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परियोजना नियोजन एवं प्रबंधन : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

UNIT-1

  • परियोजना जीवन चक्र और उसके चरण पर प्रकाद्गा डालिए ?

परियोजना जीवनचक्र और उसका वर्र्गीकरण

१.६ परियोजना जीवन चक्र और उसके चरण

परियोजना जीवन चक्र, परियोजना के आपरेशनों के क्रम को
तीन चरणों, में विभाजित करता है। कार्यक्षेत्र और जटिलता पर ध्यान दिए बगैर, कोई परियोजना अपने जीवन के दौरान कई चरणों से गुजरती है। परियोजना कार्यकलाप चरणों में विभाजित करना चाहिए जिससे कि परियोजना प्रबंधक और उसकी टीम को विभिन्न निवेशों का आयोजन कारगर ढंग से और संगठित रूप से करना सुगम हो सके। इससे विचलनों का पता लगाने में भी सहायता मिलती है और इस प्रकार परियोजना को जारी रखने या समाप्त करने के बारे में निर्णय लेने में सहायक हो सकता है।

आमतौर पर परियोजना जीवन चक्र के चार निम्नलिखित चरण हैं

१.६.१ विचार सृजन (अवधारणा चरण)

  • जो कोई निवेश करने की योजना बनाता है वह नए विचारों की हर जगह पर खोज करना शुरू कर देता है। कोई व्यक्ति नई परियोजना लगाने से पूर्व उसके उद्देश्यों, कार्यक्षेत्र, प्रयोजन और उत्पादित किए जाने वाले उत्पादों का पता लगाता है। वह अपनी परियोजना टीम रखेगा, परियोजना कार्यालय स्थापित करेगा और परियोजना की पुनरीक्षा करेगा जिससे कि अगले चरण शुरू करने के लिए अनुमोदन मिल सके। इस आरंभिक चरण की मूलभूत प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं-
  • परियोजना दस्तावेज :यह एक विवरणी है जिसमें संचालित की जा रही परियोजना की विशेषताओं का वर्णन रहता है।
  • परियोजना साध्यता दस्तावेज : इसमें कठिनाइयां और वैकल्पिक हल निहित होते हैं।

परियोजना संभाव्यता

अध्ययन में चार उपाय इस प्रकार हैं

 समस्या वर्णन

 प्रयुक्त किया जाने वाला दृष्टिकोण

 समस्या का समाधान करने के लिए विकल्प उत्पत्ति

  •  प्रारंभिक सिफारिशें

परियोजना अवधारणा दस्तावेज : इसमें निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर शामिल हैं

 क्या किया जाना है?

 यह कैसे किया जाना है?

  •  यह क्यों किया जाना है?

परियोजना चार्टर : परियोजना चाटर्र में औपचारिक तौर पर परियोजना के प्रारंभ के संसूचना होती है। इसमें परियोजना का कार्यक्षेत्र, परियोजना प्राधिकारी और सफलता के महत्वपूर्ण कारण (केएसएफ) शामिल होते हैं।

इस चरण के दौरान, परियोजना टीम निम्नलिखित कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी होती हैः

 ग्राहकों और पणधारियों के साथ साक्षात्कारों का आयोजन

 अधिक आवश्यक सूचना की उत्पत्ति के लिए अनुसंधान आयोजित करना

 परियोजना साध्यता दस्तावेज, परियोजना अवधारणा विवरण और परियोजना चार्टर तैयार करना।

१.६.२. परियोजना आयोजन चरण

परियोजना आयोजन चरण परियोजना प्रारंभिक चरण के बाद आता है। सही आयोजन के साथ अनगिनत उत्तरोत्तर चरणों के दौरान अनगिनत घण्टों की बचत की जा सकती है।

  • परियोजना आयोजन चरण का प्रयोजन हैः
  • परियोजना आवश्यकताओं का निर्धारण करना।
  • परियोजना लागत और अनुसूचियों का निर्णय करना।

सभी संसाधनों के स्रोतों की खोज करना।

परियोजना आयोजन चरण की आधारभूत प्रक्रियाएं हैं:-

  • कार्य क्षेत्र परिभाषित करना : परियोजना के कार्यक्षेत्र आरै उसकी सीमाओं को निर्धारित करना।
  • कार्य ब्रे्रेक डाउन संरचना तैयार करना : सारी परियोजना को छोटे-छोटे कार्यकलापों में विभाजित करें।
  • भूूिमका सौंपना :व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूहों को निर्धारित कार्यकलाप या कायोर्ं का काम सौंपना।
  • परियोजना अनसूचियां तैयार करना : परियोजना की इष्टतम अनसूची निर्धारित करें और उसे घण्ट चार्ट में दिखाएं।

निधि आवंटन : व्यक्तिगत कार्यकलापों के लिए निधियों का आवंटन।

  • योजना के स्तर पर अन्य अनुषंगी प्रक्रियाएं इस प्रकार हैः
  • जोखिम प्रबंधन योजना : इसमें जोखिमों के संभव कारणों और प्रभाव की पहचान करना और जोखिम के प्रभाव को कम करने की कोशिश करना शामिल है।
  • प्रापण योजनाःसभी उत्पादों, सेवाओं या संसाधनों के संबंध में, जो परियोजना को पूरा करने के लिए जरूरी हों, निर्णय लेना।

योजना चरण पर विभिन्न उपाय किए जाते हैं, जिन में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • परियोजना की अंंितम तकनीकी-आर्र्थिक संभाव्यता : यह निर्णय को बदलने का अंतिम अवसर होता है क्योंकि इस स्टेज के बाद परियोजना को न तो बंद किया जा सकता है और न ही उसमें कोई बदलाव किया जा सकता है।
  • बुुिनयादी इंजीनियरी और प्रक्रिया डिजाइन :प्रक्रिया का चयन किया जाता है और बुनियादी इंजीनियरी की जाती है। उपस्कर विनिर्देशन के संबंध में दस्तावेज तैयार किए जाते हैं।
  • कार्य जिम्मेदारियों का विभाजन :व्यक्तियों या समूहों को विभिन्न कार्यकलाप आवंटित किए जाते हैं।
  • संभावित विक्रताओं और उप-संविदाकारों की पहचान करना :बाहरी विशेषज्ञ अभिकरणों के वगैर, जिन्हें उप संविदाकार कहते हैं, कोई परियोजना पूरी नहीं होती। संभावित आपूर्तिकर्ताओं के विभिन्न उपस्कर, सिविल निर्माण अभिकरण और ऐसे ही अभिकरणों की पहचान करके बातचीत की जाती है।
  • विस्तृत इंजीनियरी डिजाइन : सप्लाई किए गए उपस्कर के डिजाइन पर आधारित, विस्तृत इंजीनियरी निष्पादित की जाती है। अंतिम नक्शा तैयार किया जाता है और कार्य अनुसूची तैयार की जाती है।
  • परियोजना की लागत का अंंितम अनुुमान : उपर्युक्त कदमों से परियोजना की बिल्कुल विशुद्ध लागत को अंतिम रूप देना पड़ता है। यह आवश्यक है क्योंकि अगले कदम में निधि की व्यवस्था करनी शामिल होगी।
  • पूंजीगत संरंरचना का निर्र्णय और वित्तपोषण के तरीके :परियोजना के वित्तपोषण के संबंध में अंतिम निर्णय आयोजन चरण के दौरान लेने की जरूरत होती है। यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है जिसे आमतौर पर कोर कार्य-युक्ति ग्रुप द्वारा वित्तीय प्रबंधकों की सलाह पर लिया जाता है।

कार्यान्वयन की अंंितम अनसूची (अगला चरण) : अगला चरण कार्यान्वयन का होगा। भ्रम से बचने के लिए कार्यान्वयन की सही अनुसूची आवश्यक है। कार्यान्वयन अनुसूची टीम के सभी सदस्यों को बताती है कि विशेष कार्यकलाप कब प्रारंभ होना चाहिए और कब समाप्त किया जाना चाहिए। यह हर कार्यकलाप को पड़ाव प्रदान करेगा। प्रयोग में लाए जाने वाले तकनीक हैं पर्ट, सीपीएम, गेन्ट चार्ट, क्रैशिंग संसाधन आवंटन और संसाधन समीकरण।

१.६.३ कार्यान्वयन कार्य-निष्पादन चरण

  • परियोजना निष्पादन का चरित्रण आयोजित कार्यों पर वास्तविक कार्य द्वारा किया जाता है और परियोजना नियंत्रण में आयोजित निष्पादन के साथ वास्तविक निष्पादन की तुलना करना और वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए समुचित उपचार करना शामिल होता है। इस चरण के दौरान, परियोजना टीम निम्नलिखित कार्यकलाप के लिए जिम्मेदार हैः
  • परियोजना प्रबंधक के पर्यवेक्षण के अंर्तगत पहले वाले चरण में आवंटित कार्य को टीम सदस्य निष्पादित करेंगे और उसे रिपोर्ट देंगे।
  • परियोजना प्रबंधक निष्पादन मापन के लिए जिम्मेदार होता है जिसमें लागत, अनुसूची और कार्यक्षेत्र के संबंध में भिन्नताओं का पता लगाना शामिल होता है।
  • परियोजना प्रबंधक सभी महत्वपूर्ण शेयरधारियों को परियोजना वस्तुस्थिति रिपोर्ट प्रदान करने के लिए जिम्मेदार होता है। उसे योजना में हुए विचलनों की विशेष तौर से सूचना शेयरधारियों को देनी चाहिए। उसे विचलन के असली कारण का निर्धारण भी करना चाहिए और किए गए विचलनों या प्रत्याशित विचलनों का सामना करने के लिए वैकल्पिक र्कारवाई का सुझाव देना चाहिए। यह उपचारी र्कारवाई का निर्णय लेने में पणधारियों की सहायता करता है।
  • परियोजना के सभी महत्वपूर्ण पणधारी भिन्नताओं की पुनरीक्षा के लिए जिम्मेदार हैं।

परियोजना के सभी महत्वपूर्ण पणधारी इस तरह से निर्धारित भिन्नताओं के लिए आवश्यक र्कारवाई करने हेतु जिम्मेदार हैं ताकि परियोजना को समय और लागत के भीतर पूरा किया जा सके।

  • परियोजना निष्पादन की बुनियादी प्रक्रिया यह हो सकती हैः
  • परियोजना योजना का निष्पादन
  • परिवर्तनों को हैण्डल करना

परियोजना नियंत्रण

  • परियोजना निष्पादन के दौरान सहायक प्रक्रियाएं निम्नलिखित हो सकती हैं:
  • गुणवत्ता नियंत्रण
  • निष्पादन मानीटरिंग
  • परियोजना प्रशासन
  • जोखिम मानीटरिंग और नियंत्रण
  • कार्यक्षेत्र और नियंत्रण
  • अनुसूची और लागत नियंत्रण
  • बाहरी अभिकरणों का प्रबंधन (उप-अनुबंधकर्ताओं का)

निष्पादन के इस चरण के दौरान महत्वपूर्ण कार्यकलाप इस प्रकार हैं:

  • संविदाकारों, विक्रेताओं उप संविदाकारों को संविदाएं प्रदान करनाः सेवाओं की विभिन्न आपूर्तियों के आपूर्तिकर्ताओं (आमतौर पर संविदाकारों) और वास्तविक उपकस्कर (आमतौर पर विक्रेताओं) का अंतिम चयन।
  • उपस्कर और सेवाओं का प्रापणःआपूर्तिकर्ताओं के लगातार मानीटरिंग के पश्चात, परियोजना टीम को वस्तुओं और सेवाओं का प्रापण करना होता है।
  • उपस्कर का स्थापनःअपेक्षित बुनियाद तैयार करने के पश्चात प्राप्त उपस्कर को तैयार किए गए स्थान पर रखने की जरूरत होती है।
  • परियोजना लागत, अनुसूची और व्यक्तिः चूंकि इस चरण के दौरान अधिकांश प्रयास, समय और लागत खर्च की जाती है, यह आवश्यक है कि इस दौर में परियोजना अनुसूची और लागत को मानीटर किया जाए। इसे आमतौर पर विभिन्न उपकरणों जैसे गैण्ट चार्ट और अर्जित मूल्य मूल्यांकन (अर्ंड वैल्यु एनालेसिस) का प्रयोग करके किया जाता है।

परियोजना टीम को प्रेरणा देनाः इस दौर में टीम के सदस्यों की अधिकतम र्ऊजा खर्च होती है, इस दौर के दौरान उनको प्रेरणा देना परियोजना की सफलता के लिए महत्वर्पण होता है।

१.६.४ समापन चरण (सफाई चरण)

