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सतत विकास के आयाम: लघुउत्तरीय

 इकाई प्रथम

विकास अर्थ परिभाषा एवं आयाम

  1.    परिवर्तन क्या है? स्पष्ट कीजिये।

 विकास को सामान्यतः परिवर्तन का द्योतक माना जाता है। परिवर्तन सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार का होता है। नकारात्मक परिवर्तन जहाॅ अवनति का द्योतक है वहीं सकारात्मक या वांछित परिवर्तन ही विकास के रूप में मान्य होता है जो प्रकृति और मानव दोनोे को बेहतरी की ओर ले जाता हो।

अथवा

परिवर्तन एक प्रक्रिया है जिसमें स्थिति, स्थान, संगठन, स्वरूप, या अवस्था में बदलाव होता है। यह जीवन का स्वाभाविक तत्व है और सभी क्षेत्रों में घटित होता है, सहित राजनीति, समाज, आर्थिक, प्रौद्योगिकी, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, और पर्यावरणिक दृष्टिकोणों से।

परिवर्तन कई तरीकों से हो सकता है, जैसे समाजिक, प्राकृतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पॉलिटिकल, तकनीकी आदि। यह आवश्यक होता है क्योंकि समय के साथ जरूरतें और परिस्थितियां परिवर्तित होती हैं और मानव समुदाय को उन बदलते परिस्थितियों के साथ समायोजित होने की आवश्यकता होती है।

परिवर्तन के पीछे कई कारक हो सकते हैं, जैसे तकनीकी आविष्कार, आर्थिक नीतियाँ, सामाजिक आन्दोलन, संगठनात्मक प्रक्रियाएं, राजनीतिक नदी, सांस्कृतिक परिवर्तन आदि। परिवर्तन अक्सर विवादित हो सकता है और विभिन्न समाज और संगठनों के बीच मतभेद पैदा कर सकता है, लेकिन यह विकास और प्रगति की मूल शक्ति है।


    2.    विकास को समझाइये।

विकास के संबंध में जितने विद्वान हैं उतनी ही परिभाषायें भी दी गई हैं। कोई भी परिभाषा दूसरी परिभाषा से मिलती-जुलती नहीं है। विकास को सामान्यतः परिवर्तन का द्योतक माना जाता है। परिवर्तन सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार का होता है। नकारात्मक परिवर्तन जहाॅ अवनति का द्योतक है वहीं सकारात्मक या वांछित परिवर्तन ही विकास के रूप में मान्य होता है जो प्रकृति और मानव दोनोे को बेहतरी की ओर ले जाता हो। विकास और वृद्धि में भी अंतर है। ये समानार्थी नहीं हैं। वृद्धि का अर्थ है बढ़ना। हर प्रकार की वृद्धि विकास नहीं होती है। उदाहरण के लिए यदि किसी गांव में 5 वर्ष पूर्व शराबियों की संख्या 2 थी, जो आज बढ़कर 20 हो गई है। यहां पर वृद्धि तो हो रही है, किन्तु किसी भी गाॅव में शराबियों की संख्या का बढ़ना विकास नहीं माना जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि विकास में केवल संख्यातमक वृद्धि के बजाए गुणात्मक-सकरात्मक परिवर्तन भी होना आवश्यक है। सामान्यतः विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे नियोजित एवं सहभागी क्रियान्वयन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने विकास की जो परिभाषा प्रस्तुत की है, उसके अनुसार:विकास का तात्पर्य है सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक संरचना, संस्थाओं, सेवाओं की बढ़ती क्षमता जो संसाधनों का उपयोग इस प्रकार से कर सके ताकि जीवन स्तर में अनुकूल परिवर्तन आये”।
विकास के बारे में नीचे दी गई जानकारी से आपको और स्पष्टता होगी। 

