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औद्योगिक संगठनों में समाज कार्य : अति लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर

इकाई प्रथम 


1.    आधुनिक श्रम विधानों के नाम लिखिए।

आधुनिक श्रम विधानों के नाम निम्नलिखित हैं:

1. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (The Industrial Relations Code, 2020)
2. वेतन संहिता, 2019 (The Code on Wages, 2019)
3. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (The Code on Social Security, 2020)
4. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 (The Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020)


2.    श्रम विधान के इतिहास में बताइए इनकी आवश्यकता क्यों हुयी?

भारत में श्रम सन्नियम- उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक भारतीय औद्योगिक श्रमिकों की दशा अत्यन्त दयनीय थी और हर प्रकार से उद्योगपतियों को दया पर निर्भर थे। उन्हें प्रातः से रात्रि तक पन्द्रह अथवा सोलह घण्टेलगातार काम करना होता था। नौकरी की सुरक्षा, छुट्टा अथवा अवकाश आदि की उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। ब्रिटिश सरकार को भी श्रमिकों की दशा सुधारने में कोई रुचि नहीं थी। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ब्रिटिश सरकार ने जिन श्रम सन्नियमों का निर्माण किया उनका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटेन के उद्योगपतियों को संरक्षण प्रदान करना था। अतः स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व के श्रम सन्नियमों में श्रमिकों के हितों को कोई भी पर्याप्त संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ। श्रमिकों ने अपने हितों की रक्षा के लिए श्रम संघ का निर्माण किया और अपनी संगठित आवाज श्रम संघों के माध्यम से बुलन्द की इस प्रकार हम स्पष्टतः कह सकते हैं कि स्वतन्त्रता से पूर्व ब्रिटिश सरकार ने जो श्रम सन्नियम बनाये थे उनसे श्रमिकों के को ठीक सुरक्षा नहीं मिल सकी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् श्रमिकों के हितों की सुरक्षा धरने के लिए भारत सरकार ने अनेक श्रम सन्नियमों में आवश्यक संशोधन किये तथा नये नियम बनाये।


3.    सामाजिक सुरक्षा की पद्धतियां कौन-कौन सी हैं.

(क)     क्षतिपूर्ति- किसी आर्थिक क्षति का हर्जाना देना। उदाहरण के लिये कोई श्रमिक दुर्घटना में अपंग होकर अपनी आंख, हाथ, पैर खो बैठता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तब उसका परिवार आर्थिक संकट में पड़ता है। ऐसे समय सहायता से उसकी क्षतिपूर्ति होती है।
(ख)    पुनर्वास या उद्धार- बीमार या अशक्त व्यक्ति की सहायता कर उसे फिर से कार्य करने योग्य बना देना या बेकार व्यक्ति को फिर से काम पर ला देना उसका पुनर्वास होता है।
(ग)    प्रतिरोध- दुर्घटनाओं से बचाना या दुर्घटनायें न होने देने की व्यवस्था, उसके बाद की सहायता से भी अधिक महत्वपूर्ण है। इसके लिए अच्छे औजार देना, प्रशिक्षण देना तथा कार्य की दशाओं में सुधार करना इसी सामाजिक सुरक्षा के अंग होते हैं।

OR

सामाजिक सुरक्षा की पद्धतियों में विभिन्न योजनाएँ और नीतियाँ शामिल होती हैं जो व्यक्तियों और परिवारों को आर्थिक और सामाजिक जोखिमों से सुरक्षा प्रदान करती हैं। प्रमुख सामाजिक सुरक्षा पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं:

1. भविष्य निधि (Provident Fund): इसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों एक निश्चित राशि का योगदान करते हैं, जो सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी को दी जाती है।

2. पेंशन योजनाएँ (Pension Schemes): ये योजनाएँ सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय सुनिश्चित करती हैं। जैसे कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) द्वारा चलाई जाने वाली पेंशन योजनाएँ।

3. स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance): इसमें चिकित्सा खर्चों का बीमा किया जाता है, जैसे कि कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ।

4. जीवन बीमा (Life Insurance): इसमें व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाती है।

5. गर्भावस्था और प्रसूति लाभ (Maternity Benefits): इसमें महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान और बाद में आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।

6. बाल कल्याण योजनाएँ (Child Welfare Schemes): इसमें बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के लिए योजनाएँ शामिल होती हैं।