परियोजना को विदाई देने के अंतिम कार्य को समापन चरण कहते हैं। परियोजना का समापन अपरिहार्य होता है लेकिन यह कैसे और कब समाप्त की जाती है इसका संगठन और उसके कर्मचारियों पर गहरा और चिरस्थायी प्रभाव पड़ता है। अंत में सभी परियोजनाएं, सफल या असफल दोनों को समाप्त होना होता है। समापन चरण के दौरान, परियोजना के संसाधन पुनर्वितरित किए जाते हैं, वित्तीय रिर्काड बंद किए जाते हैं तथा परियोजना कार्मिकों का पुर्नअभ्यर्पण होता है। परियोजना टीम के प्रति संगठन की संवेदनशीलता का उनकी बचनबद्धता और उत्पादकता पर चिरस्थायी प्रभाव पड़ सकता है। अंततः वरिष्ठ प्रबंधन के लिए अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाती है जिसमें परियोजना की सफलताओं और कमियों की चर्चा होती है। यह रिपोर्ट इस बात का बड़ा प्रभाव डाल सकती है कि संगठन भविष्य में परियोजनाओं का प्रबंध कैसे करता है।

 

मीरडिथ और मैण्टल (१९९५) के अनुसार, परियोजना का समापन करने के तीन तरीके हैं: विलोपन, अंतर्वेशन और एकीकरण। विलोपन द्वारा समापन का अर्थ है कि परियोजना पूरी हो गई है। उदाहरण के लिए एक नई परियोजना विकसित करके एक ग्राहक को दी जाती है, भवन पूरा हो गया है और खरीददार ने उसे स्वीकार कर लिया है, या साफ्टवेयर प्रतिष्ठापित कर दिया है और वह संचालित हो रहा है। इसके ठीक विपरीत, अंतर्वेशन द्वारा समापन एक बिल्कुल भिन्न प्रक्रिया है। जैसाकि कोई अपेक्षा कर सकता है, इस किस्म का परिवर्तन संगठन के दिन-प्रतिदिन के संचालनों भारी अतिरिक्त दबाव डालता है। परियोजना प्रबंधक और टीम के सदस्य इन दबावों के प्रति तब तक संवेदनशील होने चाहिए, जब तक कि संगठन नई और अधिक स्थायी दिनचर्या में लगने में समर्थ न हो जाए।

एकीकरण द्वारा समापन का तरीका अत्यधिक सामान्य, लेकिन अत्यधिक जटिल भी है। परियोजना के संसाधन, कार्मिक और कार्य, मौलिक संगठन के भाग के रूप में खपा लिए जाते हैं। इस समापन प्रक्रिया के साथ सम्बद्ध प्रमुख समस्या संगठन और परियोजना के बीच प्रौद्योगिकीय अंतरों को समिश्रित करने संबंधी संगठन की योग्यता होती है। समाप्त परियोजनाओं के सफलतापूर्वक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका विबात अनुभव की प्रतीत होती है।

आकृति परियोजना के विभिन्न चरणों में प्रयास का स्तर

आकृति  परियोजनाओं के जोखिमी पहलू की जानकारी होती है। जैसे-जैसे परियोजना प्रगति करती है, कोई बदलाव करने की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और परियोजना की प्रगति के साथ मूल्य जोड़ना कठिन हो जाता है।

                                                                                                                           

 

 

 

अवधारण योजना               कार्यान्वयन       समापन

 चरण                 चरण                 चरण         चरण

आकृृति १.६ः  परियोजना जीवन चक्र के दौरान मूल्यन बदलाव की लागत आरै मूल्य जोड़ने की संभावना

  • विभिन्न मानदण्ड़ों पर आधारित परियोजनाओं के वर्गीकरण पर विस्तार से प्रकाद्गा डालिए ?

विभिन्न मानदण्डों पर आधारित परियोजनाओं का वर्र्गीकरण

परियोजना को अवधि, निवेश की मात्रा और उसमें निहित जोखिम के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

१.८.१ अवधि पर आधारित वर्र्गीकरण : यह दीर्घावधि, मध्य अवधि और अल्पावधि का हो सकता है। दीर्घावधि परियोजनाओं का जीवनकाल १० वर्षों से अधिक होता है, जबकि मध्यावद्यि परियोजनाओं का जीवनकाल ५ से १० वर्षों का होता है। अल्पावधि परियोजनाएं ५ वर्षों से कम की अवधि में ही समाप्त हो जाती हैं।

१.८.२ निवेशों पर आधारित वर्र्गीकरण :यह इस बात पर आधारित होता है कि परियोजना को आरंभ करने के लिए शुरू में कितने निवेश की जरूरत है। भारत में, २० करोड़ रूपए से ऊपर के परिव्यय का निवेश उच्च निवेश माना जाता है जबकि ५ करोड़ से २० करोड़ रूपए के बीच का निवेश परिव्यय मध्यम आकार का उद्योग माना जाता है और ५ करोड़ रूपए से कम का निवेश निम्न उद्योग माना जाता है। ५० लाख रूपए से कम के प्रारंभिक परिव्यय के उद्योग को कुटीर उद्योग कहते हैं।

१.८.३ स्वामित्व के पर वर्र्गीकरण : परियोजना की स्वामी सरकार, लोक क्षेत्र, निगमित क्षेत्र, सहकारी, क्षेत्र, साझेदारी फर्म या मालिकाना फर्म हो सकते हैं।

१.८.४ जोखिम पर आधारित वर्र्गीकरण : यह परियोजना वर्गीकरण का अधिकतर आम प्रयोग में लाया जाने वाला आधार है। बुनियादी तौर पर परियोजनाओं का वर्गीकरण ग्रीनफील्ड परियोजना, ब््रााडन फील्ड परियोजना, डाइवेस्टमेंट परियोजना और आद्युनिकीकरण या प्रतिस्थापन परियोजना के रूप में किया जाता है। जोखिम के आधार पर वर्गीकरण और  उपवर्गीकरण आकृति २.३ में चित्रित किया गया है।

or

परियोजनाओं का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जा सकता है। इन वर्गीकरणों को समझने के लिए हम निम्नलिखित बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे:

1.8.1 अवधि पर आधारित वर्गीकरण

परियोजनाओं की अवधि के आधार पर उन्हें तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है: दीर्घावधि, मध्यावधि, और अल्पावधि।

  • दीर्घावधि परियोजनाएं (Long-term Projects):

    • जीवनकाल: 10 वर्षों से अधिक।
    • उदाहरण: हाईवे निर्माण, बड़े डैम निर्माण, और रेलवे नेटवर्क का विस्तार।
    • विस्तार: जैसे, भारत में एनएच-44 (National Highway 44) का निर्माण एक दीर्घावधि परियोजना है, जो कई राज्यों से गुजरता है और इसे पूरा करने में एक दशक से अधिक समय लगा।
  • मध्यावधि परियोजनाएं (Medium-term Projects):

    • जीवनकाल: 5 से 10 वर्ष।
    • उदाहरण: मीडियम साइज पावर प्लांट का निर्माण, मेट्रो रेल परियोजना।
    • विस्तार: दिल्ली मेट्रो रेल परियोजना का फेज 3 निर्माण मध्यावधि परियोजना के अंतर्गत आता है, जिसे लगभग 7-8 वर्षों में पूरा किया गया।
  • अल्पावधि परियोजनाएं (Short-term Projects):

    • जीवनकाल: 5 वर्षों से कम।
    • उदाहरण: छोटे पुल निर्माण, आवासीय परियोजनाएं।
    • विस्तार: एक आवासीय सोसाइटी का निर्माण, जो 2-3 वर्षों में पूरा हो जाता है, एक अल्पावधि परियोजना है।

1.8.2 निवेशों पर आधारित वर्गीकरण

परियोजनाओं को प्रारंभिक निवेश की मात्रा के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • उच्च निवेश परियोजनाएं (High Investment Projects):

    • निवेश सीमा: 20 करोड़ रुपये से अधिक।
    • उदाहरण: बड़े औद्योगिक संयंत्र, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं।
    • विस्तार: रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी एक उच्च निवेश परियोजना है, जिसमें कई हजार करोड़ रुपये का निवेश हुआ।
  • मध्यम निवेश परियोजनाएं (Medium Investment Projects):

    • निवेश सीमा: 5 करोड़ रुपये से 20 करोड़ रुपये के बीच।
    • उदाहरण: मीडियम साइज मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स।
    • विस्तार: एक मध्यम आकार की फार्मास्युटिकल कंपनी का निर्माण, जिसमें 10 करोड़ रुपये का निवेश हुआ हो।
  • निम्न निवेश परियोजनाएं (Low Investment Projects):

    • निवेश सीमा: 5 करोड़ रुपये से कम।
    • उदाहरण: छोटे उद्योग, सर्विस सेक्टर स्टार्टअप।
    • विस्तार: एक छोटे खाद्य प्रसंस्करण यूनिट का निर्माण, जिसमें 3 करोड़ रुपये का निवेश हुआ हो।
  • कुटीर उद्योग (Cottage Industry):

    • निवेश सीमा: 50 लाख रुपये से कम।
    • उदाहरण: हस्तशिल्प, हाथ से बने उत्पाद।
    • विस्तार: एक घर-आधारित बुनाई इकाई, जिसमें 10 लाख रुपये का निवेश हुआ हो।

1.8.3 स्वामित्व पर आधारित वर्गीकरण

परियोजनाओं का स्वामित्व विभिन्न प्रकार के संगठनों या व्यक्तियों के पास हो सकता है:

  • सरकारी परियोजनाएं (Government Projects):

    • उदाहरण: सरकारी अस्पताल निर्माण, सड़क निर्माण।
    • विस्तार: प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के अंतर्गत घरों का निर्माण।
  • लोक क्षेत्र परियोजनाएं (Public Sector Projects):

    • उदाहरण: BSNL नेटवर्क विस्तार, ONGC तेल खनन।
    • विस्तार: इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन द्वारा रिफाइनरी का विस्तार।
  • निजी क्षेत्र परियोजनाएं (Private Sector Projects):

    • उदाहरण: निजी आईटी पार्क, निजी अस्पताल।
    • विस्तार: विप्रो टेक्नोलॉजी पार्क का निर्माण।
  • सहकारी परियोजनाएं (Cooperative Projects):

    • उदाहरण: दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ।
    • विस्तार: अमूल दूध उत्पादन और वितरण।
  • साझेदारी फर्म परियोजनाएं (Partnership Firm Projects):

    • उदाहरण: लॉ फर्म, आर्किटेक्चर फर्म।
    • विस्तार: एक साझेदारी में चलने वाला नया रेस्टोरेंट।
  • मालिकाना फर्म परियोजनाएं (Proprietorship Firm Projects):

    • उदाहरण: एकल स्वामित्व वाली दुकान।
    • विस्तार: एक व्यक्ति द्वारा संचालित किराना स्टोर।

1.8.4 जोखिम पर आधारित वर्गीकरण

परियोजनाओं का वर्गीकरण उनके जोखिम के आधार पर भी किया जाता है:

  • ग्रीनफील्ड परियोजना (Greenfield Projects):

    • विशेषता: नई जगह पर नई परियोजना की शुरुआत।
    • उदाहरण: नया मैन्युफैक्चरिंग प्लांट।
    • विस्तार: टेस्ला द्वारा भारत में नया प्लांट लगाना।
  • ब्राउनफील्ड परियोजना (Brownfield Projects):

    • विशेषता: मौजूदा संरचना का उपयोग कर नई परियोजना।
    • उदाहरण: पुराने कारखाने का पुनर्निर्माण।
    • विस्तार: पुरानी फैक्ट्री को रिनोवेट कर नया प्रोडक्शन यूनिट बनाना।
  • डाइवेस्टमेंट परियोजना (Divestment Projects):

    • विशेषता: किसी हिस्से को बेचना या निजीकरण।
    • उदाहरण: सरकारी कंपनियों का निजीकरण।
    • विस्तार: एयर इंडिया का निजीकरण।
  • आद्युनिकीकरण या प्रतिस्थापन परियोजना (Modernization or Replacement Projects):

    • विशेषता: पुरानी तकनीक या उपकरण को नई तकनीक से बदलना।
    • उदाहरण: पुराने मशीनों का अपग्रेड।
    • विस्तार: एक पुरानी स्टील मिल को आधुनिक उपकरणों से लैस करना।

उदाहरण का संक्षेप

एक सरकारी संस्था 15 करोड़ रुपये की लागत से एक नया हॉस्पिटल बनाने की योजना बना रही है, जिसे 6 वर्षों में पूरा किया जाना है। यह परियोजना एक मध्यावधि परियोजना है जो मध्यम निवेश श्रेणी में आती है। इस परियोजना का स्वामित्व सरकार के पास है और इसमें ग्रीनफील्ड परियोजना के रूप में जोखिम शामिल है क्योंकि यह पूरी तरह से नए स्थान पर बनाई जा रही है।

इस प्रकार, परियोजनाओं को उनकी अवधि, निवेश की मात्रा, स्वामित्व और उनमें निहित जोखिम के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इन वर्गीकरणों से परियोजना प्रबंधकों को विभिन्न परियोजनाओं के बारे में बेहतर समझ मिलती है और वे उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकते हैं।


  • परियोजना प्रबंधक की क्या भूमिकाएं होती है विस्तार से समझाईए ?

