सतत विकास के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए बताइए|
UNIT- 1
1.5 सतत विकास के लिए किए गए प्रयास: अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय चितंन
1.मानव पर्यावरण संगोष्ठी:5-12 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टॅाकहोम में; जिसमें विश्व के 110 देशो ने भाग लेकर पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में कई प्रस्ताव पारित किए; को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई।
2.रियो सम्मेलन:संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ;न्छम्च्द्ध द्वारा प्रथम वैश्विक मानव सम्मेलन (स्टाॅक होम) की 20वीं वर्षगाॅठ पर ब्राजील की राजधानी रियो-डि-जेनेरियो में पृथ्वी शिखर सम्मेलन ;म्ंतजी ैनउउपजद्ध का आयोजन 3 से 13 जून, 1992 के दौरान किया गया जिसमें विश्व के 120 राष्ट्रों ने भाग लिया, जिसमें विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की जैव सम्पदा के संरक्षण के लिये पर्याप्त पूॅजी व तकनीक प्रदान करने, ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन आदिद्ध के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत कटौती, पर्यावरण को स्वच्छ रखने तथा उसके संरक्षण पर होने वाले व्यय का अधिकांश हिस्सा विश्व के विकसित देश उठायेगें जो पर्यावरण की क्षति के लिये अधिक उत्तरदायी हैं।
3.अर्थ प्लस फाइव सम्मेलन: 23 से 27 जून, 1997 तक ‘अर्थ प्लस फाइव’ या ‘संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ पर्यावरण को क्षति पहुॅचाने वाली हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कटौती तथा पर्यावरण संरक्षण की तकनीकों का विश्व के विभित्र देशों को रियायती दरों पर उपलब्ध कराने जैसे मुद्दो पर व्यापक रूप से बहस हुई।
4.मान्ट्रीयल सहमति:मान्ट्रीयल प्रोटोकाल ओजोन परत क्षीण करने वाले पदार्थो के बारे में (ओजोन परत के संरक्षण के लिए वीयना सम्मेलन में पारित प्रोटोकाल) एक अन्तराष्ट्रीय संधि है।
5.क्योटो प्रोटोकाॅल:जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार मानी जा रही कार्बनडाई आक्साइड मीथेन, नाइट्रस आक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसो के उत्सर्जन के स्तर को कम करने के लिए 11 दिसम्बर, 1997 में जापान के क्योटो शहर में एक सहमति पत्र तैयार किया गया था।
6.जोहांसबर्ग पृथ्वी सम्मेलन:यह सम्मेलन 1 से 4 सितम्बर, 2002 के बीच जोहांसबर्ग (दक्षिण अफ्रीकाद्ध में सम्पन्न हुआ। विश्व के अब तक के इस सबसे बडे सम्मेलन में लगभग दो सौ राष्ट्रों के 60 हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
7.कोप-8 सम्मेलन: नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में 23, अक्टूबर से 01, नवम्बर 2002 के बीच जलवायु परिर्वतन पर संयुक्तराष्ट्र देशो के सदस्य देशो का आठवाँ सम्मेलन कोप-8 ;ब्वच.8ए ब्वदमितमदबम व िच्ंतजपमेद्ध हुआ। जलवायु परिर्वतन से सबंधित अनेक बिंदुओ पर चर्चा की गई एवं विकासशील देशो की माँग के अनुरूप तकनीक हस्तांतरण क्षमता विकास और समयानुकूल बदलाव पर केंद्रित जलवायु परिर्वतन एवं सतत विकास संबधी घोषणा पत्र को एक नवम्बर को उक्त सम्मेंलन में सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।
8.पीपुल्स वल्र्ड वाटर फोरम-2004:पानी का संकट दुनिया के सामने आज चुनौती बनकर खड़ा हुआ है। इसी क्रम में जल समस्याओ के समाधान के लिए 12 जनवरी 2004 को दिल्ली में तीन दिवसीय पीपुल्स वल्र्ड वाटर फोरम का आयोजन किया गया।
9.द्वितीय पृथ्वी सम्मेलन:प्रथम पृथ्वी सम्मेलन के 20 वर्ष बाद रियो में ही सन् 2012 में रियो $20 के नाम से सम्मेलन हुआ जहाॅ यह तय हुआ कि क्योटो प्रोटोकाॅल 1997 को सन 2020 तक ही जारी रखेंगे अैार 2020 के बाद क्या करना है,यह 2015 के पेरिस सम्मेलन में सभी देशो को तय करके रखना होगा।
सतत विकास के लक्ष्यों का वर्णन कीजिए
UNIT - 1
सतत विकास के लक्ष्य
1. पूरे विश्व से गरीबी के सभी रूपों की समाप्ति।
2. भूख की समाप्ति, खा़द्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा।
3. सभी आयु के लोगो में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा।
4. समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा।
5. लैंगिक समानता।
6. सभी के लिए स्वच्छता और पानी का सतत प्रबंधन।
7. सस्ती विश्वसनीय टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना।
8. समावेशी और सतत आर्थिक विकासयुक्त उत्पादन, रोजगार और बेहतर कार्य को बढ़ावा देना।
9. लचीले व बुनियादी ढांचे, समावेशी व सतत औद्योगीकरण को बढावा।
10. देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना।
