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सामुदायिक संगठन एवं सामाजिक क्रिया : इकाई चतुर्थ


दीर्घउत्तरीय प्रश्न  (Long Answer Type Questions)


 1.    सामुदायिक संगठन में निर्देशित एवं अनिर्देशित उपागमों को लिखिए।

अनिर्देशात्मक परामर्श 

अनिर्देशीय परामर्श प्रार्थी -केंद्रित है। रोजर्स को अनिदेशात्मक परामर्श का प्रदाता माना जाता है। अनिदेशात्मक परामर्श में परामर्शदाता के कार्य महत्वपूर्ण नहीं होते हैं। सेवार्थी के कार्यों पर ध्यान दिया जाता है। अनिदेशात्मक परामर्श में रोग का निदान आवश्यक नहीं है क्योंकि यह सेवार्थी से संबंधित पूर्व सूचना एकत्र नहीं करता है और कोई परीक्षण नहीं होता है।

अनिर्देशात्मक परामर्श की अवधारणा -

व्यक्ति की मर्यादा में विश्वास -रोजर्स व्यक्ति की गरिमा में विश्वास करते हैं। वह व्यक्ति को स्वयं निर्णय लेने में सक्षम समझता है और ऐसा करने के अपने अधिकार को स्वीकार करता है।

वास्तविकरण की प्रवृत्ति -रोजर्स ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की बढ़ने और विकसित होने की क्षमता व्यक्ति की आवश्यक विशेषता है जिस पर परामर्श और मनोचिकित्सा विधियां निर्भर करती हैं।

व्यक्ति विश्वसनीय होता है -व्यक्ति भरोसेमंद है क्योंकि व्यक्ति कुछ शक्तियों के साथ पैदा हुआ है जिसे स्वस्थ व्यक्तित्व विकास के लिए नियंत्रित करने की आवश्यकता है।

व्यक्ति अपनी बुद्धि से अधिक संवेदनशील होता है -व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग विवकेशील होने के लिए कर सकता है और समस्याओं के संबंध में सही निर्णय ले सकता है।

अनिर्देशात्मक परामर्श के चरण -

वार्तालाप -पहले चरण में, काउंसलर और परामर्श प्रार्थी के बीच विभिन्न विषयों पर कई बैठकों में अनौपचारिक रूप से चर्चा की जाती है। कई बार ये दोनों किसी न किसी मकसद से मिलते हैं, लेकिन पहले कदम का मुख्य मकसद आपसी सदभाव स्थापित करना होता है, ताकि परामर्श प्रार्थी बिना झिझक के अपनी बात कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सके। परामर्श प्रार्थी द्वारा परामर्शदाता से मित्रता करने का प्रयास किया जाता है।

जांच-पड़ताल -परामर्श प्रार्थी की वैयक्तिक समस्या, परिस्थितियों एवं संदर्भों के संबंध में विस्तृत जांच की व्यवस्था की जाती है। इसलिए, परामर्शदाता विभिन्न अप्रत्यक्ष तरीकों का उपयोग करता है।

संवेगात्मक अभिव्यक्ति -इस कदम का मुख्य उद्देश्य परामर्श प्रार्थी को अपनी व्यवस्थाओं, भावनाओं और मानसिक तनाव को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करना है।

परोक्ष रूप से दिए गए सुझावों पर चर्चा -इस चरण में परामर्श प्रार्थी परामर्श दाता द्वारा दिए गए सुझावों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखता है।

नियोजन का प्रतिपादन -यह परामर्श प्रार्थी को अपनी समस्या का समाधान खोजने के लिए एक यथार्थवादी योजना तैयार करने का अवसर प्रदान करता है। दोनों इस योजना की प्रकृति, प्रभाव आदि पर चर्चा करते हैं।

योजना का क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन -छठे चरण के अन्तर्गत परामर्श दाता परामर्श प्रार्थी द्वारा तैयार की गयी योजना को क्रियान्वित किया जाता है तथा इस चरण में स्व-मूल्यांकन की व्यवस्था भी की जाती है ताकि उसकी प्रभावशीलता को जाना जा सके।

निर्देशात्मक परामर्श- निर्देशात्मक परामर्श समस्या-केंद्रित होता है और निर्देशात्मक परामर्श में विश्लेषण को अधिक महत्व दिया जाता है। निर्देशात्मक परामर्श में कोई भी व्यक्ति अपना अध्ययन निष्पक्ष होकर नहीं कर सकता। इसलिए, गैर-पक्षपातपूर्ण अध्ययन के लिए एक परामर्शदाता की आवश्यकता होती है। निर्देशात्मक परामर्श में भावात्मक पहलू को अधिक महत्व दिया जाता है। निदेशात्मक परामर्श दाता के लिए समस्या समाधान उपागम बहुत महत्वपूर्ण है। वह भावनात्मक वातावरण से बौद्धिक वातावरण में जाने की कोशिश करता है। समय की दृष्टि से निदेशात्मक परामर्शदाता का कहना है कि यह संभव नहीं है कि सेवार्थी को कम समय में प्रशिक्षित किया जा सके। कम समय में उसे इतना ही प्रशिक्षित किया जा सकता है कि वह स्वयं संबंधी निर्णय ले सके, दूसरों को सलाह नहीं दे सकता है। निर्देशात्मक परामर्श सेवार्थी के  अतीत का अध्ययन करना अनिवार्य मानता है। इसके लिए उसके गत जीवन के इतिहास का विभिन्न माध्यमों से अध्ययन करना चाहिए। रोग निदान लिए व्यक्ति का अनुभव और आत्म-बोध बहुत महत्वपूर्ण है। निर्देशात्मक परामर्श के अनुसार, भविष्य को ध्यान में रखते हुए बौद्धिक विकल्प बनाया जाता है और विकल्पों चुनाव कराने में प्रार्थी की सहायता करनायह परामर्श दाता  का काम है 