7. श्रमिक मुआवजा (Workers' Compensation): कार्यस्थल पर चोट लगने या दुर्घटना की स्थिति में श्रमिकों को मुआवजा प्रदान किया जाता है।

8. बेरोजगारी भत्ता (Unemployment Allowance): नौकरी छूटने पर आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।

9. सामाजिक सहायता (Social Assistance): इसमें वृद्धावस्था पेंशन, विकलांगता पेंशन, विधवा पेंशन आदि शामिल हैं।

ये पद्धतियाँ सामाजिक सुरक्षा के विभिन्न आयामों को कवर करती हैं और व्यक्तियों को आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करती हैं।

4.    सामाजिक सुरक्षा का अर्थ बताइए।

सामाजिक सुरक्षा वह सुरक्षा है जो कि समाज उचित संगठनों द्वारा समाज के सदस्यों को कुछ आपत्तियों के अवसर पर प्रदान करता है। सुरक्षा एक मानसिक स्थिति है और वास्तविक व्यवस्था है। सुरक्षा प्राप्त होने का अर्थ यह है कि मनुष्य को यह विश्वास हो कि आवश्यकता होने पर सुरक्षा प्राप्त होगी। सुरक्षा गुण तथा परिणाम में सन्तोषजनक भी होनी चाहिये।‘‘

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इकाई द्वितीय


    1.    औद्योगिक विकास को परिभाषित करें।   

औद्योगिक विकास की अवधारणा वो क्रिया है जिसके अंतर्गत उत्पादन से संबंधित कार्यों में होने वाले परिवर्तन होते रहते हैं और इन परिवर्तनों के कारण उत्पादन की प्रक्रिया में वृद्धि होती है। यह परिवर्तन जिनका सीधा संबंध औद्योगिक क्रियाकलापों जैसे कि यंत्रीकरण, तकनीक, नए-नए विचारों के कार्यान्वन से होता है 

OR

‘‘औद्योगीकरण एक प्रक्रिया है। जिसके अन्तर्गत उत्पादन कार्य से सम्बन्धित अनेक परिवर्तन होते रहते है। इसके अन्तर्गत तीन मौलिक परिवर्तन आते है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यावसायिक साहस का यंत्रीकरण, नवीन उद्योगों की स्थापना, नए बाजार की खोज एव नए क्षेत्रों का शोषण होता है। संक्षेप में, औद्योगीकरण एक साधन है, जिसके द्वारा पूँजी का विस्तार एवं विकास किया जाता है।‘‘‘ इस प्रकार ‘‘औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसकी सहायता से नवीन उद्योगों की स्थापना की जातीहै और प्राचीन उद्योगों को विशाल पैमाने में परिवर्तित किया जाता है। इस परिवर्तन के लिए विशाल यंत्रों और मशीनों का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय प्रगति में वृद्धि करना होता है।‘‘


    2.    श्रम कल्याण को परिभाषित करें।    

श्रम कल्याण का अर्थ एवं परिभासएँ :- शाही श्रम आयोग ने लिखा है श्रम कल्याण एक ऐसा शब्द है जो बहुत ही लचीला है। इसका अर्थ एक देश की तुलना में उसकी विभिन्न सामाजिक नीतियों औद्योगिकरण की स्थिति व श्रमिकों की शिक्षा सम्बंधी प्रगति के अनुसार भिन्न भिन्न लगाया जाता है। 

सर एड वर्ड पेटन के अनुसार:  श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य श्रम के सुख स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए उपलब्ध की जाने वाली दशाओं से है।


ई० टी० कैली के अनुसार : श्रम कल्याण से तात्पर्य किसी प्रतिष्ठान द्वारा श्रमिको के व्यवहारों के लिए कुछ नियमो का अपनाया जाना है।


ई० एम० ग्राउण्ड के अनुसार:-  
श्रम कल्याण से ताप्पर्य विद्यमान औद्योगिक प्रणाली तथा अपनी फैक्ट्रियो रोजगार की दशाओ को उन्नत करने के लिए मालिको द्वारा किए गए ऐच्छिक प्रयत्नों से है।


एन0 एम0 जोशी के अनुसार: 
श्रम कल्याण के अंतर्गत हम श्रमिको के लाभ के लिए मालिको द्वारा किए गए प्रयत्नो तथा कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कार्य करने की न्यूनतम दशाओं के आदर्श तथा दुर्घटना वृद्वावस्था बेकारी और बीमारी के लिए पास किए गए सामाजिक विधान को सम्मिलित कर सकतें हैं।


    3.    औद्योगिक विकास के कोई पांच सिद्धांत लिखिए।



    4.    औद्योगिक विकास की आवश्यकता क्यों होती है?

