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औद्योगिक संगठनों में समाज कार्य : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर

इकाई प्रथम 

 1.    भारत में श्रम विधानों का ऐतिहासिक विकास का वर्णन कीजिए।
 2.    सामाजिक सुरक्षा क्या है? इसका अर्थ बताते हुए क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
 3.    प्रमुख सामाजिक  सुरक्षा कार्यक्रमों कावर्णन कीजिए।
 4.    औद्योगिक समाजकार्य क्या है? चर्चा करें।



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इकाई द्वितीय

1.    भारत में औद्योगिक विकास की अवधारणा एवं आवश्यकता का वर्णन करें।

औद्योगिक विकास
औद्योगिक विकासआधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। सभ्यता के विकास के साथ ही साथ इस शब्द के महत्व में और भी वृद्धि होती जा रही है। यदि इस शब्द का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि इस शब्द की उत्पत्ति उद्योग से हुई है। उद्योग मानव जीवन का आधार है और इसके अभाव में मनुष्य अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता है। वैसे भी उद्योग का साधारण अर्थ है परिश्रम करना या प्रयास करना, आदि। मौलिक प्रश्न यह है कि व्यक्ति परिश्रम क्यों करता है? क्या परिश्रम किए बिना वह जिन्दा नहीं रह सकता है? इसके उत्तर में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि परिश्रम मानव जीवन के लिए अनिवार्य है। मनुष्य की अनेक आवश्यकताएँ होती हैं और वह इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिश्रम करता है। वह जीवनयापन के साधनों को अपनाता है और इन्हीं साधनों को उद्योग के नाम से जाना जाता है।
उद्योगों का सफलतापूर्वक सम्पादन तभी सम्भव हो सकता है जबकि मशीनें और यंत्र हों। इसका परिणाम यह होता है कि उद्योगों में यंत्रों और मशीनों को अपनाने की प्रक्रिया हो जाती है। इसी प्रक्रिया को यंत्रीकरण के नाम से जाना जाता है। वैसे तो प्रत्येक उद्योगों में यंत्रों की आवश्यकता होती है, किन्तु यंत्रीकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके माध्यम से यंत्र ही उद्योगो के आधार होते हैं। औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बड़े पैमाने के नवीन उद्योगों को प्रारम्भ किया जाता है और साथ ही जो छोटे उद्योग होते हैं उन्हें विशाल उद्योगों में परिवर्तित किया जाता है। औद्योगीकरण की पीकागचांग ने इस प्रकार परिभाषा दी है-
‘‘औद्योगीकरण एक प्रक्रिया है। जिसके अन्तर्गत उत्पादन कार्य से सम्बन्धित अनेक परिवर्तन होते रहते है। इसके अन्तर्गत तीन मौलिक परिवर्तन आते है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यावसायिक साहस का यंत्रीकरण, नवीन उद्योगों की स्थापना, नए बाजार की खोज एव नए क्षेत्रों का शोषण होता है। संक्षेप में, औद्योगीकरण एक साधन है, जिसके द्वारा पूँजी का विस्तार एवं विकास किया जाता है।‘‘‘ इस प्रकार ‘‘औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसकी सहायता से नवीन उद्योगों की स्थापना की जातीहै और प्राचीन उद्योगों को विशाल पैमाने में परिवर्तित किया जाता है। इस परिवर्तन के लिए विशाल यंत्रों और मशीनों का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय प्रगति में वृद्धि करना होता है।‘‘


भारत में उद्योगों का विकास


यदि हम भारत में औद्योगीकरण की विवेचना करें तो स्पष्ट होता है कि यहाँ पर औद्योगीकरण की स्थापना 19वीं शताब्दी के मध्य में हुई है। इसके इतिहास का अवलोकन करने से ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में काम करने वाले कर्मचारियों ने जूट और वस्त्र की मिलों की स्थापना सबसे पहले भारत में की थी। भारत के दो प्रमुख नगरों कलकत्ता और बम्बई में सबसे पहले कारखाने की स्थापना की गई। यद्यापि भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया 1850 से ही प्रारम्भ हुई थी, किन्तु प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इस क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई। औद्योगीकरण प्रमुख रूप से दो क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापन से हुआ।


(1) बम्बई और अहमदाबाद में सूत्री वस्त्र मिलों के कारण
(2) कलकत्ता में जूट की मिलों की स्थापना के कारण।
इसी प्रकार 1876 में ‘लाल इमली के नाम से कानपुर में सबसे पहले ऊनी कपड़ों के मिलों की स्थापना की गई। 1882 में पंजाब में धारीवाल नामक मिल की स्थापना की गई थी। इसके साथ ही अनेक नगरों में रेशमी कपड़े के मिलों की स्थापना हुई जैसे मैसूर, सूरत, बम्बई, बेलगाँव वाराणसी, अमृतसर आदि। इसके कारण भी औद्योगीकरण की प्रक्रिया को काफी गति मिली है।
1974 के भारत में औद्योगीकरण अत्यन्त ही तीव्र गति से हुआ है। स्वतंत्रता के बाद अनेक विशाल कारखानों की स्थापना के कारण औद्योगीकरण को काफी गति मिली है।


भारत में औद्योगीकरण की आवश्यकता


औद्योगीकरण प्रत्येक देश के लिए उपयोगी है। इसी कारण भारतवर्ष में भी इसका महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। भारतवर्ष में वास्तविक औद्योगिक की प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद ही प्रारम्भ होती है भारतवर्ष मे निम्न कारणों से औद्योगीकरण की अत्यन्त ही आवश्यकता है-