 2.    सामुदायिक संगठन में संचार की प्रक्रिया को लिखें।

संचार प्रक्रिया 

संचार एक व्यक्ति से दूसरे तक अर्थपूर्ण संदेश प्रेषित करने वाली प्रक्रिया है। संचार एक द्विमार्गीय प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक लोगों के बीच विचारों, अनुभवों, तथ्यों तथा प्रभावों का प्रेषण होता है । संचार प्रक्रिया में प्रथम व्यक्ति संदेश स्रोत  या प्रेषक  होता है । दूसरा व्यक्ति संदेश को ग्रहण करने वाला अर्थात प्राप्तकर्ता या ग्रहणकर्ता होता है ।इन दो व्यक्तियों के मध्य संवाद या संदेश होता है जिसे प्रेषित एवं ग्रहण किया जाता है प्रेषित किये शब्दों से तात्पर्य ‘अर्थ’ से होता है तथा ग्रहणकर्ता शब्दों के पीछे छिपे ‘अर्थ’ को समझने के पश्चात प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। 

संचार की प्रक्रिया तीन तत्वों क्रमशः सन्देश प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता के माध्यम से सम्पन्न होती है किन्तु इसके अतिरिक्त सन्देश प्रेषक को किसी माध्यम की भी आवश्यकता होती है जिसकी सहायता से वह अपने विचारों को प्राप्तिकर्ता तक पहुंचाता है।

आदर्श संचार-प्रक्रिया 

1. स्रोत/प्रेषक - संचार प्रक्रिया की शुरूआत एक विशेष स्रोत से होता है जहां से सूचनार्थ कुछ बाते कही जाती है। स्रोत से सूचना की उत्पत्ति होती है और स्रोत एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह भी हो सकता है। इसी को संप्रेषक कहा जाता है ।

 2. सन्देश - प्रक्रिया का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व सूचना सन्देश है। सन्देश से तात्पर्य उस उद्दीपन से होता है जिसे स्रोत या संप्रेषक दूसरे व्यक्ति अर्थात सूचना प्राप्तकर्ता को देता है। प्रायः सन्देश लिखित या मौखिक शब्दों के माध्यम से अन्तरित होता है  परन्तु अन्य सन्देश कुछ अशाब्दिक संकेत जैसे हाव-भाव, शारीरिक मुद्रा, शारीरिक भाषा आदि के माध्यम से भी दिया जाता है । 

3. कूट संकेतन - कूट संकेतन संचार प्रक्रिया की तीसरा महत्वपूर्ण तथ्य है जसमें दी गयी सूचनाओं को समझने योग्य संकेत में बदला जाता है । कूट संकेतन की प्रक्रिया सरल भी हो सकती है तथा जटिल भी । घर में नौकर को चाय बनाने की आज्ञा देना एक सरल कूट संकेतन का उदाहरण है लेकिन मूली खाकर उसके स्वाद के विषय में बतलाना एक कठिन कूट संकेतन का उदाहरण है क्योंकि इस परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति (स्रोत) अपने भाव को उपयुक्त शब्दों में बदलने में असमर्थ पाता है। 

4. माध्यम - माध्यम संचार प्रक्रिया का चौथा तत्व है । माध्यम से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिसके द्वारा सूचनाये स्रोत से निकलकर प्राप्तकर्ता तक पहुँचती है । आमने सामने का विनियम संचार प्रक्रिया का सबसे प्राथमिक माध्यम है परन्तु इसके अलावा संचार के अन्य माध्यम जिन्हें जन माध्यम भी कहा जाता है, भी है । इनमें दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, समाचारपत्र, मैगजीन,फोन आदि प्रमुख है ।

5. प्राप्तकर्ता - प्राप्तकर्ता से तात्पर्य उस व्यक्ति से होता है जो सन्देश को प्राप्त करता है । दूसरे शब्दों में स्रोत से निकलने वाले सूचना को जो व्यक्ति ग्रहण करता है, उसे प्राप्तकर्ता कहा जाता है । प्राप्तकर्ता की यह जिम्मेदारी होती है कि वह सन्देश का सही -सही अर्थ ज्ञात करके उसके अनुरूप कार्य करे । 

6. अर्थपरिवर्तन - अर्थपरिवर्तन संचार प्रक्रिया का छठा महत्वपूर्ण पहलू है । अर्थपरिर्वन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सूचना में व्याप्त संकेतों के अर्थ की व्याख्या प्राप्तकर्ता द्वारा की जाती है । अधिकतर परिस्थिति में संकेतों का साधारण ढंग से व्याख्या करके प्राप्तकर्ता अर्थपरिवर्तन कर लेता है परन्तु कुछ परिस्थिति में जहां संकेत का सीधे-सीधे अर्थ लगाना कठिन है । अर्थ परिवर्तन एक जठिल एवं कठिन कार्य होता है । 

7. प्रतिपुष्टि - प्रतिपुष्टि एक तरह की सूचना होती है जो प्राप्तिकर्ता की ओर से स्रोत या संप्रेषक को प्राप्त स्रोत है। जब स्रोत को प्राप्तकर्ता से प्रतिपुष्टि परिणाम ज्ञान की प्राप्ति होती है तो वह अपने द्वारा संचरित सूचना के महत्व या प्रभावशीलता को समझ पाता है । प्रतिपुष्टि के ही आधार पर स्रोत यह भी निर्णय कर पाता है कि क्या उसके द्वारा दी गयी सूचना में किसी प्रकार का परिमार्जन की जरूरत है ।यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि केवल द्विमार्गी संचार में प्रतिपुष्टि तत्व पाया जाता है । 

8. आवाज - संचार प्रक्रिया में आवाज भी एक तत्व है। यहॉं आवाज से तात्पर्य उन बाधाओं से होता है जिसके कारण स्रोत द्वारा दी गयी सूचना को प्राप्तकर्ता ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पाता है या प्राप्तकर्ता द्वारा प्रदत्त पुनर्निवेशत सूचना के स्रोत ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पाता है । अक्सर देखा गया है कि स्रोत द्वारा दी गई सूचना को व्यक्ति या प्राप्तकर्ता अनावश्यक शोरगुल या अन्य कारणों से ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पाता है । इससे संचार की प्रभावशाली कम हो जाती है । 


 3.    सामुदायिक संगठन में सामाजिक क्रिया (आंदोलन) को उदाहरण सहित स्पष्ट  करें। 

 सामुदायिक संगठन :

सामुदायिक संगठन या समुदाय आधारित संगठन, समाज कार्य का एक तरीका है जिसका मकसद समुदाय के सामाजिक स्वास्थ्य, कल्याण, और समग्र कार्यप्रणाली में सुधार करना होता है. यह संगठन लोगों की ताकत बढ़ाने का एक तरीका है, जो बदलाव लाने में शामिल लोगों की क्षमता, कौशल, और नेतृत्व को विकसित करने पर केंद्रित होता है. सामुदायिक संगठन, समुदायों में लोगों को आवाज़ देता है और उन्हें अपने जीवन और स्थितियों पर नियंत्रण रखने के लिए सशक्त बनाता है. इसका इस्तेमाल कई मुद्दों को संबोधित करने के लिए किया जा सकता है, जैसे कि गरीबी, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, और पर्यावरण न्याय. 