औद्योगीकरण प्रत्येक देश के लिए उपयोगी है। इसी कारण भारतवर्ष में भी इसका महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। भारतवर्ष में वास्तविक औद्योगिक की प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद ही प्रारम्भ होती है भारतवर्ष मे निम्न कारणों से औद्योगीकरण की अत्यन्त ही आवश्यकता है-

(1)     भारतवर्ष आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश नहीं है। देश के सन्तुलित आर्थिक विकास के लिए औद्योगीकरण की अत्यन्त ही आवश्यकता है।
(2)     भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहाँ के हल, बैल, बीज, पशु आदि अत्यन्त ही पिछड़ी अवस्था में हैं। इसके साथ ही भारतीय किसान अत्यन्त ही रूढ़िवादी और अन्धविश्वासी है। इसका कारण भी स्पष्ट है। भारतीय किसान को खेती के लिए कृषि पर आश्रित रहना पड़ता है। इस दृष्टिकोंण से भारत की उन्नति के लिए औद्योगीकरण आवश्यक है।
(3)     औद्योगीकरण का जनसंख्या पर भी प्रभाव पड़ता है। भारत में जनसंख्या की जो तीव्र गति से वृद्धि हो रही है उसे रोकने तथा सन्तुलन बनाये रखने के लिए भी औद्योगीकरण आवश्यक है।
(4)     भारत में बेरोजगारी प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए औद्योगीकरण ही एकमात्र उपाय है। औद्योगीकरण से अनेक व्यक्तियों को रोजगार दिया जा सकता है।
(5)    भारत में प्रति व्यक्ति आय भी अत्यन्त ही कम है। इस आमदनी में वृद्धि के लिए आवश्यक है।कि भारत में औद्योगीकरण को अपनाया जाए।
(6)    औद्योगीकरण के द्वारा युद्ध सामग्री का उत्पादन किया जा सकता है। इससे देश की सैनिक शक्ति में वृद्धि होती है। इसलिए सामाजिक दृष्टि से भी भारत में औद्योगीकरण आवश्यक है।
(7)    औद्योगीकरण ही एक साधन है जिसके माध्यम से लघु और विशाल उद्योगों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। भारतवर्ष में जहाँ लघु उद्योगों की आवश्यकता है, औद्योगीकरण अत्यन्त ही आवश्यक है।
(8)    औद्योगीकरण ही एक ऐसा साधन है जिसकी सहायता से देश का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।


    5.    हड़ताल को परिभाषित कीजिए।

एक अस्थायी रूप से कार्य की रुकावट है जो ‘‘श्रमिकों द्वारा अपने असन्तोष को व्यक्त करने, अपनी माँगें स्वीकृत करवाने तथा कार्य की दशाएं सुधारने हेतु नियोक्ता से आग्रह है।‘‘
    औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (Q) के अनुसार, ‘‘व्यक्तियों के समूह द्वारा, जो मिलकर कार्य करते हैं, सामूहिक रूप से कार्य नहीं करना अथवा एकमत होकर कार्य करने से मना करना, हड़ताल कहलाता है।
    ‘‘श्रमिक श्रमिकों के लिए हड़ताल अत्यधिक शक्तिशाली अस्त्र है जिसके द्वारा वे नियोक्ता को अपनी मांगे मनवाने के लिए बाध्य करते हैं। यह श्रमिक द्वारा स्वतः कार्य मुक्ति है। इसका आयोजन सामूहिक कल्याण तथा वर्तमान कार्य की दशाओं में सुधार की दृष्टि से किया जाता है।‘‘

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इकाई तृतीया


1.    किस अधिनियम में श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान क्या है।

श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान 'कारखाना अधिनियम, 1948' (Factories Act, 1948) के अंतर्गत किया गया है। इस अधिनियम के अनुसार, प्रत्येक ऐसे कारखाने में जहां 500 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत होते हैं, एक योग्य श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य होती है। यह अधिकारी श्रमिकों के कल्याण और उनके कामकाज के बेहतर माहौल को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होता है।