1.विकास सकारात्मक वांछित परिवर्तन है।
2.विकास में स्थायित्व होता है।
3.विकास बहु-आयामी, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था की पुनर्रचना है।
4.विकास समस्त मानव जीवन की गुणवत्ता में सुधार की प्रक्रिया का नाम है।
5.विकास नियोजन का परिणाम है।
6.जीवन स्तर में गुणात्मक एवं अनुकूलन परिवर्तन


    3.    विकास और वृद्धि में अन्तर कीजिये।

विकास और वृद्धि दोनों ही प्रगति की प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इनमें अंतर है।

विकास एक व्यापक और स्थायी प्रक्रिया है जिसमें संगठित और स्वाभाविक रूप से समाज या संगठन के सामरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानसिक दृष्टिकोणों में परिवर्तन होता है। विकास स्थायी और सुगम होता है और समृद्धि, स्थायित्व, सामरिक संपन्नता, सामाजिक न्याय, और मानवीय कल्याण की प्राप्ति पर जोर देता है। यह सुधार के एक साधारण मानदंड के रूप में समझा जा सकता है और एक समग्र उन्नति की दिशा में आरंभिक और प्रगतिशील स्थिति का संकेत करता है।

वृद्धि, सामरिक या आर्थिक परिस्थितियों में बढ़ोतरी या बढ़त की एक संकेतिक प्रक्रिया है। इसमें उत्पादन, आय, निवेश, आर्थिक प्रगति आदि में वृद्धि होती है। वृद्धि अक्सर तार्किक और अधिकांश अंकों के आधार पर मापी जाती है और एक अवधारणात्मक प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है। यह अंकों, दरों, स्तरों और प्रदर्शन मापकों के माध्यम से नकारात्मक या सकारात्मक तरीके से मापा जा सकता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी गांव में 5 वर्ष पूर्व शराबियों की संख्या 2 थी, जो आज बढ़कर 20 हो गई है। यहां पर वृद्धि तो हो रही है, किन्तु किसी भी गाॅव में शराबियों की संख्या का बढ़ना विकास नहीं माना जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि विकास में केवल संख्यातमक वृद्धि के बजाए गुणात्मक-सकरात्मक परिवर्तन भी होना आवश्यक है। सामान्यतः विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे नियोजित एवं सहभागी क्रियान्वयन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

संक्षेप में कहें तो, विकास एक समृद्ध, स्थायी, सामरिक, सांस्कृतिक और मानसिक परिवर्तन की प्रक्रिया है, जबकि वृद्धि एक संकेतिक और अंकों पर आधारित बढ़ोतरी या वृद्धि की प्रक्रिया है।


    4.    ग्रीन हाउस इफैक्ट क्या है?

ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें पृथ्वी के वातावरण में गैसों की एक पर्यावरणीय प्रतिक्रिया के कारण गर्मी का संग्रह होता है।

यह प्रक्रिया इसलिए होती है क्योंकि धरती की वायुमंडलीय गैसों में मुख्य रूप से वायुमंडलीय ग्रीनहाउस गैसों (जैसे कि कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) के कारण इंफ्रारेड (IR) विकिरण धरती के परिसर में पांच निर्दिष्ट गैसों द्वारा पकड़ा जाता है। इस प्रक्रिया में गैस मानव गतिविधियों द्वारा उत्पन्न किए गए एक्सट्रा ग्रीनहाउस गैसों (जैसे कि नाइट्रस ऑक्साइड, फ्लोरोकार्बन, हालोकार्बन) के कारण बढ़ जाता है। यह प्रक्रिया इंफ्रारेड विकिरण के संचरण के कारण पृथ्वी पर वापस प्रतिबिंबित होती है और इसे गर्मी बनाने का कारण बनता है।

ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण, धरती पर औसत तापमान बढ़ जाता है, जिससे जलवायु परिवर्तन की जटिल समस्याएं उत्पन्न होती हैं। अत्यधिक ग्रीनहाउस गैसों के उत्पादन और उद्योगिक गतिविधियाँ इस प्रभाव को अधिकतम स्तर तक बढ़ा सकती हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन और उष्णकटिबंधीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।


5.   इको सिस्टम से आप क्या समझते हैं?