सामाजिक क्रिया:

यह दृष्टिकोण आबादी के एक पीड़ित या वंचित वर्ग के अस्तित्व को मानता है जिसे बड़े समुदाय से बढ़े हुए संसाधनों या समान उपचार की मांग करने के लिए संगठित होने की आवश्यकता है।इस दृष्टिकोण का उद्देश्य समुदाय में मूलभूत परिवर्तन करना है, जिसमें शक्ति और संसाधनों का पुनर्वितरण और सीमांत समूहों के लिए निर्णय लेने की पहुंच प्राप्त करना शामिल है। सामाजिक कार्य क्षेत्र में अभ्यास करने वालों का लक्ष्य गरीबों और पीड़ितों को सशक्त बनाना और लाभ पहुंचाना है। यह शैली मुख्य रूप से वह है जिसमें सामाजिक न्याय एक प्रमुख आदर्श है प्रदर्शन, हड़ताल, मार्च, बहिष्कार और अन्य विघटनकारी या ध्यान आकर्षित करने वाले कदमों जैसी टकराव की रणनीति पर जोर दिया गया है, क्योंकि वंचित समूह अक्सर “लोगों की शक्ति“ पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं, जिसमें दबाव और विघटन की क्षमता होती है।इस दृष्टिकोण के अभ्यासकर्ता कम बिजली वाले निर्वाचन क्षेत्रों को संगठित करते हैं और उन्हें शक्ति को प्रभावित करने के कौशल से लैस करते हैं।

सामाजिक कार्य में सामाजिक आंदोलन

एक सामाजिक आंदोलन समूह, समाज, या विश्व व्यवस्था जिसका वह हिस्सा है, में परिवर्तन को बढ़ावा देने या विरोध करने के उद्देश्य से संस्थागत चौनलों के बाहर कुछ हद तक संगठन और निरंतरता के साथ काम करने वाली एक सामूहिकता है । 19वीं शताब्दी के बाद से, सामाजिक आंदोलनों ने अमेरिकी सामाजिक कार्य को अपनी बौद्धिक और सैद्धांतिक नींव और इसके कई नेता प्रदान किए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रगतिशील आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई और एक सदी से भी अधिक समय से श्रम, नारीवादी, नागरिक अधिकार, कल्याण अधिकार और शांति आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 1960 के दशक के बाद से, सामाजिक कार्यकर्ता भी नए सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं, हालाँकि पहले की तरह उस हद तक नहीं। इन आंदोलनों ने पहचान, आत्म-सम्मान, मानवाधिकार और विपक्षी आलोचनात्मक चेतना के विकास के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है। सामाजिक कार्यकर्ता उन अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों में भी शामिल रहे हैं जो आर्थिक वैश्वीकरण, पर्यावरणीय गिरावट और बड़े पैमाने पर आप्रवासन सहित प्रमुख जनसंख्या बदलावों के जवाब में उभरे हैं। हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका में,प्रत्येक सामाजिक आन्दोलन किसी न किसी सामाजिक असन्तोष के कारण उत्पन्न होता है । जब लोग सामाजिक संरचना, संस्था, प्रथा, परम्परा अथवा नियम आदि में से किसी से अत्यधिक असन्तुष्ट हो जाते हैं तो किसी सामाजिक आन्दोलन के जन्म की भूमिका तैयार होती है । सामाजिक आन्दोलन सामूहिक अथवा जन आन्दोलन होते हैं ।

भारत में सामाजिक कार्य के लिए सामाजिक आंदोलन का महत्व 

सामाजिक आंदोलन के लिए अपनेपन की भावना और समूह चेतना बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसी चेतना समूह के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से लाई जा सकती है। द्वितीय. सामाजिक आंदोलनों से एक पूरी तरह से नई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण होता है।आधुनिक पाश्चात्य जगत में सामाजिक आन्दोलन शिक्षा के प्रसार के द्वारा तथा उन्नीसवीं शदी में औद्योगीकरण व नगरीकरण के कारण श्रमिकों के आवागमन में वृद्धि के कारण सम्भव हुए।आधुनिक आन्दोलन संसार भर में लोगों को जागृत करने के लिये प्रौद्योगिकी तथा अन्तरजाल का सहारा लेते हैं।

भारत के सामाजिक आन्दोलन के सबसे बड़े महानायक डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर है। डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर का शक्तिशाली सामाजिक आंदोलन विश्व के सबसे प्रभावशाली आन्दोलनों में से एक है तथा भारत का सबसे प्रभावशाली सामाजिक आंदोलन है। बाबासाहेब का आन्दोलन भारत देश के पिछडे, गरीब, शोषित, दलित लोगों को उनके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक विशेषकर मानव अधिकार देने के लिये था, यह भारत की सबसे बडी सामाजिक क्रांति भी थी। डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर संविधान निर्माता थे, इसलिए उन्होंने  देश के शोषित लोगा,ें उनके अधिकारों के  लिए संघर्ष किया और उसमें सफलता पाई। डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर जी के महाड़ सत्याग्रह या चवदार तालाब आंदोलन, नाशिक का कालाराम मन्दिर आंदोलन और दलित बौद्ध आंदोलन प्रसिद्ध है। विश्व के सबसे महान मानवाधिकारी आंदोलनकारीयों में डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर जी का स्थान शिर्ष पर स्थान है।

कुछ शक्तिशाली सामाजिक आंदोलन 

स्वदेशी आंदोलन, 1905

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जो क्रांति शुरू हुई वह आत्मनिर्भर स्वदेश बनकर ब्रिटिश साम्राज्य को नियंत्रण से बाहर करने पर केंद्रित थी। इस अभियान में कई भारतीय शामिल हुए और विदेशी उत्पादों का बहिष्कार किया। उनके आयातित कपड़ों को जला दिया गया है, ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया है और घरेलू वस्तुओं को पुनर्जीवित किया गया है। इसने लोगों को अपने अधिकार के खिलाफ बोलने और अपनी राय साझा करने का साहस देने के लिए प्रेरित किया।