11. सुरक्षित, लचीले और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण।
12. स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना।
13. जलवायु परिर्वतन और उसके प्रभावों से बचाव के लिए कार्यवाही।
14. महासागरों, समुद्र और समुद्री संसाधनो का संरक्षण और उपयोग।
15. स्थलीय पारिस्थितिकीय प्रणालियों का संरक्षण।
16. सभी के लिए न्याय।
17. सतत विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करना।
विकास से आई चुनौतियों को बताइए
विकास से पृथ्वी एवं लोगों के समक्ष आयी चुनौतियाॅ
मनुष्य ने तरक्की तो की किन्तु इसके बदले में प्रकृति एवं मानवता के समक्ष अनेक गंभीर चुनौतियाॅ भी प्रदान किया। अनियन्त्रित उपभोग के कारण पर्यावरण के समक्ष ऐसे संकट उत्पन्न हो रहे हैं जो न केवल मानव बल्कि पृथ्वी के अन्य समस्त जीवधारियों के अस्तित्व के लिए भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं। उनमें से कुछ प्रमुख यहाँ प्रदान किए जा रहे हैं -
1. तापमान बृद्धि से फसलों की पौष्टिकता में कमी: मानव के अनेक क्रियाकलापो एवं कुछ प्राकृतिक क्रियाओ के फलस्वरुप प्रायः अनेक हाउस गैसे जैसे कार्बन डाई आक्साइड, हाइड्रोजन मोनो आक्साइड, मीथेन ;ब्व्2ए भ्2व्ए ब्भ्4द्ध इत्यादि उत्पन्न होती है। कार्बन डाई आक्साइड गैस मानवीय कारणों जैसे ज़ंगलो की कटाई और जीवाश्म ईधंन के जलने और प्राकृतिक कारणों जैसे श्वसन और ज्वाला मुखी के विस्फोट से वातावरण में आती हैं। ये वायुमंडल मे एकत्रित होकर विशाल परत बनाती है जो पृथ्वी की गर्मी को वायुमंडल मे नही जाने देती। इसके कारण धरती के तापमान में निरन्तर बृद्धि हो रही है। इसे ग्रीन हाउस इफेक्ट के नाम से जाना जाता है। पिछले 150 वर्षों में तेज अैद्योगिकरण से धरती का तापमान 1.1 डिग्री बढ़ा है। बढ़ा हुआ तापमान फसलों की पौष्टिकता को कम रहा है। गेहूँ व चावल जैसी फसलों में प्रोटीन, जिंक, आयरन कम हो रहा है। बिगत वर्षों में गर्म हवाओं की जल्द आमद और बारिस में कमी से भारत में गेहूँ के उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। नतीजतन सरकार को गेहूं के निर्यात पर पाबंदी लगानी पड़ी।
2. समुद्र की गर्मी बढ़ने से समुद्री जीव खतरे में: 1901 के बाद से समुद्री सतह के तापमान में 1.5 डिग्री की वृद्धि हुई है। साथ ही बीते 200 वर्षों में समुद्र अम्लीयता (एशिडीफीकेशन) में 30 प्रतिशतकी बृद्धि हुयी है। उससे कोरल रीफ अर्थात समुद्री मूंगंे की चट्टानों में रहने वाले जीवों का घर खतरे में है। केकड़ा, झींगा मछली जैसे जीवों के लिए अपना खोल बनाना मुश्किल हो गया है। इसके कारण 25 प्रतिशत समुद्री जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है।
3. प्रदूषण से हर साल 90 लाख मौतें: इंसान हर साल लाखों मीट्रिक टन प्रदूषण फैला रहा है वायु प्रदूषण से न सिर्फ पृथ्वी की सुरक्षा करने वाले ओजोन परत को नुकसान हुआ, बल्कि इसने हमारी सेहत को भी बिगाड़ा है। लैसेंट की रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण से 90 लाख लोगों की असमय मौत हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा 24 लाख मौतें भारत में हो रही हैं।
4. रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक डालने से उपजाऊ भूमि खराब होना:अधिक उपज के रासायनिक उर्वरकों का निरन्तर उपयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार फसलों को कीड़ों से बचानें के लिए कीटनाशकों का भी बेहिसाब उपयोग किया जा रहा है। 1990 से 2018 के बीच दुनिया में इसका उपयोग करीब दोगुना बढ़कर 23 लाख टन से 41 लाख टन हो गया है। इससे भूमि, पानी और हमारी सेहत को भी नुकसान हुआ है। विश्व में कृषि भूमि का 64 प्रतिशत हिस्सा (245 लाख वर्गकिमी) रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से खराब हो रहा है।
5. बीते 25 साल में 13 लाख वर्ग मील के जंगल काट दिए हैं: विश्व बैंक का अनुमान है कि 20वीं सदी की शुरूआत से अब तक 1 करोड़ वर्ग किमी. जंगल मनुष्य ने नष्ट किए हैं। पिछले 25 वर्षों में ही 13 लाख वर्ग किमी. जंगल सिकुड़ गए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1960 के दशक के बाद से आधे से अधिक वन नष्ट हो गए हैं। हर सेकंड एक हेक्टेयर से अधिक उष्णकटिबंधीय वन नष्ट हो जाते हैं।