 परियोजना प्रबंधक की भूिमकाएं

परियोजना प्रबंधक किसी जहाज के कप्तान की तरह कार्य करता है, जिस प्रकार जहाज को सुरक्षित तरीके से समय पर किनारे तक पहुंचाने के लिए सभी प्राधिकार एवं जिम्मेवारी कप्तान की होती है उसी प्रकार परियोजना को लागत सीमाओं के भीतर उपयुक्त समय में सभी कार्यक्षेत्र के साथ परियोजना को पूरा करना प्रबंधक की जिम्मेवारी होती है। उसकी भूमिका विभिन्न संसाधनों को (सामग्री, उपकरण एवं लोगों) लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए समेकित करना होती है। परियोजना प्रबंधक को अपनी समयावधि के दौरान विभिन्न भूमिकाएं निभानी होती हैं। परियोजना प्रबंधक की भूमिकाएं इस प्रकार हैं :

उद्यमी : परियोजना प्रबंधक स्वयं मालिक या उद्यमी नहीं हो सकता, परंतु उसे उद्यमी की भूमिका निभानी होती है। वह निधियों, सुविद्याओं तथा परियोजना के लिए लोगों की अधिप्राप्ति के लिए जिम्मेवार होता है। वह विफलता के लिए तथा सफल होने की स्थिति में सभी प्रकार के क्रेडिट प्राप्त करने के लिए जवाबदेह होता है। किसी परियोजना की सफलता मुखयतः इसके उद्यमी पर निर्भर करती है।

निर्णय लेने वाला :परियोजना प्रबंधक संसाधनों के आबंटन, परियोजना के क्षेत्र को परिभाषित करने तथा योजना के अनुसार लागत एवं अनुसूचियों का प्रबंध करने के लिए उत्तरदायी होता है। वह परियोजना अनुसूचियों एवं लागतों को प्रतिधारित करने के लिए परियोजना को नियंत्रित करता है तथा स््रोतों के विचलन को कम करता है।

संचारक : परियोजना प्रबंधक किसी परियोजना में सभी संचारों का केन्द्र बिन्दु होता है। वह संचार हब या सर्वर की तरह कार्य करता है। वह विभिन्न सूचनाएं प्राप्त कर उनको संसाधित करता है। वह पद्धतियों का संचार करने तथा परियोजना टीम के विभिन्न सदस्यों के लिए लक्ष्य निर्धारित करने का कार्य भी करता है। वह समीक्षा बैठकों का आयोजन भी करता है।

परिवर्र्तन कारक : परियोजना प्रबंधक परिवर्तन करता है तथा परिवर्तन प्रक्रिया की वजह से उभरने वाली विपरीत ताकतों को कम करने का प्रयास करता है। सभी परिवर्तनों से विरोधी ताकतें पैदा होती हैं तथा परियोजनाओं में विशेद्गातौर पर अत्यधिक ज्यादा होती हैं क्योंकि सामान्य तौर पर उनका उद्देश्य आमूल-चूल परिवर्तन करना होता है। उदाहरण के लिए ठज (बीटी) फसलों को उगाना।

  • प्रेरक : प्रतिबद्ध तथा प्रेरणादायी क्रू मेम्बर्स (दल) के बिना सफलतापूर्वक किसी भी अभियान को पूरा नहीं किया जा सकता है। जहाज का कप्तान या परियोजना प्रबंधक अपने दल के सदस्यों के प्रेरणा स्तर को सृजित करने तथा उतार-चढ़ाव की परिस्थितियों में इसे बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता है। परियोजना भी कई बार ऐसी स्थिति से गुजरती है जब यह अंधकारमय हो जाती है और कोई सफलता दिखाई नहीं पड़ती। कई बार ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं कि टीम के सदस्यों का परियोजना में विश्वास बहाल करने के लिए परियोजना प्रबंधक मुखय भूमिका निभाता है। उसे अपने दल का उत्साह एवं उत्तेजना कायम रखना चाहिए। मुखयतः दो प्रकार की प्रेरणा होती है :
  • जो लोगों को काम करने के लिए प्रेरित करती है
  • जो कार्यबल को थकान से दूर रखती है
  • परियोजना प्रबंध में प्रेरणा लाई जा सकती है
  • उन्हें परियोजना के लिए उपयोगी महसूस करवाना
  • उन्हें यह महसूस करवाना कि इससे उनके कैरियर को बढ़ावा मिलेगा
  • उन्हें भ्रमित या असुरक्षित महसूस न करने देना
  • कल्पित एवं प्राप्त रिर्वाड (परिणाम) के बीच असंतुलन को दूर करना

दूरदर्शिता एवं अग्नि बचाव कर्मी :किसी भी परियोजना में जोखिम विरासती विशेषता है। सफल परियोजना प्रबंधक जोखिम या विविधताओं का अनुमान अग्रिम तौर पर ही लगता लेता है तथा संभावित विचलनों का सामना करने के लिए रास्तों की योजना बनाता है। उन परिस्थितियों में जब अप्रत्याशित घटना का पूर्व अनुमान लगाया गया हो और यह घटित हो जाए तो परियोजना प्रबंधक समस्या का सामना करने के लिए अपनी टीम का नेतृत्व अग्नि शामक की तरह करता है। उदाहरण के लिए, परियोजना प्रबंधक को स्टील के दामों में थोड़े समय के लिए होने वाली बढ़ोतरी का पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए तथा स्टील का अग्रिम संचय कर लेना चाहिए। परंतु यदि परिवहन हड़ताल या किसी अन्य कारण की वजह से स्टील की कमी की स्थिति पैदा हो जाए तो उसे इसकी योजना बनानी चाहिए ताकि हड़ताल की वजह से परियोजना अनुसूची प्रभावित न हो।  वह अन्य स्थान से स्टील प्राप्ति का विकल्प चुन सकता है और यह संभव न हो तो उसे हड़ताल अवधि के दौरान बिना स्टील उपयोग वाले अन्य शेष कार्यों को पूरा करने के लिए कार्य अनुसूची को पुनः तैयार करना चाहिए।

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UNIT - 2

  •  परियोजना लागत के विभिन्न संघटक क्या होते है उनके बारें मे जानकारी दीजिए ?

 परियोजना लागत के संघटक तथा इसका अनुमान

परियोजना में परियोजना के वाणिज्यिकरण से पूर्व वहन किए गए सभी प्रकार के व्यय शामिल होते हैं। इससे किसी परियोजना को पूरा किए जाने से पूर्व या परियोजना को संचालन हेतु सौंपे जाने से पूर्व वहन किए गए सभी आर्वती व्यय (जैसे वेतन, ब्याज इत्यादि) तथा पूंजीगत निवेश शामिल होते हैं।

  • विभिन्न वित्तीय एवं मूल्यांकन प्राद्यिकारियों के दिशा-निर्देशों के अनुसार परियोजना की लागत के विभिन्न संघटक इस प्रकार हैं :
    • भूमि एवं स्थल विकास : इसमें भूमि को अद्यिग्रहित करने तथा इसे परियोजना के कार्यान्वयन के लिए उपयुक्त बनाने हेतु वहन किए गए सभी प्रकार के व्यय शामिल होते हैं। विभिन्न उप-संघटक इस प्रकार हैं :
    • भूमि का क्रय मूल्य
    • वैद्यानिक एवं पंजीकरण प्रभार
    • भूमि को समतल करना
    • आंतरिक एवं सम्पर्क सड़कें बनाना
    • चाहरदीवारी/भूमि की बाडबंदी
    • दरवाजे एवं स्थल कार्यालय
    • परियोजना के कार्यान्वयन हेतु यूबवैल एवं विद्युतीकरण

इसी स्वरूप का अन्य कोई खर्च

निर्र्माण लागत : इस लागत में आरसीसी, पीसीसी इत्यादि सहित सभी प्रकार के फैक्ट्रीध्गैर-फैक्ट्री भवनों के निर्माण पर

    • वहन किए गए व्यय शामिल होते हैं। विभिन्न फैक्ट्री भवन हैं :-
    • उत्पादन शेड
    • बॉयलर हाऊस
    • ट्रांसर्फामर कक्षध्जेनरेटर कक्ष
    • कार्यशाला प्रयोगशाला इत्यादि
    • विभिन्न प्रकार के गैर-फैक्ट्री भवन इस प्रकार हैं :
    • गोदाम
    • स्टोर्स
    • सुरक्षा गृह
    • कामगार आराम गृह
    • पार्किंग
    • टाइम कार्यालय/आबकारी कक्ष
    • प्रशासनिक खण्ड
    • कामगारों के लिए आवश्यक क्वार्टर्स
  • कैंटीन
    • संयंत्र एवं मशीनरी : यह सामान्य तौर पर विनिर्माण परियोजनाओं की सबसे बड़ी लागत होती है। इसमें आयातित एवं स्वदेशी मशीनों की समग्र लागत के साथ ही इनको स्थापित करने तथा प्रतिष्ठान लागत भी शामिल होती है। इस र्शीष के अंर्तगत निम्नलिखित लागतों को शामिल किया जाता है :
    • उपकरण की मूल लागत
    • उत्पाद/सीमा-शुल्क एवं विक्रय कर
    • पोतांतरण लागत (विक्रेता से स्थल तक) तथा परिवहन के दौरान बीमा
    • स्थापना एवं प्रतिष्ठान लागत
  • पाइप डालने की लागत
    • तकनीकी जानकारी : चाहे सृजित की गई हो या अंतरित की गई हो प्रौद्योगिकी की अपनी लागत होती है। इस तकनीकी जानकारी लागत में शामिल हैं :
    • प्रौद्योगिकी विकास या क्रय की मूल लागत
    • कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण की लागत
  • भुगतान की नई रॉयल्टी (यदि एकमुश्त हो)
    • उपयोगिता : उपयोगिता में वे सभी सामान्य सुविद्याएं शामिल होती हैं जिनका उपयोग एक ही संगठन के विभिन्न संयंत्रों के लिए किया जाता है। यह संयंत्र एवं मशीनरी लागत के समान ही प्रतीत होती है परंतु इनका अंतर इस तथ्य में निहित है कि उपयोगिताओं का प्रयोग विभिन्न संयंत्रों के लिए किया जाता है जबकि संयंत्र तथा मशीनरी पृथक संयंत्र के लिए होती है :
    • बॉयलर
    • कम्प्रेसर
    • जेनरेटर ध्ट्रांसर्फामर
    • भूमिगत ध्ऊपरी वाटर टैंक
  • अपगामी उपचार संयंत्र
    • विविध अचल परिसम्पत्तियाँ : कई ऐसी लागतें होती हैं, जिन्हें उपर्युक्त लागतों में शामिल नहीं किया जाता है। उन्हें विविध अचल परिसम्पत्तियों के रूप में जाना जाता है :
    • फर्नीचर/फिक्सचर
    • कम्प्यूटर/फैक्सध्प्रिंर्टस एवं एसेसरीज
    • वाहन
  • तोल कांटा (सेतु)
  • प्रारंंिभक खर्च : इनमें बाजार सर्व ेक्षण खर्च, सार्व जनिक मुद्दों पर किए जाने वाले खर्च तथा कार्यान्वयन के दौरान ब्याज शामिल होता है।
  • संचालन पूूर्व खर्च : इनमें सामान्य खर्च जैसे वेतन एवं किराया इत्यादि शामिल होता है जिसे किसी उद्यमी द्वारा वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ किए जाने से पूर्व वहन किया जाता है। इसमें यात्रा व्यय, कंपनी निर्माण व्यय, चालू करने संबंधी खर्च, परीक्षण संचालन लागत इत्यादि भी शामिल होते हैं।
  • आकस्मिक खर्च : यह एक ऐसी निधि होती है जिसे किसी प्रत्याशित अतिखर्च या किसी अप्रत्याशित खर्च के लिए रखा जाता है।

कार्र्यगत पूूंंजी हेतु अतिरिक्त राशि : कार्यगत पूंजी का सामान्य तौर पर निधियन अल्पकालिक वित्त स््रोतों के माध्यम से किया जाता है।


  •  कार्यगत पूॅजी अनुमान व परियोजना नगदी प्रवाह के बारे में विस्तार से बताइऍ ?


