इकाई प्रथम
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इकाई द्वितीय
1. औद्योगिक विकास को परिभाषित करें।
‘‘औद्योगीकरण एक प्रक्रिया है। जिसके अन्तर्गत उत्पादन कार्य से सम्बन्धित अनेक परिवर्तन होते रहते है। इसके अन्तर्गत तीन मौलिक परिवर्तन आते है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यावसायिक साहस का यंत्रीकरण, नवीन उद्योगों की स्थापना, नए बाजार की खोज एव नए क्षेत्रों का शोषण होता है। संक्षेप में, औद्योगीकरण एक साधन है, जिसके द्वारा पूँजी का विस्तार एवं विकास किया जाता है।‘‘‘ इस प्रकार ‘‘औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसकी सहायता से नवीन उद्योगों की स्थापना की जातीहै और प्राचीन उद्योगों को विशाल पैमाने में परिवर्तित किया जाता है। इस परिवर्तन के लिए विशाल यंत्रों और मशीनों का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय प्रगति में वृद्धि करना होता है।‘‘
श्रम कल्याण से आशय
श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य उन क्रियाकलापों से होता है। जिनके द्वारा श्रमिकों का जीवन सुखमय हो जाता है और जिनमें श्रमिको की कार्यकुशलता में वृद्धि की जाती है। श्रम कल्याण, कार्य धारणा को विभिन्न अर्थो में प्रयुक्त किया जाता है। और देश कार्य तथा परिस्थितियों के अनुसारइसके महत्व में भी भिन्नता पायी जाती है। वस्तुतः श्रम कल्याण की धारणा उतनी लचीली है कि इसकी परिभाषा देना अत्यन्त कठिन कार्य है।
श्रम कल्याण का अर्थ एवं परिभासएँ :- शाही श्रम आयोग ने लिखा है श्रम कल्याण एक ऐसा शब्द है जो बहुत ही लचीला है। इसका अर्थ एक देश की तुलना में उसकी विभिन्न सामाजिक नीतियों औद्योगिकरण की स्थिति व श्रमिकों की शिक्षा सम्बंधी प्रगति के अनुसार भिन्न भिन्न लगाया जाता है। सर एड वर्ड पेटन के अनुसार श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य श्रम के सुख स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए उपलब्ध की जाने वाली दशाओं से है।
ई० टी० कैली के अनुसार श्रम कल्याण से तात्पर्य किसी प्रतिष्ठान द्वारा श्रमिको के व्यवहारों के लिए कुछ नियमो का अपनाया जाना है।
ई० एम० ग्राउण्ड के अनुसार:- श्रम कल्याण से ताप्पर्य विद्यमान औद्योगिक प्रणाली तथा अपनी फैक्ट्रियो रोजगार की दशाओ को उन्नत करने के लिए मालिको द्वारा किए गए ऐच्छिक प्रयत्नों से है।
एन0 एम0 जोशी के अनुसार श्रम कल्याण के अंतर्गत हम श्रमिको के लाभ के लिए मालिको द्वारा किए गए प्रयत्नो तथा कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कार्य करने की न्यूनतम दशाओं के आदर्श तथा दुर्घटना वृद्वावस्था बेकारी और बीमारी के लिए पास किए गए सामाजिक विधान को सम्मिलित कर सकतें हैं।
श्रम कल्याण कार्य के अंग
1 स्थान की दृष्टि से वर्गीकरण
- कारखाने के अन्दर कल्याणकार्य
- कारखाने के बाहर कल्याणकार्य
2. प्रबंध की दृष्टि से वर्गीकरण
- श्रम कल्याण कानून
- ऐच्छिक श्रम कल्याण
- पारस्परिक श्रम कल्याण
3. प्रदान करने वाले संगठन की दृष्टि से वर्गीकरण
- सेवायोजको द्वारा
- सरकार द्वारा
- मजदूर संघ द्वारा
- समाज की अन्य संस्थाओं द्वारा
औद्योगीकरण का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रभाव पड़ा है। इस प्रभाव को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है--
(1) नगरीय जनसंख्या में वृद्धि - औद्योगीकरण का सबसे अधिक प्रभाव जनसंख्या की गतिशीलतापर पड़ा है। इससे गतिशीलता के दो तरफा प्रभाव हुए -
- इससे ग्रामीण जनसंख्या में कमी आई है
- इसके साथ ही ग्रामीण जनसंख्या का नगरों की ओर स्थानान्तरण के कारण नगरीय जनसंख्यामें वृद्धि हुई है।
(2) कृषि का यन्त्रीकरण - औद्योगीकरण का दूसरा प्रभाव कृषि पर पड़ा है। औद्योगीकरण से पहले कृषि परम्परात्मक आधार पर होती थी और इसका मात्र उद्देश्य जीवन यापन करना था। औद्योगीकरण के कारण कृषि में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए है और आज इसका स्वरूप व्यावसायिक हो गया है।
(3) आवास समस्या - विशाल ग्रामीण जनसंख्या का नगरों की ओर स्थानान्तरण के कारण नगरोंमें मकान की समस्या ने भीषण रूप धारण कर लिया है। खासकर श्रमिकों के लिए मकानों की कमी के कारणगन्दी बस्तियों का भी विकास हुआ है।
(4) शासकीय संस्थाओं का विकास -औद्योगीकरण से पहले शासकीय संस्थाएँ इतनी मात्रा में नहीं थी, जितनी की आज है। नगरों में विशाल जनसंख्या आ जाने के कारण आवश्यकताओं में वृद्धि और व्यवसाय को स्थापित करने के लिए आज अनेक संस्थाओं का विकास हुआ है जैसे पुलिस, जेल, न्यायालय, श्रम कल्याण, मनोरंजन, शिक्षा और चिकित्सा से सम्बन्धित संस्थाएँ आदि।