इकोसिस्टम या पारिस्थितिकीय प्रणाली संगठित एक समुदाय है जिसमें प्राणियों, पौधों, और अश्वास्त्रीय प्राणियों के साथ वातावरणीय तत्व और अपने साथी संघर्षी साथियों के बीच सम्बन्ध होते हैं। यह एक अविभाज्य इकाई होती है जहां ये सभी संघर्षी संबंध एक समानुपातिकता में संगठित होते हैं ताकि संतुलन और सहजता बनाए रखी जा सके। इकोसिस्टम प्रदूषण, पोषण, विपणन, और अन्य प्राकृतिक और मानवीय कारकों के प्रभाव को अवशोषित करता है और वातावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखने का अपना एक स्वाभाविक प्रणाली है।

इकोसिस्टम के भीतर विभिन्न प्राकृतिक तत्व, जैसे कि जल, वायु, मृदा, और जीवों के समुदाय में संघटित होते हैं और एक दूसरे के साथ संवाद करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य संतुलन, स्थिरता, और जीवनरक्षा का संरक्षण करना होता है। यहां आपस में जुड़े हुए प्राणियों और पर्यावरण के बीच संबंध और आपसी प्रभाव से साथी संघर्षी साथियों के संगठन का एक समूह होता है। इकोसिस्टम मानवीय कार्यक्रमों और उपयोगों के प्रभाव से प्रभावित हो सकता है और मानवीय गतिविधियों की सामरिक और आर्थिक गुणवत्ता पर भी प्रभाव डालता है।

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इकाई द्वितीय

सामाजिक सातत्यता की अवधारणा एवं सतत विकास लक्ष्यों में सामाजिक सातत्यता


1.    सतत कृषि से क्या समझते है?


11. सतत कृषि, विस्तार और प्रौद्योगिकी योजनाएँ:देश के चिन्हित जिलों में स्थायी रूप से क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता में वृद्धि के माध्यम से चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने, व्यक्तिगत खेत स्तर पर मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को बहाल करने और किसानों के बीच विश्वास को बहाल करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण  राज्य और केन्द्र प्रायोजित योजनायें निम्नाकित हैं-


1.राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाय), 

2.राज्य सूक्ष्म सिंचाई मिशन 

3.मुख्‍यमंत्री खेत तीर्थ योजना 

4.प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 

5.परंपरागत कृषि विकास योजना 

6.प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 

7.राष्ट्रीय कृषि विस्तार और प्रौद्योगिकी मिशन (एनएमएईटी) 

8.तेल बीज एवं तेल ताड़ राष्ट्रीय मिषन (एनएमओओपी)


सतत कृषि एक कृषि प्रणाली है जिसका मुख्य उद्देश्य भूमि, पानी, और पर्यावरण के संसाधनों का सही उपयोग करके दीर्घकालिक उत्पादकता सुनिश्चित करना होता है। यह प्रणाली खेती, पशुपालन, मत्स्यपालन और अन्य संबंधित क्षेत्रों में अपनाई जाती है।


सतत कृषि के मूल तत्व शामिल हो सकते हैं:

1. पोषण के लिए जल्दबाजी रोपण के बजाय धीरे-धीरे बागवानी की प्रक्रिया का पालन करना।

2. उपयुक्त खाद, जैविक खाद और सुगंधित खाद का उपयोग करना।

3. कीटनाशकों और कीट प्रबंधन के स्थान पर प्राकृतिक कीटनाशकों का प्रयोग करना।

4. बायो-डाइवर्सिटी को संजोए रखना और प्राकृतिक पर्यावरणीय संसाधनों का सुरक्षित रखना।

5. जल संसाधनों का सही उपयोग करना, सिंचाई प्रणालियों का उपयोग करके पानी की बचत करना।

6. अवशेषों का उपयोग करना, जैसे कि पशुओं के गोबर का उपयोग करके खेती में खाद का निर्माण करना।