OR

कल्याण अधिकारियों की संख्या:- प्रत्येक कारखाने का मालिक जहां 500 या अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, 2000 श्रमिकों तक कम से कम एक कल्याण अधिकारी और प्रत्येक 1000 पर एक अतिरिक्त कल्याण अधिकारी नियुक्त करेगा। एक महिला कल्याण अधिकारी, जिसमें 500 महिला श्रमिक कार्यरत हैं।


योग्यताएँ:- कोई व्यक्ति कल्याण अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक पात्र नहीं होगा जब तक उसके पास- (ए) सामाजिक विज्ञान या किसी विश्वविद्यालय से कानून में डिग्री न होय (बी) विशेष विषय के रूप में श्रम कल्याण को कवर करने वाले औद्योगिक संबंध और कार्मिक प्रबंधन में डिग्री या डिप्लोमा,

2.    श्रमिकों को किस क्षेत्र में परामर्श दिया जा सकता है।

व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से हर जगह परामर्श की आवश्यकता होती है। सामाजिक जीवन में भी परिवारों में, समूहों में, व्यक्तिगत रूप से समस्याओं के समाधान में परामर्श प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। एक श्रमिक कारखाने में कार्य पर्यावरण में कार्य रहता है। वहां वह उत्पादन प्रक्रिया में भाग लेता है। निर्धारित कार्य के घंटों अनुसार कार्य करता है। विभिन्नसहयोगियों के बीच रहकर कार्य करता है। इस दौरान उसे ऊब मानसिक एवं शारीरिक थकान, चिंता, दुश्चिंता आदि से सामना करना पड़ता है कार्य के पश्चात् घर आने पर उपरोक्त समस्याओं का श्रमिक के पारिवारिक जीवनपर भी प्रभाव पड़ता है। श्रमिक जब उपरोक्त समस्याओं से प्रभावित होता है तो उत्पादन प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है और इस कारण से कसरखानों को उत्पादन में क्षति उठानी पड़ती है उधर श्रमिक के परिवार में भी असामंजस्य की स्थिति बन जाती है। समाधान न होने की स्थिति में श्रमिक वह सभत्री कार्यों को करता है जिससे उन्हें शारीरिक एवं मानसिक क्षति होती है। मद्यपान, ड्रक्स लेना ऋण का बोझ आदि आदतें पड़ जाती हैं। साथ ही कार्यस्थल पर अनुपस्थि अनुपस्थिति की मात्रा भी बढ़ जाती है। जिसका प्रभाव बहतु ही नकारात्मक होता है। ऐसी स्थिति में कारखाना प्रबंधन समय-समय पर श्रमिकों के मध्य परामर्श की प्रक्रिया सम्पन्न कराता है जिससे आने वाली सभी समस्याओं के कारणों को जानकर उनका समाधान किया जाता हैयह परामर्श प्रक्रिया प्रबंधन के सदस्यों क्षरा मनोवैज्ञानिकों, विषय विशेषज्ञों के द्वारा करवाता है। जिसका श्रमिक एवं कर्मचारियों पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अपने अन्य साथियों क साथ सहयोग करता है विचारों को, आइडियाज  एवं बातों को सहयोगियों से साझा करता है। अतः कहा जा सकता है कि परामर्श किसी भी संगठन के श्रमिकों, कर्मचारियों के लिए बहतु आवश्यक है।


3.    श्रम कल्याण अधिकारी के कार्यों को लिखिए।

कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत  कुद कर्त्तव्य और जिम्मेदारियां निर्धारित हैं
1. बातचीत करने वाले अधिकारी के रूप में कार्यकरना।
2. लेबर ऑयल को आकार देना और उसे तैयार करना।
3. संपर्क स्थापित करना।
4. मजदूरी एव रोजगार की स्थितियों से निपटना।
5. असामाजिक गतिविधियों से बचाव करना।
6. शांतिपूर्ण समाधान निकालना।
7. कारखाने के प्रावधानों का अनूपालन करवाना।
8. कारखाने, मजदूर, कर्मचारी एवं बाह्य मानव संसाधन के मध्य संबंधों को बढ़ावा देना।
9. समितियों के गठन को प्रोत्साहन देना।
10. छुट्टियों के नियमन में कारखाना प्रबंधन को मदद करना।
11. कल्याणकारी प्रावधानों को सुरक्षित करना।
12. कारखाना प्रबंधन को समय-समय पर सलाह देना।

श्रम कल्याण अधिकारी क्या है?

