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सामुदायिक संगठन एवं सामाजिक क्रिया : लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर

इकाई प्रथम 

    1.    सामुदायिक संगठन के विभिन्न उपागमों को लिखें        

सामुदायिक संगठन के विभिन्न उपागम (approaches) समुदाय की जरूरतों, समस्याओं, संसाधनों और संदर्भों के आधार पर विकसित किए जाते हैं। इन उपागमों का उद्देश्य सामुदायिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना है। मुख्य उपागम निम्नलिखित हैं:

 1. सामाजिक कार्रवाई उपागम (Social Action Approach)
इस उपागम का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन और न्याय को बढ़ावा देना है। इसमें समुदाय के सदस्यों को सामाजिक असमानताओं और अन्यायों के खिलाफ एकजुट होकर संगठित किया जाता है।

# विशेषताएँ:
- समानता और न्याय: असमानताओं को कम करने और न्याय स्थापित करने पर जोर।
- सामूहिक कार्रवाई: समुदाय के सदस्यों को एकजुट कर सामूहिक रूप से कार्य करने की प्रेरणा।
- आंदोलन और अभियान: विरोध प्रदर्शन, जन आंदोलनों और अभियानों के माध्यम से बदलाव लाना।

 2. स्थानीयता उपागम (Locality Development Approach)
इस उपागम में समुदाय के स्थानीय संसाधनों और क्षमताओं का उपयोग करके स्थानीय समस्याओं का समाधान किया जाता है। इसमें सामुदायिक सदस्यों को सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है ताकि वे स्वयं अपने विकास में भागीदार बन सकें।

# विशेषताएँ:
- सक्रिय सहभागिता: समुदाय के सभी सदस्यों की सक्रिय भागीदारी।
- स्थानीय संसाधनों का उपयोग: स्थानीय संसाधनों और क्षमताओं का समुचित उपयोग।
- स्वयं सहायता: आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन को बढ़ावा।

 3. कार्यक्रम विकास उपागम (Program Development Approach)
इस उपागम का उद्देश्य विशेष कार्यक्रमों और परियोजनाओं के माध्यम से समुदाय के विकास को बढ़ावा देना है। इसमें विशिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए योजनाबद्ध कार्यक्रम और परियोजनाएँ विकसित की जाती हैं।

# विशेषताएँ:
- लक्ष्य-उन्मुख: स्पष्ट लक्ष्यों और उद्देश्यों के साथ कार्य करना।
- संगठित प्रयास: योजनाबद्ध और व्यवस्थित रूप से कार्यक्रमों का कार्यान्वयन।
- मूल्यांकन और सुधार: नियमित मूल्यांकन के माध्यम से कार्यक्रमों में सुधार करना।

 4. सामुदायिक शिक्षा उपागम (Community Education Approach)
इस उपागम का उद्देश्य शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से समुदाय के सदस्यों को सशक्त बनाना है। इसमें विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से समुदाय के ज्ञान और कौशल का विकास किया जाता है।

# विशेषताएँ:
- शिक्षा और जागरूकता: शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से ज्ञान और जागरूकता बढ़ाना।
- कौशल विकास: व्यावसायिक और जीवन कौशल का विकास।
- सूचनात्मक अभियान: विभिन्न मुद्दों पर जागरूकता अभियान चलाना।

 5. संस्थागत विकास उपागम (Institutional Development Approach)
इस उपागम का उद्देश्य सामुदायिक संस्थाओं और संगठनों को मजबूत बनाना है ताकि वे सामुदायिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। इसमें संस्थागत ढांचे को विकसित और सुदृढ़ किया जाता है।

# विशेषताएँ:
- संस्थागत क्षमता निर्माण: संस्थाओं की क्षमता और प्रभावशीलता को बढ़ाना।
- संगठनात्मक संरचना: मजबूत संगठनात्मक ढांचे का निर्माण।
- नियंत्रण और प्रबंधन: प्रभावी प्रशासन और प्रबंधन के माध्यम से संस्थाओं का संचालन।

 6. सामुदायिक सशक्तिकरण उपागम (Community Empowerment Approach)
इस उपागम का उद्देश्य समुदाय के सदस्यों को सशक्त बनाना है ताकि वे स्वयं अपने विकास के लिए आवश्यक निर्णय ले सकें और कार्य कर सकें। इसमें आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन को बढ़ावा दिया जाता है।

# विशेषताएँ:
- स्वयं निर्णय लेने की क्षमता: निर्णय लेने की शक्ति और क्षमता का विकास।
- आत्मनिर्भरता: आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन को प्रोत्साहन।
- सशक्तिकरण: समुदाय के सदस्यों को सशक्त बनाना।

ये विभिन्न उपागम सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया को विविध और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक उपागम का उद्देश्य समुदाय के सदस्यों की समस्याओं का समाधान कर उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाना है।