7. प्रणाली उत्पादन के माध्यम से बिजली और ऊर्जा की बचत करना।

8. गर्भपाती पशुओं का संचालन करना और पशुओं के स्वास्थ्य का संरक्षण करना।


सतत कृषि में लक्षित किया जाता है कि विशेष ध्यान देकर उत्पादन कार्यक्रम को स्थायीत्वपूर्ण बनाया जाए ताकि संसाधनों का उचित उपयोग किया जा सके और भविष्य में उत्पादन वृद्धि के लिए नकारात्मक प्रभाव कम हो। इससे सतत कृषि पर्यावरणीय सुस्थिति को सुनिश्चित करने, जल संसाधनों की सुरक्षा करने, बायोडाइवर्सिटी की रक्षा करने और कृषि उत्पादों के गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद मिलती है।



2.    खाद्य सुरक्षा का क्या आशय है?

खाद्य सुरक्षा का आशय है ऐसी स्थिति जहां सभी लोगों को स्वस्थ्य, पोषणपूर्ण और पर्याप्त खाद्यान्न की उपलब्धता और पहुंच होती है। खाद्य सुरक्षा के माध्यम से समाज में भूखमरी और पोषणहीनता को दूर किया जाता है और सभी लोगों को स्वस्थ्य और उचित मात्रा में पोषणपूर्ण आहार प्राप्त होता है।


खाद्य सुरक्षा का मुख्य उद्देश्य है सुरक्षित, उपयुक्त और वाणिज्यिक खाद्य उत्पादन के माध्यम से लोगों के खाद्यान्न की आवश्यकताओं को पूरा करना। इसके लिए कृषि उत्पादन, प्रबंधन, वितरण, खाद्य सुरक्षा कानूनों का निर्माण और कार्यान्वयन, खाद्य संरक्षण, अनुसंधान और तकनीकी उन्नयन जैसे कई क्षेत्रों पर कार्य किया जाता है। खाद्य सुरक्षा नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों की खाद्यान्न की आवश्यकताओं का पूरा होना सुनिश्चित किया जाता है।


5. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन: देश के चिन्हित जिलों में स्थायी रूप से क्षेत्र विस्तार और चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए 2007-08 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत खेत स्तर पर मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को बहाल करना तथा किसानों के बीच विश्वास बहाल करने के लिए कृषि स्तर की अर्थव्यवस्था (यानी कृषि लाभ) को बढ़ाना है। मध्यप्रदेश शासन भी मिशन की मूल रणनीति के अनुरूप किसानों की क्षमता निर्माण के साथ-साथ उन्नत प्रौद्योगिकियों, अर्थात बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, मृदा संरक्षण, एकीकृत कीट प्रबंधन, कृषि मशीनरी और औजार, सिंचाई उपकरणों के संसाधन संरक्षण को बढ़ावा दे रही है।


6. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए):मध्यप्रदेश सरकार का खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता संरक्षण विभाग एनएफएसए-2013 के प्रावधानों के कार्यान्वयन में अग्रणी रहा है। एनएफएसए अधिनियम के तहत परिकल्पित सुधार के तहत:सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) उपकरण का प्रयोग” उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) का आॅटोमेषन केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता के साथ शुरू किया गया था। एफपीएस ऑटोमेशन का लक्ष्य लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) को अधिक कुशल, प्रभावी और पारदर्शी बनाना और सिस्टम में बढ़ती जवाबदेही लाना है।



3.    जीवन प्रत्याक्षा सूचकांक क्या है?