(1)     भारतवर्ष आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश नहीं है। देश के सन्तुलित आर्थिक विकास के लिए औद्योगीकरण की अत्यन्त ही आवश्यकता है।
(2)     भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहाँ के हल, बैल, बीज, पशु आदि अत्यन्त ही पिछड़ी अवस्था में हैं। इसके साथ ही भारतीय किसान अत्यन्त ही रूढ़िवादी और अन्धविश्वासी है। इसका कारण भी स्पष्ट है। भारतीय किसान को खेती के लिए कृषि पर आश्रित रहना पड़ता है। इस दृष्टिकोंण से भारत की उन्नति के लिए औद्योगीकरण आवश्यक है।
(3)     औद्योगीकरण का जनसंख्या पर भी प्रभाव पड़ता है। भारत में जनसंख्या की जो तीव्र गति से वृद्धि हो रही है उसे रोकने तथा सन्तुलन बनाये रखने के लिए भी औद्योगीकरण आवश्यक है।
(4)     भारत में बेरोजगारी प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए औद्योगीकरण ही एकमात्र उपाय है। औद्योगीकरण से अनेक व्यक्तियों को रोजगार दिया जा सकता है।
(5)    भारत में प्रति व्यक्ति आय भी अत्यन्त ही कम है। इस आमदनी में वृद्धि के लिए आवश्यक है।कि भारत में औद्योगीकरण को अपनाया जाए।
(6)    औद्योगीकरण के द्वारा युद्ध सामग्री का उत्पादन किया जा सकता है। इससे देश की सैनिक शक्ति में वृद्धि होती है। इसलिए सामाजिक दृष्टि से भी भारत में औद्योगीकरण आवश्यक है।
(7)    औद्योगीकरण ही एक साधन है जिसके माध्यम से लघु और विशाल उद्योगों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। भारतवर्ष में जहाँ लघु उद्योगों की आवश्यकता है, औद्योगीकरण अत्यन्त ही आवश्यक है।
(8)    औद्योगीकरण ही एक ऐसा साधन है जिसकी सहायता से देश का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।



    2.    भारत में श्रम कल्याण क्षेत्रों का वर्णन करें।

श्रम कल्याण कार्य के अंग
1 स्थान की दृष्टि से वर्गीकरण

  •     कारखाने के अन्दर कल्याणकार्य
  •     कारखाने के बाहर कल्याणकार्य

2. प्रबंध की दृष्टि से वर्गीकरण

  •     श्रम कल्याण कानून
  •     ऐच्छिक श्रम कल्याण
  •    पारस्परिक श्रम कल्याण

3. प्रदान करने वाले संगठन की दृष्टि से वर्गीकरण

  •      सेवायोजको द्वारा
  •      सरकार द्वारा
  •      मजदूर संघ द्वारा
  •      समाज की अन्य संस्थाओं द्वारा

1.    स्थान की दृष्टि से वर्गीकरण - ब्राउण्ट ने श्रमिक कल्याण के कार्य को दो भागो में बाँटा है।

  • कारखाने के अंदर का कल्याण कार्य :- वैज्ञानिक भर्ती श्रमिकों की भर्ती वैज्ञानिक ढंग से करना औद्योगिक प्रशिक्षण विभिन्न कारखानो मे विशिष्ट कार्यों का प्रशिक्षण स्वच्छता प्रकाश तथा वायु का प्रबंध इससे कारखाने में सफाई-पुताई रोशनदानों का प्रबंध, पीने के पानी का प्रबंध, स्नानगृह शौचालय, मूत्रालय आदि की व्यवस्था रोशनी का प्रबंध तथा सर्दी को कम करने की व्यवस्थाएं आती है। दुर्घटनाओं की रोकथाम - इसमें खतरनाक यंत्रो अत्यधिक ताप आदि से बचाव तथा आग बुझाने का प्रबंध आदि सम्मिलित अन्य कार्य जैसे कैण्टीन थकावट दूर करने की व्यवस्था आराम की व्यवस्था आदि।
  •     कारखाने के बाहर का कल्याणकार्य
    •     सस्ते तथा पोषक युक्त भोजन की व्यवस्था
    •     मनोरंजन की सुविधाएँ  क्लब, अखाडे, सिनेमा, रेडियो आदि।
    •     शिक्षा का प्रबंध इसमें प्रौढ शिक्षा सामाजिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा स्त्री पुरुष बालको कोदी जाती है।
    •     चिकित्सा व्यवस्था इसमें आराम, अवकाश, मुक्त, उपचार, आदि होते हैं।
    •     उत्तम आवासों की व्यवस्था

2.  प्रबंध की दृष्टि से वर्गीकरणः-

  •  कानूनी श्रम कल्याण - कानूनी श्रम कल्याण कार्यों से तात्पर्य उन समस्त कार्यों से है जो श्रमिको के हित के लिए सरकार की ओर से विभिन्न कानूनों के रूप में किये जाते हैं।
  •  ऐच्छिक श्रम कल्याण -  इस वर्ग में वे कल्याण आते है जिनको करनाकानूनन आवश्यक नहीं होता है  किन्तु उद्याोगपति इनको सेवा भावना अथवा सार्वजनिक हित के उद्देश्य से स्वयं करते हैं।
  •  पारस्परिक श्रम कल्याण -  कभी कभी उद्योगपति मजदूरी तथा अन्य दल भी परस्पर हित के लिए एक दूसरे की सहायता करके श्रम कल्याण की सेवाओं की व्यवस्था करते है। उद्योगपतियों और मजदूरों और दोनों का बहुधा सहयोग इन कार्यों में होता है

3.   प्रदान करने वाले संगठन की दृष्टिसे वर्गीकरणः-

  •  सेवायोजको द्वारा- मजदूरी के अतिरिक्त ऐच्छिक में दिया जाने वाला लाभ इस वर्ग में आता है। जैसे निवास, जलपान, यातायात आदि की सुविधा।
  •   सरकार द्वारा- अनेक राज्य सरकारो ने मजदूरों की उन्नति के लिएवयवस्था की है वह इसी श्रेणी की है।
  •   मजदूर संघ द्वारा- श्रमिक संघों का भी यह कर्तव्य है कि सदस्यों के लिए कुछ कल्याणकारी कार्य करें। कुछ श्रमिक संघ चिकित्सा आदि की भी व्यवस्था करते है।
  •   समाज की अन्य संस्थाओं द्वारा: अनेको धनी व्यक्ति संस्थाओं आदि भी श्रमिको के लिए शिक्षा अस्पताल आदि खुलवातें है। वे इस वर्ग में आते है।

