुशासनहीनता: श्रमिकों के अनुशासनहीन व्यवहार का विरोध।
    2. हड़ताल का जवाब: श्रमिकों की हड़ताल का जवाब।
    3. प्रबंधन के आदेशों का पालन न करना: श्रमिकों द्वारा प्रबंधन के आदेशों का पालन न करने पर।
    4. आर्थिक दबाव: आर्थिक कठिनाइयों के कारण उद्योग को बंद करने की मजबूरी।

    तालाबंदी के प्रकार:

    1. संपूर्ण तालाबंदी: पूरे उद्योग या प्रतिष्ठान को बंद कर दिया जाता है।
    2. आंशिक तालाबंदी: उद्योग के कुछ हिस्सों को बंद कर दिया जाता है।

    हड़ताल और तालाबंदी का प्रभाव

    1. उत्पादन में हानि: हड़ताल और तालाबंदी से उत्पादन में भारी हानि होती है।
    2. आर्थिक हानि: श्रमिकों और उद्योग दोनों को आर्थिक हानि होती है।
    3. समाज पर प्रभाव: समाज और समुदाय पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
    4. श्रमिकों और प्रबंधन के संबंध: श्रमिकों और प्रबंधन के बीच तनाव और मतभेद बढ़ते हैं।

    निष्कर्ष

    हड़ताल और तालाबंदी औद्योगिक विवादों के प्रमुख रूप हैं और ये दोनों ही श्रमिक और प्रबंधन के बीच उत्पन्न तनाव और विवादों को प्रदर्शित करती हैं। इनका समाधान संवाद, मध्यस्थता और सामूहिक विचार-विमर्श के माध्यम से किया जाना चाहिए ताकि औद्योगिक शांति और उत्पादन में निरंतरता बनी रहे।

    *-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*


    UNIT - 5

        1.    मानवीय संबंधों का अर्थ बतराते हुए मानवीय संबंधों के उद्देश्य लिखिए।

    उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध विचारधारा का शुभारम्भ मुख्यतया सन् 1940 के आसपास माना जाता है। सन् 1941 में रोथलिसवर्जर और डिक्सन ने एल्टन मेयो तथा उनके सहयोगियों द्वारा किये गये प्रयोगों को प्रकाशित किया। सन् 1913 में शिकागो विश्वविद्यालय में ‘उद्योगों में मानव सम्बन्ध समिति का गठन किया गया। इस समिति के गठन का उद्देश्य मानवीय सम्बन्धों पर शोध करना और इसके लिए शोधकर्ताओं को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करना था। इसके बाद समय-समय पर मानवीय सम्बन्धों पर अनेक शोध कार्य एवं पुस्तकें लिखी गई। इनमें बलेगार्डनर द्वारा लिखित ‘उद्योगों में मानव सम्बन्ध एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मानवीय सम्बन्ध विचारधारा का विकास अनेक देशों में तीव्र गति से होने लगा। 

    इसके विकास के लिए निम्न कारण मुख्य रूप से उत्तरदायी रहे है-

    (1) औद्योगीकरण के कारण वृहत स्तर पर उत्पादन किये जाने के कारण और उत्पादन विधियों में जटिलताएं, कठिनाइयाँ एवं पेचीदगियाँ उत्पन्न होने के कारण मानवीय सम्बन्ध विचारधारा का विकास हुआ।
    (2) उत्पादन विधियों में जटिलताओं के कारण तकनीकी श्रम की कमी ने श्रमिकों के साथ मानवता का व्यवहार किये जाने पर बल दिया। फलतः मानवीय सम्बन्ध विचारधारा का विकास हुआ।
    (3) औद्योगिक विकास के साथ-साथ श्रम लागतों में भी आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। इस वृद्धि को रोकने के लिए और श्रम लागतों में कमी लाने के लिए मानवीय सम्बन्ध विचारधारा का आश्रय लिया गया।
    (4) औद्योगिक क्षेत्र में नवीन प्रवृत्तियों के उत्पन्न होने के कारण मानवीय सम्बन्ध विचारधारा को सर्मथन मिला। व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व और भागीदारी प्रबन्ध विचारधाराओं ने तो मानो मानवीय सम्बन्ध विचारधारा के विकास में ‘आग में घी‘ के समान कार्य किया है।