जीवन प्रत्याक्षा सूचकांक (Life Expectancy Index) एक महत्वपूर्ण सामाजिक सूचकांक है जो किसी देश या क्षेत्र में जनसंख्या की औसत उम्र को प्रदर्शित करता है। इस सूचकांक का मापन मुख्य रूप से जीवनकाल (लंबाई) के माध्यम से किया जाता है। जीवन प्रत्याक्षा सूचकांक द्वारा संकेतित किया जाता है कि वहां की जनसंख्या के अद्यतनित रूप से जीवित रहने की औसत उम्र क्या है।


जीवन प्रत्याक्षा सूचकांक मुख्य रूप से जनसंख्या के स्वास्थ्य और पोषण स्तर का प्रतिबिंब दर्शाता है। यह देश या क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण की सुविधाओं, शिक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक सुरक्षा और अन्य प्राथमिक आवश्यकताओं के स्तर का मापन करने में मदद करता है। जीवन प्रत्याक्षा सूचकांक की बढ़ती हुई मान्यता एक समृद्ध और स्वस्थ समाज के लक्षण के रूप में भी मानी जाती है।


यह सूचकांक देशों या क्षेत्रों के बीच तुलना करने, विकास की प्रगति को मापने और समाजिक नीतियों का निर्माण करने में भी उपयोगी होता है। इसके माध्यम से सरकारें और संगठनों को आवश्यक कदम उठाने और उनकी प्राथमिकताओं को सुनिश्चित करने का अवसर मिलता है।


4.    आयुष्मान योजना को स्पष्ट कीजिये।

आयुष्मान योजना, जिसे पूरा नाम प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana) है, एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजना है जिसका उद्देश्य गरीब और निचले आय वर्ग के लोगों को मुफ्त और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना है। यह भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही है और 23 सितंबर 2018 को शुरू हुई थी।


आयुष्मान योजना के तहत, पात्र गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को सामाजिक सुरक्षा कार्ड (Social Security Card) द्वारा आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) के अंतर्गत लाभ प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह योजना अस्पतालीय और चिकित्सा सेवाओं के लिए बीमा योजना प्रदान करती है, जिसमें निर्धारित बजट में उपचार का वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।


आयुष्मान योजना के तहत, लाभार्थी एक व्यक्तिगत पहचान पत्र (आधार कार्ड) के साथ चिकित्सा विभाग के निर्धारित अस्पतालों में उपचार प्राप्त कर सकते हैं। यह योजना विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं को कवर करती है, जिनमें सर्जरी, रोगों का इलाज, गर्भावस्था संबंधित सेवाएं, बाल चिकित्सा, नवजात शिशु की देखभाल, कैंसर के इलाज, दिमागी रोगों का इलाज, किडनी रोगों का इलाज और अन्य चिकित्सा सेवाएं शामिल हैं।


आयुष्मान योजना के अंतर्गत लाभार्थी व्यक्ति की आय के आधार पर चयनित होते हैं और उन्हें पहले से ही वार्ड निर्धारित किया जाता है। यह योजना भारत के गरीब और निचले आय वर्ग के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण संकल्प का हिस्सा है।


5.    ड्राॅप आउट से क्या आशय है?

ड्रॉपआउट (Dropout) शिक्षा क्षेत्र में एक शब्द है जिसका अर्थ होता है विद्यालय या स्कूल में पठन अध्ययन करते दौरान छात्र या छात्राओं की शैक्षिक पाठशाला से प्रायः बिचड़ जाना या पढ़ाई छोड़ देना। इसे अनियमित उपस्थिति, स्कूल से छुट्टी लेने, आराम करने, मज़बूती के अभाव, परिवारी समस्याएं, आर्थिक कठिनाइयां, शैक्षणिक निराशा, या अन्य कारणों के कारण हो सकता है।


ड्रॉपआउट आमतौर पर शिक्षा प्राप्त करने की प्रक्रिया के मध्य में ब्रेक या अवरोध का कारण बनता है और इसके परिणामस्वरूप छात्र शिक्षा का अवसर खो देते हैं और उन्हें आगे की शैक्षिक पढ़ाई और सामाजिक विकास का लाभ नहीं मिलता है। ड्रॉपआउट के कारण, छात्रों की पढ़ाई, उनकी करियर और जीवन की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए, शिक्षा निरंतरता, स्थिरता और छात्रों के अवसरों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण ध्यान रखना आवश्यक है।

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इकाई तृतीय

आर्थिक सातत्यता

1. कौशल विकास से आप क्या समझते हैं?