    2.    सामुदायिक संगठन के ऐतिहासिक विकासक्रम को लिखिए।

क्या हमें अपनी जड़ें पता हैं? आदिम मानव वास्तव में किसी सामाजिक व्यवस्था में नहीं था। वह छोटे-छोटे समूहों में रह कर शिकार करता, फल-फूल इकठ्ठा करके जीवन जीता था। तब सामजिक संरचना क्या थी इसके बारे में ज्यादातर अनुमान आज के आदिवासी समुदाय के जीवन से ही लगाए जा सकते हैं। जिन समूहों में आदिम मानव रहता था, उसमें कोई विभाजन या बंटवारा नहीं था। सभी मिलकर काम करते थे। उनमें न तो स्त्री और पुरुष का भेद था, न ही यह कोई निर्धारण था कि किसी व्यक्ति को कोई तयशुदा काम ही करना होगा। एक तरह से हम कह सकते हैं कि श्रम का कोई विभाजन नहीं था। वे जंगल, नदी और पहाड़ों से जो भी इकठ्ठा करते थे, उसे जमा (संग्रहीत) करके नहीं रखते थे। ज्यादा से ज्यादा बचा हुआ शिकार, फल को अगले दो-चार दिनों के लिए रखा रहने देते थे। इसमें भी कोई बंटवारा या विभाजन नहीं था कि किसी को ज्यादा मिलेगा और किसी को कम मिलेगा। न ही यह व्यवस्था थी कि किसी एक व्यक्ति को बचा हुआ खाना रखने की जिम्मेदारी दे दी जायेगी। यानी संपत्ति का विभाजन या उस पर नियंत्रण की व्यवस्था भी नहीं थी। 

विकास का पहला चरण - औजारों का बनना, श्रम का विभाजन और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध 

विकास का दूसरा चरण - खेती और पशुपालन





OR
सामुदायिक संगठनों का ऐतिहासिक विकासक्रम बहुत विविध और युगों के अनुसार बदलता रहा है। यहां कुछ महत्वपूर्ण मोमेंट्स दिए गए हैं जो सामुदायिक संगठनों के विकास में महत्वपूर्ण थे:

1. नागरिक समाज की शुरुआत (18वीं और 19वीं सदी): सामुदायिक संगठनों की शुरुआत नागरिक समाजों के प्रयासों से हुई, जहां लोगों ने समाज में सुधार के लिए एकजुट होकर काम किया। यहां समाज में समस्याओं के समाधान के लिए सामुदायिक आंदोलनों का जन्म हुआ।

2. उदारवादी आंदोलन (19वीं और 20वीं सदी): इस काल में, उदारवादी आंदोलनों ने समाज में विशेषता के खिलाफ लड़ा, जिसमें समुदायिक संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये संगठन अक्सर शिक्षा, समाजिक उन्नति, और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए काम करते थे।

3. स्वतंत्रता संग्राम (20वीं सदी): भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में, सामुदायिक संगठनों ने राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लिया और लोकतांत्रिक समाज की नींव रखने में मदद की। इन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट कर स्वतंत्रता के लिए लड़ा।

4. समुदायिक विकास की आधुनिक परिप्रेक्ष्य (वर्तमान): आधुनिक समय में, सामुदायिक संगठनों का कार्यक्षेत्र विस्तार से बढ़ गया है। वे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, और सामाजिक न्याय के लिए काम करते हैं।

इन महत्वपूर्ण पलों ने सामुदायिक संगठनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसने समाज को सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

    3.    सामुदायिक संगठन के मूल्यों को समझाइए।



    4.    मौलिक अधिकारों का स्पष्ट करें।

जीवन जीने का अधिकार -

 हमारे देश के कानून ने प्रत्येक व्यक्ति को अपना स्वतन्त्र जीवन जीने का जन्मसिद्ध अधिकार प्रदान किया है. इसके तहत किसी भी इंसान को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं मारे जाने का भी अधिकार प्राप्त है.

उचित परीक्षण का अधिकार -

इस अधिकार के तहत हर व्यक्ति को निष्पक्ष अदालत द्वारा निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, प्राप्त हैं. उसका मुद्दा उचित समय के भीतर सुनना, वकील के अधिकार, जन सुनवाई के अधिकार और व्याख्या के अधिकार हैं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार -

इस देश के हरेक इंसान को स्वतंत्र रूप से बोलने का और जनता में अपनी राय स्वतंत्र रूप से रखने और अपने खिलाफ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है. हालांकि इस अधिकार में कुछ सीमा निर्धारित की गई है, जैसे अश्लीलता, गड़बड़ी और दंगा भड़काना आदि निषेद हैं

शिक्षा का अधिकार-

हरेक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है. जिसको देश के प्रत्येक नागरिक को शिक्षा मुहैया कराना सरकार का कर्तव्य हैं.

सोच, विवेक व धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार- 

हमारे देश के हरेक नागरिकों को स्वतंत्र रूप से सोचने और ईमानदार विश्वासों का निर्माण करने का अधिकार है. हर व्यक्ति को अपनी पसंद के किसी भी धर्म का पालन करने का अधिकार है और समय-समय पर किसी भी समय अपनी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार इसे बदलने के लिए स्वतंत्र है. इसके ऊपर कानूनी रूप से किसी तरह का कोई दबाव नहीं डाला जा सकता हैं.

स्वतंत्रता और बराबर का अधिकार - 

भारत के संविधान के अनुसार देश के सभी लोग गरिमा के मामले में स्वतंत्र और बराबर हैं. कानून के अनुसार यह अधिकार मनुष्य जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त हैं. इसलिए सभी को अपने बुद्धि और अंतरात्मा की देन के अनुसार आपस में भाईचारे के भाव से बर्ताव करना चाहिए.

गुलामी से स्वतंत्रता का अधिकार -

किसी भी व्यक्ति को गुलामी या दासता से आजादी का अधिकार है अर्थात किसी भी व्यक्ति को गुलामी या दासता की हालत में नहीं रखा जा सकता, गुलामी-प्रथा और व्यापार पूरी तरह से निषिद्ध होगा.