    मानवीय सम्बन्ध का अर्थ एवं परिभाषाएँ-श्री मेकग्रेगर ने ठीक ही लिखा है कि प्रत्येक प्रबन्धकीय निर्णय अथवा कार्यवाही के पीछे मानवीय प्रकृति और आचरण के सम्बन्ध में मान्यताएं है। तकनीकी भाषा में मानवीय सम्बन्धों का अर्थ संगठन के उद्देश्यों और कर्मचारियों के हितों में एकीकरण करना है सामान्यतः उद्योग में कर्मचारियों के साथ मानवता का व्यवहार करना, उनकी योग्यता का विकास करना, कार्य के प्रति उनकी इच्छा जाग्रत करना, प्रबन्ध और कर्मचारियों के मध्य समन्वय स्थापित करके उत्पादकता में वृद्धि करना एवं लक्ष्यों की प्राप्ति करना ही मानवीय सम्बन्ध है।

    मानवीय सम्बन्ध विचारधारा एक व्यापक विचारधारा है जिसे कई तरह से प्रस्तुत किया गया है। मानवीय सम्बन्ध के बारे में कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार है-

    (1) प्रबन्ध शब्दकोष के अनुसार, ‘‘उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध से आशय उस शब्द से है जिसका प्रयोग वर्तमान समय में औद्योगिक व्यक्ति के आचरण को स्पष्टकरने वाले व्यवस्थित एवं विकासशील ज्ञानपुञ्ज के लिए किया जाता है।‘‘ 

    (2) कीथ डेविस के अनुसार, प्रबन्ध व्यवहार के क्षेत्र में मानवीय सम्बन्ध व्यक्तियों का कार्य के साथ समन्वय है, जो उन्हें उत्पादकीय ढंग से, सहकारिता से आर्थिक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सन्तुष्टि से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है। 

    (3) मी. जोन एफ. के अनुसार,मानवीय सम्बन्ध एक साधन है। जिसके द्वारा दोनों कर्मचारी और कम्पनी उच्च मनोबल के माध्यम से अधिक उत्पादन करनेके लिए पारस्परिक सहयोग करते हैं, जो कि आखिर समस्त व्यवसाय और उद्योगों का आर्थिक उद्देश्य है।

     (4)स्कॉट के अनुसार, प्रबन्ध,मानवीय सम्बन्ध का प्रयोग व्यवसाय में मानवीय सन्तुष्टि और मानवीय संघर्ष की असुलझी हुई समस्याओं के समाधान के लिए करता है।‘‘

    मानवीय सम्बन्धों का महत्त्व

    1. निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए
    2. श्रम शक्ति के सदुपयोग एवं उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए 
    3. मानवीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए 
    4. मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए
    5. मनोबल बढ़ाने के लिए:
    6. न्यूनतम लागत पर अधिक उत्पादन के लिए
    7. प्रबन्ध कार्यों को प्रभावी ढंग से सम्पन्न करने के लिए 
    8. सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए 
    9. श्रम संघों का विकास 

    मानवीय सम्बन्धों का दर्शन-श्री अर्ल बंटिंग‘ ने मानवीय सम्बन्धों के दर्शन को निम्न प्रकार से व्यक्त किया है-

    (1)उद्योग व्यक्तियों के लिए है, न कि व्यक्ति उद्योग के लिए उद्योग में मानव का महत्त्वपूर्ण स्थान है, संगठन या संस्था का नहीं।

    (2) प्रत्येक उपक्रम को, अपनी क्रियाओं में मानव की एक कर्मचारी के रूप में, एक स्कन्धारी के रूप में, एक उपभोक्ता के रूप में और समाज के एक       सदस्य के रूप में सामाजिक भावनात्मक एवं आर्थिक आवश्यकताओं का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। 