कार्र्यगत पूंजी अनुुमान

कार्यगत पूंजी को संचालन पूंजी के रूप में जाना जाता है। कार्यगत पूंजी केवल पर्याप्त स्तर तक होनी चाहिए : उच्चतर कार्यगत पूंजी का अर्थ होगा निधियों की कम उपयोगिता तथा निम्नतर कार्यगत पूंजी से सुव्यवस्थित संचालनों में बाधा पैदा हो सकती है।

    • कार्यगत पूंजी के विभिन्न निर्धारक हैं :
    • कच्ची सामग्री की माल सूची (घटा क्रेडिर्टस)
    • कार्य प्रगति की माल सूची
    • तैयार माल सम्पत्ति सूची
    • डेर्टस

नकदी (घटा भुगतान किए जाने वाले बिल)

२.१० परियोजना नकदी प्रवाह

संचालन के दौरान परियोजना नकदी प्रवाह वित्तीय नकदी प्रवाह से भिन्न होता है। परियोजना नकदी प्रवाह को तीन श्रेणियों अर्थात प्रारंभिक परिव्यय, संचालन नकदी प्रवाह तथा समापन नकदी प्रवाह में वर्गीकृत किया जा सकता है।

नकदी प्रवाह के प्रकार

प्रारंभिक परिव्यय

नियत निवेश + कार्यरत

पूंजी

 

सामान्य बहिर्प्रवाह

सामान्य तौर पर शुरूआती

वर्ष में

 

संचालन नकदी प्रवाह

ईबीआईटी - कर +

अवमूल्यन

 

सामान्य अंतःप्रवाह

प्रथम से नौवें वर्ष तक

 

समापन नकदी प्रवाह

सैल्विज मूल्य + कार्यगत पूंजी

 

अंतःप्रवाह

नौवां वर्ष

 

ई.बी.आई.टी का अर्थ है ब्याज एवं कर से पूर्व की आय।

संचालन नकदी प्रवाह की गणना ब्याज को व्यय के रूप में माने बिना की जाती है। प्रारंभिक परिव्यय सामान्यतः परियोजना प्रारंभ होने से पूर्व होता है, परंतु जब विक्रय का क्षमता विस्तार या वृद्धि होती है तो आगामी वर्ष में अतिरिक्त परिव्यय होता है। कार्यगत पूंजी की गणना करते समय हमें सावद्यान रहना चाहिए। इसे एक वर्ष पूर्व उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, दूसरे वर्ष में २ मिलियन रुपए कार्यगत पूंजी की आवश्यकता होती है। प्रथम वर्ष में १.५ मिलियन रुपए कार्यगत पूंजी उपलब्ध है तथा अतिरिक्त ०.५ मिलियन रुपए प्रथम वर्ष के नकदी प्रवाह में शामिल किए जाने चाहिए क्योंकि प्रथम वर्ष का नकदी प्रवाह मूलतः प्रथम वर्ष की समाप्ति या दूसरे वर्ष की शुरूआत में होता है।

 प्रारंभिक परिव्यय सामान्यतः प्रथम वर्ष में होता है परंतु कई बार आगामी वर्षों में अतिरिक्त कार्यगत पूंजी की आवश्यकता या आगामी वर्षों में कार्यगत पूंजी में कमी की वजह से इसमें वृद्धि या कमी हो सकती है। संचालन नकदी प्रवाह गैर नकदी प्रवाह है (अवमूल्यन की तरह) जिसे कर के बाद निवल लाभ में जोड़ा जाता है।

परियोजना अवधि के अंतिम वर्ष में रक्षित मूल्य एवं कार्यगत पूंजी में शोधन को समापन नकदी प्रवाह माना जाता है। समदृश वर्षों में तीन नकदी प्रवाह का कुल योग परियोजना नकदी प्रवाह होता है।

परियोजना नकदी प्रवाह की गणना हेतु फार्मेट

वर्ष

प्रारंभिक

परिव्यय

एफआई

+

डब्ल्यूसी

 

अतिरिक्त

डब्ल्यूसी

 

अतिरिक्त

डब्ल्यूसी

 

अतिरिक्त

डब्ल्यूसी

 

अतिरिक्त

डब्ल्यूसी

 

-

 

संचालन

नकदी

प्रवाह

- ईबीआईटी-कर

+ अवमूल्यन

 

ईबीआईटी-कर

+ अवमूल्यन

 

ईबीआईटी-कर

+ अवमूल्यन

 

ईबीआईटी-कर

+ अवमूल्यन

 

ईबीआईटी-कर

+ अवमूल्यन

 

ईबीआईटी-कर

+ अवमूल्यन

 

समापन

नकदी

प्रवाह

-

-

-

-

-

एसवी +

डब्ल्यूसी

 

परियोजना नकदी

प्रवाह

तीनों का

योग

 

तीनों का

योग

 

तीनों का

योग

 

तीनों का

योग

 

तीनों का

योग

 

तीनों का

योग

 

तीनों का योग तीनों का योग तीनों का योग तीनों का योग तीनों का योग एफआई निर्धारित निवेश है, डब्ल्यूपी- कार्यगत पूंजी; डिप्रे- अवमूल्यन; एसवी- सेल्वेज मूल्य है। यह नोट किया जाना चाहिए कि केवल वास्तविक व्यय की गणना नकदी प्रवाह में की जाती है तथा लेखाकंन व्यय जैसे प्रारंभिक व्यय, बट्ठेखाते या ओवर हेड की गणना नकदी प्रवाह में नहीं प्रलेखन की जाती है।



  • वित्त पोषण के दीर्घकालिक एवं अल्पावधि स्त्रोत के बारें मे जानकारी दीजिए ?

दीर्घकालिक वित्त पोषण के स्त्रोत

दीर्घकालिक स््रोतों का मुखय वर्गीकरण }ण वित्त पोषण (बाहरी देयताएं) एवं साम्या वित्त पोषण (आंतरिक देयता) के रूप में किया जा सकता है।


OR


वित्त पोषण के दीर्घकालिक और अल्पावधि स्रोतों को समझने के लिए, हमें यह जानना जरूरी है कि व्यवसायों को किस प्रकार की वित्तीय आवश्यकताओं के लिए इन स्रोतों का उपयोग करना पड़ता है। दीर्घकालिक वित्त पोषण आमतौर पर पूंजीगत परियोजनाओं, संपत्ति खरीद, और विस्तार योजनाओं के लिए होता है, जबकि अल्पावधि वित्त पोषण का उपयोग परिचालन आवश्यकताओं, कार्यशील पूंजी की जरूरतों, और तात्कालिक खर्चों के लिए किया जाता है।

दीर्घकालिक वित्त पोषण के स्रोत

दीर्घकालिक वित्त पोषण के स्रोत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: ऋण वित्त पोषण (Debt Financing) और साम्य वित्त पोषण (Equity Financing)

ऋण वित्त पोषण (Debt Financing)

ऋण वित्त पोषण में वह धन शामिल होता है जिसे व्यवसाय को उधार लेना पड़ता है और जिसे बाद में ब्याज के साथ वापस चुकाना होता है। यह बाहरी देयताओं (External Liabilities) का हिस्सा होता है। दीर्घकालिक ऋण वित्त पोषण के स्रोत निम्नलिखित हैं:

  1. बैंकों से दीर्घकालिक ऋण (Long-term Loans from Banks):

    • बैंक कंपनियों को लंबी अवधि के लिए ऋण प्रदान करते हैं, जो 5 से 20 वर्षों तक हो सकता है।
    • उदाहरण: एक निर्माण कंपनी अपने नए प्रोजेक्ट के लिए बैंक से 15 वर्षों के लिए ऋण ले सकती है।
  2. वित्तीय संस्थान (Financial Institutions):

    • विभिन्न वित्तीय संस्थान, जैसे ICICI, IFCI, आदि, दीर्घकालिक ऋण प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: एक उद्योगिक इकाई के विस्तार के लिए वित्तीय संस्थान से ऋण प्राप्त करना।
  3. बॉण्ड्स और डिबेंचर (Bonds and Debentures):

    • कंपनियाँ बॉण्ड्स और डिबेंचर्स जारी करके सार्वजनिक से धन जुटाती हैं।
    • उदाहरण: एक कंपनी बॉण्ड्स जारी करती है जिसमें निवेशक कंपनी को दीर्घकालिक ऋण प्रदान करते हैं और बदले में कंपनी बॉण्ड्स पर ब्याज का भुगतान करती है।
  4. वाणिज्यिक बैंकों से सावधि ऋण (Term Loans from Commercial Banks):

    • वाणिज्यिक बैंक लंबे समय के लिए सावधि ऋण प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: एक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी अपने संयंत्र और मशीनरी के लिए वाणिज्यिक बैंक से सावधि ऋण प्राप्त कर सकती है।

साम्य वित्त पोषण (Equity Financing)

साम्य वित्त पोषण में वह धन शामिल होता है जिसे व्यवसाय मालिकों या शेयरधारकों से प्राप्त करते हैं। यह आंतरिक देयताओं (Internal Liabilities) का हिस्सा होता है। दीर्घकालिक साम्य वित्त पोषण के स्रोत निम्नलिखित हैं:

  1. शेयर पूंजी (Share Capital):

    • कंपनियाँ शेयर जारी करके पूंजी जुटाती हैं।
    • उदाहरण: एक कंपनी IPO (Initial Public Offering) के माध्यम से बाजार से पूंजी जुटाती है।
  2. संपत्ति पुनर्निवेश (Retained Earnings):

    • कंपनी अपनी अर्जित आय का एक हिस्सा पुनः निवेश करती है।
    • उदाहरण: कंपनी अपने पिछले साल के मुनाफे का एक हिस्सा नई परियोजना में निवेश करती है।
  3. प्राथमिक शेयर (Preference Shares):

    • कंपनियाँ प्राथमिक शेयर जारी करके पूंजी जुटाती हैं, जिनपर एक निश्चित लाभांश का भुगतान किया जाता है।
    • उदाहरण: कंपनी नए निवेश के लिए प्राथमिक शेयर जारी करती है, जिसमें निवेशकों को एक निश्चित लाभांश मिलता है।
  4. सहायक कंपनियों का निवेश (Investment by Subsidiaries):

    • सहायक कंपनियाँ अपनी मूल कंपनी में निवेश करती हैं।
    • उदाहरण: एक समूह की सहायक कंपनी अपनी मूल कंपनी में लंबी अवधि के लिए निवेश करती है।

अल्पावधि वित्त पोषण के स्रोत

अल्पावधि वित्त पोषण के स्रोत परिचालन आवश्यकताओं और तात्कालिक खर्चों के लिए होते हैं, जो आमतौर पर एक वर्ष के भीतर चुकाए जाते हैं। अल्पावधि वित्त पोषण के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं:

  1. बैंक ओवरड्राफ्ट (Bank Overdraft):

    • बैंक अपने खाताधारकों को उनके खाते में निर्धारित सीमा से अधिक राशि निकालने की अनुमति देते हैं।
    • उदाहरण: एक व्यवसाय अपने बैंक खाते से ओवरड्राफ्ट का उपयोग करके अपने तात्कालिक खर्चों को पूरा करता है।
  2. वाणिज्यिक पत्र (Commercial Paper):

    • कंपनियाँ अल्पावधि के लिए वाणिज्यिक पत्र जारी करके धन जुटाती हैं।
    • उदाहरण: एक कंपनी अपने कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए वाणिज्यिक पत्र जारी करती है।
  3. विक्रेता ऋण (Trade Credit):

    • विक्रेता अपने ग्राहकों को कुछ समय के लिए बिना भुगतान के सामान देने की अनुमति देते हैं।
    • उदाहरण: एक खुदरा व्यापारी अपने विक्रेता से 30 दिनों की क्रेडिट पर सामान प्राप्त करता है।
  4. कार्यशील पूंजी ऋण (Working Capital Loans):

    • बैंक और वित्तीय संस्थान व्यवसायों को उनके कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अल्पावधि ऋण प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: एक निर्माण कंपनी अपने कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंक से 6 महीने का ऋण प्राप्त करती है।
  5. फैक्टोरिंग (Factoring):

    • कंपनियाँ अपने खातों की प्राप्तियों को डिस्काउंट पर बेचकर तात्कालिक धन जुटाती हैं।
    • उदाहरण: एक कंपनी अपनी बकाया बिलों को फैक्टोरिंग कंपनी को बेचकर तात्कालिक धन प्राप्त करती है।

निष्कर्ष

वित्त पोषण के दीर्घकालिक और अल्पावधि स्रोत व्यवसायों को उनकी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं। दीर्घकालिक स्रोतों का उपयोग पूंजीगत परियोजनाओं और विस्तार योजनाओं के लिए होता है, जबकि अल्पावधि स्रोत परिचालन आवश्यकताओं और तात्कालिक खर्चों के लिए होते हैं। सही वित्त पोषण स्रोत का चयन व्यवसाय की वित्तीय स्थिति और आवश्यकताओं पर निर्भर करता है।

  •  वित्तीय संभाव्यता का महत्व व उसके सोपानों के बारे में जानकारी दीजिए ?