6. ओजोन परत का ह्रास:आॅक्सीजन पर सूर्य के प्रकाश की क्रिया से ओजोन गैस बनती है । यह पृथ्वी की सतह से 20 से 50 किमी ऊपर एक पर्त बनाती है। वायुमंडल में यह प्रक्रिया प्राकृतिक रुप से चलती रहती है पर बहुत धीमी होती है। इसके प्रत्येक अणु में तीन परमाणु होते है। यह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणो से बचाती है। उपरी वायुमंडल का ओजोन पराबैगनी किरणो को सोखकर इन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से रोकती है। रेफ्रिजरेटरो, वातानुकूलन के सयंत्रों, एरोसोल के छिड़काव इत्यादि द्वारा उत्सर्जित क्लोरोफ्लोरो कार्बन ओजोन पर्त के साथ क्रिया कर उसे उसे नष्ट कर रहें हैं। वस्तुतः ये सी.एफ.सी. अणु ओजोन के अणुओं से क्रिया करके उन्हें आॅक्सीजन के अणुओ में तोड़ देते हैं आॅक्सीजन के अणु पराबैगनी किरणो को नही सोखते। 1980 के दशक में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन की पर्त को पतला होते पाया गया है। यही प्रवृत्ति अब आॅस्ट्रेलिया समेत दूसरे स्थानो पर भी देखने को मिली है। ओजोन पर्त का विनाश होने से सूर्य की पराबैगनी किरणे पृथ्वी पर पॅहुचकर त्वचा कैसंर जैसी गम्भीर बीमारियो को जन्म देती है।
7. जलवायु परिवर्तन:जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है। जलवायु परिवर्तन के 5 प्रमुख लक्षणहैं। कार्बन डाई आक्साइड की विश्वव्यापी सान्द्रता में वृद्धि, विश्वव्यापी सतह तापमान में वृद्धि, उŸारी ध्रुवीय (आर्कटिक) समुद्र की बर्फ मे कमी, स्थलीय बर्फ में कमी तथा समुद्र के जल स्तर में वृद्धि। वर्ष 2005-2010 में विश्वव्यापी सतही तापमान सर्वाधिक दर्ज किए गए। आर्कटिक समुद्र की बर्फ में 1979 से लेकर 2000 की औसत बर्फ की तुलना में अब 11.5 प्रतिशत की दर से कमीं आ रही है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैण्ड दोनो जगह स्थलीय हिम की परत पिघल रही है। अंटार्कटिका महाद्वीप की वर्फ में वर्ष 2002 से प्रतिवर्ष 100 घन किलोमीटर की कमी आ रही है। इसी प्रकार सन् 1970 से 1990 के बीच समुद्र स्तर 1.70 मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ रहा था जबकी 1994 के बाद से यह वृद्वि 3.19 मिमी की दर से प्रतिवर्ष बढ रहा है। इस प्रकार से जलवायु परिवर्तन के पीछे वैज्ञानिक पक्ष सुस्पष्ट है कि उक्त घटनाएं पर्यावरण के प्रति मानव के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का परिणाम है।
चूँकि जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण हमारे विभिन्न गतिविधियों जैसे दहन, परिवहन, इत्यादि के लिए उŸाम किस्म के चूल्हो, परिवहन के लिए उच्च दक्षता के इंजनो एवं औद्योगिक करण में भी उच्च दक्षता की मशीनों का प्रयोग किया जाय तो कार्बन उत्सर्जन मे कमी लाई जा सकती है। इन सभी सयंत्रो व मशीनो की दक्षता केवल तकनीकी परिवर्तन कर प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही यदि पर्यावरण के प्रति जनजागरूकता उत्पन्न की जाये तो मानव अपनी जीवन शैली परिवर्तित कर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन की चुनौती को कम कर सकता है।
विकास का सही मॉडल बताइए
वश्व स्तर पर विकास के वैकल्पिक माॅडल के बारे में बहस जोर पकड़ रही है क्योंकि विकास के मौजूदा माॅडल की कमियां स्पष्ट होती जा रही हैं। विकास की मौजूदा राह में पर्यावरण विनाश व जलवायु परिवर्तन जैसा गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है।गरीबी और अभाव आज भी बडे स्तर पर बने हुए हैं जबकि विषमता और तेजी से बढ रही है। उपभोक्तावाद, लालच और प्रतिस्पर्धा पर आधारित विकास की राह न केवल सामाजिक समरसता व सहयोग में कमी कर रही है बल्कि इसके कारण नए तनाव उत्पन्न हो रहे हैं।इस स्थिति मे पेचीदा होती समस्याओं के बीच विकास के वैकल्पिक माॅडल की जरूरत है।
अब केवल राष्ट्रीय आय व जीएनपी की वृद्धि पर मात्र फोकस करना उचित नहीं है। क्योंकि प्रायः जीएनपी की तेज वृद्धि के दौर में ही पर्यावरण का विनाष असहनीय हद तक बढ गया है। यदि कोई समुदाय एक वर्ष में अपने वन काट के बेंच देता है तो उसकी आय में अधिक वृद्धि दर्ज होती है जबकि कोई समुदाय वनों को बचाकर रखता है तो उसकी आय में वृद्धि दर्ज नहीं होती है। किसी बस्ती में शराब व जुए का कारोबार दूर-दूर तक फैलता है तो उसकी आय मे तेज वृद्धि दर्ज हो जाती है, जबकि इससे किसी की भी भलाई संभव ंनहीं है।