(5) व्यावसायिक विविधता -व्यावसायिक विविधता की दृष्टि से यदि औद्योगीकरण की विवेचना करें तो स्पष्ट होता है कि आज विविध प्रकार के व्यवसायों का जन्म और विकास हुआ है और इसके साथ ही रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि हुई है।
(6) राजनैतिक जागरुकता -औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप विभिन्न भाषा, धर्म, जाति, सम्प्रदाय और क्षेत्र के व्यक्ति एक स्थान पर आकर काम करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उन सब में राजनैतिक जागरूकता का विकास होता है। इसके साथ ही औद्योगीकरण के कारण प्रजातंत्र के महत्व में भी वृद्धि हुई है।
(7) प्राथमिक समूहों का विघटन -औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप प्राथमिक समूह का विघटन और इसकी संख्या में कमी होती है। इसके विपरीत द्वितीयक समूहों की संख्या में वृद्धि होती है। औद्योगीकरणके कारण समाज में आज अनेक प्रकार के समूहों का जन्म और विकास हो गया है। इसके साथही आज प्राथमिक समूहों की तुलना में द्वितीयकसमूहों के महत्व में वृद्धि होती जा रही है।
(8) परिवारिक स्वरूप में परिवर्तन - औद्योगीकरण ने परिवार के स्वरूप को भी परिवर्तित करदिया है। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों के विघटन की प्रक्रिया प्रारम्भ है और साथ ही व्यक्तिगत परिवारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
(9) व्यक्तिवादी भावना- औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप समूहवाद की भावना समाप्त होती जा रही है और इसके साथ ही व्यक्तिवाद की भावना में वृद्धि होती जा रही है। यह व्यक्तिवाद की भावनापरिवार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय जीवन में भी देखी जा सकती है।
(10) स्वार्थवाद की भावना -व्यक्तिवाद की भावना के विकास के साथ ही परार्थवाद की भावना समाप्त होती जा रही है और साथ ही स्वार्थवाद की भावनाओं का विकास होता जा रहा है।
(11) संचार साधनों का विकास -औद्योगीकरण के कारण भारी मात्रा में एक स्थान पर माल का उत्पादन होता है, जितने माल का उपभोग एक स्थान में होना सम्भव नहीं है। इससे माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित करना पड़ता है। इसके लिए संचार और आवागमन के साधनों का विकास करना होता है।
(12) भौतिकवादी विचारधारा -औद्योगीकरण से भौतिक वस्तुओं का उत्पादन होता है। पैसेके महत्व में वृद्धि होती है और आवागमन तथा शिक्षा का प्रसार होता है। इसका परिणाम यह होता है किभौतिकवादी विचारधारा का जन्म और विकास होता है।
(13) वौद्धिक विकास - औद्योगीकरण से आवागमन और संचार के साधनों में वृद्धि के साथ ही शिक्षा का भी प्रचार और प्रसार होता है। इसका परिणाम यह होता है कि कूप मण्डुकता समाप्त होती है औरबौद्धिक विकास होता है।
(14) ग्रामीण उद्योगों का पतन -औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप विशाल उद्योगों की स्थापना हुई है। इनसे जो माल पैदा होता है, वह सस्ता पड़ता है। इसके साथ ही अच्छा भी होता है। इसका परिणाम यह होता है कि ग्रामीण उद्योगों का पतन होता है और नगरीय उद्योगो की संख्या में वृद्धि होती है।
(15) श्रम विभाजन - औद्योगीकरण की मौलिक विशेषता श्रम विभाजन है। आधुनिक उद्योगों मेंकाम करने के लिये प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण के कारण विशेषीकरणका जन्म होता है और विशेषीकरण के परिणामस्वरूप उद्योगों में श्रम विभाजन का जन्म होता है।
(16) प्रतिस्पर्धा - औद्योगीकरण ने प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है। इसका परिणाम यह होता है कि विशाल पैमाने पर उत्पादन होता है। उत्पादन और उपभोग में सन्तुलन स्थापित करने के लिये प्रतिस्पर्धा को आधार बनाया जाता है।
(17) श्रम संघों का जन्म - औद्योगीकरण के कारण बड़ी संख्या में श्रमिक एक स्थान पर कामकरते हैं। इससे उनमें जागरुकता का विकास होता है। वे अनेक समस्याओं से ग्रस्त होते हैं। इन समस्याओंसे निपटने के लिये श्रम संघों का निर्माण किया जाता है।
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इकाई तृतीया
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इकाई चतुर्थ
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इकाई पंचमी
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