कल्याण अधिकारी कौन होता है? कारखाना अधिनियम 1948 की धारा 49 के अनुसार कल्याण अधिकारी वह व्यक्ति होता है जिसे कारखाने में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या पांच सौ से अधिक होने पर कारखाने के भीतर कल्याण गतिविधियों से संबंधित कर्तव्यों का पालन करने के लिए अधिष्ठाता द्वारा नियुक्त किया जाता है।

4.    कारखाना अधिनियम किस सन में लागू हुआ।

श्रम समस्याओं को भली प्रकार से हल करने के लिए भारत सरकार द्वारा 1948 में कारखाना अधिनियम, 1948 पारित किया  गया जो 1 अप्रैल, 1949 से लागू किया गया था। इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य कार्य की दशा में सुधार करना तथा श्रमिकों के कल्याण एवं स्वास्थ्य में वृद्धि करना है। इसका क्षेत्र काफी विस्तृत है। किसी भी कारखाने में, जहाँ 20 से अधिक नियमित श्रमिक कार्य करते हैं, इसे लागू करना आवश्यक कर दिया गया है।


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इकाई चतुर्थ

1.    श्रम संघ को परिभाषित कीजिए। 

श्रम संघों को विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न रूप में परिभाषित किया गया है। कुछ विद्वानों का कथन है कि ये केवल कर्मचारियों (सेविवर्गीय) के संगठन हैं जो उद्योग में या किसी न किसी प्रकार के व्यवसायों में लगे है और मजदूरी पर आश्रित है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि इनमें नियोक्ता संगठन, मैत्री संस्थाएँ, व्यावसायिक क्लब, आदि भी सम्मिलित किये जाने चाहिए।

विद्वानों में आज भी यह मत है कि श्रम संघ किसे कहा जाय, किन्तु इस बात पर सभी एकमत है कि सभी संगठन अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करने के लिए बनाये जाते हैं, उनकी सौदेबाजी की क्षमता में वृद्धि करते हैं, प्रबन्धकीय एकाधिकार समाप्त करते हैं तथा श्रमिक व नियोक्ताओं के मध्य सम्बन्ध सुधारने में सहायक होते हैं। संघ की परिभाषाओं को संकुचित और विस्तृत रूप में बांटा जा सकता है:

(1)    संकुचित परिभाषाएँ


(i)    येल योडर के मत में,‘‘श्रम संघ एक निरन्तर तथा दीर्घकालीन कर्मचारी संगठन है जो विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करने तथा श्रम सम्बन्धों में सुधार हेतु बनाये जाते हैं।

(ii)    एस. डी. पुनेकर के अनुसार ‘‘श्रम संघ औद्योगिक कर्मचारियों का निरन्तर संगठन है जो नियोक्ता अथवा श्रमिकों द्वारा स्वतन्त्र रूप से बनाया जाता है। इसका उद्देश्य अपने सदस्यों के हितोकी रक्षा करना है।


(2)     विस्तृत परिभाषाएँ अथवा आधुनिक परिभाषाएँ


(i)    एन. एम. जोशी के शब्दों में‘‘श्रम संघ निश्चित रूप से कर्मचारियों का संगठन है। यह नियोक्ता का संगठन नहीं है, न यह सह-भागियों (ब्व-चंतजदमते) का संगठन है और न ही स्वतंत्र श्रमिकों का।"

(ii)    जी. डी. एच. कोल के विचार मे ‘‘श्रम संघ से अर्थ एक या अधिक व्यवसायो / उद्योगोमें कार्यरत श्रमिकों के संगठन से है। ये संगठन अपने सदस्यों के लिए दैनिक कार्य में आर्थिक हितों की रक्षा तथा उनमें वृद्धि करने की दृष्टि से कार्य करते है।"