वित्तीय संभाव्यता का महत्व एवं सोपान

वित्तीय संभाव्यता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें समग्र निवेश परिव्यय की पहचान की जाती है, लाभ प्राप्ति की अनुमानित दर का निर्धारण किया जाता है तथा परियोजना का वित्तीय रूप से मूल्यांकन किया जाता है।

  • वित्तीय संभाव्यता किसी भी संगठन के लिए निम्नानुसार महत्वपूर्ण है :
  • यह दीर्घकालिक तौर पर फर्म के विकास को प्रभावित करती है
  • यह विचारद्यीन फर्म के जोखिम को प्रभावित करती है
  • इसमें सामान्य तौर पर काफी मात्रा में निधियां शामिल होती हैं
  • किसी मौजूदा फर्म के लिए काफी मात्रा में निवेश करने संबंधी गलत निर्णय घातक सिद्ध हो सकता है। किसी भी
  • पूंजीगत बजटीय तकनीक का अनुप्रयोग करने से पूर्व नकदी बाह्य प्रवाह तथा नकदी आंतरिक प्रवाह का

ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया जाना आवश्यक है।

पूंजीगत बजट उस प्रक्रिया की पहचान करने, मूल्यांकन करने तथा चयन करने की प्रक्रिया है, जिसके लिए अत्यधिक निधियों की आवश्यकता होती है तथा भविष्य में दीर्घकालिक लाभ की प्राप्ति होती है।

आकृति २.७ वित्तीय विश्लेषण के सोपान

  • वित्तीय विश्लेषण में शामिल विभिन्न सोपान इस प्रकार हैं :
  • परियोजना की लागत का अनुमुमान :परियोजना की लागत के विभिन्न संघटक होते हैं। इसमें मुखयतः दो प्रकार की लागत शामिल होती है, नियत निवेश एवं कार्यगत पूंजी। परियोजना की लागत में वाणिज्यिक उत्पादन (विनिर्माण परियोजना) या संचालन (सेवा परियोजना) शुरू किए जाने से पूर्व वहन की गई सभी लागतें शामिल होती हैं।
  • परियोजना नकदी प्रवाह का अनुमुमान :इस अनुमान में परियोजना के चक्रीय जीवन के दौरान सभी प्रकार कापरियोजना नकदी प्रवाह शामिल होता है। इसमें प्रारंभिक निवेश, संचालनों के दौरान सृजित नकदी प्रवाह तथा किसी परियोजना के समापन के दौरान किया गया निवेश शामिल होता है।
  • संभावित प्रतिलाभ संभ्ंभावित की दर का अनुमुमान : किसी परियोजना के वित्त पोषण के लिए निधियों के कई स्त्रोत होते हैं। सावद्यानीपूर्वक मूल्यांकन करने के बाद हम फर्म के लिए अनुकूलतम पूंजी ढांचे की अभिकल्पना करते हैं। परियोजना से संभावित प्रतिलाभ में दो संघटक शामिल होते हैं, जोखिम मुक्त संघटक (सामान्यतः पूंजी की भारित औसत लागत) एवं जोखिम संघटक (निवेश की वजह से जोखिम प्रीमियम)।

निर्णर्यय नियम का अनुप्रुप्रयोग : वित्तीय विश्लेषण का अंतिम स्तर किसी परियोजना की वित्तीय संभाव्यता की जांच करने हेतु विभिन्न उपकरणों का प्रयोग करना है। परियोजना से लाभकारिता तथा अनुमानित प्रतिलाभ का निर्धारण करने के लिए पूंजी बजट तकनीकों का अनुप्रयोग किया जाता है।


  • परियोजना प्रबंध मे जोखिम व उसके स्त्रोत के बारें मे जानकारी दीजिए ?

 परियोजना प्रबंध में जोखिम के स्रोत

जोखिम के कई स्रोत है। किसी राष्ट्र या वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था में होने वाला कोई परिवर्तन, इनपुट्‌स या आउटपुट्‌स के मूल्य स्तरों में किसी परिवर्तन से जोखिम हो सकता है। आइए जोखिम के विभिन्न स््रोतों का वर्णन करें।

  • संचालन जोखिम : संचालन दक्षता में कमी से लाभ में कमी हो सकती है या कई बार इससे परियोजना की हानि भी हो सकती है। कुछ परियोजनाओं में, संचालन दक्षता में कमी काफी ज्यादा हो सकती है या कम हो सकती है। इसी प्रकार से, दक्षता में विविधता की संभावना परियोजना दर परियोजना भिन्न हो सकती है। मशीनों की खराब होना, संसाधनों एवं उत्पादों की माँग एवं आर्पूति की स्थिति गड़बड़ा जाना, माल एवं सेवाओं की कमी, सक्षम संभार तंत्र एवं सम्पत्ति सूची की कमी से उत्पादन में कमी आ सकती है। संचालन उत्तोलन संचालन दक्षता का एक उपाय है।
  • बाजार जोखिम : हालांकि प्रत्येक परियोजना के लिए बाजार की संभावना का विश्लेषण तथा माँग का पूर्वानुमान लगाया जाता है, फिर भी कई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कारणों की वजह से इसमें भिन्नता होने की संभावना रहती है, जिससे योजनागत परियोजना की बाजार संभावनाओं या उत्पाद विक्रय या प्रदान की जाने वाली सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह उपभोक्ता स्वीकार्यता जोखिम है।
  • आर्थिक जोखिम : वैश्विक तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था हमेशा विभिन्न चरणों में होती है तथा कोई भी परियोजना अनवरत रूप से जारी आर्थिक बदलावों से अछूती नहीं रह सकती। सभी परियोजनाओं के साथ अर्थव्यवस्था का जोखिम जुड़ा हुआ होता है। अर्थव्यवस्था में मंदी से उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति में कमी आती है तथा इस प्रकार परियोजना के विक्रय या राजस्व पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे मांग तथा विक्रय मूल्य में भी कमी आ सकती है। आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथ ही मुद्रा-स्फीति दर में भी परिवर्तन होता है जिससे किसी परियोजना की संभावना पर भी प्रभाव पड़ता है।
  • वित्तीय जोखिम :ब्याज दर या पूंजी लागत में किसी भी परिवर्तन से परियोजना की संभावना पर प्रभाव पड़ता है। १२ प्रतिशत के अनुमानित प्रतिलाभ पर संभावित कोई परियोजना १५ प्रतिशत के अनुमानित प्रतिलाभ पर संभावित असंभव हो जाती है। संभावित प्रतिलाभ में ब्याज दरों के साथ प्रत्यक्ष परिवर्तन होता है। विभिन्न परियोजनाओं के लिए वित्तीय जोखिम की मात्रा इनकी }ण इक्विटी अनुपात के साथ परिर्वतित होती है तथा वित्तीय उत्तोलन से इसे मापा जा सकता है।
  • प्रौद्यौगिकीय जोखिम :किसी भी परियोजना के लिए चयनित प्रौद्योगिकी का विफल होना सबसे बड़ा जोखिम होता है। इसके अतिरिक्त, किसी परियोजना के समक्ष प्रौद्योगिकी के स्तरोन्नयन की समस्या भी खड़ी हो सकती है। प्रौद्योगिकीय नवाचार के साथ कदमताल न मिलाने की वजहसे कई परियोजनाएं विफल हो चुकी हैं। आद्युनिक वैश्विक परिदृश्य में जोखिम का यह विशिष्ट स्रोत सबसे घातक होता है क्योंकि प्रौद्योगिकी में बड़ी तेजी से बदलाव हो रहा है।
  • वाणिज्यिक जोखिम : उपभोक्ता या }णी व्यक्ति का दीवालीया होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। हालांकि, कंपनी ऐसे अशोध्य }णों का प्रबंध करती है तथा इनके लिए प्रावद्यान किए जाते हैं परंतु कई बार जब उपभोक्ता काफी बड़ा हो तथा उसकी तरफ देय राशि की मात्रा काफी ज्यादा हो तो इससे परियोजना की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है।
  • गुणवत्ता जोखिम :आज की दुनिया में गुणवत्ता को काफी महत्व दिया जाता है तथा घटिया गुणवत्ता वाले उत्पादों को रिजेक्ट (नकार) कर दिया जाता है तथा उपभोक्ताओं की अपेक्षा के अनुसार उत्पाद की गुणवत्ता न बनाए रखी जाए तो दीर्घकाल में ब्राण्ड का मूल्य समाप्त हो सकता है।
  • कानूनी या विनियामक जोखिम : किसी देश के राजनीतिक माहौल की वजह से कानूनी या विनियामक परिवर्तन हो सकते हैं तथा इससे नए कर लगाए जाने या आपात पर रोक लगाने या निर्यात खोले जाने की वजह से जोखिम हो सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय जोखिम : यदि सौदा लागत (परिवहन लागत एवं कर) के साथ अंतर्राष्ट्रीय मूल्य घरेलू मूल्य से कम हो तो आयात करने का संकट खड़ा हो जाता है। विदेशी विनिमय दरों में किसी भी परिवर्तन से परियोजना पर अंर्तराष्ट्रीय परिदृश्य का प्रभाव पड़ता है। कम मूल्य पर आंकी गई भारतीय मुद्रा उस परियोजना पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है जो माल एवं सेवाओं के आयात पर निर्भर है। इसी प्रकार से, विदेशी विनिमय का कम मूल्य आंके जाने से उन परियोजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है जो निर्यात उन्मुखी है। युद्ध का जोखिम, आयात एवं निर्यात प्रतिबंद्य लगाए जाने तथा देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव से अंर्तराष्ट्रीय कारोबार वाली परियोजना में जोखिम हो सकता है।

२.१७. प्रबंधन जोखिम

प्रबंधन जोखिम के विभिन्न सोपान इस प्रकार हैं :

  • जोखिम की पहचान करना : जोखिम की पहचान करने की विभिन्न पद्धतियाँ हैं। ये इस प्रकार हैं :
  • लक्ष्य संबंधी जोखिम पहचान : परियोजना के कार्यकलाप परियोजना के लक्ष्यों के समरूप न होना।
  • आधारित जोखिम की पहचान :परियोजना के स्रोत या स्टेकहोल्डर संभावनाओं के अनुरूप न होना।
  • उद्योग आधारित जोखिम पहचान :उद्योग का समग्र क्षेत्र सही स्थिति में न होना।
  • अर्थव्यवस्था संबंधी जोखिम पहचान :समग्र तौर पर कमजोर आर्थिक परिस्थितियों के कारण परियोजना द्वारा अपेक्षित कार्य-निष्पादन को पूरा न किया जाना।
  • समय आधारित जोखिम पहचान :परियोजना का अपेक्षित समय-अनसु ूची से काफी पीछे चलना।

वित्तीय अनुपुपात आधारित जोखिम पहचान :यह जोखिम की पहचान करने की सबसे सामान्य पद्धति है। विभिन्न वित्तीय अनुपात यह बताते हैं कि परियोजना जोखिमपूर्ण हो रही है।

जोखिम के कारणों का मापन एवं निहित प्रतिबंध : जोखिम के कारकोंध्कारणों की पहचान करें। निहित जोखिम के लिए एक या एक से से अधिक संभावित कारण हो सकते हैं। परियोजना के मालिक को जहां तक संभव हो ज्यादा से ज्यादा कारणों का पता लगाना चाहिए। इसमें वित्तीय, आर्थिक, विपणन, उत्पादन या प्रौद्योगिकी प्रतिबंद्य शामिल हो सकते हैं। प्रतिबंधों के अंर्तगत पहचान किए गए कारणों में विविधता हो सकती है। उदाहरण  के लिए, उत्पादन की लागत में अत्यधिक विचलन हो तो इसका कारण संगठन की कमजोर दक्षता हो सकती है।

जोखिम परिमाण :जोखिम परिमाण का निधार्र ण करने के लिए विभिन्न पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है।