श्रम कल्याण कार्यों की आवश्यकता

  •    श्रमिको मे उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत करने में सहायक होता है। जिससे राष्ट्रको अच्छे श्रमिक मिलते है।
  •    यह एक मानवीय कार्य है। जिसके द्वारा श्रमिको को पूर्ण तथा आरामदायक जीवनमिलता है इससे श्रमिक की कार्यकुशलता तथा कार्यक्षमता में वृद्धि की जाती है।
  •    इससे श्रमिको का मानसिक तथा नैतिक विकास किया जाता है।
  •    इससे श्रमिक की क्षमता तथा पूर्ति की वृद्धि करने तथा उनमें संगठन प्रवृत्ति कम करने की दिशा में लाभदायक होता है।



    3.    भारत के उद्योगों में श्रमिकों की विभिन्न समस्याओं का वर्णन कीजिए।

भारतीय श्रमिकों की प्रमुख समस्याएँ
समस्यायें मानव जीवन के साथ ही हैं। प्रत्येक विकसित और अविकसित देशों में कुछ न कुछ समयस्याएं होती है। भारत में अनेक प्रकार की समस्यायें हैं। इन समस्याओं में श्रमिकों की समस्या भी एक है। श्रमिकों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के कारण श्रमिकों की शारीरिक और मान क्षमता का ह्रास होता है। कार्यक्षमता की कमी चाहे शारीरिक हो या मानसिक उत्पादन को प्रभावित है। इससे उत्पादन में कमी आने से देश के विकास की गति धीमी हो जाती है। भारतवर्ष के श्रमिकों की प्रमुख समस्याओं को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-
(1)     प्रवासिता- प्रवासी प्रवृत्ति भारतीय श्रमिकों की मौलिक विशेषता है। प्रवासिता का अर्थ है कि भारतीय श्रमिक जहाँ काम करते हैं, वहाँ के मूलनिवासी नहीं होते हैं। इसके कारण उनका एक से दूसरे स्थान को आना जाना बना रहता है। इसके साथ ही भारतीय श्रमिक फसल और उत्सव के अवसर पर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हैं। इस कारण उन्हें अपना कार्य छोड़ना पड़ता है। भारतीय श्रमिकों में प्रवासिता के कारणों को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-

  •     कुटीर उद्योगों का पतन,
  •     जनसंख्या में वृद्धि और
  •     भूमि पर जनसंख्या का अधिक दबाव।


    प्रवासिता के दुष्परिणाम-प्रवासिता के दुष्परिणामों को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-

  •     कार्य कुशलता में कमी,
  •     स्वास्थ्य पर बुरा असर,
  •     अधिक व्यस्तता और मस्तिष्क पर अधिक दबाव,
  •     स्वस्थ्य मनोरंजन का अभाव और बुरी प्रवृत्तियों का विकास
  •     मजदूरी में कमी
  •     काम की अनिश्चितता में वृद्धि,
  •     औद्योगिक संगठनों पर प्रभाव

(2)     श्रमिकों के भर्ती की दोषपूर्ण पद्धति- श्रमिकों की दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या उनके भर्ती की पद्धति से सम्बन्धित है। इन समस्याओं में से कुछ प्रमुख समस्यायें इस प्रकार है- कि


(i)     श्रमिकों की भर्ती मध्यस्थों के द्वारा होती है। ये मध्यस्थ अनेक प्रकार की समस्यायें पैदा करते हैं-
(ii)     श्रमिकों और नालिकों के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति को जन्म देते हैं।
iii)     श्रमिकों की भर्ती में कुशलता और अकुशलता को महत्व नहीं देते है।
(iv)     भर्ती में मजदूरों से कमीशन लेते है।
(v)     भर्ती के अतिरिक्त श्रमिकों की पदोन्नति के कोई भी सन्तोषजनक नियम नहीं होते हैं। जिससे पदोन्नति के परिणामस्वरूप मजदूरों में असन्तोष की भावना का विकास होता है।
(vi)    स्थानान्तरण में भी पक्षपात किया जाता है। इसके कारण से भी श्रमिकों में अनेक प्रकार कीसमस्याओं का जन्म और विकास होता है।


(3)    अनुपस्थितता-अनुपस्थितता भारतीय श्रमिकों की तीसरी मौलिक विशेषता है। अनुपस्थितता या अर्थ है निर्धारित समय पर काम पर उपस्थित न होना। जब श्रमिक बिना पूर्व सूचना के काम पर नहीं जाते हैं तो इसे अनुपस्थितता कहा जाता है। अनुपस्थितता से श्रमिकों को निम्न हानियों उठानी पड़ती है-


(i)    इससे श्रमिकों को आर्थिक हानि होती हैै।
(ii)    अनुपस्थित रहने से श्रमिकों में अनुशासनहीनता की प्रवृत्ति का विकास होता है, जिससे उनकी उन्नति में बाधा उत्पन्न होती है,
(iii)     इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप श्रमिकों और मालिकों के बीच में संघर्ष की स्थिति का जन्म और विकास होता है.
(iv)    इससे परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

(4)     श्रमिकों के हेर-फेर की समस्या- उद्योगों में ऐसा पाया गया है कि कर्मचारियों के कार्यों की प्रकृति में हेर फेर किया जाता है, या परिवर्तन होता रहता है। इस हेर फेर की समस्या का श्रमिकों के ऊपर निम्न कुप्रभाव पड़ता है-