यातना, प्रताड़ना या क्रूरता से आजादी का अधिकार-

किसी को भी शारीरिक यातना नहीं दी जा सकती और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार किया जा सकता है.

कानून के सामने समानता का अधिकार-
हरेक व्यक्ति को हर जगह कानून की निगाह में व्यक्ति के रूप में स्वीकृति-प्राप्ति का अधिकार है.

कानून के सामने सभी को समान संरक्षण का अधिकार- 

देश के कानून की निगाह में सभी समान हैं और सभी बिना भेदभाव के समान कानूनी सुरक्षा के अधिकारी हैं.

मनमाने ढंग से की गई गिरफ्तारी, हिरासत में रखने या निर्वासन से आजादी का अधिकार- 

देश का कानून किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ्तार, नजरबंद, या देश-निष्कासित करने का इजाजत नहीं देता है. ऐसा करना मानवाधिकार का खुला उलंघन हैं.


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इकाई द्वितीय

   1.    सर्वोदय के लक्ष्यों को लिखिए

जिसमें सभी लोग दूसरे लोगों के धर्म का सम्मान करते हैं और जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार काम करने का अवसर मिलता है और वह स्वेच्छा से समाज के विकास में अधिक से अधिक योगदान देता है। सर्वोदय योजना ने आर्थिक विकास की प्रक्रिया में कृषि और ग्रामोद्योग विशेषकर लघु-स्तरीय कपड़ा और कुटीर उद्योगों के महत्व को आगे रखा और जोर दिया।  



   2.    जनहित याचिका को संक्षिप्त में समझाइये। OR 
जन पैरवी को संक्षिप्त में समझाइये।

जनहित याचिका से तात्पर्य है सार्वजनिक हित या सामान्य हित में, प्रारंभ कीजाने वाली न्यायिक कार्रवाई जिसकी समुदाय के एक समूह के हित में रुचि हो,जिससे उसके कानूनी अधिकार और जिम्मेदारी प्रभावित होती है। जनहित याचिकाएक कार्रवाई है, जिसमें एक व्यक्ति या समूह जनता के लिए में राहत मांगता ह ैन कि अपने लिए।


जनहित याचिका का उपयोग समाज कार्यकर्ताओं के द्वारा प्रभावशाली तरीके सेकिया जा सकता है। इस प्रक्रिया में समाज कार्यकर्ता न्याय प्रदान करने मेंविशेषतौर पर कमजोर वर्गों को न्याय प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। समाज कार्यकर्ता कानूनी प्रणाली विधि के साथ संपर्क कर सकते हैं और किशोरों, कैदियों के पुनर्वास, वेश्याओं, अनुसूचित जातियों/जनजातियों और गरीबों के लिए सामाजिक न्याय को कार्यान्वयन करने में सहायता कर सकते हैं और जिन जरुरतमंद लोगों को कानूनी सहायता की आवश्यकता है उनकी सहायता कर सकते हैं। वास्तव में, समाजकर्ता जनहित याचिका के द्वारा स्वयं के लिए एक सार्थक और रचनात्मक भूमिका तैयार कर सकते हैं। 



   4.    सशक्तिकरण के अवरोधक कारकों को लिखिए।

सशक्तिकरण के अवरोधक कारकों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

1. सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठाएँ: धार्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठाएँ, जाति और वर्ग से जुड़ी परंपराओं के कारण महिलाओं के स्वाधीनता और समानता को प्रतिबंधित कर सकते हैं।

2. शिक्षा और पहुंच की कमी: महिलाओं की शिक्षा और जागरूकता की कमी, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, उनके सशक्तिकरण को बाधित कर सकती है।

3. आर्थिक असमानता: आर्थिक असमानता और वित्तीय पहुंच की कमी महिलाओं को स्वाधीनता के लिए आवश्यक संसाधनों से वंचित कर सकती है।

4. कानूनी और सियासी प्रतिबंध: कानूनी और सियासी अयोग्यता, जैसे विवाहित महिलाओं के संपत्ति और अधिकारों के प्रति नकारात्मक पहलू, उनके सशक्तिकरण को प्रतिबंधित कर सकते हैं।

5. अदालती प्रणाली की अस्पष्टता: अदालती प्रक्रियाओं में अस्पष्टता और लंबी विचाराधीनता के कारण महिलाओं को न्याय और अधिकारों का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता है।

इन अवरोधक कारकों को पहचानना और उन्हें हल करने के लिए प्रयास करना महिलाओं के सशक्तिकरण के मार्ग को सुधारने में मददगार साबित हो सकता है।


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इकाई तृतीया


    1.    सामाजिक आंदोलनों के प्रकारों को लिखिए।


सामाजिक आंदोलनों के विभिन्न प्रकार हैं, जो अपने उद्देश्यों, कार्यक्षेत्र, और रणनीतियों के आधार पर भिन्न होते हैं। निम्नलिखित सामाजिक आंदोलनों के प्रमुख प्रकार हैं:


 1. सुधारवादी आंदोलन (Reform Movements)

   - उद्देश्य: समाज में मौजूदा संस्थाओं और प्रथाओं में सुधार करना।

   - उदाहरण: 

     - भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में समाज सुधारकों द्वारा किए गए सुधार आंदोलन जैसे सती प्रथा उन्मूलन आंदोलन।

     - दलितों के अधिकारों के लिए अंबेडकर के नेतृत्व में चला आंदोलन।


 2. क्रांतिकारी आंदोलन (Revolutionary Movements)