(iii)    कार्ल मार्क्स के मत में श्रम संग सर्वप्रथम संगठन केन्द्र रहा है। इसमें कार्यकर्ताओं को एकत्रित करने की शक्ति है। श्रम संघ श्रमिकों की इच्छा से, स्वतः विकसित हुए, जिनका उद्देश्यअपने आपको ‘दास‘ के स्तर से ऊँचा उठाना तथा उचित अनुबन्धयुक्त कार्य की दशाएँउपलब्ध करना था।

(iv)    श्रम संघ संशोधित अधिनियम, 1982 के अनुसार -श्रम संघ एक स्थायी अथवा अस्थायी संगठन है जिसकी स्थापना श्रमिक तथा नियोक्ता में,  श्रमिक एवं श्रमिक में तथा नियोक्ता व नियोक्ता से सम्बन्ध बनाने हेतु एवं किसी व्यवसाय के आचरण को नियन्त्रित करने हेतु की जाती है। इसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक श्रम संघों के संगठन सम्मिलित किये जाते हैं।

2.    श्रम संघ कैसे कार्य करते हैं?

श्रम संघों के कार्यों को समय-समय पर विभिन्न विचारधाराओं ने प्रभावित किया है। आधुनिक श्रम काफी विकसित है तथा उसका कार्य-क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। श्रम संघों का मूल उद्देश्य अपने सदस्यों के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना तथा उनको कार्य के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके अतिरिक्त श्रम शिक्षा, शोध, कल्याणकारी कार्य बीमा योजनाएँ, मनोरंजन सुविधाएँ, आदि संघो के कार्यों में सम्मिलित किये जाते हैं।


(1) डॉ. ब्राउटन का वर्गीकरण- डॉ बाउटन ने श्रम संघों के कार्यो को तीन भागों में वर्गीकृतकिया है

(i) अन्तर्मुखी कार्य- इसके अन्तर्गत प्रतिष्ठानों में होने वाली कल्याणकारी क्रियाएं सम्मिलित की जाती है। इन कार्यों से श्रमिकों के रोजगार सम्बन्धी कार्य दशाओ में सुधार होता है जैसे कार्य के घण्ट, मजदूरी, अवकाश, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्था में सुधार तथा रोजगार में नियमितता

(ii) बहिर्मुखी कार्य-इन कार्यों के अन्तर्गत ऐसी योजनाएँ सम्मिलित की जाती है जिनके द्वारा श्रमिकों की आवश्यकता के समय सहायता प्रदान की जा सके (जैसे शैक्षणिक मनोरंजन और आवासीय सुविधा दुर्घटनाओं के समय आर्थिक सहायता

(iii) राजनीतिक कार्य- यह कार्य समाज में व्याप्त आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए किये जाते हैं जिससे कालान्तर में वर्गहीन समाज की स्थापना कीजा सके।

इस प्रकार भारत में श्रम संघों के मुख्य कार्य हैं।


(1)     श्रमिकों के लिए उचित मजदूरी, अच्छी कार्य की दशाएँ तथा अच्छी रहन-सहन की दशाएँ प्राप्त करना

(2)     श्रमिकों द्वारा उद्योग पर नियन्त्रण स्थापित करना।

(3)     व्यक्तिगत रूप में श्रमिकों की क्षमता में वृद्धि करना तथा आकस्मिक दुर्घटनाओं के समय में सामूहिक रूप से संगठित प्रबन्धकीय षडसंत्रों के विरुद्ध कार्यवाही करना तथा अन्याय को समाप्त करने के लिए वातावरण तैयार करना।

(4)     श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि करके उन उद्योग में सहभागी के रूप में तथा समाज में भद्र नागरिक के रूप में स्थान दिलाना,

(5)     श्रमिक में यह आत्मबल जागृत करना कि वह उद्योगों में केवल मशीन का पुर्जा मात्र नहीं है।

(6)     श्रमिकों के अनुशासन तथा उत्तरदायित्व वहन करने की योग्यता का विकास करना।

(7)     श्रमिकों का नैतिक उत्थान करने की दृष्टि से कल्याणकारी कार्य करना।

3.    श्रम संघ के प्रकार लिखिए।

संघों के प्रकार

क्लार्क कैरने छः प्रकार के श्रम संघ बताये है। यह वर्गीकरण आर्थिक उद्देश्यों तथा विधियोंपर आधारित है।