    (3)कम्पनी को सुद्ध सेविवर्गीय नीतियों एवं पद्धतियों से कर्मचारियों के अधिकारों, हितों एवं कल्याण आदि की सुरक्षा एवं विकास होना चाहिए।

    (4) उपक्रम एवं कर्मचारियों के मध्य अच्छे सम्बन्धों की स्थापना करना एक आधारभूत आवश्यकता है, चाहे उपक्रम में श्रम संघ हो अथवा नहीं। सरकार, श्रम संगठनों एवं प्रबन्धकों की औद्योगिक सम्बन्धों के क्षेत्र में नीतियों एवं क्रियाओं का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे आधारभूत सम्बन्धों को विकसित करती है अथवा नहीं।

    (5)एक कर्मचारी का उसकी इकाई में हित तथा उसकी एक श्रम संघ की सदस्यता की स्वीकृति के मध्य कोई आधारभूत असंगति या परस्पर विरोध नहीं है। कर्मचारी को अपनी संस्था के प्रति सदैव कर्तव्य निष्ठ होना चाहिए।

    (6)संस्था में कर्मचारी का सहयोग प्राप्त किया जाना चाहिए। यह सहयोग दबाव के आधार पर नहीं, अपितु स्वेच्छा से प्राप्त किया जाना चाहिए।

    (7)सेवानियोजकों को जहाँ तक उनके नियंत्रण में है, कर्मचारियों के हित में कार्य करना चाहिए और कर्मचारियों को अधिकतम आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना चाहिए।

    (8) प्रत्येक कर्मचारी उसकी प्रतिष्ठा, अधिकार, विकास की सम्भावनाओं, आर्थिक कल्याण आदि के सन्दर्भ में अपरिहार्य रूप से संस्था की सफलता के साथ जुड़ा होता है। 

    (9) प्रबन्धकों को या श्रमिकों की ऐसी कोई भी नीति जो कर्मचारियों के अधिकारों को समाप्त करती है और स्वतन्त्रता का हनन करती है, एक स्वतन्त्र समुदाय में अधिक समय तक सफल नहीं हो सकती है।

    (10) एक स्वतन्त्र समाज का यह नैतिक दायित्व है कि वह व्यक्तियों (कर्मचारियों) के अधिकारों एवं छूटों की रक्षा करें तथा इस बात का ध्यान रखे कि राष्ट्रीय नीति में इस सिद्धान्त का प्रभावकारी रूप में पालन किया जाय।



        2.    मानवीय संबंधों की विचारधारा पर निबंध लिखिए।

    मानवीय संबंधों की विचारधारा

    मानवीय संबंधों की विचारधारा एक ऐसी महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो व्यक्ति और समूहों के बीच सकारात्मक, स्वस्थ और सहयोगपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देती है। यह विचारधारा केवल व्यक्तिगत विकास और सामाजिक सामंजस्य के लिए नहीं, बल्कि संगठनात्मक सफलता और सामूहिक उत्पादकता के लिए भी अनिवार्य है। मानवीय संबंधों की विचारधारा का उद्भव 20वीं सदी के प्रारंभ में हुआ, जब मैनेजमेंट और प्रशासनिक सिद्धांतों में मानव तत्व पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा।

    मानवीय संबंधों की परिभाषा

    मानवीय संबंधों से तात्पर्य उन सभी गतिविधियों, प्रक्रियाओं और तकनीकों से है, जो व्यक्ति और समूहों के बीच बेहतर संवाद, सहयोग, और समझ को बढ़ावा देने के लिए उपयोग की जाती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत और संगठनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण का निर्माण करना है।

    मानवीय संबंधों का महत्व

    मानवीय संबंधों की विचारधारा का महत्व कई दृष्टिकोणों से है:

    1. उत्पादकता और कार्यक्षमता: अच्छे मानवीय संबंध कार्यक्षमता और उत्पादकता में वृद्धि करते हैं। जब कर्मचारी एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं और एक सकारात्मक कार्य वातावरण में काम करते हैं, तो उनका कार्य नैतिकता और प्रेरणा बढ़ती है।