   (i)      इससे श्रमिकों के संगठन को हानि पहुँचती है।
   (ii)     श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी आती है,
   (iii)     सेवाओं में स्थायित्व की कमी के कारण उनके जीवन में उथल पुथल मची रहती है।
   (iv)    अनिश्चितता के कारण श्रमिक अपने भविष्य के सम्बन्ध में किसी प्रकार की योजना का निर्माण नहीं कर सकते हैं।
   (v)     श्रमिकों में हेर-फेर या परिवर्तन के कारण श्रम संगठनों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,
   (vi)    श्रमिकों में हेरफेर की प्रवृत्ति के कारण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता है।
   (vii)   इसके परिणामस्वरूप मानवीय व भौतिक प्रसाधनों के उपयोग में कठिनाइयां उत्पन्न होती है।


(5)    निम्न जीवन-स्तर- जीवन स्तर का सम्बन्ध मनुष्य की आदत से है। जीवन स्तर रहन-सहन के तरीकों को कहते हैं। संक्षेप में, जीवन स्तर का सम्बन्ध मनुष्य की आदतों से हैं, जिनकी तृप्ति का वह आदी हो गया है। जीवन स्तर को सुविधा की दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है-
    (i)    उच्च जीवन-स्तर और
    (ii)   निम्न जीवन-स्तर
    श्रमिकों के निम्न जीवन स्तर के परिणामस्वरूप उनके जीवन में निम्न समस्याओं का का जन्म होता है-
    (i)    कार्यकुशलता में कमी,
    (ii)   अशिक्षा और अज्ञानता में वृद्धि,
    (iii)   स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,
    (iv)   असन्तुलित और अपर्याप्त भोजन।
    (v)    स्वस्थ मनोरंजन का अभाव और जनसंख्या में वृद्धि।
    (vi)   तंग बस्तियों में निवास ।

(6)    ऋणग्रस्तता की समस्या-भारतीय श्रमिकों को सबसे बड़ी समस्या ऋणग्रस्तता की है। मजदूरों की कार्यक्षमता में कमी और उनके निम्न जीवन स्तर का सबसे प्रधान कारण है। शाही श्रम आयोग ने अपने अध्ययन में ऐसा पाया कि औद्योगिक क्षेत्रों के 3/4 श्रमिक ऋणग्रस्त है। औद्योगिक केन्द्रों में श्रमिकों में पाई जाने वाली ऋणग्रस्तता के अनेक कारण हैं। ऋणग्रस्तता का श्रमिकों के जीवन पर निम्न कुप्रभाव पड़ता है-
    (i)     श्रमिकों की कार्यकुशलता में कमी होती है।
    (ii)    श्रमिकों के नैतिक चरित्र में गिरावट आती है।
    (iii)   वर्ग संघर्ष की भावना का जन्म होता है।
    (iv)   ऋणग्रस्तता श्रमिक की मोल भाव या सौदा करने की शक्ति को कम करती है। इसके परिणामस्वरूप उन्हें वस्तुओं का अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है।
    (v)    इससे श्रमिकों में आत्म सम्मान की भावना का लोप होता है।
    (vi)   ऋणग्रस्तता में श्रमिकों के जीवन स्तर में निरन्तर गिरावट होती रहती है.
    (vii)   ऋणग्रस्तता के परिणामस्वरूप श्रमिकों की समस्त अभिलाषाओं का विनाश होता है।


(7)    काम करने की बुरी दशायें-मजदूरों के काम करने की जो दशायें हैं, उनकी विशेषतायें निम्न है-
    (i)      धूल, धुआं, आदि से सुरक्षा का अभाव।
    (ii)     कल्याण कार्यों की कमी और इनकी अव्यवस्था.
    (iii)    स्वच्छता का अभाव।
    (iv)    सुरक्षा का अभाव (यन्त्रों से)।
    (v)     स्वच्छ वायु और प्रकाश की कमी।
    (vi)    काम के अधिक घण्टे आदि।
    कारखाने में इन बुरी दशाओं में रहकर श्रमिकों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इस कठिन परिश्रम के कारण उनकी कार्यक्षमता में कमी होती है, स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है और ऋणग्रस्तता में वृद्धिहोती है।

(8)     पाली व्यवस्था के दोष- प्रायः सभी देशों और सभी उद्योगों में पाली अथवा शिफ्ट की प्रथा पाई जाती है। इस पाली की प्रथा के कारण मजदूरों को निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता
     (i)    रात्रि पालियाँ स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती हैं और इससे श्रमिकों की आयु सीमा कम होती है
     (ii)    कार्य के घण्टे फैले हुए होने के कारण मजदूरों को असुविधा का अनुभव होता है।
    (iii)    रात्रि पाली से पति पत्नी अलग रहते हैं और इससे अनैतिकता में वृद्धि होती है.
    (iv)    शिफ्ट प्रणाली के कारण मजदूरों को अनेक प्रकार की दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है।
    (v)    कुछ शिफ्ट ऐसे समय में प्रारम्भ और समाप्त होते हैं कि न तो समय पर खाना ही मिल पाता है और न नींद ही पूरी होती है।


(9)    काम करने के अधिक घण्टे- काम करने के अधिक घण्टे भारतीय श्रमिकों की अगली महत्वपूर्ण करना समस्या है। काम के घण्टों में अधिकता के कारण श्रमिकों को निम्न समस्याओं का सामना पड़ता है-
    (i)    सामाजिक जीवन के कार्यों की उपेक्षा।
    (ii)    कार्यक्षमता में कमी।
    (iii)    स्वास्थ्य में गिरावट।


(10)    स्वास्थ्य की समस्यायें- श्रमिकों की अन्य समस्याओं की तुलना में स्वास्थ्य की समस्या - अधिक महत्वपूर्ण है। आज का औद्योगिक काम अनेक खतरों और जोखिमों से भरा पड़ा है। उन्हें अत्यन्त ही दयनीय परिस्थितियों में कार्य करना पड़ता है। श्रमिकों की स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रमुख समस्यायें हैं-
      (i)    कार्यस्थल का दोषपूर्ण वातावरण।
     (ii)    हानिकरण पदार्थों का प्रयोग।
     (iii)    आवास की कमी।
     (iv)    चिकित्सा सुविधाओं का अभाव।