कौशल विकास से हम व्यक्ति के कौशल, यानी निपुणता या माहिरी की विकास प्रक्रिया को समझते हैं। यह व्यक्ति के नौकरी, करियर, व्यापारिक या व्यक्तिगत मामलों में सफलता प्राप्त करने के लिए उनके दक्षता स्तर को बढ़ाने और विकसित करने का एक प्रमुख तत्व है।

कौशल विकास का महत्व यह है कि इससे व्यक्ति के नौकरी की अवसरों में सुधार होता है, व्यापार में सफलता मिलती है और सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है। इसके द्वारा व्यक्ति नई कौशलों का अध्ययन कर सकता है, अपने मौजूदा कौशलों को सुधार सकता है, नए अनुभवों का अनुभव कर सकता है और अपनी प्रदर्शन क्षमता में सुधार कर सकता है। कौशल विकास व्यक्ति की स्वायत्तता, स्वयंसेवा और आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उन्हें स्वतंत्रता के साथ अपने लक्ष्यों की प्राप्ति करने में मदद करता है।

कौशल विकास के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी प्राप्त कर सकता है, व्यापारिक प्रयासों में सफलता प्राप्त कर सकता है, सामाजिक नेटवर्क का निर्माण कर सकता है और अपनी व्यक्तिगत विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।


2. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट क्या है?
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट एक प्रौद्योगिकी और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण परियोजना है जिसका उद्देश्य शहरी जीवन को सुगम, स्थायी, और उच्च गुणवत्ता वाला बनाना है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से शहरी क्षेत्रों में नवीनतम तकनीकी और डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके जनसंचार, प्रबंधन, उपयोग संसाधनों का सुगम एवं सहज उपयोग, ऊर्जा और पर्यावरण के प्रबंधन, सुरक्षा, वित्तीय प्रबंधन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने का प्रयास किया जाता है।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट विभिन्न तकनीकी उपकरणों, नेटवर्कों, संगठनात्मक प्रणालियों और संचार प्रोटोकॉल का उपयोग करते हुए शहरी जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। इसके द्वारा विभिन्न गतिविधियों को स्वचालित करने, डेटा को संग्रहित करने, जनसंचार को सुगम बनाने, सेवाओं को प्रभावी बनाने, संपत्ति के व्यवस्थापन में सुधार करने, प्रदूषण कम करने, ऊर्जा की बचत करने, सुरक्षा को सुधारने आदि के उद्देश्य से कई परियोजनाएं आयोजित की जाती हैं।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में अलग-अलग क्षेत्रों जैसे जल, विद्युत, परिवहन, स्वच्छता, सुरक्षा, व्यापार, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए उपयोगी और सुरक्षित समाधानों की विकास प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में सामान्य जीवन को सुगम और आरामदायक बनाने, पर्यावरण सुरक्षित और सामरिक ढांचे का निर्माण किया जाता है जिससे नागरिकों का जीवन आसान बनता है और शहर का विकास सुगमता से हो सकता है।



3. समावेशी विकास को स्पष्ट कीजिये।
समावेशी विकास एक प्रगतिशील विकास की धारणा है जिसमें समाज, आर्थिक विकास और पर्यावरण के संपूर्ण पहलुओं को सम्मिलित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य समृद्धि, सामरिक न्याय, सामाजिक समावेश और पर्यावरणीय सतत्ता को सुनिश्चित करना है।

समावेशी विकास के तहत, सभी समाज के विभिन्न वर्गों, समुदायों और अवधारणाओं को सम्मिलित किया जाता है और सभी को समान अवसरों और सुविधाओं का लाभ प्राप्त करने का मौका मिलता है। यह स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक विकास को सुनिश्चित करने के लिए उचित नीतियों, कार्यक्रमों और प्रक्रियाओं का उपयोग करता है।