   - उद्देश्य: मौजूदा सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक संरचना को पूरी तरह से बदलना।

   - उदाहरण:

     - 1917 का रूसी क्रांति।

     - नक्सलवादी आंदोलन।


 3. रूढ़िवादी आंदोलन (Conservative Movements)

   - उद्देश्य: मौजूदा सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं को बनाए रखना और उन्हें बचाना।

   - उदाहरण:

     - धार्मिक संगठनों द्वारा पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित करने के प्रयास।

     - विभिन्न क्षेत्रों में जातिगत व्यवस्था का समर्थन करने वाले आंदोलन।


 4. उद्धार आंदोलन (Revivalist Movements)

   - उद्देश्य: पारंपरिक या पुरानी प्रथाओं, विश्वासों, और आदर्शों को पुनर्जीवित करना।

   - उदाहरण:

     - आर्य समाज का आंदोलन, जिसका उद्देश्य वैदिक धर्म और परंपराओं का पुनरुद्धार करना था।

     - भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन।


 5. प्रतिरोध आंदोलन (Resistance Movements)

   - उद्देश्य: किसी विशेष नीति, कानून, या सामाजिक व्यवस्था का विरोध करना।

   - उदाहरण:

     - किसान आंदोलन, जो कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ।

     - नागरिक अधिकार आंदोलन, जैसे अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में।


 6. पर्यावरणीय आंदोलन (Environmental Movements)

   - उद्देश्य: पर्यावरण संरक्षण और स्थिरता को बढ़ावा देना।

   - उदाहरण:

     - चिपको आंदोलन, जिसने वृक्षों की कटाई के विरोध में जनजागरण किया।

     - जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक आंदोलन, जैसे ग्रेटा थनबर्ग का फ्राइडे फॉर फ्यूचर।


 7. नारीवादी आंदोलन (Feminist Movements)

   - उद्देश्य: महिलाओं के अधिकारों और समानता के लिए संघर्ष करना।

   - उदाहरण:

     - महिला सशक्तिकरण आंदोलन, जिसमें महिला आरक्षण विधेयक और कार्यस्थल पर समानता के मुद्दों को उठाया गया।

     - मी टू आंदोलन, जो यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक वैश्विक आंदोलन है।


 8. अधिकार आधारित आंदोलन (Rights-Based Movements)

   - उद्देश्य: विभिन्न समुदायों और समूहों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सुनिश्चित करना।

   - उदाहरण:

     - LGBTQ+ अधिकार आंदोलन।

     - आदिवासी अधिकार आंदोलन।


 9. आर्थिक न्याय आंदोलन (Economic Justice Movements)

   - उद्देश्य: आर्थिक असमानताओं को दूर करना और समाज में आर्थिक न्याय स्थापित करना।

   - उदाहरण:

     - श्रमिक अधिकार आंदोलन।

     - वैश्वीकरण और नवउदारवाद के विरोध में आंदोलन।


 10. नागरिक आंदोलन (Civil Movements)

   - उद्देश्य: नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा और प्रचार करना।

   - उदाहरण:

     - भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जैसे अन्ना हजारे के नेतृत्व में जन लोकपाल आंदोलन।

     - चुनाव सुधार आंदोलन।


ये विभिन्न प्रकार के सामाजिक आंदोलन समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करते हैं और परिवर्तन की दिशा में योगदान देते हैं। प्रत्येक आंदोलन का अपना एक विशिष्ट उद्देश्य, रणनीति, और कार्यक्षेत्र होता है, जो उसे अन्य आंदोलनों से अलग बनाता है।




    2.    सामाजिक आंदोलन में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका को संक्षेप में समझाइए।


    3.    सामुदायिक संगठन में क्षेत्रीय मुद्दों का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है?

सामुदायिक संगठन में क्षेत्रीय मुद्दों का निर्धारण कई चरणों में किया जाता है, जिसमें समुदाय की भागीदारी और विभिन्न तकनीकों का उपयोग शामिल है। यहां क्षेत्रीय मुद्दों के निर्धारण की प्रक्रिया को विस्तृत रूप से बताया गया है:


 1. समुदाय की भागीदारी (Community Participation):

   - जनसभाएं और बैठकें: समुदाय के सदस्यों के साथ जनसभाओं और बैठकों का आयोजन किया जाता है, जहां लोग खुलकर अपने मुद्दों और समस्याओं को साझा कर सकते हैं।

   - फोकस ग्रुप चर्चा (Focus Group Discussions): छोटे समूहों में विशेष मुद्दों पर चर्चा की जाती है, जिससे विशिष्ट समस्याओं की गहराई से पहचान की जा सके।

   - सर्वेक्षण और प्रश्नावली (Surveys and Questionnaires): समुदाय के सदस्यों से जानकारी एकत्र करने के लिए सर्वेक्षण और प्रश्नावली का उपयोग किया जाता है।


 2. मौजूदा डेटा और रिपोर्टों का विश्लेषण (Analysis of Existing Data and Reports):

   - सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्टें: विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों और डेटा का अध्ययन किया जाता है।

   - आंकड़ों का विश्लेषण: जनगणना, स्वास्थ्य, शिक्षा, और आर्थिक स्थितियों से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है।


 3. समुदाय संसाधन मानचित्रण (Community Resource Mapping):

   - संसाधन और समस्याओं की पहचान: समुदाय के संसाधनों, सेवाओं, और बुनियादी ढांचे की पहचान और मानचित्रण किया जाता है। इसके साथ ही, समस्याओं के संभावित कारणों का भी पता लगाया जाता है।