(11)     दोषपूर्ण प्रबन्ध की समस्या- इसके अन्तर्गत निम्न समस्यायें आती हैं।
     (i)     मालिक का व्यवहार।
    (ii)     काम का दोषपूर्ण विभाजन
    (iii)    शिक्षा का अभाव और मजदूरों की अज्ञानी प्रकृति।
    (iv)    रूढ़िवादिता और परम्परा प्रेम।




    4.    औद्योगिक विवादों को समझाते हुए इसके समाधानों पर प्रकाश डालें।

औद्योगिक विवाद
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा (K) के अनुसार औद्योगिक विवाद वे विवाद हैं जो ‘‘नियोक्ता और नियोक्ता के मध्य, नियोक्ता तथा कर्मचारियों के मध्य एवं श्रमिक तथा श्रमिक के मध्य विवाद अथवा मतभेद के रूप में प्रकट होते हैं, तथा जो रोजगार की शर्तों, कार्य की दशाओं तथा बेरोजगारी से सम्बन्धित होते हैं।


औद्योगिक विवाद के आवश्यक तत्व
(1)     कर्मचारी तथा नियोक्ता में संविदाजनित सम्बन्ध विद्यमान होने चाहिए। इनमें सेवा सम्बन्धी आपसी अनुबन्ध होना चाहिए तथा श्रमिक वास्तव में कार्यरत होना चाहिए।
(2)     विवाद श्रमिकों द्वारा अथवा उनके संगठनों द्वारा प्रस्तुत किये गये हों, किन्तु नियोक्ता द्वारा उन पर विचार न किया गया हो।
(3)     यह विवाद नियोक्ताओं के मध्य हो सकता है (जैसे मजदूरी की दर में स्पर्द्धा) श्रमिकों एवं नियोक्ताओं के मध्य हो सकता है (जैसे वर्गीकरण में उत्पन्न विवाद तथा कार्य आबंटन के समय उत्पन्न विवाद तथा श्रमिकों एवं श्रमिकों के मध्य हो सकता है।
(4)     विवाद नियोजन अथवा अनियोजन से सम्बन्धित भी हो सकता है तथा नियोजन की शर्तों एवं दशाओं से भी। अधिकारियों एवं प्रबन्धकों में कार्य की शर्तों एवं दशाओं सम्बन्धी विवाद को औद्योगिक विवाद नहीं कहा जाता।
(5)     विवाद ऐसे उद्योगों में प्रस्तुत किये जाने चाहिए जो कार्यरत हैं। अधिनियम एवं वैधानिक निर्णय के आधार पर औद्योगिक विवाद निम्न किसी भी बात को लेकरउत्पन्न हो सकते हैं

 

  1.     स्थायी आदेशों के औचित्य के सम्बन्ध में विवाद
  2.     छँटनी (नियोक्ता द्वारा श्रमिक को बिना किसी दण्ड अथवा अभियोग के सेवा से पृथक करना) जो व्यवसाय बन्द करने पर की जाती है (व्यवसाय बन्द करने का अर्थ किसी स्थान विशेष में व्यवसाय को बन्द करना नहीं, वरन सम्पूर्ण व्यवसाय की सामप्ति से है)। जबरी छुट्टी (कच्चे माल, ईंधन तथा पूँजी के अभाव, अधिक माल जमा होना अथवा ऐसे ही अन्य किसी कारण से नियोक्ता द्वारा श्रमिक को कार्य देने में असमर्थता प्रकट करना सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत श्रमिक को कार्य मुक्त कर दिया जाता है), निलम्बित श्रमिक को पुनः कार्य पर लेना, उसे निकालना अथवा तत्सम्बन्धी क्षतिपूर्ति के प्रश्न को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है।आदि।
  3.     किसी सरकारी घोषणा, निर्णय या विवाद के प्रतिफल का लाभ श्रमिक को देने से मना करनेपर सामयिक नियुक्ति वाले श्रमिक को सामयिक भत्ता देने से इन्कार करना।
  4.     मजदूरी की न्यूनतम दर निर्धारित करने, भुगतान विधि तथा श्रमिक के किसी अधिकार का हनन करने के प्रश्न पर।
  5.     तालाबन्दी (जय नियोजक श्रमिक को कार्य देने से मना कर दे तथा उन्हें कार्य स्थल पर जाने की अनुमति न दें। क्षतिपूर्ति के दावे सम्बन्धी तथा किसी हड़ताल को अवैध घोषित करने कीसमस्या को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है।
  6.     नगरपालिकाओं एवं उनके कर्मचारियों के मध्य हुए विवाद।
  7.     प्रतिस्पर्दी संगठनो के मध्य विवाद।
  8.     कर्मचारी एवं नियोक्ता के मध्य विवाद।