अतः राष्ट्रीय आय के मानदंड को छोड़कर हमें यह पूछना चाहिए कि दुनिया बेहतर बन रही है कि नहीं। इस व्यापक सोंच में यह सवाल बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या सब लोगों की बुनियादीं जरूरतें बेहतर ढंग से पूरी हो रहीं हैं या नहीं। सब लोगों की रोटी, कपडा, मकान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना बडी प्राथमिकता बननी चाहिए। अतः विकास के वैकल्पिक राह पर विमर्श अब अति महत्वपूर्ण हो गया है। इसका एक पक्ष तो यह स्पष्ट है कि अब लोगों की बुनियादी जरूरतों को स्थायी तौर पर पूरा करने के साथ ही ंपर्यावरण की रक्षा करने को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास केवल अल्पकालीन नहीं होने चाहिए, अपितु टिकाऊ होने चाहिए। यह तभी हो सकता है जब प्राकृतिक संसाधनो के आधार एवं, पर्यावरण की रक्षा को साथ-साथ उच्च महत्व मिले। भोजन और आश्रय से बडी जरूरत साफ हवा व पानी की है, यह जरूरत भी पर्यावरण की रक्षा से जुडी हुई है। पर्यावरण रक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रित करने के जो भी प्रयास अभी संभव है वह किए जाए। बढ़ती आपदाओं से बचाव की बेहतर तैयारी को विभिन्न स्तरों पर समुचित महत्व देना जरूरी है।
पर यह तभी संभव हो सकेगा यदि विश्व व राष्ट्रीय स्तर पर सम्पत्ति व आय की अत्यधिक विषमताओं को कम किया जा सके और इस तरह उच्चतम प्राथमिकता .वाले कार्यो ंको आगे बढाने के लिए आर्थिक संसाधन प्राप्त किए जा सकें। अतः विश्व स्तर पर व अपने देश के स्तर पर आर्थिक विषमता को कम करना बहूत जरूरी है।
जब सभी लोगों व विशेषकर निर्धन लोगों की जरूरतों पर विशेष ध्यान की बात कही जाती है तो उसके साथ एक सवाल यह भी जुड़ जाता है कि क्या अन्याय केवल आर्थिक स्तर पर होता है, या इसके विभिन्न सामाजिक संदर्भ में भी जाति, धर्म, रंग, नस्ल लिंग आदि के आधार पर कई तरह के गंभीर भेद-भाव मौजूद हैं और इस तरह के अन्याय को दूर करने को भी ऊंची प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मूल उद्देष्य तो यह है कि न्याय व समता पर आधारित सामाजिक सद्भावना व भाईचारा भी ऐसी व्यवस्था में ही अच्छी तरह पनप सकता है।
मानव समाज का दुख-दर्द बहुत हद तक उसके आपसी सम्बन्धों से जुडा है। सामाजिक बिखराव व पारिवारिक टूटन के कारण बढ़ती आय के दौर से भी दुख-दर्द बढ सकता है। विभिन्न समुदायो ंमें टकराव से या सांम्प्रदायिकता से अमन-शांति छिन सकती है, सामाजिक ताना-बाना टूट सकता है। अतःसद्भावना व सहयोग को बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है, इसके लिए सतत् प्रयास होने चाहिए।
सामाजिक सौहार्द व सद्भावना के लिए निरंतरता से प्रयास करते हुए इन प्रयासांे को द्वेष व दुनियां में अमन-शांति के व्यापक प्रयासों से जोड़ना चाहिए। इससे निशस्त्रीकरण के प्रयासों को जनमत का व्यापक आधार मिलेगा। सभी महाविनाशक हथियारों को धरती से दूर करने का लक्ष्य सदा सामने रहना चाहिए। एक बडी संभावना हमारे सामने यह भी है कि जो खरबों रूपये बहुत विनाशक हथियारो व अन्य सैन्य खर्च पर दुनिया भर में लग रहें हैं उन्हें प्राथमिकता के विकास कार्यों व पर्यावरण रक्षा के कार्यों पर खर्च किया जाय।
कितना बजट व अन्य संसाधन विकास कार्यो ंमें जाएंगे व कितने हथियारों में, कितने शहरी विकास मे ंजाएंगे व कितने ग्रामीण में, कितने संसाधन जरूरतों की वस्तुओं पर खर्च होंगे व कितने विलासिता पर यह सब महत्वपूर्ण सवाल हैं। इस तरह न्यायसंगत प्राथमिकताओं, अमन, पर्यावरण, रक्षा व समता के लक्ष्यों को लेकर ही पूरी दुनिया ंमें विकास का सही मार्ग तय होना चाहिए । सब कुछ बाजार के जिम्मे ंनही ंछोडा जा सकता है, व देष-दुनिया के स्तर पर आर्थिक नियोजन की जरूरत है ताकि न्यायसंगत प्राथमिकताओं को पूरा किया जा सके।
पर्यावरण की रक्षा, खाद्य-सुरक्षा व करोडों लोगों की आजीविका की रक्षा जरूरी है। उस माॅडल को स्वीकार नहीं किया जा सकता है जिसमें गाॅंववासियों के विस्थापन व महानगरों की बढती जनसंख्या को विकास माना जाता है। इसके स्थान पर गांवों व कस्बो ंमें स्थायित्व व वहां अधिक विविधता भरे रोजगारों की उपलब्धि को महत्व देने पर बल दिया जा रहा है जिससे कृषि के साथ अन्य रोजगार भी गांवों के पास उपलब्ध रहें। इस संदर्भ में आदिवासियों के विस्थापन को रोकने को विषेष महत्व देना चाहिए।
विकेंन्द्रीकरण की नीतियां अपनानें से ग्रामीण विकास के नए रचनात्मक आयाम खुल सकतें हैं। भूमंडलीकरण के स्थान पर विकेंन्द्रीकरण की नीति को विकास का प्रमुख आधार बनाना चाहिए।
साथ में यह समझना जरूरी है कि धरती केवल मनुष्यों के लिए नहीं है। सभी प्रजातियों की रक्षा व उनके पनपने के प्राकृतिक स्थानों की रक्षा को समुचित महत्व मिलना चाहिए। पर्यावरण क्षरण रोकने हेतु हमको पर्यावरण हितैषी पदार्थो ,तकनीकों,दिनचर्या एवं जीवनशैली को अपनाना होगा।संक्षेप में उक्त दृष्टिकोण से भरी जीवन पद्धति से पर्यावरण का विकास होगा तथा हम व हमारी अगामी पीढ़ी खुशहाल रह सकेगी अन्यथा कि दशा मे पर्यावरण क्षरण एवं हमारा विनाश सुनिश्चित होगा।
UNIT- 1
1.5 सतत विकास के लिए किए गए प्रयास: अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय चितंन