    2. संतोष और समर्पण: जब कर्मचारियों को संगठन में सम्मान और सहयोग मिलता है, तो वे अधिक संतुष्ट और समर्पित होते हैं। इससे संगठन की स्थिरता और सफलता में वृद्धि होती है।

    3. संघर्ष और समस्याओं का समाधान: अच्छे मानवीय संबंधों के माध्यम से संगठनात्मक संघर्षों और समस्याओं का समाधान अधिक सुगमता और प्रभावशीलता से किया जा सकता है। संवाद और समझौता प्रक्रिया के माध्यम से विवादों को हल किया जा सकता है।

    4. मनोबल और आत्मविश्वास: सकारात्मक मानवीय संबंध कर्मचारियों के मनोबल और आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं। इससे वे अपने कार्यों में अधिक आत्म-विश्वासी और उत्साही होते हैं।

    मानवीय संबंधों की विचारधारा के सिद्धांत

    मानवीय संबंधों की विचारधारा के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

    1. सम्मान और आदर: प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान और आदर देना चाहिए। इससे उनकी आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास में वृद्धि होती है।

    2. सकारात्मक संवाद: संवाद को खुला, सकारात्मक और प्रोत्साहित करने वाला होना चाहिए। इससे पारस्परिक समझ और सहयोग बढ़ता है।

    3. सहयोग और सहयोगात्मक कार्य: कार्यस्थल पर सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे समूह की उत्पादकता और कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

    4. प्रशंसा और मान्यता: कर्मचारियों की उपलब्धियों और प्रयासों की प्रशंसा और मान्यता देना चाहिए। इससे उनका मनोबल बढ़ता है और वे अपने कार्यों में अधिक समर्पित होते हैं।

    मानवीय संबंधों की विचारधारा का व्यावहारिक अनुप्रयोग

    मानवीय संबंधों की विचारधारा का व्यावहारिक अनुप्रयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है, जैसे:

    1. शिक्षा क्षेत्र: शिक्षकों और छात्रों के बीच अच्छे संबंध सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाते हैं। इससे छात्रों की शैक्षणिक उपलब्धि में वृद्धि होती है।

    2. स्वास्थ्य क्षेत्र: डॉक्टरों और मरीजों के बीच अच्छे संबंध चिकित्सा उपचार को अधिक प्रभावी और संतोषजनक बनाते हैं।

    3. व्यवसाय और उद्योग: कर्मचारियों और प्रबंधकों के बीच सकारात्मक संबंध संगठन की सफलता और स्थिरता में योगदान करते हैं।

    निष्कर्ष

    मानवीय संबंधों की विचारधारा केवल व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह संगठनात्मक और व्यवसायिक सफलता के लिए भी अनिवार्य है। अच्छे मानवीय संबंध कार्यस्थल पर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं, जिससे कर्मचारियों की उत्पादकता, संतोष और समर्पण में वृद्धि होती है। इसके अलावा, यह संगठनात्मक समस्याओं और संघर्षों के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार, मानवीय संबंधों की विचारधारा का पालन करके संगठन और समाज दोनों की समृद्धि और विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।


        3.    उद्योगों में मानव अधिकारों की आवश्यकता है या नहीं? अपने उत्तर को तर्कपूर्णं    रूप से प्रतुत करें।

    उद्योगों में मानव अधिकारों की आवश्यकता

    उद्योगों में मानव अधिकारों की आवश्यकता न केवल नैतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यावसायिक सफलता और स्थिरता के लिए भी अनिवार्य है। मानव अधिकारों की अवधारणा प्रत्येक व्यक्ति के गरिमा, सम्मान और मूलभूत स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करती है। उद्योगों में इन अधिकारों का पालन करने से न केवल कर्मचारियों की भलाई होती है, बल्कि यह संगठन की उत्पादकता, प्रतिष्ठा और दीर्घकालिक सफलता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    तर्क:

    1. नैतिक और कानूनी दायित्व: प्रत्येक उद्योग का नैतिक और कानूनी दायित्व होता है कि वह अपने कर्मचारियों के मानव अधिकारों का सम्मान करे। यह सुनिश्चित करना कि कोई भी कर्मचारी शोषण, भेदभाव, या अन्याय का शिकार न हो, न केवल एक नैतिक जिम्मेदारी है, बल्कि यह कई देशों के कानूनों और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार भी अनिवार्य है।