सत्याग्रह

सत्याग्रह भारतीय इतिहास के सबसे प्रसिद्ध अभियानों में से एक था जिसने शांतिपूर्वक हजारों लोगों को एक साथ लाया। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को उनके देश वापस लौटाने और भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए अहिंसा आंदोलन शुरू किया।

चिपको आंदोलन, 1973

गांधीवादी आदर्शों के आधार पर चिपको आंदोलन और चिपको आंदोलन में लोगों को वनों की कटाई से बचने के लिए पेड़ों को गले लगाकर वनों की कटाई के खिलाफ लड़ते देखा गया। 70 के दशक की शुरुआत में चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में महिलाओं के एक समूह ने पेड़ काटने के विरोध में आंदोलन शुरू किया। उनके कार्य जंगल की आग की तरह फैल गए हैं और हरित आंदोलन में भारत में सैकड़ों-हजारों लोग शामिल हो गए हैं।

नमनतारन आंदोलन, 1978

दलित आंदोलन द्वारा औरंगाबाद के मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय कर दिया गया। 16 साल पुराना यह अभियान 1994 में सफल हुआ जब डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम समझौता के रूप में स्वीकार किया गया। दलितों द्वारा कई दंगे हुए, जिनमें हत्याएं, छेड़छाड़, घर जलाना आदि शामिल थे। इस आंदोलन के भयानक परिणाम हुए।

नर्मदा बचाओ आंदोलन, 1985

इस रैली में बड़ी संख्या में आदिवासी, ग्रामीण, पर्यावरण कार्यकर्ता  बाबा आमटेऔर मेधा पाटकर मानवाधिकार कार्यकर्ता एक साथ आये और उन्होंने नर्मदा नदी के किनारे बड़ी संख्या में बांधों के बारे में अपने विचार साझा किये। इस आंदोलन में लोकप्रिय लोग शामिल थे और उन्होंने इस उद्देश्य के प्रति समर्थन प्रदर्शित करने के लिए भूख हड़तालें शुरू कीं। निर्णय लंबित है, लेकिन अदालत ने मूल रूप से फैसला सुनाया कि निर्णय आंदोलन के पक्ष में था और इस प्रकार बांध पर काम तत्काल रोक दिया गया और संबंधित राज्यों को पहले पुनर्निर्माण और प्रतिस्थापन की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया गया। इसके बाद अदालत ने बांध को जारी रखने की अनुमति दे दी।

मंडल विरोधी आंदोलन, 1990

अगस्त 1990 में पूरे भारत के छात्रों ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी रोजगार में 27 प्रतिशत कोटा पर विरोध शुरू कर दिया। वीपी सिंह ने 1980 में मंडल आयोग द्वारा सरकार को दी गई सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार का नेतृत्व किया। हालाँकि विरोध प्रदर्शन दिल्ली विश्वविद्यालय में शुरू हुआ, लेकिन यह दुनिया भर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में फैल गया, जिसके कारण देश के कई क्षेत्रों में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए। कई जगहों पर छात्रों ने परीक्षाओं का बहिष्कार किया. यह उथल-पुथल तब समाप्त हुई जब 7 नवंबर, 1990 को सिंह ने अपनी जनता दल सरकार के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से समर्थन वापस ले लिया।

जन लोकपाल विधेयक - अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, 2011

जब भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली, जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की, तो पूरा देश एक साथ आया और उनके साथ खड़ा रहा। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप जन लोकपाल मसौदे की समीक्षा करने के लिए जिम्मेदार मंत्रियों के समूह से कृषि मंत्री शरद पवार ने इस्तीफा दे दिया। यह कार्यक्रम कई लोगों को एक साथ लाता है और कई दशकों में यह एक अनोखा आयोजन रहा है। यह भी इन असाधारण घटनाओं में से एक थी जिसने दिखाया कि जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जागता है और सत्ता संभालता है तो क्या संभव है।

निर्भया आंदोलन, 2012

दिल्ली गैंग रेप 2012 उन लोगों की क्रोधित प्रतिक्रियाओं में से एक थी, जिन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया कि अब बहुत हो चुका। इस घटना के बाद, देश भर में हजारों लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। इस अभियान ने सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया उत्पन्न की है, जहां लोगों ने अपनी राय को काले बिंदु में बदल दिया है और हजारों लोगों ने घटना की निंदा करने के लिए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं। केंद्र सरकार और कई राज्यों ने अभियान को ध्यान में रखते हुए महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उपायों की घोषणा की।

मीटू मूवमेंट

भारत में #MeToo अभियान 2018 में विस्तारित हुआ। यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक वैश्विक आंदोलन से प्रेरित होकर, दुनिया भर में महिलाओं ने सत्ता पदों पर पुरुष दुर्व्यवहार की रिपोर्टें खोलीं। दुनिया के साथ अपने अनुभव साझा करने वाली अन्य महिलाओं की कई पोस्ट निम्नलिखित थीं। महिला पेशेवरों ने कलाकारों, फिल्म निर्माताओं से लेकर विज्ञापन प्रमुख बंदूकधारियों, लेखकों, लेखिकाओं और राजनेताओं तक कार्यस्थल पर अपमानजनक व्यवहार का आह्वान किया। कार्यस्थल पर अवांछित ध्यान देने से लेकर फिल्म के सेट पर यौन उत्पीड़न तक कई तरह के आरोप लगे हैं। जबकि इनमें से कुछ अभी भी आरोपों के घेरे में में हैं, अन्य अधिकारियों को साफ जैकेट दिलाने में कामयाब रहे। 

सीएए, एनआरसी विरोध, 2019

एनआरसी सभी भारतीय नागरिकों की एक रजिस्ट्री है जिसे 2003 में नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन करके बनाया जाना आवश्यक था। इसका उद्देश्य अवैध प्रवासियों को पहचानने और उन्हें बाहर निकालने के लिए भारत के सभी वैध निवासियों को पंजीकृत करना है। इसे असम राज्य के लिए 2013-2014 में पेश किया गया था। 


 4.    सामुदायिक संगठन में दस्तावेजीकरण का क्या महत्व है? यह किस प्रकार किया जाता    है ? स्पष्ट करें।