1.मानव पर्यावरण संगोष्ठी:5-12 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टॅाकहोम में; जिसमें विश्व के 110 देशो ने भाग लेकर पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में कई प्रस्ताव पारित किए; को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई।
2.रियो सम्मेलन:संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ;न्छम्च्द्ध द्वारा प्रथम वैश्विक मानव सम्मेलन (स्टाॅक होम) की 20वीं वर्षगाॅठ पर ब्राजील की राजधानी रियो-डि-जेनेरियो में पृथ्वी शिखर सम्मेलन ;म्ंतजी ैनउउपजद्ध का आयोजन 3 से 13 जून, 1992 के दौरान किया गया जिसमें विश्व के 120 राष्ट्रों ने भाग लिया, जिसमें विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की जैव सम्पदा के संरक्षण के लिये पर्याप्त पूॅजी व तकनीक प्रदान करने, ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन आदिद्ध के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत कटौती, पर्यावरण को स्वच्छ रखने तथा उसके संरक्षण पर होने वाले व्यय का अधिकांश हिस्सा विश्व के विकसित देश उठायेगें जो पर्यावरण की क्षति के लिये अधिक उत्तरदायी हैं।
3.अर्थ प्लस फाइव सम्मेलन: 23 से 27 जून, 1997 तक ‘अर्थ प्लस फाइव’ या ‘संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ पर्यावरण को क्षति पहुॅचाने वाली हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कटौती तथा पर्यावरण संरक्षण की तकनीकों का विश्व के विभित्र देशों को रियायती दरों पर उपलब्ध कराने जैसे मुद्दो पर व्यापक रूप से बहस हुई।
4.मान्ट्रीयल सहमति:मान्ट्रीयल प्रोटोकाल ओजोन परत क्षीण करने वाले पदार्थो के बारे में (ओजोन परत के संरक्षण के लिए वीयना सम्मेलन में पारित प्रोटोकाल) एक अन्तराष्ट्रीय संधि है।
5.क्योटो प्रोटोकाॅल:जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार मानी जा रही कार्बनडाई आक्साइड मीथेन, नाइट्रस आक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसो के उत्सर्जन के स्तर को कम करने के लिए 11 दिसम्बर, 1997 में जापान के क्योटो शहर में एक सहमति पत्र तैयार किया गया था।
6.जोहांसबर्ग पृथ्वी सम्मेलन:यह सम्मेलन 1 से 4 सितम्बर, 2002 के बीच जोहांसबर्ग (दक्षिण अफ्रीकाद्ध में सम्पन्न हुआ। विश्व के अब तक के इस सबसे बडे सम्मेलन में लगभग दो सौ राष्ट्रों के 60 हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
7.कोप-8 सम्मेलन: नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में 23, अक्टूबर से 01, नवम्बर 2002 के बीच जलवायु परिर्वतन पर संयुक्तराष्ट्र देशो के सदस्य देशो का आठवाँ सम्मेलन कोप-8 ;ब्वच.8ए ब्वदमितमदबम व िच्ंतजपमेद्ध हुआ। जलवायु परिर्वतन से सबंधित अनेक बिंदुओ पर चर्चा की गई एवं विकासशील देशो की माँग के अनुरूप तकनीक हस्तांतरण क्षमता विकास और समयानुकूल बदलाव पर केंद्रित जलवायु परिर्वतन एवं सतत विकास संबधी घोषणा पत्र को एक नवम्बर को उक्त सम्मेंलन में सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।
8.पीपुल्स वल्र्ड वाटर फोरम-2004:पानी का संकट दुनिया के सामने आज चुनौती बनकर खड़ा हुआ है। इसी क्रम में जल समस्याओ के समाधान के लिए 12 जनवरी 2004 को दिल्ली में तीन दिवसीय पीपुल्स वल्र्ड वाटर फोरम का आयोजन किया गया।
9.द्वितीय पृथ्वी सम्मेलन:प्रथम पृथ्वी सम्मेलन के 20 वर्ष बाद रियो में ही सन् 2012 में रियो $20 के नाम से सम्मेलन हुआ जहाॅ यह तय हुआ कि क्योटो प्रोटोकाॅल 1997 को सन 2020 तक ही जारी रखेंगे अैार 2020 के बाद क्या करना है,यह 2015 के पेरिस सम्मेलन में सभी देशो को तय करके रखना होगा।
सतत विकास के लक्ष्यों का वर्णन कीजिए
UNIT - 1
सतत विकास के लक्ष्य
1. पूरे विश्व से गरीबी के सभी रूपों की समाप्ति।
2. भूख की समाप्ति, खा़द्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा।
3. सभी आयु के लोगो में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा।
4. समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा।
5. लैंगिक समानता।
6. सभी के लिए स्वच्छता और पानी का सतत प्रबंधन।
7. सस्ती विश्वसनीय टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना।
8. समावेशी और सतत आर्थिक विकासयुक्त उत्पादन, रोजगार और बेहतर कार्य को बढ़ावा देना।
9. लचीले व बुनियादी ढांचे, समावेशी व सतत औद्योगीकरण को बढावा।
10. देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना।
11. सुरक्षित, लचीले और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण।
12. स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना।
13. जलवायु परिर्वतन और उसके प्रभावों से बचाव के लिए कार्यवाही।
14. महासागरों, समुद्र और समुद्री संसाधनो का संरक्षण और उपयोग।