    2. उत्पादकता और कार्यक्षमता: जब कर्मचारियों के मानव अधिकारों का सम्मान किया जाता है, तो वे अधिक संतुष्ट, प्रेरित और कार्यक्षम होते हैं। एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल उन्हें अपनी पूर्ण क्षमता के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे संगठन की उत्पादकता में वृद्धि होती है।

    3. प्रतिष्ठा और ब्रांड मूल्य: एक उद्योग जो मानव अधिकारों का सम्मान करता है, वह समाज में एक सकारात्मक प्रतिष्ठा और विश्वास प्राप्त करता है। उपभोक्ता, निवेशक, और अन्य हितधारक ऐसे संगठनों के साथ जुड़ने में अधिक रुचि रखते हैं जो नैतिक और सामाजिक रूप से जिम्मेदार होते हैं। इससे ब्रांड मूल्य और बाजार प्रतिस्पर्धा में वृद्धि होती है।

    4. कर्मचारी प्रतिधारण और आकर्षण: जब संगठन अपने कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान करता है, तो कर्मचारियों का संगठन के प्रति विश्वास और निष्ठा बढ़ती है। इससे कर्मचारियों की नौकरी छोड़ने की दर कम होती है और संगठन उच्च गुणवत्ता वाले प्रतिभाओं को आकर्षित करने में सक्षम होता है।

    5. विवाद और संघर्ष का निवारण: मानव अधिकारों का सम्मान करने से उद्योगों में विवाद और संघर्ष की संभावना कम होती है। यह एक सकारात्मक कार्य वातावरण का निर्माण करता है, जहां समस्याओं और मतभेदों को शांतिपूर्ण और न्यायसंगत तरीके से सुलझाया जा सकता है।

    6. सतत विकास और सामाजिक जिम्मेदारी: मानव अधिकारों का सम्मान उद्योगों के सतत विकास और सामाजिक जिम्मेदारी को सुनिश्चित करता है। यह संगठन की दीर्घकालिक स्थिरता और विकास के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

    निष्कर्ष:

    उद्योगों में मानव अधिकारों की आवश्यकता न केवल नैतिक और कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यावसायिक सफलता, उत्पादकता, प्रतिष्ठा और सतत विकास के लिए भी अनिवार्य है। मानव अधिकारों का सम्मान करके उद्योग अपने कर्मचारियों की भलाई सुनिश्चित कर सकते हैं, जिससे संगठनात्मक लाभ और समाज में सकारात्मक बदलाव दोनों को प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार, मानव अधिकारों का पालन प्रत्येक उद्योग के लिए अनिवार्य और लाभकारी है।


        4.    सामूहिक समझौते की प्रक्रिया को समझााइए।

    सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया: सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया प्रणाली जटिल होते हुए भी दिलचस्प होती है। इसके कई रूप स्तर हो सकते हैं। कुछ आधारभूत बातें सामूहिक सादेवाजी की सभी प्रक्रियाओं में पायी जाती है। सामूहिक सौदेबाजी के विभिन्न पहलू चरण निम्नलिखित हैंः