औद्योगिक विवादो के कारण

उद्योगों में पूँजीवादी की वृद्धि तथा श्रम विक्रेता (श्रमिक) तथा श्रम क्रेता (उत्पादक) दो वर्ग बन जाने के कारण श्रम संघर्षों की उत्पत्ति हुई है। श्रमिक असन्तोष, वर्ग भेद, कार्य का अनुचित वातावरण, कम मजदूरी, श्रमिक के साथ मानवीय व्यवहार की कमी, आदि कई कारणों से विवादों में वृद्धि होती गई। जब श्रमिक अपनी सेवाएँ बेचते है तथा सामूहिक रूप से एक स्थान पर, एक छत के नीचे कार्य करते हैं तो संघों का निर्माण होता है। इससे श्रमिक संगठित होकर विवाद प्रस्तुत करते हैं। श्रमिक ऊची मजदूरी तथा अधिक सुविधाएँ पसन्द करते हैं, परन्तु नियोक्ता श्रमिकों को कम मजदूरी देकर उनसे अधिक कार्य लेना चाहते हैं। श्रमिक यह चाहते है कि उनके कार्य की दशाएँ स्वास्थ्यप्रद हो उन्हें उन्नति के अधिक अवसर उपलब्ध हों प्रबन्ध में उनकी सलाह ली जाये तथा अधिक समय कार्य करने की दशा मे अधिक अभिप्रेरण दिया जाये। जब नियोक्ताओं द्वारा श्रमिकों की इच्छाएं पूरी नहीं की जातीं या नियोक्ताओं द्वारा उनको न्यायोचित मांगों पर किसी भी प्रकार का ध्यान नहीं दिया जाता तो श्रमिकहड़ताले अथवा धीमे कार्य करना अथवा इसी प्रकार की अन्य कार्यवाहीयाँ करते हैं जिनसे उनका असन्तोष प्रदर्शित हो सके। प्रायः कई कारण एकत्र होकर हड़ताल का रूप लेते हैं।


तालाबन्दी- ‘‘तालाबन्दी से अर्थ कार्य के स्थान को बन्द करना या कार्य रोक देना या नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों को काम करने से रोकना है। धारा 2 (1) औद्योगिक विवाद अधिनियमनियोक्ता तालाबन्दी की घोषणा करके अपने कर्मचारियों से कार्य के अवसर छीन लेते हैं तथा इससे अपनी शर्तें मनवाने तथा उन दी हुई शर्तो पर एवं उपलब्ध कार्य की दशाओं में कार्य करने के लिए उन्हें बाध्य करते है। कार्य अवरोध, जो तालाबन्दी के फलस्वरूप हुए हैं, के पृथक समंकों के रूप में सन् 1949 से ही उपलब्ध है। उपलब्ध समंकों को देखने से पता लगता है कि इनमें से अधिकांश पहले हड़तालों के रूप में प्रस्तुत किये जाते थे और बाद में तालाबन्दी के रूप में।
औद्योगिक विवाद का निवारण करने में वैधानिक प्रणाली तथा ऐच्छिक पंच निर्णय प्रणाली का प्रयोग भी किया जाता है।


भारत में विवाद रोकथाम एवं निवारण प्रणालियाँ


वैधानिक प्रणालियाँ
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अंतर्गत
1. कार्य समितियां
2. संयुक्त समितियां
3. समझौता प्रणाली (सझौता अधिकारी, समझौता बोर्ड तथा जांच न्यायलय)
4. न्यायाधिकरण प्रणाली ( श्रम न्यायलय, औद्योगिक ट्रिब्यूनल एवं राष्ट्रीयट्रिब्यूनल)
5. त्रिपक्षीय प्रणाली ( अस्थायी श्रम समिति, भारतीय श्रम सम्मेलन, औद्योगिक समिति)


ऐच्छिक प्रणालियां
1. श्रम संघों की मान्यता देना
2. परिवाद निवारण प्रणाली (1958) लागू करना
3. सलाहकार प्रणाली (संयुक्त प्रबन्ध तथा अन्य समितियां)
5. समझौता लागू करना
6. सामूहिक सौदेबाजी
7 निवारण एवं निर्णय
8. अनुशासन संहिता 1957
9 आचार संहिता, 1958
10 कल्याण एवं दक्षता संहिता
11 औद्योगिक नियोजन स्थायी आदेश,1946
12 औद्योगिक संधि प्रस्ताव 1962

OR

विवादों का निपटारा :

यदि औद्योगिक शांति किसी राष्ट्र की रीढ़ है, तो हड़तालें और तालाबंदी उसके लिए कैंसर हैं, क्योंकि वे कारखानों में उत्पादन और शांति को प्रभावित करती हैं।

किसी भी देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में सौहार्दपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण औद्योगिक संबंधों की बहुत महत्वपूर्ण और सार्थक भूमिका होती है। उद्योग समाज का हिस्सा है और इसलिए समाज के दृष्टिकोण से अच्छे औद्योगिक संबंध महत्वपूर्ण हैं।

आजकल, औद्योगिक संबंध प्रबंधन और कार्यबल या कर्मचारियों के बीच द्विपक्षीय मामला नहीं रह गया है। सरकार औद्योगिक संबंधों को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभा रही है। इसलिए, औद्योगिक संबंधों की अवधारणा कर्मचारियों, नियोक्ताओं और संबंधित सरकार के बीच एक त्रिपक्षीय मामला बन गई है।

यदि प्रबंधन द्वारा समय रहते कदम उठाए जाएं तो औद्योगिक विवादों का निपटारा संभव है। यदि प्रबंधन और श्रमिकों के बीच न्यायसंगत व्यवस्था और समायोजन हो तो ऐसे विवादों को रोका जा सकता है और सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाया जा सकता है।

औद्योगिक विवादों की रोकथाम और निपटान के लिए निम्नलिखित तंत्र हैं:

(i) कार्य समितियां :

यह समिति श्रमिकों और नियोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करती है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत, कार्य समितियां उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों में मौजूद हैं जिनमें पिछले वर्ष के दौरान एक सौ या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत थे।

कार्य समिति का कर्तव्य नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच सौहार्द और अच्छे संबंधों को सुरक्षित और संरक्षित करने के उपायों को बढ़ावा देना है। यह कुछ मामलों जैसे काम की स्थिति, सुविधाएँ, सुरक्षा और दुर्घटना की रोकथाम, शैक्षिक और मनोरंजक सुविधाओं से भी निपटता है।

(ii) सुलह अधिकारी :

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत सरकार द्वारा सुलह अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है।

सुलह अधिकारी के कर्तव्य नीचे दिए गए हैं:

(i) उसे विवाद का निष्पक्ष और सौहार्दपूर्ण समाधान निकालना होगा। सार्वजनिक उपयोगिता सेवा के मामले में, उसे निर्धारित तरीके से सुलह कार्यवाही करनी होगी।