  • विकल्पों का विकास करना :जोखिम को कम करने की विभिन्न पद्धतियाँ हो सकती हैं, हालांकि इसे पूर्ण रूप से दूर करना संभव नहीं है। जोखिम प्रबंधन की विभिन्न पद्धतियाँ हैं जो निम्नानुसार हैं :
  • न्यूनीकरण :इस प्रक्रिया में परियोजना के लिए खतरा उत्पन्न करने वाली घटना के परिणामों या लाभकारिता की स्थिति में कमी की जाती है। इनमें वित्तीय, विपणन या अन्य उपाय शामिल हैं।
  • शेयरिंग :यदि परियोजना में अत्यधिक जोखिम होने की संभावना हो तो जोखिम को कम करने के लिए इसे संयुक्त उपक्रम के रूप में किसी अन्य फर्म के साथ शेयर किया जा सकता है।
  • आउटसोर्सिंग :जोखिम को कम करने के लिए अभी हाल ही के वषोर्ं में प्रयोग की जाने वाली यह सबसे आम पद्धति है। जोखिम वाले संघटक का आऊटर्सोस किया जाता है। आउटसोर्सिंग उन परिस्थितियों में भी बेहद लाभकारी हो सकती है जहां अत्यधिक पूंजी निवेश जोखिम का कारण होता है।
  • विविधीकरण :विविधीकरण जोखिम कम करने के लिए सदियों से सुझाई गई सबसे आम पद्धति है। अत्यधिक उच्च नकारात्मक सह-संबंध वाली परियोजना या उत्पाद का विविधीकरण काफी हद तक परियोजना एवं उत्पाद दोनों के जोखिम को कम कर सकता है।
  • परित्याग : यदि परियोजना में एसे जोखिम हो जिसका तब प्रबंध करना संभव न हो तो परियोजना का इसके उपयोगी जीवन से पहले ही परित्याग कर देना चाहिए। यह तभी संभव है जब बहिर्गमन संभव हो।
  • प्रतिधारण :जोखिम प्रतिधारण छोटे जोखिमों के लिए संधारणीय रणनीति है। ऐसे सभी जोखिम जिन्हें कम न किया जा सके या अंतरित न किया जा सके उन्हें स्वाभाविक तौर पर प्रतिधारित किया जाता है। इस परिस्थिति में, फर्म को हमेशा संकट वाली परिस्थिति में स्वयं को बनाए रखने की स्थिति में होना चाहिए।
  • आकस्मिक निधियन : आकस्मिक निधियाँ मुद्रास्फीति या गैर-अनुमानित लागतों की वजह से अतिरिक्त लागत को वहन करने के लिए आरक्षित की जाती हैं। इससे परियोजना के कार्यान्वयन के दौरान अकस्मात निधि की आवश्यकता समाप्त होती है।

समय प्रतिरोधक :प्रबंधक मानवीय स्वभाव के अनुरूप यथा शीघ्र समय पर परियोजना प्रारंभ करने का प्रयास करते हैं। ज्यादा जल्दबाजी से व्यावहारिक अनुप्रयोग की समस्या खड़ी होती है। इसलिए, कई बार कई कार्यकलापों के लिए समय प्रतिरोधक रखे जाते हैं।

श्रेद्गठ विकल्पों का चयन : कई विकल्पों का विकास करने के बाद, जोखिम प्रबंधन का अगला कदम उन श्रेष्ठ विकल्पों का चयन करना है, जो आसानी से प्रबंध किए जाने वाले तथा सस्ते हों।

जोखिम प्रबंधन योजना तैयार करना :सही परिणाम प्राप्त करने के लिए चयनित जोखिम प्रबंधन रणनीति का कार्यान्वयन उपयुक्त ढंग से करना चाहिए। परियोजना प्रबंधक को रणनीति तैयार करनी चाहिए तथा इसे सभी स्टेकहोल्डरों के साथ साझा करना चाहिए। जिम्मेवारियां व्यक्तिगत तौर पर सौंपी जानी चाहिए। जोखिम प्रतिधारण रणनीति की स्थिति में उच्च प्रबंधन को दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए तथा संकट की स्थिति पैदा होने पर उपायों के कार्यान्वयन के संबंध में संचालन प्रबंधन को दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए। उच्च प्रबंधन को कार्य योजना एवं इसमें निहित जोखिम के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।

कार्यान्वयन :योजना का कार्यान्वयन करने में परियोजना प्रबंधक को टीम की अगुवाई करनी चाहिए। जोखिम में कमी लाने की योजनाओं का कार्यान्वयन करने से पूर्व प्रतिबंधों एवं परिमाणों की पहचान की जानी चाहिए। योजना की सफलता में परियोजना प्रबंधक एवं उसकी टीम के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होता है।

समीक्षा :यह ऐसा चरण है जिससे कई बार प्रबंधक बचना चाहते हैं। परंतु यह एक महत्वपूर्ण कार्यकलाप है क्योंकि समीक्षा से और अधिक सुधार करने (काफी हद तक जोखिम में कमी लाई जा सकती है) में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त, यदि वांछित परिणाम प्राप्त न हो तो समीक्षा चरण के दौरान चिन्हित किए गए कुछ और कदमों की आवश्यकता हो सकती है।

 

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 UNIT - 3


  • स्लेक्द्गा फ्लोट्‌स एवं उसके अनुप्रयोग के बारें में विस्तार से जानकारी दीजिऍ ?

परियोजना प्रबंधन में स्लैक (Slack) और फ्लोट (Float) महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं, जो परियोजना के समय प्रबंधन और शेड्यूलिंग में उपयोग होती हैं। यह दोनों अवधारणाएँ यह दर्शाती हैं कि परियोजना के विभिन्न कार्यों को बिना किसी विलंब के कितनी देरी से पूरा किया जा सकता है। इन्हें समझने से परियोजना प्रबंधक यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि समय की बाधाओं के बावजूद परियोजना सुचारू रूप से चलती रहे।

स्लैक (Slack) और फ्लोट (Float) की परिभाषा

  1. स्लैक (Slack):

    • परिभाषा: स्लैक वह अधिकतम समय होता है जिसके लिए एक गतिविधि को विलंबित किया जा सकता है, बिना परियोजना के अंतिम शेड्यूल को प्रभावित किए।
    • प्रकार:
      • कुल स्लैक (Total Slack): यह उस समय का माप है जिसे किसी कार्य को देरी करने पर परियोजना के कुल समय में बदलाव नहीं आता।
      • मुक्त स्लैक (Free Slack): यह उस समय का माप है जिसे किसी कार्य को देरी करने पर उसके तुरंत बाद वाले कार्य में कोई बदलाव नहीं आता।
  2. फ्लोट (Float):

    • परिभाषा: फ्लोट भी स्लैक के समान है और यह वह अधिकतम समय है जिसके लिए किसी गतिविधि को विलंबित किया जा सकता है, बिना परियोजना के निर्धारित समापन समय को प्रभावित किए।
    • प्रकार:
      • कुल फ्लोट (Total Float): यह कार्य के लिए उपलब्ध कुल अतिरिक्त समय है, जो परियोजना के समापन समय को प्रभावित किए बिना उसे विलंबित किया जा सकता है।
      • मुक्त फ्लोट (Free Float): यह समय अवधि है जिसमें कार्य को देरी करने पर उसके बाद के कार्य में कोई देरी नहीं होती।

स्लैक और फ्लोट का अनुप्रयोग

स्लैक और फ्लोट के सही अनुप्रयोग से परियोजना प्रबंधक यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि संसाधनों का प्रभावी उपयोग हो और परियोजना समय पर पूरी हो। इसके निम्नलिखित उपयोग हैं:

  1. समय प्रबंधन (Time Management):

    • परियोजना के प्रत्येक कार्य के लिए स्लैक और फ्लोट की गणना करके, प्रबंधक यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि समय का सही प्रबंधन हो और कार्यों को प्राथमिकता दी जाए।
  2. संसाधन आवंटन (Resource Allocation):

    • यदि किसी कार्य में अधिक फ्लोट है, तो उसके संसाधनों को अन्य आवश्यक कार्यों में अस्थायी रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके।
  3. जोखिम प्रबंधन (Risk Management):

    • फ्लोट और स्लैक की मदद से जोखिम वाले कार्यों की पहचान की जा सकती है और उनके लिए समय की योजना बनाई जा सकती है, जिससे परियोजना की समग्र सुरक्षा बढ़ती है।
  4. परियोजना शेड्यूलिंग (Project Scheduling):

    • फ्लोट और स्लैक की गणना से परियोजना का अधिक यथार्थवादी और व्यवहार्य शेड्यूल तैयार किया जा सकता है, जिससे समय पर परियोजना पूरी करने की संभावना बढ़ जाती है।

उदाहरण

मान लीजिए, एक निर्माण परियोजना में निम्नलिखित कार्य हैं:

  1. कार्य A: 5 दिन
  2. कार्य B: 10 दिन
  3. कार्य C: 15 दिन
  4. कार्य D: 20 दिन

इस परियोजना में कार्यों की एक निश्चित शृंखला है, जहां कार्य A के बाद कार्य B होता है, फिर कार्य C, और अंत में कार्य D।

यदि कार्य A में 5 दिन का फ्लोट है, इसका मतलब है कि कार्य A को 5 दिनों तक विलंबित किया जा सकता है बिना कार्य B को प्रभावित किए। यदि कार्य B के पास 3 दिनों का स्लैक है, तो कार्य B को 3 दिनों तक विलंबित किया जा सकता है बिना पूरे परियोजना के समय को प्रभावित किए।

गणना

स्लैक और फ्लोट की गणना करने के लिए Critical Path Method (CPM) का उपयोग किया जाता है। इसमें निम्नलिखित चरण शामिल हैं:

  1. सभी कार्यों का निर्धारण (Identify all tasks): सभी कार्यों की सूची बनाएं।
  2. कार्य की अवधि का निर्धारण (Determine the duration of each task): प्रत्येक कार्य की समय अवधि का निर्धारण करें।
  3. कार्य निर्भरता का निर्धारण (Identify task dependencies): यह पहचानें कि कौन से कार्य किस कार्य पर निर्भर हैं।
  4. प्रारंभ और समाप्ति समय की गणना (Calculate the start and finish times): प्रत्येक कार्य के प्रारंभ और समाप्ति समय की गणना करें।
  5. स्लैक और फ्लोट की गणना (Calculate slack and float): CPM का उपयोग करके स्लैक और फ्लोट की गणना करें।

निष्कर्ष

स्लैक और फ्लोट परियोजना प्रबंधन में महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं जो परियोजना प्रबंधक को समय प्रबंधन, संसाधन आवंटन, जोखिम प्रबंधन, और परियोजना शेड्यूलिंग में मदद करती हैं। इन्हें सही तरीके से समझने और लागू करने से परियोजना समय पर और बजट के भीतर पूरी की जा सकती है।


OR


स्लेक्स, फलोटेट्‌स एवं उनके अनुप्रयोग

स्लेक किसी परियोजना की समग्र समयावधि को प्रभावित किए बिना किसी घटना के लिए अधिकतम संभावित विलम्ब है।

स्लेक;पद्ध त्रएलओटी दृ ईओटी

निम्नलिखित उदाहरण में स्लेक ;१द्ध त्र ० दृ ० त्र ० ए स्लेक ;२द्ध त्र १३ दृ ९ त्र ४

कार्यकलापों के लिए फ्लोट वही होते हैं जो घटनाओं के लिए स्लेक्स। इसलिए, हम फ्लोट को परियोजना समयावधि में परिवर्तन किए बिना कार्यकलाप के लिए अधिकतम संभावित विलम्ब के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।

फ़लोट्‌स तीन प्रकार के होते हैं :

कुलुल फ्लोट : यह किसी कार्यकलाप के लिए इसके पूवर्व र्ती या परवर्ती कार्यकलापों में बिना कोई विलम्ब किए अधिकतम संभावित विलम्ब होता है।

फ्री फ्लोट : यह परवर्ती कार्यकलापों के फ्लोट को प्रभावित किए बिना कार्यकलापों के लिए अधिकतम संभावित विलम्ब होता है।

स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) फ्लोट: यह पूर्ववर्ती कार्यकलापों के साथ कार्यकलाप के लिए अधिकतम संभावित विलम्ब है और इससे परवर्ती कार्यकलापों के फ़लोट्‌स को प्रभावित करता है।

कुल फ्लोट ;आई,जेद्ध त्र एलओटीजे दृ इओटीजेदृ डीआईजेद्ध डीआईजे

फ्री फ्लोट ;आई, जेद्ध त्र एलओटीजे दृ इओटीजेदृ डी;आई,जेद्ध डीआईजे

इंडिपेंडेंट फ्लोट ;आई, जे  एलओटीजे इओटीजे डी;आई,जे डीआईजे

फ़लोट्‌स की विशेषताएं इस प्रकार हैं :

इंडिपेंडेंट फ्लोट ढ फ्री फ्लोट ढ कुल फ्लोट

केवल इंडिपेंडेंट फ्लोट ही नकारात्मक हो सकता है, शेष दो फ्लोट हमेशा सकारात्मक या शून्य होते हैं।

सभी फ़लोट्‌स के साथ कार्यकलाप त्र ०, महत्वपूर्ण कार्यकलाप हैं।

फ़लोट्‌स के अनुप्रयोग इस प्रकार हैं :

१ यह महत्वपूर्ण कार्यकलापों की पहचान करता है तथा सभी गैर-महत्वपूर्ण कार्यकलापों के अधिकतम संभावित विलम्ब को क्वाटिफाई करता है।

२ नेटवर्क का क्रेशिंग में यह बहुत महत्वपूर्ण है (समग्र परियोजना के समय और लागत में कमी करना)।

३ यह संसाधन आबंटन एवं स्मूदिंग में सहायक होता है।


  • सामाजिक लागत व सामाजिक लाभ विश्लेषण की प्रक्रिया को विस्तार से समझाइऍ ?