दस्तावेज़ीकरण

सामुदायिक आयोजन सामाजिक परिवर्तन प्राप्त करने के लिए सामूहिक कार्रवाई की एक प्रक्रिया है। एक सामुदायिक आयोजक के रूप में, आपको अपनी प्रगति का मूल्यांकन करने, अपने अनुभव से सीखने और अपने प्रभाव को संप्रेषित करने के लिए अपने सामुदायिक कार्यों और परिणामों की निगरानी और दस्तावेजीकरण करने की आवश्यकता है।

एक दस्तावेज़ कुछ जानकारी का एक रिकॉर्ड है जिसका उपयोग प्राधिकारी के रूप में या संदर्भ, आगे के विश्लेषण या अध्ययन के लिए किया जा सकता है। दस्तावेज़ीकरण से तात्पर्य दस्तावेज़ों के निर्माण, प्रसार, प्रबंधन और उपयोग की चल रही प्रक्रिया से है। दस्तावेज़ीकरण कोई भी संचारी सामग्री है जिसका उपयोग किसी वस्तु, प्रणाली या प्रक्रिया के कुछ गुणों के बारे में वर्णन करने, समझाने या निर्देश देने के लिए किया जाता है, जैसे कि इसके अंग, संयोजन, स्थापना, और उपयोग।

दस्तावेज़ीकरण न केवल सब कुछ व्यवस्थित करता है - यह सीधे उत्पादकता और दक्षता को प्रभावित करता है, प्रगति का ट्रैक रखता है, जोखिम के क्षेत्रों की पहचान करता है, और कुल मिलाकर यह सुनिश्चित करता है कि हर कोई एक ही लाइन पर है।

आपके स्रोतों का दस्तावेज़ीकरण आपके के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करता है । दस्तावेज़ीकरण परियोजना का उद्देश्य विषय को पूरी तरह से समझाना होगा। गोपनीयता बनाए रखें . उस व्यक्ति की लिखित सहमति सुरक्षित करें जिसकी कहानी या अनुभव दर्ज किया गया था। मामले से संबंधित जानकारी का उपयोग और प्रसार करने से पहले पीड़ित को सहमत होना होगा।

दस्तावेज़ीकरण  की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे बताते हैं कि चीजें कैसे की जाती हैं और फिर उन्हें बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है और उन्हें कैसे किया जाता है यह निर्धारित करता है कि परिणाम कितने सफल होंगे। यदि आप सही प्रक्रियाओं पर, सही तरीके से ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आप सफलता के लिए अपना रास्ता तैयार कर सकते हैं। प्राथमिक दस्तावेज में सेवार्थी कीडायरी, साक्षात्कार ,घटनाओं के लिखित खाते, समाचार पत्र, तकनीकी रिपोर्ट, शोध प्रबंध, सम्मेलन पत्र, शोध लेख, आदि शामिल हैं।

सामुदायिक संगठन में दस्तावेजीकरण का अत्यधिक महत्व है। यह निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:

1. पारदर्शिता: दस्तावेजीकरण से संगठन की गतिविधियों, निर्णयों और वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता बनी रहती है। यह सदस्यों और अन्य संबंधित पक्षों को विश्वास दिलाता है कि संगठन ईमानदारी से काम कर रहा है।

2. उत्तरदायित्व: सही दस्तावेजीकरण से संगठन के सदस्यों को उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति उत्तरदायी बनाया जा सकता है। यह स्पष्ट करता है कि किसने क्या काम किया और कब किया।

3. स्मरणशक्ति: दस्तावेजीकरण से पिछली घटनाओं, निर्णयों और गतिविधियों का रिकॉर्ड रखा जाता है, जिससे भविष्य में संदर्भ के लिए उनका उपयोग किया जा सकता है।

4. कानूनी सुरक्षा: कई मामलों में, सही दस्तावेजीकरण से संगठन को कानूनी विवादों में सुरक्षा मिलती है। यह सबूत के तौर पर काम करता है और संगठन की स्थिति को स्पष्ट करता है।

5. प्रभावशीलता: सही तरीके से दस्तावेजीकरण से संगठन की कार्यक्षमता और प्रभावशीलता में सुधार होता है। यह संगठन को व्यवस्थित रूप से काम करने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।

6. वित्तीय प्रबंधन: वित्तीय दस्तावेजीकरण से संगठन के बजट, आय और व्यय को ट्रैक किया जा सकता है। यह वित्तीय योजना बनाने और संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित करने में मदद करता है।

7. संचार: दस्तावेजीकरण से संगठन के सदस्यों और अन्य हितधारकों के बीच संचार में सुधार होता है। यह सूचनाओं को साझा करने और महत्वपूर्ण जानकारी को प्रसारित करने का एक प्रभावी तरीका है।

8. समर्पण और निरंतरता: दस्तावेजीकरण से संगठन की गतिविधियों और प्रथाओं में निरंतरता बनी रहती है, भले ही सदस्यों में बदलाव हो जाए। नए सदस्यों को पुरानी जानकारियों का सहारा मिल सकता है।

इस प्रकार, सामुदायिक संगठन में दस्तावेजीकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और संगठन के प्रभावी संचालन में सहायक होता है।

दस्तावेजीकरण प्रक्रिया

सामुदायिक संगठन में दस्तावेजीकरण एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो संगठन की सामग्री, कार्यों, और गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करती है। यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि संगठन के सभी सदस्यों और साझेदारों के बीच सही जानकारी का सम्मान होता है और कार्य को संचालित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं:


1. मीटिंग मिनट्स (Meeting Minutes): संगठन की सभी मीटिंग्स के लिए मीटिंग मिनट्स तैयार किए जाते हैं। इनमें मीटिंग के आयोजन, उपस्थित सदस्यों की सूची, चर्चा के मुख्य बिंदुओं का सारांश, लिए गए निर्णय और अनुमतियाँ, और कार्रवाई की जाने वाली मुद्दों की जानकारी होती है।

2. संगठनिक दस्तावेज़ (Organizational Documents): इसमें संगठन की स्थापना के कानूनी दस्तावेज, संविधान, नियम-निबंधन, और आवश्यक निर्देशिकाएं शामिल होती हैं। ये दस्तावेज संगठन की संरचना, कार्यप्रणाली, और विभागीय विवरण को परिभाषित करते हैं।