15. स्थलीय पारिस्थितिकीय प्रणालियों का संरक्षण।
16. सभी के लिए न्याय।
17. सतत विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करना।
विकास से आई चुनौतियों को बताइए
विकास से पृथ्वी एवं लोगों के समक्ष आयी चुनौतियाॅ
मनुष्य ने तरक्की तो की किन्तु इसके बदले में प्रकृति एवं मानवता के समक्ष अनेक गंभीर चुनौतियाॅ भी प्रदान किया। अनियन्त्रित उपभोग के कारण पर्यावरण के समक्ष ऐसे संकट उत्पन्न हो रहे हैं जो न केवल मानव बल्कि पृथ्वी के अन्य समस्त जीवधारियों के अस्तित्व के लिए भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं। उनमें से कुछ प्रमुख यहाँ प्रदान किए जा रहे हैं -
1. तापमान बृद्धि से फसलों की पौष्टिकता में कमी: मानव के अनेक क्रियाकलापो एवं कुछ प्राकृतिक क्रियाओ के फलस्वरुप प्रायः अनेक हाउस गैसे जैसे कार्बन डाई आक्साइड, हाइड्रोजन मोनो आक्साइड, मीथेन ;ब्व्2ए भ्2व्ए ब्भ्4द्ध इत्यादि उत्पन्न होती है। कार्बन डाई आक्साइड गैस मानवीय कारणों जैसे ज़ंगलो की कटाई और जीवाश्म ईधंन के जलने और प्राकृतिक कारणों जैसे श्वसन और ज्वाला मुखी के विस्फोट से वातावरण में आती हैं। ये वायुमंडल मे एकत्रित होकर विशाल परत बनाती है जो पृथ्वी की गर्मी को वायुमंडल मे नही जाने देती। इसके कारण धरती के तापमान में निरन्तर बृद्धि हो रही है। इसे ग्रीन हाउस इफेक्ट के नाम से जाना जाता है। पिछले 150 वर्षों में तेज अैद्योगिकरण से धरती का तापमान 1.1 डिग्री बढ़ा है। बढ़ा हुआ तापमान फसलों की पौष्टिकता को कम रहा है। गेहूँ व चावल जैसी फसलों में प्रोटीन, जिंक, आयरन कम हो रहा है। बिगत वर्षों में गर्म हवाओं की जल्द आमद और बारिस में कमी से भारत में गेहूँ के उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। नतीजतन सरकार को गेहूं के निर्यात पर पाबंदी लगानी पड़ी।
2. समुद्र की गर्मी बढ़ने से समुद्री जीव खतरे में: 1901 के बाद से समुद्री सतह के तापमान में 1.5 डिग्री की वृद्धि हुई है। साथ ही बीते 200 वर्षों में समुद्र अम्लीयता (एशिडीफीकेशन) में 30 प्रतिशतकी बृद्धि हुयी है। उससे कोरल रीफ अर्थात समुद्री मूंगंे की चट्टानों में रहने वाले जीवों का घर खतरे में है। केकड़ा, झींगा मछली जैसे जीवों के लिए अपना खोल बनाना मुश्किल हो गया है। इसके कारण 25 प्रतिशत समुद्री जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है।
3. प्रदूषण से हर साल 90 लाख मौतें: इंसान हर साल लाखों मीट्रिक टन प्रदूषण फैला रहा है वायु प्रदूषण से न सिर्फ पृथ्वी की सुरक्षा करने वाले ओजोन परत को नुकसान हुआ, बल्कि इसने हमारी सेहत को भी बिगाड़ा है। लैसेंट की रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण से 90 लाख लोगों की असमय मौत हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा 24 लाख मौतें भारत में हो रही हैं।
4. रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक डालने से उपजाऊ भूमि खराब होना:अधिक उपज के रासायनिक उर्वरकों का निरन्तर उपयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार फसलों को कीड़ों से बचानें के लिए कीटनाशकों का भी बेहिसाब उपयोग किया जा रहा है। 1990 से 2018 के बीच दुनिया में इसका उपयोग करीब दोगुना बढ़कर 23 लाख टन से 41 लाख टन हो गया है। इससे भूमि, पानी और हमारी सेहत को भी नुकसान हुआ है। विश्व में कृषि भूमि का 64 प्रतिशत हिस्सा (245 लाख वर्गकिमी) रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से खराब हो रहा है।
5. बीते 25 साल में 13 लाख वर्ग मील के जंगल काट दिए हैं: विश्व बैंक का अनुमान है कि 20वीं सदी की शुरूआत से अब तक 1 करोड़ वर्ग किमी. जंगल मनुष्य ने नष्ट किए हैं। पिछले 25 वर्षों में ही 13 लाख वर्ग किमी. जंगल सिकुड़ गए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1960 के दशक के बाद से आधे से अधिक वन नष्ट हो गए हैं। हर सेकंड एक हेक्टेयर से अधिक उष्णकटिबंधीय वन नष्ट हो जाते हैं।
6. ओजोन परत का ह्रास:आॅक्सीजन पर सूर्य के प्रकाश की क्रिया से ओजोन गैस बनती है । यह पृथ्वी की सतह से 20 से 50 किमी ऊपर एक पर्त बनाती है। वायुमंडल में यह प्रक्रिया प्राकृतिक रुप से चलती रहती है पर बहुत धीमी होती है। इसके प्रत्येक अणु में तीन परमाणु होते है। यह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणो से बचाती है। उपरी वायुमंडल का ओजोन पराबैगनी किरणो को सोखकर इन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से रोकती है। रेफ्रिजरेटरो, वातानुकूलन के सयंत्रों, एरोसोल के छिड़काव इत्यादि द्वारा उत्सर्जित क्लोरोफ्लोरो कार्बन ओजोन पर्त के साथ क्रिया कर उसे उसे नष्ट कर रहें हैं। वस्तुतः ये सी.एफ.सी. अणु ओजोन के अणुओं से क्रिया करके उन्हें आॅक्सीजन के अणुओ में तोड़ देते हैं आॅक्सीजन के अणु पराबैगनी किरणो को नही सोखते। 1980 के दशक में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन की पर्त को पतला होते पाया गया है। यही प्रवृत्ति अब आॅस्ट्रेलिया समेत दूसरे स्थानो पर भी देखने को मिली है। ओजोन पर्त का विनाश होने से सूर्य की पराबैगनी किरणे पृथ्वी पर पॅहुचकर त्वचा कैसंर जैसी गम्भीर बीमारियो को जन्म देती है।