 सामाजिक लागत लाभ विश्लेषण

एससीबीए को आर्थिक कार्य-निष्पादन से विभेद कर सामाजिक निष्पादन की चिंताओं के सुव्यवस्थित मूल्यांकन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसमें उन सभी ऐसे कार्यकलापों का विश्लेषण किया जाता है जिनका सामाजिक या वृह्त आर्थिक प्रभाव हो। एस सी बी ए की तकनीक का विकास वर्ष १८४४ में फ्रांसीसी इंजीनियर जूल्स डूपूइट द्वारा किया गया था। २०वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में प्रोफेसर ए.सी. पिगोयू, कल्याणकारी आर्थिक कार्यकलापों पर कार्य करते हुए, ने सामाजिक लागत एवं लाभों की तुलना में वित्तीय लागत एवं लाभ के बीच विभेद का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, श्श्आर्थिक रूप से लाभकारी कोई परियोजना सामाजिक रूप से समदृश लाभकारी नहीं भी हो सकती। इसका व्यावहारिक अनुप्रयोग वर्ष १९३० एवं इसके बाद प्रारंभ हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार ने वर्ष १९३६ में इसका प्रयोग खाद्य नियंत्रण उपायों का विश्लेषण करने के लिए किया।

उदाहरण के लिए, आइए हम दो परियोजनाओं की तुलना करें, एक परियोजना में सिगरेट का उत्पादन किया जा रहा है जबकि दूसरी परियोजना में कपड़े का उत्पादन किया जा रहा है। लागत लाभ विश्लेषण तथा पूंजी बजट में प्रयोग किए जाने वाले विभिन्न दृष्टिकोणों के अनुसार सिगरेट उत्पादन में वित्तीय लाभ अधिक है। परंतु इसमें संगठन के लिए केवल एक बहुत ही संर्कीण पहलू, आर्थिक पहलू, पर विचार किया गया, परंतु क्या इसमें उत्पादों के प्रभाव पर विचार किया गया है। सिगरेट उद्योग का संगठन के लिए आर्थिक लाभ की अपेक्षा अन्य प्रभाव ज्यादा व्यापक होते हैं जैसे देश में फेफड़ों एवं दिल की बीमारियों में वृद्धि, जिसकी लागत अत्यधिक ज्यादा होती है। लागत लाभ विश्लेषण करते समय इस लागत पर विचार नहीं किया जाता है। सामाजिक लागत लाभ विश्लेषण में वृह्त पैरामीटरों जैसे आर्थिक लाभ के साथ ही समाज एवं राष्ट्र दोनों पर इसके प्रभाव का प्रयोग किया जाता है।

३.१० सामाजिक लागत यदि किसी कार्यकलाप से कतिपय संसाधनों का ह्मस होता है, तो यह सामाजिक लागत है। उदाहरण के लिए, कतिपय परियोजना जैसे केन्द्र सरकार की सड़क चर्तुभुज परियोजना में सीमेंट का प्रयोग किया जा रहा है तथा इसी सीमेंट का प्रयोग वैकल्पिक तौर पर बेघरों के लिए घरों के निर्माण हेतु किया जा सकता है। यह सामाजिक लागत है। परंतु यदि इससे घरों के निर्माण हेतु सीमेंट की उपलब्धता में कोई अंतर नहीं आ रहा हो तो यह सामाजिक लागत नहीं होगी।

आइए हम विभिन्न प्रकार की सामाजिक लागतों की गणना करें :

पर्यावरणीय हानि :यदि किसी परियोजना से पर्यावरण में गड़बड़ी होती हो जैसे पेड़ों को काटना या ठोस अथवा तरल अपशिष्टों को उत्पन्न किए जाने से किसी भी प्रकार का प्रदूषण होता हो, तो यह सामाजिक लागत है। यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो सकती है। प्रत्यक्ष लागत का एक उदाहरण उद्योग से होने वाला उर्त्सजन है तथा अप्रत्यक्ष लागत माल के परिवहन हेतु उपयोग में लाए जाने वाले वाहनों के माध्यम से हो सकती है।

पारिस्थितिकी असंतुलन :कई परियोजनाओं से पारिस्थितिकीय असंतुलन पैदा हो जाता है जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अति उपयोग उदाहरण के लिए वनों को काटे जाने से कई प्राणियों के लिए आवास की उपलब्धता में कमी आ सकती है। जल के अति उपयोग से जल की कमी हो सकती है। कई बड़े शहरों में विकसित सैटेलाइट टाऊनशिप से व्यापक स्तर पर पारिस्थितिकीय असंतुलन की स्थिति पैदा हुई है तथा लोगों को अत्यधिक जल की कमी की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तथा इन क्षेत्रों से पक्षियों जैसे प्राणी विलुप्त हो जाएगें।

प्रयोग की गई मानव सेवा :कार्यान्वयन या संचालनों के दौरान परियोजना में प्रयोग में लाई गई मानव सेवा को किसी अन्य कार्य के लिए प्रयोग में लाया जा सकता था। इस प्रकार से, यह एक सामाजिक लागत (अवसर लागत) है। इसके अतिरिक्त, परियोजना से कार्य संबंधी बीमारी या चोट भी हो सकती है। इनसे व्यावसायिक बीमारियां भी हो सकती हैं जो सामाजिक लागत हैं।

प्रयोग में लाई गई सामग्री :परियोजना में प्रयोग में लाई गई सामगी्र का किन्ही अन्य कायोर्ं के लिए उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार से, यह एक सामाजिक लागत है।

जन-सुविधाओं का उपयोग :परियोजना में कुछ सार्वजनिक रूप से उपयोगी सेवाओं जैसे सरक्षा (पुलिस) या अग्निशमन इत्यादि का भी प्रयोग किया जा सकता है। यह भी एक सामाजिक लागत का संघटक है।

बेरोजगारी :कई उद्योगों से बेरोजगारी की समस्या भी खडी़ हो रही है। कृषि में मशीनीकरण से श्रमिकों का विस्थापन हो सकता है और उनकी आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है। किसी नदी पर पुल बनाए जाने से नौकायन में लगे हुए लोगों की आजीविका कमाने हेतु बेरोजगारी पैदा हो सकती है। एक बड़ा उद्योग कई कॉटेज या छोटे पैमाने के उद्योगों को समाप्त करता है तथा इस प्रकार से बेरोजगारी पैदा होती है।

ऊर्जा का ह्मस तथा वैविक गर्मी :आज के विश्व में ऊर्जा चिंता का मुखय कारण है। कोई भी नया संगठन या उद्योग र्ऊजा का उपयोग करता है और इस प्रकार र्ऊजा के विभिन्न स््रोतों की उपलब्धता में कमी लाता है। बड़े संगठनों द्वारा ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग किए जाने से विश्व के सामने र्ऊजा कमी की समस्या खड़ी हो गई है। र्ऊजा के अति उपभोग से र्काबन-डाइ-ऑक्साइड की संतृप्ति की स्थिति हो गई है, जो वैश्विक गर्मी के रूप में परिणत होती है।

विदेशी मुद्रा का उपयोग :कई उद्योग उपकरण या प्रौद्योगिकी जैसे संसाधनों को प्राप्त करने के लिए देश के विदेशी मुद्रा भंडार का प्रयोग करते हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आती है तथा यह सम्पूर्ण राष्ट्र की लागत होती है।

सब्सिडी (सहायता) : विविध प्रकार की सहायता जैसे उर्वरक सहायता, विद्यतु सहायता या कर सहायता पुनः राष्ट्र की लागत है, जो अप्रत्यक्ष तौर पर समाज की भी लागत है। कई अन्य लागतें ऐसी हैं जिनकी पहचान पृथक परियोजनाओं के लिए की जाती है जैसे आर्थिक विषमता में बढ़ोतरी, भूमिक्षरण की लागत, नवीनीकरण इत्यादि।

३.११. सामाजिक लाभ :परियोजनाएं केवल समाज के लिए लागत का कारण ही नहीं हैं अपितु वे समाज को लाभ भी प्रदान कर रही हैं।

आइए कुछ उन सामाजिक लाभों की गणना करें जो किसी योजना से हो सकते हैं :

पयार्वरण सुधार :परियोजनाओं में पौधे लगाने, स्वच्छ जल प्रदान करने की योजनाएं बनाई जाती हैं तथा ऊर्जा उपयोगिता में सुधार कर समाज को लाभ प्रदान करती हैं।

प्रदान किए जाने वाले उत्पाद एवं सेवाएं :परियोजनाएं समाज को कई उत्पाद एवं सेवाएं प्रदान करती हैं जिससे जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। कोई अस्पताल, शैक्षिक संस्था या र्फामास्यूटिकल उत्पाद समाज की जीवन की गुणवत्ता में सुधार करते हैं। यह समाज के लिए लाभ की स्थिति होती है। कोई नदी बांध परियोजना पृथक हो चुके समाज को शेष समाज से जोड़ने का कार्य करती है। यह पुनः सामाजिक लाभ का उदाहरण है।

रोजगार सृजन :नई परियोजनाएं सामान्यतः समाज को रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान करती है। शहर में कृषि आधारित परियोजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों से कई बेरोजगार लोगों को आर्कषित करती हैं तथा उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार करने में सहायक होती हैं।

कर : परियोजनाओं के कार्यान्वयन के दौरान तथा मुखय तौर पर कार्यान्वयन के बाद भुगतान किए जाने वाले करों तथा आबकारी भुगतानों को सरकार द्वारा एकत्रित किया जाता है तथा उनका प्रयोग समाज की बेहतरी के लिए किया जा सकता है। यह समाज के लिए मुखय लाभ है।

अप्रत्यक्ष रोजगार :परियोजनाओं से हमेशा अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। क्षेत्र में परियोजना के परिणामस्वरूप क्षेत्र के ट्रांसर्पोटर, खाद्य एवं अन्य आपूर्तिकर्ता फलते-फूलते हैं। इंदौर के नजदीक स्थित पीथमपुर का छोटा गांव तथा ग्रामीण काफी समृद्ध हो गए हैं तथा इस क्षेत्र में विकसित उद्योगों या प्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त कामगारों के या तो परिवहन अथवा उनके लिए माल आर्पूति के कारोबार के माध्यम से आय प्राप्ति के व्यापक अवसर प्राप्त हुए हैं।

विदेशी मुद्रा अर्जन :कई परियोजनाओं में नियार्त के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है जबकि अन्य में आयात में कमी लाकर इसकी बचत की जाती है। दोनों ही तरीकों से राष्ट्र के विदेशी मुद्रा भण्डार के मौजूदा खाते में बढ़ोतरी होती है तथा इस प्रकार से समाज एवं राष्ट्र का भला होता है।

अस्पताल एवं शिक्षा सुविधाएं :कई परियोजनाएं जो प्रत्यक्ष तौर पर शिक्षा एवं चिकित्सा सुविद्याओं के विकास में शामिल नहीं होती, परंतु वे कामगारों के लाभ के लिए इन सुविद्याओं का सृजन करती हैं जिनका प्रयोग आस-पास रहने वाले लोगों द्वारा भी किया जाता है।

पिछड़े क्षेत्रों का विकास :सरकार ऐसी परियोजनाओं को प्रोत्साहन प्रदान करती है जो पिछड़े क्षेत्रों में स्थित हैं। उद्योगपति उन प्रोत्साहनों से आर्कषित होकर पिछड़े क्षेत्रों में अपनी परियोजनाओं की स्थापना करते हैं। इससे पिछड़े क्षेत्रों का उत्थान होता है तथा बेहतर सामाजिक समानता को बढ़ावा मिलता है। पृथक परियोजनओं के साथ जुड़े हुए कई अन्य लाभ होते हैं जैसे वर्ण प्रणाली में कमी, धार्मिक एकता, गरीबी में कमी इत्यादि, इन सभी को समाज के लिए लाभकारी या फायदेमंद माना जा सकता है।