3. प्रक्रिया और नीतियाँ (Policies and Procedures): संगठन की विभिन्न प्रक्रियाएं और नीतियां जैसे कि कार्यक्रम व्यवस्थापन, वित्तीय प्रणाली, और सदस्यता के नियम दस्तावेजीकरण का हिस्सा होती हैं।

4. परियोजना और अनुबंध (Projects and Contracts): अगर संगठन कोई परियोजना या अनुबंध संभालता है, तो उसकी समग्र जानकारी, निर्णय, समझौते, और समय-सीमा समेत दस्तावेजीकरण किया जाता है।

5. वित्तीय लेखांकन (Financial Records): संगठन की वित्तीय स्थिति, बजट, वित्तीय लेखा, और अनुदानों का प्रबंधन भी दस्तावेजीकरण के तहत आता है।

6. उपयोगकर्ता दस्तावेज़ (User Documents): यदि संगठन किसी ऐप्लिकेशन, सॉफ़्टवेयर, या तकनीकी साधन का उपयोग करता है, तो उसकी उपयोगकर्ता मार्गदर्शिका और दस्तावेज़ भी तैयार किए जाते हैं।

ये दस्तावेज संगठन के सभी सदस्यों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये संगठन के कामकाज को सुव्यवस्थित और स्पष्ट रूप से प्रबंधित करने में मदद करते हैं और विभिन्न स्तरों पर समन्वय और सहयोग को सुनिश्चित करते हैं।


लघुउत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)


1.    सामुदायिक संगठन में नेतृत्व के कार्यों को लिखें।

नेतृत्व 

नेतृत्व एक प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति सामाजिक प्रभाव के द्वारा अन्य लोगों की सहायता लेते हुए एक कॉमन कार्य सिद्ध करता है। नेतृत्व वह है जो लोगों के लिए एक ऐसा मार्ग बनाये जिसमें लोग अपना योगदान दे कर कुछ असाधारण कर सकें।एक नेता की तीन सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाएँ प्रेरक, संचारक और एकजुट करने वाले हैं। नेता अपनी टीम के सदस्यों को महान कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं, स्पष्ट रूप से और लगातार उन्हें अपेक्षाओं और संगठन के सांस्कृतिक मानदंडों के बारे में बताते हैं, और उन्हें लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उद्देश्य की साझा भावना के साथ एकजुट करते हैं। एक नेता का सबसे महत्वपूर्ण कार्य टीम के सदस्यों के लिए लक्ष्य निर्धारित करना है ताकि उन्हें आत्मविश्वास और उत्साह से काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। फिर वे उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए रणनीति भी बनाते हैं। उनका मकसद अपनी टीम के सदस्यों के लिए एक रोडमैप बनाना है कि उन्हें सही रास्ते पर कैसे निर्देशित किया जाए और निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में कैसे मदद की जाए

नेतृत्व के कार्य Functions of Leadership

नेतृत्व के कार्यों को कई अर्थों में लिया जाता है, लेकिन मुख्यतया नेतृत्व के निम्न कार्य माने जा सकते है-

(1) अभिप्रेरणा व समन्वय - नेतृत्व का कार्य  समूह सदस्यों को क्षमतानुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करना तथा उनके कार्य में समन्वय उत्पन्न कर लक्ष्य को प्राप्त करना ।

(2) निर्देशन एवं नियोजन - नेतृत्व का प्रमुख कार्य है, कार्य का नियोजन तथा संगठन के सदस्यों का लक्ष्य प्राप्ति की ओर निर्देशन । समूह का नेता समूह के प्रतिनिधि के रूप में उच्च स्तरीय बैठकों में भाग लेता है तथा संगठन के लक्ष्य एवं नीतियाँ निर्धारित करने में सहयोग करता है। इसके उपरान्त वह उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सदस्यों का मार्गदर्शन करता है।

(3) स्वास्थ्यप्रद वातावरण का निर्माण- एक संगठन में संगठनात्मक वातावरण का कर्मचारियों के कार्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नेता का यह कार्य है कि वह अपने विभाग में ऐसे स्वस्थ व मित्रतापूर्ण वातावरण का निर्माण करे, जिससे कर्मचारी इच्छापूर्वक तथा प्रसन्नता के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित हों। कर्मचारियों के मध्य व्याप्त आपसी मनमुटाव तथा कटुताओं को दूर करने का प्रयास भी नेता को करना चाहिए, अन्यथा इनसे कार्य वातावरण दूषित होता है।

(4) सदस्यों को प्रोन्नति तथा विकास- नेतृत्व का यह महत्वपूर्ण कार्य है कि वह अपने समूह सदस्यों की आकांक्षाओं तथा इच्छाओं को समझे और उन्हें सन्तुष्ट करने में योगदान दे। इसके साथ ही सदस्यों को आगे बढ़ने और विकास करने के अवसर भी प्रदान करे।

(5) पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करना- नेतृत्व अपने समूह सदस्यों के लिए पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करता है। वह अच्छा कार्य करने वालों को पुरस्कार तथा अक्षम या गलत कार्य करने वालों को दण्ड देता है अथवा उच्च प्रबन्ध को इस सम्बन्ध में सिफारिश करता है। नेता को ही अपने समूह सदस्यों के मनोभावों का ठीक से पता रहता है कि किस प्रकार का पुरस्कार उन्हें अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

(6) अधीनस्थों का सहयोग प्राप्त करना- नेता को चाहिए कि वह नेतृत्व की ऐसी शैली अपनाये जो उसे अधीनस्थों का पूर्ण सहयोग प्रदान कर सके। इस दृष्टि से वह जनतान्त्रिक दृष्टिकोण अपना सकता है, जिसमें समय-समय पर समस्याओं के समाधान हेतु कर्मचारियों का परामर्श प्राप्त किया जा सकता है और प्रबन्धकीय निर्णयों में उन्हें भागीदार बनाया जा सकता है।

(7) सूचनाएँ तकनीकी सहायता प्रदान करना- नेतृत्व का यह कार्य है कि वह समूह सदस्यों को उनके कार्य तथा हितों से सम्बन्धित सूचनाएं प्रेषित करे तथा उन्हें कार्य करते समय कठिनाई उत्पन्न होने पर तकनीकी तथा अन्य प्रकार की सहायता भी प्रदान करे।