7. जलवायु परिवर्तन:जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है। जलवायु परिवर्तन के 5 प्रमुख लक्षणहैं। कार्बन डाई आक्साइड की विश्वव्यापी सान्द्रता में वृद्धि, विश्वव्यापी सतह तापमान में वृद्धि, उŸारी ध्रुवीय (आर्कटिक) समुद्र की बर्फ मे कमी, स्थलीय बर्फ में कमी तथा समुद्र के जल स्तर में वृद्धि। वर्ष 2005-2010 में विश्वव्यापी सतही तापमान सर्वाधिक दर्ज किए गए। आर्कटिक समुद्र की बर्फ में 1979 से लेकर 2000 की औसत बर्फ की तुलना में अब 11.5 प्रतिशत की दर से कमीं आ रही है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैण्ड दोनो जगह स्थलीय हिम की परत पिघल रही है। अंटार्कटिका महाद्वीप की वर्फ में वर्ष 2002 से प्रतिवर्ष 100 घन किलोमीटर की कमी आ रही है। इसी प्रकार सन् 1970 से 1990 के बीच समुद्र स्तर 1.70 मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ रहा था जबकी 1994 के बाद से यह वृद्वि 3.19 मिमी की दर से प्रतिवर्ष बढ रहा है। इस प्रकार से जलवायु परिवर्तन के पीछे वैज्ञानिक पक्ष सुस्पष्ट है कि उक्त घटनाएं पर्यावरण के प्रति मानव के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का परिणाम है।
चूँकि जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण हमारे विभिन्न गतिविधियों जैसे दहन, परिवहन, इत्यादि के लिए उŸाम किस्म के चूल्हो, परिवहन के लिए उच्च दक्षता के इंजनो एवं औद्योगिक करण में भी उच्च दक्षता की मशीनों का प्रयोग किया जाय तो कार्बन उत्सर्जन मे कमी लाई जा सकती है। इन सभी सयंत्रो व मशीनो की दक्षता केवल तकनीकी परिवर्तन कर प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही यदि पर्यावरण के प्रति जनजागरूकता उत्पन्न की जाये तो मानव अपनी जीवन शैली परिवर्तित कर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन की चुनौती को कम कर सकता है।
विकास का सही मॉडल बताइए
वश्व स्तर पर विकास के वैकल्पिक माॅडल के बारे में बहस जोर पकड़ रही है क्योंकि विकास के मौजूदा माॅडल की कमियां स्पष्ट होती जा रही हैं। विकास की मौजूदा राह में पर्यावरण विनाश व जलवायु परिवर्तन जैसा गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है।गरीबी और अभाव आज भी बडे स्तर पर बने हुए हैं जबकि विषमता और तेजी से बढ रही है। उपभोक्तावाद, लालच और प्रतिस्पर्धा पर आधारित विकास की राह न केवल सामाजिक समरसता व सहयोग में कमी कर रही है बल्कि इसके कारण नए तनाव उत्पन्न हो रहे हैं।इस स्थिति मे पेचीदा होती समस्याओं के बीच विकास के वैकल्पिक माॅडल की जरूरत है।
अब केवल राष्ट्रीय आय व जीएनपी की वृद्धि पर मात्र फोकस करना उचित नहीं है। क्योंकि प्रायः जीएनपी की तेज वृद्धि के दौर में ही पर्यावरण का विनाष असहनीय हद तक बढ गया है। यदि कोई समुदाय एक वर्ष में अपने वन काट के बेंच देता है तो उसकी आय में अधिक वृद्धि दर्ज होती है जबकि कोई समुदाय वनों को बचाकर रखता है तो उसकी आय में वृद्धि दर्ज नहीं होती है। किसी बस्ती में शराब व जुए का कारोबार दूर-दूर तक फैलता है तो उसकी आय मे तेज वृद्धि दर्ज हो जाती है, जबकि इससे किसी की भी भलाई संभव ंनहीं है।
अतः राष्ट्रीय आय के मानदंड को छोड़कर हमें यह पूछना चाहिए कि दुनिया बेहतर बन रही है कि नहीं। इस व्यापक सोंच में यह सवाल बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या सब लोगों की बुनियादीं जरूरतें बेहतर ढंग से पूरी हो रहीं हैं या नहीं। सब लोगों की रोटी, कपडा, मकान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना बडी प्राथमिकता बननी चाहिए। अतः विकास के वैकल्पिक राह पर विमर्श अब अति महत्वपूर्ण हो गया है। इसका एक पक्ष तो यह स्पष्ट है कि अब लोगों की बुनियादी जरूरतों को स्थायी तौर पर पूरा करने के साथ ही ंपर्यावरण की रक्षा करने को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास केवल अल्पकालीन नहीं होने चाहिए, अपितु टिकाऊ होने चाहिए। यह तभी हो सकता है जब प्राकृतिक संसाधनो के आधार एवं, पर्यावरण की रक्षा को साथ-साथ उच्च महत्व मिले। भोजन और आश्रय से बडी जरूरत साफ हवा व पानी की है, यह जरूरत भी पर्यावरण की रक्षा से जुडी हुई है। पर्यावरण रक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रित करने के जो भी प्रयास अभी संभव है वह किए जाए। बढ़ती आपदाओं से बचाव की बेहतर तैयारी को विभिन्न स्तरों पर समुचित महत्व देना जरूरी है।