   - SWOT विश्लेषण: सामुदायिक संगठन SWOT (Strengths, Weaknesses, Opportunities, Threats) विश्लेषण का उपयोग करके समुदाय की ताकत, कमजोरियाँ, अवसर और खतरे की पहचान करते हैं।


 4. समस्या निर्धारण (Problem Identification):

   - प्राथमिकता निर्धारण (Prioritization): समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है। यह तय किया जाता है कि कौन से मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं और पहले समाधान की आवश्यकता है।

   - कारण और प्रभाव विश्लेषण (Cause and Effect Analysis): समस्या के मूल कारणों और उनके प्रभावों का विश्लेषण किया जाता है। यह प्रक्रिया समस्या के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने में मदद करती है।


 5. विज़न और लक्ष्यों का निर्धारण (Setting Vision and Goals):

   - लक्ष्य निर्धारण: समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर समस्याओं को हल करने के लिए लक्ष्यों का निर्धारण किया जाता है। 

   - रणनीति विकास (Strategy Development): समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न रणनीतियों और क्रियाकलापों का विकास किया जाता है।


 6. कार्रवाई योजना (Action Plan):

   - कार्रवाई के कदम: ठोस कार्रवाई योजना बनाई जाती है, जिसमें समस्याओं के समाधान के लिए उठाए जाने वाले कदमों का विवरण होता है।

   - जिम्मेदारियाँ निर्धारण: किसे कौन सी जिम्मेदारी निभानी है, यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाता है।

   - समयबद्ध योजना: समस्याओं के समाधान के लिए समय सीमा निर्धारित की जाती है।


 7. निरंतर निगरानी और मूल्यांकन (Continuous Monitoring and Evaluation):

   - निगरानी (Monitoring): समस्याओं के समाधान के लिए उठाए गए कदमों की निरंतर निगरानी की जाती है।

   - मूल्यांकन (Evaluation): समय-समय पर मूल्यांकन किया जाता है कि क्या समस्याओं का समाधान हो रहा है और क्या सुधार की आवश्यकता है।


 8. फीडबैक और सुधार (Feedback and Improvement):

   - समुदाय की प्रतिक्रिया (Community Feedback): समुदाय के सदस्यों से निरंतर प्रतिक्रिया ली जाती है और उनके सुझावों के आधार पर योजनाओं में सुधार किया जाता है।

   - अभ्यास से सीखना (Learning from Practice): पिछले अनुभवों से सीखकर भविष्य की योजनाओं को बेहतर बनाया जाता है।


सामुदायिक संगठन में क्षेत्रीय मुद्दों का निर्धारण एक समग्र और सहभागितात्मक प्रक्रिया है, जिसमें समुदाय के प्रत्येक सदस्य की आवाज और भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। इससे सुनिश्चित होता है कि जो भी समाधान और योजनाएं बनाई जाएं, वे समुदाय की वास्तविक आवश्यकताओं और समस्याओं पर आधारित हों।


    4.    सामुदायिक संगठन में नेतृत्व के प्रकारों को लिखिए।

सामुदायिक संगठन में नेतृत्व के विभिन्न प्रकार होते हैं, जो संगठन की जरूरतों, समुदाय के स्वरूप, और नेताओं के व्यक्तिगत गुणों पर निर्भर करते हैं। निम्नलिखित नेतृत्व के प्रमुख प्रकार हैं:

1. लोकतांत्रिक नेतृत्व (Democratic Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में निर्णय सामूहिक रूप से किए जाते हैं। नेता समुदाय के सदस्यों की राय और सुझावों को महत्व देते हैं और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करते हैं।
  • उदाहरण: ग्राम पंचायतों में सरपंच का कार्य, जहां निर्णय सामूहिक रूप से किए जाते हैं।

2. तानाशाही नेतृत्व (Autocratic Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता खुद निर्णय लेते हैं और उन्हें लागू करते हैं। समुदाय के सदस्यों की राय और सुझावों को बहुत कम महत्व दिया जाता है।
  • उदाहरण: कुछ स्वयंसेवी संगठनों में संस्थापक या प्रमुख का कार्य, जहां सभी निर्णय उनकी एकल स्वीकृति से होते हैं।

3. सेवा नेतृत्व (Servant Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता अपने समुदाय की सेवा करने पर जोर देते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य समुदाय की भलाई और विकास है।
  • उदाहरण: मदर टेरेसा और उनके मिशनरी कार्य, जहां सेवा भावना प्रमुख थी।

4. लक्ष्य-निर्देशित नेतृत्व (Goal-Oriented Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करते हैं और समुदाय को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं।
  • उदाहरण: किसी एनजीओ के परियोजना प्रबंधक, जो विशेष परियोजनाओं के लक्ष्यों को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

5. प्रेरणादायक नेतृत्व (Inspirational Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता अपने दृष्टिकोण और दृष्टि से लोगों को प्रेरित करते हैं। वे सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा का स्रोत होते हैं।
  • उदाहरण: सामाजिक कार्यकर्ता जैसे अन्ना हजारे, जिन्होंने अपने आंदोलनों से लोगों को प्रेरित किया।

6. सहभागी नेतृत्व (Participative Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता और समुदाय के सदस्य मिलकर निर्णय लेते हैं। यह नेतृत्व शैली समुदाय की भागीदारी और सामूहिक प्रयास को प्रोत्साहित करती है।
  • उदाहरण: महिला स्वयं सहायता समूहों का नेतृत्व, जहां सभी सदस्य मिलकर निर्णय लेते हैं।