    1.     बार्ता से पूर्व का चरण-सामूहिक सौदेबाजी प्रबन्ध की भाँति एक कला है, विज्ञान नहीं। सामूहिक सौदेबाजी को एक अभिनय बताया गया है, जिसमें दोनों पक्षकार एक दूसरे की शक्ति का परीक्षण करते हैं, छल-कपट करते हैं और आदान-प्रदान के माध्यम से समझने में सम्मिलित हो जाते हैं। वार्ता से पूर्व का पहलू कुछ आवश्यक बातों की ओर संकेत करता है। उदाहरण के लिये प्रबन्ध को चाहिये कि वह कर्मचारी संघों या संघ के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ले कि संघ या संघों की शक्ति कितनी है, इसके पीछे समर्थन तथा सहयोग कितना है और यदि समझौता न हो सके तो क्या यह संग हड़ताल आदि की कार्यवाही करवाने में सफल हो सकेगा अथवा नहीं। इस प्रकार कर्मचारी संघ या संघों को भी चाहिये कि ये प्रबन्ध के सम्बन्ध में समस्त आवश्यक जानकारी तथा उनकी बातों अर्थात मदों पर, जिनको कि तय किया जाना है, के सम्बन्ध में समस्त आवश्यक आंकड़े तथ्य एवं प्रमाण एकत्रित कर लें, जिससे कि उनकी सहायता से अपने पक्ष को मजबूत किया जा सके। प्रवन्ध एवं कर्मचारी संघ को चाहिए कि ये दोनों ही उन समझौतों या राय की प्रतियाँ भी प्राप्त कर में जो कि अन्य संगठनों या संघों के साथ किये थे। संक्षेप में, वार्ता से पूर्व की स्थिति तैयार की स्थिति है। बातों के लिये पूर्ण तैयारी ही इस पहलू की विषय सामग्री है

    2.     वार्ताकारों का चयन -वार्ताकारों का चयन सामूहिक सौदेबाजी की सफलता के लिए बहुत सावधानी से किया जाना चाहिये। वार्ताकारों का चयन सेवानियोजकों या प्रबन्धकों की ओर से तथा कर्मचारी संघों की ओर से किया जाता है। बार्ताकारों का चयन करते समय इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वार्ताकार कार्य की दशाओं से, श्रम प्रबन्ध सम्बन्धों से एवं अन्य आवश्यक बातों से पूर्णतया परिचित है और इस योग्य हो कि ये वार्ता को सफल बनाकर किसी समझौते पर सहमत हो सकेंगे। प्रबन्ध की ओर से ऐसे वार्ताकारों में विभागीय अध्यक्ष, मानव संसाधन प्रबन्धक, कोई संचालक, मुख्य या उप अधिशासी या कोई कानूनी सलाहकार हो सकता। 

    3.     सौदेबाजी की चक्रव्यूह-सामूहिक सौदेबाजी के लिये की जाने वाली वार्ता का सत्र प्रबन्ध एवं कर्मचारियों दोनों के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। श्रम लागत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। श्रम प्रबन्ध समस्याओं के निपटारे के लिए प्रभावी उपायों की तीव्रता को अनुभव किया जा रहा है। सामूहिक सौदेबाजी एक ऐसी व्यवस्था है जो आदान-प्रदान अर्थात ले और दे के सिद्धान्त पर आश्रित है, जो कर्मचारियों को भी प्रबन्धक दायित्वों में हिस्सा बटाने के लिये प्रोत्साहित करती है। इसलिये प्रबन्ध एवं कर्मचारी संघ को चाहिए कि वे पहले से ही ऐसी नीतियाँ अवश्य निर्धारित कर लें जिनके अनुसार पारस्परिक उत्तरदायित्वों एवं अधिकारों का निर्धारण किया जाना है। प्रबंधन को चाहिए कि सभा कक्ष में प्रवेश करने से पहले मूलभूत योजनायें एवं नीतियाँ निर्धारित कर ले तथा आवश्यक अधिकार प्राप्त करले, जिससे कि समझौता करने में कोई कठिनाई न आये और संगठन द्वारा उसे आसानी से किया जा सके। 