(1)    शुद्ध एवं तरल संघ- इनमें सामूहिक सौदेबाजी को महत्व दिया जाता है। इसमें इस बात पर बल दिया जाता है कि मौद्रिक लाभ में वृद्धि होनी चाहिए किन्तु इसमें विभिन्न सिद्धान्तों एवं सूत्रों का कोई उपयोग नहीं किया जाता है।


(2)    विकसित संघ-ये वास्तविक मजदूरी में वृद्धि की माँग करते है तथा अधिक उत्पादन में से श्रमिकों के लिए लाभांश चाहते हैं।


(3)    प्रबन्धकीय संघ- यह संघ लाभागिता पर बल देते हैं। श्रम संघ प्रबन्ध एवं संघ व्यवस्था, मूल्य निर्धारण तथा नयी औद्योगिक इकाइयों के प्रवेश पर नियन्त्रण करनेके प्रयास करते हैं।


(4)     नये संघ-इनमे पूर्ण नियोजन की दशाएँ प्राप्त करने के लिए सरकारीएवं राजनीतिक प्रयास किये जाते हैं तथा विकासमान अर्थव्यवस्था में विकास के साथ सुधरी हुई अधिक दशाओं के लिए ऊँची मजदूरी की माँग की जाती है।


(5)     श्रम गुट संघ- इसके अन्तर्गत राज्य पर प्रभाव डालकर सरकार के माध्यम से कार्य करवाया जाता है। किन्तु सामूहिक सुविधाओं का सहारा नहीं लिया जाता। प्रगतिशीलकरों तथा विभिन्न योगदानों द्वारा वितरण व्यवस्था में सुधार किया जाता है।


(6)     प्रत्यक्ष नियन्त्रण संघ- ये संघ सरकार से अल्पकाल के लिए नियन्त्रण अपेक्षित करते हैं इस स्तर पर वर्ग हितों के लिए संसदीय स्तर पर मजदूरी, मूल्यों, दरों, राजकीय लाभों आदि समस्याओं पर विचार किया जाता है एवं उनका निराकरण किया जाता है।


4.    अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना कब हुई?

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) संयुक्त राष्ट्र संघ की विशिष्ट त्रिपक्षीय एजेंसी है जिसके सदस्य सरकारें, कर्मचारी तथा कामगार हैं। इसकी स्थापना सन् 1919 में वर्साइल की संधि के द्वारा हुई थी। । है और सन् 1922 से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के शासी निकाय का स्थाई सदस्य है।


5.    श्रम संघों के उद्देश्य लिखिए।


श्रम संघों के उद्देश्य


ब्रिटिश ट्रेड यूनियन काँग्रेस नेश्रम संघों के उद्देश्य सम्बन्धी विचारों को तीन भागों में बाँटा है:


(1)     मजदूरी संघ एवं उसमें सुधार कार्य,कार्य के घण्टों एवं कार्य की दशाओं का संधारण एवं वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि के प्रयास तथा बढ़ी हुई राष्ट्रीय आय के फलस्वरूप श्रमिकों को अपना बढ़ा हुआ भाग दिलाने का प्रयास करना।


(2)     श्रमिकों के लिए उपलब्ध अवसरों को प्राप्त करना। श्रम संघों का उद्देश्य ‘पूर्ण रोजगार‘ की दशाएँ स्थापित करना है।


(3)     प्रत्येक श्रम संघ श्रमिकों में अपना प्रभाव व्यापक करने के प्रयास करता है। इनके लिए वे श्रमिकों को प्रबन्ध में सहभागिता दिलाने का प्रयास करते है।


फ्लेंडस एवं क्लेग के अनुसार श्रम संघों के उद्देश्य इस प्रकार हैं:


(1)    कार्य की दशाएँ सुधारना तथा मजदूरी सम्बन्धी समस्याओं के प्रति श्रमिक का पक्ष दृढ़ करना।


(2)    श्रमिकों को अपने रहन-स्तर का स्तर सुधारने के अवसर प्रदान करना।


(3)    उन्हें राष्ट्रीय आर्थिक जीवन को नियन्त्रित करने में सहयोग देना।

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इकाई पंचमी

  1.    श्रम विधान क्या होता है? परिभाषित करें।

श्रम सन्नियम से तात्पर्य उन सभी वैधानिक अधिनियमों एवं उपायों से है जिनका उद्देश्य श्रमिकों की आर्थिक, सामाजिक, नैतिक व मनोवैज्ञानिक स्थिति को सुधारना, श्रमिकों की कार्यदशाओं को सुधारना तथा नियोक्ता या प्रबन्ध एवं श्रमिकों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित करना है।