(ii) यदि कोई विवाद सुलह कार्यवाही के दौरान सुलझा लिया जाता है तो वह पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौते के चार्टर के साथ सरकार को रिपोर्ट भेजेगा।

(iii) जहां कोई समझौता नहीं हो पाता है, वहां सुलह अधिकारी सरकार को एक रिपोर्ट भेजेगा जिसमें विवाद से संबंधित तथ्यों, परिस्थितियों तथा समझौता करने के कारणों का पता लगाने के लिए उसके द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख होगा तथा सुलह कार्यवाही शुरू होने के 14 दिनों के भीतर समझौता करने का कारण भी बताएगा।

सुलह बोर्ड :

सरकार औद्योगिक विवादों के निपटारे को बढ़ावा देने के लिए एक सुलह बोर्ड भी नियुक्त कर सकती है। बोर्ड का अध्यक्ष एक स्वतंत्र व्यक्ति होता है और अन्य सदस्यों (दो या चार हो सकते हैं) का विवादों के पक्षों द्वारा समान रूप से प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए।

बोर्ड के कर्तव्यों में निम्नलिखित शामिल हैं:

(क) विवाद तथा उसके गुण-दोष को प्रभावित करने वाले सभी मामलों की जांच करना तथा पक्षों को निष्पक्ष एवं सौहार्दपूर्ण समझौते पर पहुंचने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से हर संभव प्रयास करना।

(ख) बोर्ड को सरकार को एक रिपोर्ट भेजनी होगी कि विवाद का निपटारा हुआ है या नहीं, विवाद को सरकार को भेजे जाने की तारीख से दो महीने के भीतर।

(iii) जांच न्यायालय :

सरकार किसी औद्योगिक विवाद की जांच के लिए जांच न्यायालय नियुक्त कर सकती है। न्यायालय में एक व्यक्ति या एक से अधिक व्यक्ति हो सकते हैं और ऐसी स्थिति में उनमें से एक व्यक्ति इसका अध्यक्ष होगा। न्यायालय को मामले की जांच करनी होगी और छह महीने की अवधि के भीतर सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

(iv) श्रम न्यायालय :

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की द्वितीय अनुसूची के अनुसार।

सरकार निम्नलिखित मामलों से निपटने के लिए श्रम न्यायालयों की स्थापना करती है:

(i) स्थायी आदेशों के तहत नियोक्ता द्वारा पारित आदेश की औचित्य या वैधता।

(ii) पारित स्थायी आदेशों का अनुप्रयोग एवं व्याख्या।

(iii) कामगारों की बर्खास्तगी या सेवा से उनकी बहाली, गलत तरीके से बर्खास्त किए गए कामगारों को राहत प्रदान करना।

(iv) किसी भी परम्परागत विशेषाधिकार की रियायत को वापस लेना।

(v) हड़ताल या तालाबंदी की अवैधता या अन्यथाता, तथा अन्य सभी मामले जो तीसरी अनुसूची में निर्दिष्ट नहीं हैं।

(v) औद्योगिक न्यायाधिकरण :

औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए सरकार द्वारा एक न्यायाधिकरण नियुक्त किया जाता है।

(vi) राष्ट्रीय न्यायाधिकरण :

राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों से संबंधित औद्योगिक विवादों के लिए केन्द्र सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय न्यायाधिकरण का गठन किया जाता है।

(vii) मध्यस्थता :

नियोक्ता और कर्मचारी मध्यस्थ नामक एक स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यक्ति की नियुक्ति करके विवाद को निपटाने के लिए सहमत हो सकते हैं। मध्यस्थता न्यूनतम लागत पर न्याय प्रदान करती है।




    5.    हड़ताल के कारणों को बताते हुए इसकी अवधारणा प्रस्तुत करें।

हड़ताल व तालेबन्दी से अर्थ अथवा औद्योगिक विवाद के अनुभाग


जब कोई विवाद व्यापक रूप धारण कर लेता है तो हड़ताल की जाती है, प्रदर्शन किये जाते है, धरना दिया जाता है, उस दशा में परिवाद औद्योगिक विवाद बन जाता है। इस प्रकार उपरोक्त सभी तत्व औद्योगिक विवाद के अंग है।


(1) हड़ताल-एक अस्थायी रूप से कार्य की रुकावट है जो ‘‘श्रमिकों द्वारा अपने असन्तोष को व्यक्त करने, अपनी माँगें स्वीकृत करवाने तथा कार्य की दशाएं सुधारने हेतु नियोक्ता से आग्रह है।‘‘
    औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (Q) के अनुसार, ‘‘व्यक्तियों के समूह द्वारा, जो मिलकर कार्य करते हैं, सामूहिक रूप से कार्य नहीं करना अथवा एकमत होकर कार्य करने से मना करना, हड़ताल कहलाता है।
    ‘‘श्रमिक श्रमिकों के लिए हड़ताल अत्यधिक शक्तिशाली अस्त्र है जिसके द्वारा वे नियोक्ता को अपनी मांगे मनवाने के लिए बाध्य करते हैं। यह श्रमिक द्वारा स्वतः कार्य मुक्ति है। इसका आयोजन सामूहिक कल्याण तथा वर्तमान कार्य की दशाओं में सुधार की दृष्टि से किया जाता है।‘‘

(2)    तालाबन्दी -नियोक्ता के हाथ में एक अस्त्र है। जिससे वह श्रमिक को तितर-बितर करने,उनके आचार दूषित करने तथा उनके सामूहिक प्रयास को असफल करने का प्रयत्न करता है। वह श्रमिकोंकी चेतना को नष्ट करने का अस्त्र है। औद्योगिक परिवाद अधिनियम की धारा 2 (क) के अनुसारतालाबन्दी की परिभाषा इस प्रकार है:
    ‘‘नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों से कार्य नहीं लेना, अथवा कार्य स्थल पर ताला लगा देना, अथवा कार्य स्थगित कर देना, आदि क्रियाएँ तालाबन्दी कही जाती है।‘‘ जब नियोक्ता श्रमिकों के मानवीय अधिकारों पर शासन करना चाहता है तथा उन पर सम्पत्ति अधिकार का प्रयोग करना चाहता है, तो वह उन्हें अपने व्यवसाय क्षेत्र से बाहर निकाल देता है एवं उन्हें कार्य करने से रोकता है।