  • परियोजना समाप्ति लेखा परीक्षा की प्रक्रिया को समझ सकेगें।

. परियोजना समाप्ति लेखा-परीक्षा

  • लेखा-परीक्षा को सामान्यतः किसी संगठन की प्रक्रिया, दस्तावेजों या ब्यौरों की पूर्वाग्रह रहित जांच या मूल्यांकन के तौर पर परिभाषित किया जाता है। यह आंतरिक तौर (संगठन के कर्मचारियों द्वारा) या बाह्य तौर पर (किसी बाह्य फर्म द्वारा) की जा सकती है। परियोजना लेखा-परीक्षा में पूरी हो चुकी परियोजना की इस तथ्य के दृष्टिगत वास्तविक रूप-रेखा की परीक्षा की जाती है कि क्या योजना बनाई गई थी तथा क्या वांछित था। परियोजना समाप्ति लेखा-परीक्षा (पीएसी) को परियोजना समाप्ति के बाद इसके मूल्यांकन के तौर पर परिभाषित किया गया है :
  • वित्तीय लेखा-परीक्षा : प्रत्येक परियोजना के लिए कुछ वित्तीय प्रक्षेपण होते हैं जिन्हें योजना एवं मूल्यांकन स्तर पर निर्धारित किया जाता है। वित्तीय लेखा-परीक्षा में प्रक्षेपणों की वास्तविक प्राप्तियों के साथ तुलना की जाती है।
  • तकनीकी लेखा-परीक्षा :यह लेखा-परीक्षा परियोजना के अन्य उद्देश्यों अर्थात गुणवत्ता एवं क्षेत्र पर प्रकाश डालती है। इस लेखा-परीक्षा में उत्पाद में प्राप्त वास्तविक गुणवत्ता तथा योजनागत गुणवत्ता और सेवाओं की तुलना की जाती है।
  • अनुसूचित लेखा-परीक्षा : समय किसी भी परियोजना का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है। विलम्बित परियोजना से अवसर लागत अथवा असंतुष्ट उपभोक्ता के रूप में व्यापक नुकसान हो सकता है। अनुसूचित लेखा-परीक्षा का उद्देश्य प्रक्षेपित समय की तुलना प्रतिस्पर्धा के वास्तविक समय के साथ करना है।
  • सामाजिक लेखा-परीक्षा :इस प्रकार की लेखा-परीक्षा सामान्यतः या तो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या सरकारी परियोजनाओं के लिए की जाती है। इसमें प्रक्षेपित लागत की तुलना वहन की गई सामाजिक लागत का निर्धारण किया जाता है।
OR

परियोजना समाप्ति लेखा-परीक्षा (Project Closure Audit) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो परियोजना के समापन के बाद की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य परियोजना के सफल समापन की पुष्टि करना और उसकी प्राप्तियों को मूल्यांकित करना होता है। यह विभिन्न प्रकारों में किया जा सकता है, जैसे:

  1. वित्तीय लेखा-परीक्षा: इसमें परियोजना के लिए निर्धारित वित्तीय प्रक्षेपण और उसकी वास्तविक प्राप्तियों की जांच की जाती है। यह लेखा-परीक्षा वित्तीय दृष्टिकोण से परियोजना की सफलता या असफलता का मूल्यांकन करती है।

  2. तकनीकी लेखा-परीक्षा: यह परियोजना की तकनीकी दृष्टिकोण से मूल्यांकन करती है, जैसे उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता, उनका उपयोग, और क्षेत्रफल। यह विभिन्न उपक्रमों के गुणवत्ता और प्रदर्शन की तुलना करके निष्कर्ष निकालती है।

  3. अनुसूचित लेखा-परीक्षा: यह विलम्बित परियोजना से उत्पन्न नुकसान या किसी भी असंतोषजनक परिणाम का मूल्यांकन करती है। इसमें परियोजना की निर्माण और प्रक्रिया में किए गए कमियों का पता लगाया जाता है।

  4. सामाजिक लेखा-परीक्षा: यह लेखा-परीक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सरकारी परियोजनाओं के लिए की जाती है और उनकी सामाजिक लागत का मूल्यांकन करती है। इसमें प्रक्षेपित लागत की तुलना सामाजिक लागत के साथ की जाती है।

इन प्रक्रियाओं के माध्यम से परियोजना समाप्ति लेखा-परीक्षा प्राप्तियों की पुष्टि करती है और परियोजना के प्रबंधन में सुधार की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करती है।



  • परियोजना विफलता के क्या कारण क्या हो सकते है, सम्पूर्ण प्रक्रिया को विस्तार से समझाइऍ ?

परियोजना की विफलता के कारण- कई परियोजनाएं विफल हो जाती हैं तथा या तो उन्हें समय से पूर्व ही समाप्त कर दिया जाता है अथवा इनके पूरा होने के बाद समस्याएं बड़ी होती हैं। किसी भी परियोजना के विफल होने के विभिन्न कारण हैं।

३.१४.१ योजना से संबंधित कारण

योजना स्तर पर भी कई प्रकार की गलतियां हो जाती हैं, जो किसी परियोजना की विफलता का कारण बनती हैं। न्यून आकलन लागत से नकदी प्रवाह में कमी आ सकती है तथा इससे परियोजना में विलम्ब होता है, जो परियोजना की विफलता का कारण बनता है। योजना स्तर पर की गई कुछ बड़ी गलतियों से परियोजना कार्यान्वयन में समस्याएं खड़ी हो सकती हैं तथा इसके परिणामस्वरूप परियोजना विफल भी हो सकती है।

  • न्यून परिभाषित या कम परिभाषित क्षेत्र या उद्देश्य
  • समय एवं लागत का न्यून आकलन
  • दीर्घ परियोजना आयोजन
  • अनुपयुक्त प्रौद्योगिकी का चयन
  • दोषपूर्ण प्रक्रिया योजना

​​​​​​​३.१४.२ नेतृृत्व से संबंधित कारण

  • अस्पष्ट भूमिका एवं जिम्मेवारी
  • भयग्रस्त वातावरण
  • वास्तविक को नज़रअंदाज करना
  • अपर्याप्त मॉनीटरिंग एवं नियंत्रण
  • अपर्याप्त संचार
  • अपर्याप्त ट्रेकिंग (खोज)
  • पर्याप्त प्रतिवेदन आवृति

३.१४.३ अन्य कारण

  • अनुपयुक्त परिवर्तन प्रबंधन
  • सामाजिक पहलुओं की अनदेखी करना
OR

परियोजनाएं कई कारणों से विफल हो सकती हैं, जिनमें योजना, नेतृत्त्व, और अन्य बाहरी कारक शामिल होते हैं। किसी परियोजना की विफलता के कारणों को जानना और समझना महत्वपूर्ण है ताकि भविष्य में उनसे बचा जा सके। नीचे परियोजना विफलता के प्रमुख कारणों का विस्तार से विश्लेषण किया गया है:

3.14.1 योजना से संबंधित कारण

योजना स्तर पर की गई गलतियाँ अक्सर परियोजना की विफलता का मुख्य कारण बनती हैं। इसमें निम्नलिखित कारक शामिल हैं:

  1. न्यून परिभाषित या कम परिभाषित क्षेत्र या उद्देश्य:

    • उदाहरण: एक सॉफ्टवेयर विकास परियोजना में यदि उद्देश्यों और आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया हो, तो टीम यह नहीं जान पाएगी कि वास्तव में क्या बनाना है, जिससे गलत उत्पाद बन सकता है।
  2. समय एवं लागत का न्यून आकलन:

    • उदाहरण: एक इमारत निर्माण परियोजना में, यदि समय और लागत का सही अनुमान नहीं लगाया गया, तो बजट खत्म हो सकता है और समय पर काम पूरा नहीं हो पाएगा।
  3. दीर्घ परियोजना आयोजन:

    • उदाहरण: एक लंबी अवधि की परियोजना जैसे हाईवे निर्माण में, कई बार योजना की लंबाई और जटिलता को सही ढंग से नहीं संभाला जाता, जिससे समय और लागत में वृद्धि होती है।
  4. अनुपयुक्त प्रौद्योगिकी का चयन:

    • उदाहरण: एक आईटी परियोजना में, यदि अनुपयुक्त सॉफ़्टवेयर या हार्डवेयर चुना जाता है, तो यह परियोजना की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाएगा और प्रौद्योगिकी संबंधी समस्याएं उत्पन्न होंगी।
  5. दोषपूर्ण प्रक्रिया योजना:

    • उदाहरण: एक निर्माण परियोजना में, यदि प्रक्रियाएं ठीक से परिभाषित नहीं हैं, तो कार्यान्वयन के दौरान समस्याएं आ सकती हैं, जिससे देरी और अतिरिक्त लागत हो सकती है।

3.14.2 नेतृत्त्व से संबंधित कारण

परियोजना नेतृत्त्व और प्रबंधन में कमियाँ भी परियोजना की विफलता का कारण बनती हैं। इसमें निम्नलिखित कारक शामिल हैं:

  1. अस्पष्ट भूमिका एवं जिम्मेवारी:

    • उदाहरण: यदि एक टीम में प्रत्येक सदस्य की भूमिका और जिम्मेवारी स्पष्ट नहीं है, तो कोई काम सही ढंग से नहीं किया जाएगा और अंत में परियोजना विफल हो सकती है।
  2. भयग्रस्त वातावरण:

    • उदाहरण: अगर प्रोजेक्ट मैनेजर बहुत सख्त और डराने वाला है, तो टीम के सदस्य अपनी समस्याओं को नहीं बतायेंगे, जिससे छोटी-छोटी समस्याएं बड़ी बन जाएंगी।
  3. वास्तविक को नज़रअंदाज करना:

    • उदाहरण: एक प्रोजेक्ट मैनेजर को यह मान लेना कि सभी कार्य समय पर और बिना किसी समस्या के होंगे, यथार्थवादी नहीं है। इस तरह की मानसिकता से वास्तविक समस्याओं को नज़रअंदाज किया जा सकता है।
  4. अपर्याप्त मॉनीटरिंग एवं नियंत्रण:

    • उदाहरण: यदि परियोजना की प्रगति पर सही तरीके से निगरानी नहीं रखी जाती और समय पर सुधारात्मक कदम नहीं उठाए जाते, तो परियोजना सही दिशा में नहीं जा पाएगी।
  5. अपर्याप्त संचार:

    • उदाहरण: अगर परियोजना टीम के बीच संचार अच्छा नहीं है, तो आवश्यक जानकारी का आदान-प्रदान नहीं हो पायेगा और इससे गलतफहमियां और गलतियां बढ़ेंगी।
  6. अपर्याप्त ट्रेकिंग (खोज):

    • उदाहरण: परियोजना की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए सही उपकरण और प्रक्रियाएं नहीं होने से प्रगति को मापना मुश्किल हो जाता है और समस्याओं का पता नहीं चलता।
  7. पर्याप्त प्रतिवेदन आवृति:

    • उदाहरण: नियमित रूप से रिपोर्टिंग नहीं करने से परियोजना की प्रगति और समस्याओं का सही समय पर पता नहीं चलता, जिससे सही समय पर सुधारात्मक कदम नहीं उठाए जा सकते।
  8. 3.14.3 अन्य कारण

    इनके अलावा, अन्य बाहरी और आंतरिक कारण भी परियोजना की विफलता का कारण बन सकते हैं:

    1. अनुपयुक्त परिवर्तन प्रबंधन:

      • उदाहरण: यदि परियोजना के दौरान होने वाले परिवर्तनों को सही तरीके से प्रबंधित नहीं किया जाता, तो इससे अराजकता और दिशा भ्रम हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि एक सॉफ्टवेयर परियोजना में ग्राहक की आवश्यकताओं में बदलाव होता है और उसे सही तरीके से प्रबंधित नहीं किया जाता, तो परियोजना का पूरा शेड्यूल और बजट प्रभावित हो सकता है।
    2. सामाजिक पहलुओं की अनदेखी करना:

      • उदाहरण: यदि एक परियोजना में स्थानीय समुदाय की जरूरतों और चिंताओं को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह विरोध और परियोजना में बाधा का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए, एक निर्माण परियोजना जिसमें स्थानीय निवासियों की चिंताओं को ध्यान में नहीं रखा गया, जिससे विरोध और कानूनी समस्याएं उत्पन्न हुईं।

    निष्कर्ष

    परियोजना की विफलता के कई कारण हो सकते हैं, जो योजना, नेतृत्त्व और अन्य बाहरी कारकों से संबंधित होते हैं। इन कारणों को पहचानना और उनसे बचने के लिए उचित रणनीतियों का उपयोग करना परियोजना प्रबंधक की जिम्मेदारी है। सही योजना, स्पष्ट नेतृत्व, प्रभावी संचार, और समय पर निगरानी और नियंत्रण के माध्यम से परियोजना की सफलता सुनिश्चित की जा सकती है।

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