‘सरल शब्दों में हम कह सकते हैं, कि श्रमिकों से सम्बन्धित सन्नियम को ‘श्रम सन्नियम‘ कहते हैं।


  2.    औद्योगिक विवाद को परिभाषित करें।

औद्योगिक विवाद का अर्थ- इस अधिनियम की धारा 2(K) के अनुसार, ‘‘नियोक्ता के मध्य, नियोक्ता तथा कर्मचारियों के मध्य तथा श्रमिक तथा श्रमिक के मध्य विवाद अथवा मतभेद जो रोजगार की शर्तों कार्य की दशाओं तथा बेरोजगारी से संबंधित हो औद्योगिक विवाद कहलाते हैं।‘‘



  3.    बोनस को परिभाषित करें।

मजदूरी भुगतान अधिनियम की धारा 2(vi) के अन्तर्गत मजदूरी को परिभाषित कि गया है। इस धारा के अनुसार, मजदूरी से धन के रूप में अभिव्यक्त अथवा ऐसे अभिव्यत हो सकने वाला वह सब पारिश्रमिक, चाहे वह वेतन के रूप में हो या भत्ते या अन्यथा रूप में, अभिप्रेत है और जिसका भुगतान यदि नियोजन की शर्तें प्रत्यक्ष या विवक्षित रूप में पूरी कर दी जाती है तो एक ऐसे व्यक्ति को देव है, जो कि उस नियोजन के सम्बन्ध में नियोजित है या नियोजन सम्बन्ध में यह कोई कार्य करता है।

मकान के किराये का भता तथा काम से अलग रखने के बदले मिली प्रतिकर की धनराशि ‘मजदूरी‘ नहीं है। बोनस को ‘मजदूरी‘ की परिभाषा में शामिल किया गया है।

  4.    ग्रेच्युटी परिभाषित करें।

ग्रेच्युटी अधिनियम 1965- कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना प्रत्येक सरकार एवं सेवायोजक का कर्तव्य है। इस हेतु अनेक अधिनियम बने हैं। उपदान भुगतान अधिनियम इसी दिशा में एक ओर कदम है, जिसे सरकार ने 1972 में उठाया था, जिसके परिणामस्वरूप सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों को एक अतिरिक्त सेवानिवृत्ति लाभ मिलना प्रारम्भ हो गया है। यह सामाजिक न्याय की आवश्यकता को पूरा करने वाला प्रगतिशील एवं सराहनीय कदम है।


  5.    क्षतिपूर्ति का अर्थ बताइए।

 भारत में श्रम विधि विकास से पूर्व औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमिकों की दशा बहुत बुरी थी। नियोजकों द्वारा कर्मकारों का शारीरिक एवं आर्थिक शोषण किया जाता था। श्रमिकों की मृत्यु अपघात तथा शारीरिक चोटों के लिए स्वयं कर्मकार ही उत्तरदायी होते थे चाहे ऐसी नियोजक की लापरवाही से नियोजन काल में ही क्यों न हुई हो।

समय बीतने के साथ-साथ श्रमिकों द्वारा अपने हितों व अधिकारों की सुरक्षा की माँग उठायी जाने लगी। फलस्वरूप, कर्मकारों द्वारा इस बात पर जोर दिया गया कि उन्हें नियोजन अवधि में हुई दुर्घटनाओं के लिए कुछ प्रतिकार या क्षतिपूर्ति प्रदान की जानी चाहिए। भारत में सर्वप्रथम 1923 में कर्मकारों को प्रतिकार प्रदान करने के लिए एक अधिनियम ‘‘कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923‘‘ पारित किया गया जो 1 जुलाई, 1924 को लागू किया गया।

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क्षतिपूर्ति शब्द का अर्थ है वित्तीय देयता के विरुद्ध सुरक्षा या संरक्षण। यह आम तौर पर पार्टियों के बीच किए गए एक संविदात्मक समझौते के रूप में होता है जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष द्वारा झेले गए नुकसान या क्षति के लिए भुगतान करने के लिए सहमत होता है।

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