7. रूपांतरणात्मक नेतृत्व (Transformational Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता समुदाय में गहरे और स्थायी परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। वे लोगों को एक नई दिशा में प्रेरित करते हैं और सामूहिक दृष्टि को प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।
  • उदाहरण: महात्मा गांधी का नेतृत्व, जिन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से समाज में बड़े पैमाने पर परिवर्तन लाए।

8. करिश्माई नेतृत्व (Charismatic Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता अपनी व्यक्तिगत करिश्मा और आकर्षण से लोगों को प्रभावित करते हैं। वे अपने व्यक्तित्व से लोगों को प्रेरित और आकर्षित करते हैं।
  • उदाहरण: नेल्सन मंडेला का नेतृत्व, जिनकी करिश्माई शक्ति ने लोगों को प्रेरित किया।

9. समस्या समाधान नेतृत्व (Problem-Solving Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे समस्याओं की पहचान करके उनके समाधान के लिए ठोस कदम उठाते हैं।
  • उदाहरण: ग्रामीण विकास अभियानों के नेता, जो समुदाय की समस्याओं का समाधान करने के लिए काम करते हैं।

10. मध्यस्थता नेतृत्व (Mediative Leadership):

  • विशेषताएँ: इस प्रकार के नेतृत्व में नेता समुदाय के भीतर विवादों और संघर्षों का समाधान करते हैं। वे विभिन्न समूहों के बीच मध्यस्थता करके शांति और समझौते की स्थापना करते हैं।
  • उदाहरण: आदिवासी समुदायों में बुजुर्ग नेता, जो विवादों का समाधान करने में मदद करते हैं।

इन विभिन्न प्रकार के नेतृत्वों के माध्यम से सामुदायिक संगठन अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए कार्य कर सकते हैं। प्रत्येक प्रकार का नेतृत्व अपनी विशेषताएं और प्रभावशीलता रखता है, जो विभिन्न परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार भिन्न हो सकता है।


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इकाई चतुर्थ

1.    सामुदायिक संगठन में नेतृत्व के कार्यों को लिखें।

नेतृत्व के कार्यों को कई अर्थों में लिया जाता है, लेकिन मुख्यतया नेतृत्व के निम्न कार्य माने जा सकते है-

(1) अभिप्रेरणा व समन्वय - नेतृत्व का कार्य  समूह सदस्यों को क्षमतानुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करना तथा उनके कार्य में समन्वय उत्पन्न कर लक्ष्य को प्राप्त करना ।

(2) निर्देशन एवं नियोजन - नेतृत्व का प्रमुख कार्य है, कार्य का नियोजन तथा संगठन के सदस्यों का लक्ष्य प्राप्ति की ओर निर्देशन । समूह का नेता समूह के प्रतिनिधि के रूप में उच्च स्तरीय बैठकों में भाग लेता है तथा संगठन के लक्ष्य एवं नीतियाँ निर्धारित करने में सहयोग करता है। इसके उपरान्त वह उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सदस्यों का मार्गदर्शन करता है।

(3) स्वास्थ्यप्रद वातावरण का निर्माण- एक संगठन में संगठनात्मक वातावरण का कर्मचारियों के कार्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नेता का यह कार्य है कि वह अपने विभाग में ऐसे स्वस्थ व मित्रतापूर्ण वातावरण का निर्माण करे, जिससे कर्मचारी इच्छापूर्वक तथा प्रसन्नता के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित हों। कर्मचारियों के मध्य व्याप्त आपसी मनमुटाव तथा कटुताओं को दूर करने का प्रयास भी नेता को करना चाहिए, अन्यथा इनसे कार्य वातावरण दूषित होता है।

(4) सदस्यों को प्रोन्नति तथा विकास- नेतृत्व का यह महत्वपूर्ण कार्य है कि वह अपने समूह सदस्यों की आकांक्षाओं तथा इच्छाओं को समझे और उन्हें सन्तुष्ट करने में योगदान दे। इसके साथ ही सदस्यों को आगे बढ़ने और विकास करने के अवसर भी प्रदान करे।

(5) पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करना- नेतृत्व अपने समूह सदस्यों के लिए पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करता है। वह अच्छा कार्य करने वालों को पुरस्कार तथा अक्षम या गलत कार्य करने वालों को दण्ड देता है अथवा उच्च प्रबन्ध को इस सम्बन्ध में सिफारिश करता है। नेता को ही अपने समूह सदस्यों के मनोभावों का ठीक से पता रहता है कि किस प्रकार का पुरस्कार उन्हें अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

(6) अधीनस्थों का सहयोग प्राप्त करना- नेता को चाहिए कि वह नेतृत्व की ऐसी शैली अपनाये जो उसे अधीनस्थों का पूर्ण सहयोग प्रदान कर सके। इस दृष्टि से वह जनतान्त्रिक दृष्टिकोण अपना सकता है, जिसमें समय-समय पर समस्याओं के समाधान हेतु कर्मचारियों का परामर्श प्राप्त किया जा सकता है और प्रबन्धकीय निर्णयों में उन्हें भागीदार बनाया जा सकता है।

(7) सूचनाएँ तकनीकी सहायता प्रदान करना- नेतृत्व का यह कार्य है कि वह समूह सदस्यों को उनके कार्य तथा हितों से सम्बन्धित सूचनाएं प्रेषित करे तथा उन्हें कार्य करते समय कठिनाई उत्पन्न होने पर तकनीकी तथा अन्य प्रकार की सहायता भी प्रदान करे।