हड़ताल के प्रकार
हड़ताले श्रमिकों का ही एकाधिकार नहीं है। आजकल सभी वर्ग के कर्मचारी चाहे वह डॉक्टर, इन्जीनियर, प्राध्यापक, उच्चस्तरीय सरकारी व गैर-सरकारी कर्मचारी हो, अपनी समस्याओं के निवारण हेतु हड़ताल का प्रयोग करते हैं। अतः सम्बद्ध पक्ष तथा समस्या के अनुरूप विभिन्न प्रकार की हड़तालें आयोजित की जाती है। कुछ हड़तालों के प्रकार का विवरण इस प्रकार है (
(1)     नियमानुसार कार्य- उड्डयन विभाग के विमान चालकों द्वारा तथा बैंक कर्मचारियों और बाद में राज्य कर्मचारियों द्वारा इस प्रणाली का सहारा लिया गया। नियमकी जटिलताओं से लाभ उठाने की यह नयी विधि है।


(2)    धीमे काम करोहड़तालें- तो बहुत ही सामान्य हो गयी हैं। इन हड़तालों में श्रमिक जान-बूझकर अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर कार्य नहीं करते क्योंकि वे प्रवन्धकों  को अपनी माँगों के बारे में सोचने के लिए बाध्य करना चाहते हैं। कई बार नियोक्ता श्रमिकों की मांग स्वीकार करने के बदले तालाबन्दी घोषित कर देते हैं।


(3)    सांकेतिक हड़तालें- नियोक्ता का ध्यान किसी समस्या के प्रति आकृष्ट करने के लिए सांकेतिक हड़तालें भी की जाती है। इस क्रिया का असर नहीं होनेपर विधिवत नोटिस देकर लम्बी हड़ताल प्रारम्भ कर दी जाती है।


(4)    सहानुभूति हड़तालें- इस प्रकार की हड़ताल, अन्य हड़ताली व्यक्तियों की सहानुभति व श्रम संघ की सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए की जाती हैं। ये हड़ताले किसी क्षेत्र विशेष में अथवा राष्ट्रव्यापी होती हैं।


(5)    बन्द-यह हड़ताल का काफी उग्ररूप है। इसके द्वारा श्रम संघ अपनी माँगे मनवाने हेतु उद्योग ही नहीं वरन् सम्पूर्ण शहर के विभिन्न औद्योगिक, व्यापारिक व अन्य गैर-औद्योगिक प्रतिष्ठानों में काम काज बन्द करते हैं। कभी राज्य व्यापी बन्द भी होते हैं।


(6)    घेराव- का प्रयोग भी असन्तोष प्रदर्शित करने हेतु किया जाता है। इसमें कर्मचारियों द्वारा प्रबन्धकों अथवा मुख्य अधिशासी को घेर लिया जाता है तथा तब तक घेरे रखा जाता है जब तक कि उनकी माँगे नहीं मान ली जायंे अथवा उन्हें स्वीकृत करने के लिए आश्वासन न दे दिया जाय। इस प्रक्रिया में कई बार श्रमिक सम्पत्ति को आग लगा देते हैं एवं तोड़-फोड़ करते हैं। अनुउत्तरदायी व्यवहार के कारण प्रवन्धकों को मिल बन्द करने पड़े हैं।


(7)    भूख हड़तालें-यह हड़ताल सबसे प्रचलित विधि है। सामान्यतः यह नेताओं, विद्यार्थियों अथवा श्रमिकों द्वारा अपनी मांगें मनवाने हेतु की जाती है। भूख हड़ताल का प्रारम्भ हड़ताल से पूर्व हड़ताल के समय, हड़ताल के उपरान्त कभी भी किया जा सकता है। इसमें श्रमिकों का सहयोग प्राप्त किया जाता है। किसी विरोधी निर्णय को वापस लेने, श्रमिकों की मांगे मानने अथवा श्रमिकों के विरुद्ध लगाये गये किसी अभियोग को वापस लेने के उद्देश्य से भूख हड़तालें आयोजित की जाती हैं।




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इकाई तृतीया


    1.    श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
    2.    किसी कारखाने में श्रम कल्याण अधिकारी के कार्यों और उत्तरदायित्वों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
    3.    किसी औद्योगिक संगठन में श्रमिकों एवं कर्मचारियों के कल्याण हेतु समाजकार्य पद्धतियों का प्रयोग कैसे करेंगे।
    4.    श्रम कल्याण अधिकारी के लिए अपने कार्य क्ष्ेत्र में आने वाली चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
    5.    श्रमिकों को परामर्श देना जरूरी होता है? अपने उत्तर को तर्कपूर्णं रूप से प्रस्तुत कीजिए।

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इकाई चतुर्थ

1.    श्रम संघ को परिभाषित कीजिए।

2.    श्रम संघ कैसे कार्य करते हैं?
3.    श्रम संघ के प्रकार लिखिए।
4.    अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना कब हुई?
5.    श्रम संघों के उद्देश्य लिखिए।

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इकाई पंचमी

 

    1.    भारत में श्रम विधानों के ऐतिहासिक विकास पर निबंध लिखिए।

    2.    श्रमिक संविधानों का वर्गीकरण कीजिए।
    3.    श्रमिक संघ अधिनियम 1926 के मुख्य प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
    4.    औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के मुख्य प्रावधानों का वर्णन कीजिए।

    5.    कारखाना  अधिनियम 1948 के मुख्य प्रावधानों का वर्णन कीजिए। 

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