    4.     सौदेबाजी की युक्तियाँ-सौदेबाजी की नीतियों का निर्धारण वार्ता कक्ष में प्रवेश करने से पूर्व ही कर लिया जाता है। किन्तु सौदेबाजी की युक्तियों का प्रयोग नीतियों के अनुसार वार्ता मेज पर किया जाता है। वास्तव में युक्तियाँ विशेष प्रकार की कार्यवाहियां होती हैं, जो कि वार्ता करते समय काम में ली जाती है। यद्यापि बहुत से विद्वानों का मत है कि सामूहिक सौदेबाजी में कर्म विषयकता होनी चाहिये, किन्तु व्यवहार में दोनों पक्ष युक्तियों का सहारा लेकर सामने वाले पक्ष को कम देकर अधिक लेना चाहते हैं। सामने वाले पक्षकार को भ्रमित करने हेतु सौदेबाजी की युक्तियाँ अपनाई जाती हैं। प्रबन्ध यह प्रयत्न करता है कि सम्पूर्ण अनुबन्ध को सामने रखकर वार्ता की जाय किन्तु कर्मचारी संघ सम्पूर्ण अनुबन्ध पर एक साथ नहीं अपितु अनुबन्ध के प्रत्येक वाक्य पर अलग-अलग रूप से वार्ता करने के इच्छुक होते हैं। अलग-अलग मद पर बातचीत हो जाने के पश्चात, अर्थात विश्लेषण के पश्चात लिये गये निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन तथा पुनर्निरीक्षण किया जाता है। ऐसा करने के बाद ही अगली मद पर विचार किया जाता है। प्रबन्धक चाहते हैं कि वार्ता सत्र जितना अधिक लम्बा हो उतना ही अच्छा है, किन्तु कर्मचारी संघ सम्पूर्ण सत्र या अत्यधिक विस्तृत सत्रों को प्राथमिकता नहीं देते हैं। 

    5.     अनुबन्ध- सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया अपने पाँचवे चरण में सामूहिक अनुबन्ध को जन्म देती है। यह अनुबन्ध आने वाले वर्ष या वर्षों के लिए श्रम प्रबन्ध सम्बन्धों की प्रकृति का औपचारिक बातों के रूप में निर्धारण करता है। सामान्यतया यह माना जाता है कि ऐसे अनुबन्धों और औसत समय दो या तीन वर्ष होता है, विश्लेषण भी किया जाता है। यह अनुबन्ध बहुत ही विस्तृत तौर पर बनाये जाते हैं। इसमें संघ की सुरक्षा परिवेदना, पद्धति, पदोन्नति, हस्तान्तरण, जबरी छुट्टी, मजदूरी दरें एवं श्रेणियाँ कार्य के घण्टे, छुट्टियों, प्रेरणा पद्धति, सुरक्षा एवं स्वास्थ्य प्रबन्धकीय दायित्व आदि सम्मिलित किये जाते हैं।

    6.     अनुबन्ध प्रवर्तन- सामूहिक सौदेबाजी का अन्तिम चरण सम्बन्धित पक्षकारों के मध्य हुए अनुबन्धों का प्रवर्तन कराना है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत में इन अनुबन्धों का प्रवर्तन करने के लिए इन प्रतिनिधियों ने समय-समय पर कई कदम उठाये हैं, जैसे-न्यायालय की शरण लेना, पुनः हड़तालें कराना आदि। इस प्रकार यह सामूहिक सौदेबाजी का अन्तिम चरण है।


        5.    मानवीय संबंधों की मान्यताएं एवं सिद्धांतों का वर्णन करें।

    मानवीय सम्बन्धों की मान्यतायें

    हेरोल्ड जे लेविट के अनुसार मानवीय सम्बन्धों की मान्यताओं को अग्र प्रकार से विभाजित किया जा सकता है-

    (A) परम्परागत मान्यतायें।
    (B) आधुनिक मान्यतायें।

    •  मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से।
    •  सामाजिक दृष्टिकोण से।
    •  सामाजिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से।

    (A) परम्परागत मान्यतायें:- मानवीय सम्बन्ध विचारधारा की परम्परागत मान्यतायें निम्न हैं-

    (1) कर्मचारियों की आवश्यकताएँ अनन्त होती हैं वे अपने कार्य से इन सभी की सन्तुष्टि नहीं कर पाते। वे तो केवल कुछ हद तक आर्थिक आवश्यकता ही सन्तुष्ट कर पाते हैं।

    (2) प्रत्येक उपक्रम में नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के हितों में पारस्परिक निर्भरता पायी जाती है अर्थात् दोनों के हितों में भिन्नता नहीं होती बल्कि एकता होती है। उपक्रम केउद्देश्य और कर्मचारियों के व्यक्तिगत उद्देश्य एक ही होते हैं। 