(8) आदर्श प्रस्तुत करना- नेतृत्व निष्पक्ष, निःस्वाथ, योग्य व साहसी होना चाहिए। नेतृत्व को समूह के सदस्यों के सामने अपने व्यवहार व आचरण से ऐसे आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए, अपने अनुयायियों से अपेक्षा रखता है। आचरण द्वारा आदर्शो का प्रस्तुतीकरण नेतृत्व को प्रभावशाली बनाने का एकमात्र अचूक शस्त्र है ।



2.    सामाजिक क्रिया के उद्देश्य एवं तकनीकों को लिखें।

नेतृत्व 

नेतृत्व एक प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति सामाजिक प्रभाव के द्वारा अन्य लोगों की सहायता लेते हुए एक कॉमन कार्य सिद्ध करता है। नेतृत्व वह है जो लोगों के लिए एक ऐसा मार्ग बनाये जिसमें लोग अपना योगदान दे कर कुछ असाधारण कर सकें।एक नेता की तीन सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाएँ प्रेरक, संचारक और एकजुट करने वाले हैं। नेता अपनी टीम के सदस्यों को महान कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं, स्पष्ट रूप से और लगातार उन्हें अपेक्षाओं और संगठन के सांस्कृतिक मानदंडों के बारे में बताते हैं, और उन्हें लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उद्देश्य की साझा भावना के साथ एकजुट करते हैं। एक नेता का सबसे महत्वपूर्ण कार्य टीम के सदस्यों के लिए लक्ष्य निर्धारित करना है ताकि उन्हें आत्मविश्वास और उत्साह से काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। फिर वे उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए रणनीति भी बनाते हैं। उनका मकसद अपनी टीम के सदस्यों के लिए एक रोडमैप बनाना है कि उन्हें सही रास्ते पर कैसे निर्देशित किया जाए और निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में कैसे मदद की जाए

नेतृत्व के कार्य¼Functions of Leadership½

नेतृत्व के कार्यों को कई अर्थों में लिया जाता है, लेकिन मुख्यतया नेतृत्व के निम्न कार्य माने जा सकते है-

(1) अभिप्रेरणा व समन्वय - नेतृत्व का कार्य  समूह सदस्यों को क्षमतानुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करना तथा उनके कार्य में समन्वय उत्पन्न कर लक्ष्य को प्राप्त करना ।

(2) निर्देशन एवं नियोजन - नेतृत्व का प्रमुख कार्य है, कार्य का नियोजन तथा संगठन के सदस्यों का लक्ष्य प्राप्ति की ओर निर्देशन । समूह का नेता समूह के प्रतिनिधि के रूप में उच्च स्तरीय बैठकों में भाग लेता है तथा संगठन के लक्ष्य एवं नीतियाँ निर्धारित करने में सहयोग करता है। इसके उपरान्त वह उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सदस्यों का मार्गदर्शन करता है।

(3) स्वास्थ्यप्रद वातावरण का निर्माण- एक संगठन में संगठनात्मक वातावरण का कर्मचारियों के कार्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नेता का यह कार्य है कि वह अपने विभाग में ऐसे स्वस्थ व मित्रतापूर्ण वातावरण का निर्माण करे, जिससे कर्मचारी इच्छापूर्वक तथा प्रसन्नता के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित हों। कर्मचारियों के मध्य व्याप्त आपसी मनमुटाव तथा कटुताओं को दूर करने का प्रयास भी नेता को करना चाहिए, अन्यथा इनसे कार्य वातावरण दूषित होता है।

(4) सदस्यों को प्रोन्नति तथा विकास- नेतृत्व का यह महत्वपूर्ण कार्य है कि वह अपने समूह सदस्यों की आकांक्षाओं तथा इच्छाओं को समझे और उन्हें सन्तुष्ट करने में योगदान दे। इसके साथ ही सदस्यों को आगे बढ़ने और विकास करने के अवसर भी प्रदान करे।

(5) पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करना- नेतृत्व अपने समूह सदस्यों के लिए पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करता है। वह अच्छा कार्य करने वालों को पुरस्कार तथा अक्षम या गलत कार्य करने वालों को दण्ड देता है अथवा उच्च प्रबन्ध को इस सम्बन्ध में सिफारिश करता है। नेता को ही अपने समूह सदस्यों के मनोभावों का ठीक से पता रहता है कि किस प्रकार का पुरस्कार उन्हें अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

(6) अधीनस्थों का सहयोग प्राप्त करना- नेता को चाहिए कि वह नेतृत्व की ऐसी शैली अपनाये जो उसे अधीनस्थों का पूर्ण सहयोग प्रदान कर सके। इस दृष्टि से वह जनतान्त्रिक दृष्टिकोण अपना सकता है, जिसमें समय-समय पर समस्याओं के समाधान हेतु कर्मचारियों का परामर्श प्राप्त किया जा सकता है और प्रबन्धकीय निर्णयों में उन्हें भागीदार बनाया जा सकता है।

(7) सूचनाएँ तकनीकी सहायता प्रदान करना- नेतृत्व का यह कार्य है कि वह समूह सदस्यों को उनके कार्य तथा हितों से सम्बन्धित सूचनाएं प्रेषित करे तथा उन्हें कार्य करते समय कठिनाई उत्पन्न होने पर तकनीकी तथा अन्य प्रकार की सहायता भी प्रदान करे।