(8) आदर्श प्रस्तुत करना- नेतृत्व निष्पक्ष, निःस्वाथ, योग्य व साहसी होना चाहिए। नेतृत्व को समूह के सदस्यों के सामने अपने व्यवहार व आचरण से ऐसे आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए, अपने अनुयायियों से अपेक्षा रखता है। आचरण द्वारा आदर्शो का प्रस्तुतीकरण नेतृत्व को प्रभावशाली बनाने का एकमात्र अचूक शस्त्र है ।


2.    सामाजिक क्रिया के उद्देश्य एवं तकनीकों को लिखें।

सामाजिक क्रिया (आंदोलन) के उद्देश्य और तकनीकों को समझने में मदद करने के लिए, यहाँ पर उनके मुख्य बिंदुओं को विस्तार से बताया गया है:

उद्देश्य (Objectives) ऑफ सोशल एक्शन:

1. समाजिक परिवर्तन (Social Change): सामाजिक क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य समाज में परिवर्तन लाना होता है, जैसे कि न्याय, समानता, और समरसता की बढ़ती दिशाएँ प्राप्त करना।

2. शिक्षा और संवेदना (Education and Awareness): लोगों को जागरूक करना और उन्हें समस्याओं के बारे में शिक्षित करना, ताकि वे समाधानों की दिशा में सकारात्मक कदम उठा सकें।


3. सामाजिक न्याय (Social Justice): अन्याय और असमानता के खिलाफ लड़ाई और लोगों को उनके अधिकारों की रक्षा करना।


4. राजनीतिक प्रभाव (Political Influence): राजनीतिक प्रक्रियाओं में भागीदारी और सरकारी नीतियों में परिवर्तन लाने का प्रयास करना।


5. साझेदारी और एकता (Collaboration and Unity): विभिन्न समूहों और संगठनों को एक साथ आने के लिए प्रेरित करना और एकता को बढ़ावा देना।


 तकनीक (Techniques) ऑफ सोशल एक्शन:

1. आंदोलन (Protest): लोगों के साथ साझा किया गया प्रदर्शन, मार्च, धरना, और हड़ताल जैसे आंदोलनिक तकनीकों का प्रयोग।

2. आंदोलन (Advocacy): नीतियों और सरकारी प्रवृत्तियों में बदलाव लाने के लिए लोगों की आवाज को सुनवाई में लाना।

3. शिकायत (Petition): न्यायिक अधिकारों की रक्षा के लिए शिकायत पत्र या अनुरोध प्रस्तुत करना।

4. वॉलंटियरिज्म (Volunteering): समाज की सेवा में अपना समय और सामर्थ्य देना।

5. संगठन (Organization): लोगों को एकत्रित करने, उन्हें शिक्षित करने, और आंदोलन के लिए योजना बनाने के लिए संगठनित कार्रवाई।

6. जागरूकता (Awareness): समाज में जागरूकता फैलाने के लिए मीडिया, सामुदायिक चैनल्स, और सामाजिक संचार के उपयोग का प्रयास।

ये तकनीक और उद्देश्य सामाजिक क्रियाओं को समर्थन और संगठन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, ताकि समाज में सुधार और परिवर्तन लाया जा सके।


3.    सामुदायिक संगठन का समाजकार्य की अन्य पद्धतियों से संबंध स्पष्ट करें।

4.    मीटिंग के मिनीट्स कैसे लिखेंगे।


अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)   


1.    समुदाय में समूह के साथ कार्य करने की प्रक्रिया लिखें।



2.    संघर्षों के समाधान से क्या अभिप्राय है?

सामाजिक कार्यकर्ताओं को संघर्ष निवारण को समझने की आवश्यकता है। कार्य स्थल पर विभिन्न ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं जिनसे सह कर्मियों के बीच तर्क और असहमतियाँ व्याप्त हो सकती हैं। इनमें कुछ संघर्ष को अपेक्षाकृत पहचानना आसान है परन्तु जरूरी नहीं है कि इसका निवारण सरल हो। यह व्यक्तियों के मध्य संघर्ष अथवा लोगों के संगठित समूहों के मध्य बहस से देखा जा सकता है। संघर्ष विभिन्न ढंगों से अभिव्यक्त हो सकता है जिसमें क्रोध में चिल्लाना, दूसरे व्यक्ति को विपरीत बातें कहना, अथवा सभी परस्पर सम्बन्धों को नाराज होकर तोड़ देना सम्मिलित हैं। संघर्ष विभागों, संस्थाओं, संगठनों, समूहों और व्यक्तियों में व्याप्त हो सकता है। कार्यकर्ताओं को रचनात्मक संघर्ष प्रेरित करने की आवश्यकता है जो नए समाधान, नई सेवाएं और सामाजिक स्थिति की नई जानकारी प्रस्तुत कर सके। विविध व्यक्तित्व, विचार, मूल्य, कार्य शैली और नियंत्रणकारी प्रतिमान से कार्यस्थल पर संघर्ष उत्पन्न होता है।

कार्यकर्ताओं को आरंभिक अवस्था से ही संघर्ष को समझना चाहिए और इसका निवारण करने के लिए उपाय प्रस्तुत करने चाहिए। संघर्ष निवारण संघर्ष का अंतिम निवारण करने का परिचायक है। समाज कार्य पद्धतियों, विधियों और कौशलों का इस्तेमाल करके किसी समस्या, तर्क अथवा कठिन कार्य का निवारण करने के विभिन्न ढंग हैं। संघर्ष के कारणों का पता लगाना यदि कोई उपलब्ध मामला है तो, उसके बारे में भ्रांतियों की पहचान करना, सांस्कृतिक अथवा मूल्य संबन्धित मामले, व्यक्तित्व संघर्ष और परिवर्तन के प्रतिरोध का संघर्ष अगला चरण होगा। इसके बाद अनेक वैकल्पिक निवारणों का अनुमान लगाया जाना चाहिए और सर्वाधिक उचित निवारण पर सहमति होनी चाहिए। सहमति में बातचीत, सौदेबाजी और समझौता सम्मिलित हो सकता है। बातचीत, एकमत के माध्यम से, संघर्ष निवारण की सामान्य पद्धति है। समझौता, संघर्ष निवारण की अन्य विधि है जिसमें तीसरे पक्षकार सामान्य तौर पर समझौता अधिकारी की मौजूदगी में निपटारा किया जाता है। मध्यस्थता संघर्ष निवारण की एक दूसरी विधि है जिसमें मध्यस्थ का निर्णय दोनों पक्षों के लिए बाध्यता मूलक होता है। 


3.    समुदाय में बैठकों का आयोजन किस प्रकार किया जाता है?