    (3) कर्मचारी अपने द्वारा किए गये कार्य के लिए अधिक से अधिक पारितोषण प्राप्त करना चाहते हैं।

    (B) आधुनिक मान्यतायें:-

    ¼i½ मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से:- मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानवीय सम्बन्ध की निम्न मान्यतायें हैं-

    (1)     मनुष्य अन्तःनिर्भर होता है। अतः उसके व्यक्तिगत व्यवहार को सामाजिक पृष्ठभूमिमें समझने का प्रयत्न करना चाहिए।
    (2)     मनुष्य कार्य हेतु विभिन्न प्रकार से अभिप्रेरित होता है।
    (3)     मनुष्य कई बार बिना सोचे-समझे कार्य करता है 
    (4)     सौहार्द्रपूर्ण मानवीय सम्बन्धों के लिए प्रबन्धकों को प्रशिक्षित किया जा सकता है।

    ¼ii½ सामाजिक दृष्टिकोण सेः- सामाजिक दृष्टिकोण से मानवीय सम्बन्धों की निम्न मान्यतायें हैं-

    (1)    कार्य पर सामाजिक वातावरण को केवल प्रबन्धक ही प्रभावित नहीं करते अपितु अनेक परिस्थितियाँ भी प्रभावित करती हैं।
    (2)    अनौपचारिक संगठन, औपचारिक संगठन से प्रभावित होता है और उसे प्रभावित भी करता है। 
    (3)    कार्य पर व्यक्तिगत और सामाजिक घटकों का प्रभाव पड़ता है क्योंकि कृत्य भूमिका कृत्य विवरण से अधिक पूर्ण होते हैं।

    ¼iii½ सामाजिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से:- मानवीय सम्बन्धों की सामाजिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से अग्र मान्यतायें हैं-

    (1)    निर्णयन प्रक्रिया में कर्मचारियों को सम्मिलित करने से कर्मचारी मनोबल एवं उत्पादकता दोनों पर धनात्मक प्रभाव पड़ता है। 
    (2)    प्रत्येक कर्मचारी संगठन के हित की दृष्टि से नहीं सोचता। संगठन के हित की ओर कर्मचारी का ध्यान आकर्षित करने के लिए उसे प्रेरित                करना पड़ता है।
    (3)    कर्मचारियों में समूह भावना का विकास किया जाता है। 
    (4)    प्रभावी सम्प्रेषण व्यवस्था द्वारा प्रत्येक व्यक्ति की मनोभावनाओं को समझा जासकता है। 

    मानवीय सम्बन्धों के सिद्धान्त:-अर्ज पी. स्ट्रांग ने सौहार्द्रपूर्ण मानवीय सम्बन्धों के निर्माण हेतुनिम्न निर्देशक सिद्धान्त बतलाये हैं-

    ¼i½       वैयक्तिक व्यवहार का सिद्धान्त।
    (ii)     सहभागिता एवं मान्यता का सिद्धान्त। 
    (iii)    दलीय कार्य एवं समूह प्रयत्नों का सिद्धान्त।
    (iv)    प्रजातान्त्रित वातावरण का सिद्धान्त।
    (v)      अभिप्रेरण का सिद्धान्त, एवं
    (vi)    अनुकूल अभिवृत्तियों का सिद्धान्त ।

    उपर्युक्त विवेचन के आधार पर मानवीय सम्बन्धों के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित 

    (1)   व्यक्तिगत भावनाओं का महत्त्व देने का सिद्धान्त।
    (2)   सही व्यक्ति को सही कार्य पर लगाने का सिद्धान्त।
    (3)   सहभागिता का सिद्धान्त।
    (4)   सामान्य हित का सिद्धान्त।
    (5)   कार्य मान्यता का सिद्धान्त 
    (6)   सम्प्रेषण का सिद्धान्त।
    (7)   पारस्परिक मान्यता सिद्धान्त।
    (8)   अभिप्रेरण का सिद्ध।
    (9)   समूह भावना को प्रोत्साहन का सिद्धांत।
    (10)  धनात्मक चिन्तन का सिद्धान्त।
    (11)  प्रजातान्त्रिक वातावरण का सिद्धान्त।

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