पर यह तभी संभव हो सकेगा यदि विश्व व राष्ट्रीय स्तर पर सम्पत्ति व आय की अत्यधिक विषमताओं को कम किया जा सके और इस तरह उच्चतम प्राथमिकता .वाले कार्यो ंको आगे बढाने के लिए आर्थिक संसाधन प्राप्त किए जा सकें। अतः विश्व स्तर पर व अपने देश के स्तर पर आर्थिक विषमता को कम करना बहूत जरूरी है।
जब सभी लोगों व विशेषकर निर्धन लोगों की जरूरतों पर विशेष ध्यान की बात कही जाती है तो उसके साथ एक सवाल यह भी जुड़ जाता है कि क्या अन्याय केवल आर्थिक स्तर पर होता है, या इसके विभिन्न सामाजिक संदर्भ में भी जाति, धर्म, रंग, नस्ल लिंग आदि के आधार पर कई तरह के गंभीर भेद-भाव मौजूद हैं और इस तरह के अन्याय को दूर करने को भी ऊंची प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मूल उद्देष्य तो यह है कि न्याय व समता पर आधारित सामाजिक सद्भावना व भाईचारा भी ऐसी व्यवस्था में ही अच्छी तरह पनप सकता है।
मानव समाज का दुख-दर्द बहुत हद तक उसके आपसी सम्बन्धों से जुडा है। सामाजिक बिखराव व पारिवारिक टूटन के कारण बढ़ती आय के दौर से भी दुख-दर्द बढ सकता है। विभिन्न समुदायो ंमें टकराव से या सांम्प्रदायिकता से अमन-शांति छिन सकती है, सामाजिक ताना-बाना टूट सकता है। अतःसद्भावना व सहयोग को बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है, इसके लिए सतत् प्रयास होने चाहिए।
सामाजिक सौहार्द व सद्भावना के लिए निरंतरता से प्रयास करते हुए इन प्रयासांे को द्वेष व दुनियां में अमन-शांति के व्यापक प्रयासों से जोड़ना चाहिए। इससे निशस्त्रीकरण के प्रयासों को जनमत का व्यापक आधार मिलेगा। सभी महाविनाशक हथियारों को धरती से दूर करने का लक्ष्य सदा सामने रहना चाहिए। एक बडी संभावना हमारे सामने यह भी है कि जो खरबों रूपये बहुत विनाशक हथियारो व अन्य सैन्य खर्च पर दुनिया भर में लग रहें हैं उन्हें प्राथमिकता के विकास कार्यों व पर्यावरण रक्षा के कार्यों पर खर्च किया जाय।
कितना बजट व अन्य संसाधन विकास कार्यो ंमें जाएंगे व कितने हथियारों में, कितने शहरी विकास मे ंजाएंगे व कितने ग्रामीण में, कितने संसाधन जरूरतों की वस्तुओं पर खर्च होंगे व कितने विलासिता पर यह सब महत्वपूर्ण सवाल हैं। इस तरह न्यायसंगत प्राथमिकताओं, अमन, पर्यावरण, रक्षा व समता के लक्ष्यों को लेकर ही पूरी दुनिया ंमें विकास का सही मार्ग तय होना चाहिए । सब कुछ बाजार के जिम्मे ंनही ंछोडा जा सकता है, व देष-दुनिया के स्तर पर आर्थिक नियोजन की जरूरत है ताकि न्यायसंगत प्राथमिकताओं को पूरा किया जा सके।
पर्यावरण की रक्षा, खाद्य-सुरक्षा व करोडों लोगों की आजीविका की रक्षा जरूरी है। उस माॅडल को स्वीकार नहीं किया जा सकता है जिसमें गाॅंववासियों के विस्थापन व महानगरों की बढती जनसंख्या को विकास माना जाता है। इसके स्थान पर गांवों व कस्बो ंमें स्थायित्व व वहां अधिक विविधता भरे रोजगारों की उपलब्धि को महत्व देने पर बल दिया जा रहा है जिससे कृषि के साथ अन्य रोजगार भी गांवों के पास उपलब्ध रहें। इस संदर्भ में आदिवासियों के विस्थापन को रोकने को विषेष महत्व देना चाहिए।
विकेंन्द्रीकरण की नीतियां अपनानें से ग्रामीण विकास के नए रचनात्मक आयाम खुल सकतें हैं। भूमंडलीकरण के स्थान पर विकेंन्द्रीकरण की नीति को विकास का प्रमुख आधार बनाना चाहिए।
साथ में यह समझना जरूरी है कि धरती केवल मनुष्यों के लिए नहीं है। सभी प्रजातियों की रक्षा व उनके पनपने के प्राकृतिक स्थानों की रक्षा को समुचित महत्व मिलना चाहिए। पर्यावरण क्षरण रोकने हेतु हमको पर्यावरण हितैषी पदार्थो ,तकनीकों,दिनचर्या एवं जीवनशैली को अपनाना होगा।संक्षेप में उक्त दृष्टिकोण से भरी जीवन पद्धति से पर्यावरण का विकास होगा तथा हम व हमारी अगामी पीढ़ी खुशहाल रह सकेगी अन्यथा कि दशा मे पर्यावरण क्षरण एवं हमारा विनाश सुनिश्चित होगा।
सतत विकास से आप क्या समझते हैं
प्रति व्यक्ति आय से आप क्या समझते हैं
प्रति व्यक्ति आय से हम व्यक्ति को मिलने वाली आय का मापन करते हैं। यह आय की मात्रा होती है जो व्यक्ति द्वारा उत्पन्न की गई होती है या जिसे व्यक्ति अपनी सेवाओं के बदले प्राप्त करता है। प्रति व्यक्ति आय समाजिक और आर्थिक अधिकारों, समानता और आय विभाजन की मापदंडों का महत्वपूर्ण स्रोत है।
संतुलित विकास से आप क्या समझते हैं
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