(8) आदर्श प्रस्तुत करना- नेतृत्व निष्पक्ष, निःस्वाथ, योग्य व साहसी होना चाहिए। नेतृत्व को समूह के सदस्यों के सामने अपने व्यवहार व आचरण से ऐसे आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए, अपने अनुयायियों से अपेक्षा रखता है। आचरण द्वारा आदर्शो का प्रस्तुतीकरण नेतृत्व को प्रभावशाली बनाने का एकमात्र अचूक शस्त्र है 

OR


सामाजिक क्रिया का मुख्य उद्देश्य समाज में समस्याओं के समाधान को प्रोत्साहित करना होता है। इसके तकनीक और उद्देश्यों को निम्नलिखित रूप में व्याख्या किया जा सकता है:

### उद्देश्य (Objectives):

1. समाजिक परिवर्तन: सामाजिक क्रिया का प्रमुख उद्देश्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना होता है। यह समस्याओं जैसे कि गरीबी, अन्याय, असंतुलन आदि को समाधान करने के लिए संगठित रूप से किया जाता है।

2. सामाजिक न्याय: सामाजिक क्रिया का उद्देश्य सामाजिक न्याय और समानता को स्थापित करना होता है। यह विभिन्न समुदायों और समाज के वर्गों के बीच समानता और न्याय की स्थिति स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहता है।

3. शिक्षा और जागरूकता: सामाजिक क्रिया शिक्षा और जागरूकता को बढ़ाने का भी माध्यम होता है। इसके जरिए समुदायों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक किया जाता है।

4. सामाजिक संगठन: सामाजिक क्रिया का उद्देश्य समुदायों को संगठित करना भी होता है, ताकि उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए एक साथ मिलकर काम कर सकें।

### तकनीक (Techniques):

1. आंदोलन और प्रदर्शन: समाजिक क्रिया का एक प्रमुख तकनीक आंदोलन और प्रदर्शन होता है, जिसमें समाज के विभिन्न समुदायों और संगठनों के सदस्य समुदाय के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और उन्हें सरकार और समाज को बदलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

2. शिक्षा और प्रशिक्षण: सामाजिक क्रिया में शिक्षा और प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाता है और उन्हें समाज में सक्रिय बनाने के लिए तैयार किया जाता है।

3. संघटना और गतिविधियाँ: सामाजिक क्रिया में संघटना और गतिविधियों का विशेष महत्व होता है। इसके माध्यम से समुदाय के सदस्य एकजुट होते हैं और समस्याओं का समाधान के लिए सक्रिय रूप से काम करते हैं।

4. प्रेरणा और संवेदनशीलता: सामाजिक क्रिया में लोगों को प्रेरित करने और संवेदनशील बनाने के लिए भी कार्य किया जाता है। इसके द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर लोगों को समस्याओं के समाधान के लिए उत्तेजित किया जाता है।

इन तकनीकों के माध्यम से सामाजिक क्रिया समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने और समस्याओं का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

3.    सामुदायिक संगठन का समाजकार्य की अन्य पद्धतियों से संबंध स्पष्ट करें।

सामुदायिक संगठन का समाजकार्य किसी अन्य पद्धति से भिन्न होता है। यहाँ वे कुछ मुख्य अंतर दिए गए हैं:

1. संस्थागत समाजकार्य: सामुदायिक संगठन स्थायी संगठनों के रूप में काम करते हैं जो दीर्घकालिक योजनाओं, प्रोग्राम्स और परियोजनाओं के माध्यम से समाजिक समस्याओं का समाधान करते हैं।

2. आंदोलन: सामुदायिक संगठन आमतौर पर संघर्षात्मक रूप से समाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करने के लिए आंदोलन या प्रदर्शन का आयोजन करते हैं।

3. सहभागी समाजकार्य: यह संगठन समुदाय के सदस्यों को शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करके उन्हें सामाजिक रूप से सक्रिय बनाने के लिए काम करते हैं।

4. व्यक्तिगत समाजकार्य: सामुदायिक संगठन व्यक्तियों के व्यक्तिगत स्तर पर भी समाज सेवा का कार्य कर सकते हैं, जैसे कि वृद्धाश्रम, बालवाड़ी, या ग्रामीण विकास कार्य।

इन पद्धतियों के माध्यम से सामुदायिक संगठन समाज में समस्याओं के समाधान में सक्रिय रहते हैं और सामाजिक परिवर्तन को उत्तेजित करने का कार्य करते हैं।

4.    मीटिंग के मिनीट्स कैसे लिखेंगे।

मीटिंग मिनट्स के 8 आवश्यक घटकः

  • बैठक की तिथि, समय और स्थान
  • उपस्थित लोगों की सूची और अनुपस्थिति के लिए क्षमा याचना
  • बैठक का एजेंडा और उद्देश्य
  • चर्चाओं और किए गए निर्णयों का सारांश
  • कोई भी वोट लिया गया और उसके परिणाम
  • जिम्मेदार पार्टी और पूरा होने की समय सीमा सहित एक्शन आइटम
  • कोई अगला कदम या अनुवर्ती आइटम
  • बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय को कार्यान्वित करने के लिए कौन सा पत्र जारी किया जाता है?

इकाई पंचमी 

1.    एकीकृत समाजकार्य के उद्देश्य लिखिए।



2.    सामुदायिक संगठन में परिवर्तन एजेण्ट प्रणाली क्या है?
3.    सामाजिक उपागम की विशेषताओं को लिखिए।
4.    एकीकृत समाजकार्य की अवधारणा को लिखिए।

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