वैध बैठक होने के लिए बैठक उचित प्राधिकारी द्वारा जारी उचित नोटिस द्वारा बुलाई जानी चाहिए । इसका मतलब है कि बैठक बुलाने का नोटिस अधिनियम और नियमों के अनुसार उचित रूप से तैयार किया जाना चाहिए, और उन सभी सदस्यों को भेजा जाना चाहिए जो बैठक में भाग लेने और मतदान करने के हकदार हैं।बैठक के लिए एक स्पष्ट लक्ष्य और एजेंडा विकसित करें और निर्धारित करें और इसे व्यापक रूप से संप्रेषित करें। समुदाय के विभिन्न वर्गों से भागीदारी को आमंत्रित करें। यदि संभव हो, तो प्रत्येक बैठक के लिए दो सुविधाप्रदाताओं का उपयोग करने पर विचार करें। एक चर्चा का नेतृत्व करता है, दूसरा नोट्स लेता है, लेकिन सुनिश्चित करें कि आपके पास नोट्स लेने के लिए समूह से अनुमति हो। सामुदायिक संगठन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तीन प्राथमिक कार्य शामिल हैंः 

1) शिक्षा और प्रशिक्षण; 

2) संगठन निर्माण और 

3) लामबंदी । 

सुविधा की स्थापना कुल सामुदायिक स्थिति पर विचार करती है, मौजूदा जरूरतों और चिंताओं का सामना करने के लिए प्रयासों और संसाधनों को एकीकृत करती है। 



or


आयोजन की दिशा में पहला कदम किसी समुदाय की आवश्यकताओं और रुझानों को समझना है। यह आपको उन मुद्दों या चिंताओं को निर्धारित करने में मदद करता है जो लोगों के पास हो सकते हैं। यह आपको आपके उद्देश्य का समर्थन करने की सबसे अधिक संभावना वाले विशिष्ट समूहों को लक्षित करने की अनुमति देकर आपकी सामुदायिक आउटरीच रणनीतियों को भी सूचित करता है।


सामुदायिक आवश्यकताओं और रुझानों को समझने के कदम:

1. समुदाय प्रोफ़ाइल बनाना (Create a Community Profile):

  • जनसांख्यिकी जानकारी: उम्र, लिंग, शिक्षा स्तर, आर्थिक स्थिति आदि।
  • भौगोलिक जानकारी: समुदाय का भौगोलिक विस्तार और स्थान।
  • सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू: भाषा, रीतिरिवाज, धर्म, और संस्कृति।

2. आवश्यकताओं का आकलन (Needs Assessment):

  • सर्वेक्षण और प्रश्नावली (Surveys and Questionnaires): समुदाय के सदस्यों से सीधे जानकारी प्राप्त करना।
  • फोकस समूह चर्चा (Focus Group Discussions): विभिन्न समूहों के साथ गहराई से चर्चा करना।
  • साक्षात्कार (Interviews): प्रमुख सदस्यों और नेताओं के साथ व्यक्तिगत बातचीत।

3. डेटा विश्लेषण (Data Analysis):

  • मौजूदा डेटा की समीक्षा (Review Existing Data): सरकारी रिपोर्ट्स, स्वास्थ्य डेटा, शिक्षा रिपोर्ट्स आदि।
  • मौजूदा रुझानों का अध्ययन (Study Current Trends): सामाजिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय रुझानों का विश्लेषण।

4. समुदाय की समस्याओं की पहचान (Identify Community Issues):

  • सामान्य समस्याएं (Common Issues): स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, और बुनियादी सेवाओं की समस्याएं।
  • विशिष्ट चिंताएं (Specific Concerns): किसी विशेष समूह या उपसमुदाय की विशेष समस्याएं।

5. लक्षित समूहों की पहचान (Identify Target Groups):

  • प्राथमिक हितधारक (Primary Stakeholders): वे लोग जो सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
  • द्वितीयक हितधारक (Secondary Stakeholders): वे लोग जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे।
  • समर्थक और सहयोगी (Supporters and Collaborators): वे समूह और संगठन जो आपके उद्देश्य में सहायता कर सकते हैं।

6. संचार चैनल्स की पहचान (Identify Communication Channels):

  • पारंपरिक चैनल्स (Traditional Channels): स्थानीय समाचार पत्र, रेडियो, सामुदायिक बैठकें।
  • डिजिटल चैनल्स (Digital Channels): सोशल मीडिया, ईमेल, वेबसाइट।

7. प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया (Feedback and Followup):

  • प्राप्त जानकारी का साझा करना (Share the Collected Information): समुदाय के साथ जानकारी साझा करना।
  • सदस्यों से प्रतिक्रिया लेना (Collect Feedback from Members): उनकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों को संकलित करना।
  • आगे की योजना बनाना (Plan the Next Steps): प्राप्त जानकारी के आधार पर आगे की योजना बनाना।

निष्कर्ष

किसी भी सामुदायिक आयोजन की दिशा में पहला कदम समुदाय की आवश्यकताओं और रुझानों को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह प्रक्रिया संगठन को उन महत्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने में मदद करती है जो समुदाय के लिए प्रासंगिक हैं और प्रभावी आउटरीच और सहयोग की रणनीतियाँ विकसित करने में सहायक होती है। इससे न केवल संगठन की प्रासंगिकता और प्रभावशीलता बढ़ती है, बल्कि समुदाय के साथ विश्वास और सहयोग का संबंध भी मजबूत होता है।


4.    सामुदायिक नेटवर्किंग क्या है? स्पष्ट करें।

 नेटवर्किंगः- समुदाय के सदस्य, विशेष रूप से नेता, किस हद तक ऐसे व्यक्तियों और उनकी एजेंसियों या संगठनों को जानते हैं जो समुदाय को मजबूत करने के लिए मूल्यवान संसाधन प्रदान कर सकते हैं? नेटवर्क जितना प्रभावी होगा, समुदाय या संगठन उतना ही मजबूत होगा। अलगाव कमजोरी पैदा करता है।


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