समावेशी विकास से लक्षित जनसंख्या के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं को समझने, उन्हें गतिशील बनाने, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार और सशक्तिकरण के लिए उपाय ढूंढ़ने का प्रयास किया जाता है। समावेशी विकास के माध्यम से, समाज में असमानता और भेद

भाव को कम करने का प्रयास किया जाता है और सभी को समान रूप से सम्मानित और संप्रेषित किया जाता है।


   4. मध्य प्रदेश में उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों को रेखांकित कीजिये।
मध्य प्रदेश में कई प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन की गतिविधियाँ होती हैं। यहाँ कुछ मुख्य क्षेत्रों को रेखांकित किया गया है:

1. कृषि एवं संगठित क्षेत्र: मध्य प्रदेश एक प्रमुख कृषि प्रदेश है और यहाँ पर्याप्त मात्रा में अनाज, फल, सब्जियाँ, दालहनि, तंबाकू, मक्का, उद्यानिक फसलें, गेंहू और चावल जैसी उत्पादन होता है।

2. खनन और खनिज उद्योग: मध्य प्रदेश में विभिन्न प्रकार के खनिज संसाधन मौजूद हैं जैसे कि ऊर्जा साधन (कोयला, बिजली, विद्युत स्थानक), धातु संपदा (बॉक्साइट, बाउक्साइट, सीमेंट, चाँदी, जस्ता, कोबाल्ट), अन्य खनिज संपदा (लाइमस्टोन, बाजरी पत्थर, अक्टॉबर, मर्मर)।

3. औद्योगिक क्षेत्र: मध्य प्रदेश में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्र हैं जैसे कि सिमेंट, स्टील, रंग, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा, विद्युत उपकरण, फार्मा, प्लास्टिक, विनिर्माण आदि।

4. पर्यटन और सांस्कृतिक विकास: मध्य प्रदेश

 पर्यटन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है और यहाँ प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक स्थल, धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर, बाजार और हॉटस्पॉट्स जैसी विभिन्न पर्यटन स्थल हैं।

5. ग्रामीण उद्योग एवं हाथकरघा: मध्य प्रदेश में हाथकरघा उद्योग, खादी उद्योग और ग्रामीण उद्यमिता की प्रमुख गतिविधियाँ हैं। यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में वस्त्रों, खादी उत्पादों, चटाई, जूट, गुदसे और खादी उत्पादों का उत्पादन किया जाता है।

3.4.6 परिणामों के मापन के सूचकांक

1. खरीफ फसली क्षेत्र में वृद्धि (लाख हेक्टेयर)
2. रबी फसल क्षेत्र में वृद्धि (लाख हेक्टेयर)
3. ग्रीष्मकालीन फसली क्षेत्र में वृद्धि (लाख हेक्टेयर )
4. कुल बीज उत्पादन कार्यक्रम में वृद्धि (क्विंटल)
5. कुल प्रमाणित बीज वितरण में वृद्धि (क्विंटल)
6. बीज प्रतिस्थापन दर में वृद्धि 
7. जल पुनर्भरण संरचनाओं में वृद्धि (संख्या)
8. उर्वरकों के शेष उपयोग में वृद्धि (कि.ग्रा.हेक्टेयर)
9. एन.पी.क.े रिज-फरो सिस्टम को बढ़ावा देने में वृद्धि (लाख हेक्टेयर)
10. उगाए गए क्यारी रोपण को बढ़ावा देने में वृद्धि (लाख हेक्टेयर)
11. पशुधन क्षेत्र दुग्ध उत्पादन में वृद्धि (मिलियन टन में)
12. अंडा उत्पादन में वृद्धि (मिलियन में)
13. मांस उत्पादन में वृद्धि (मीट्रिक टन में)


यह सिर्फ कुछ प्रमुख क्षेत्रों की सूची है और मध्य प्रदेश में अन्य उत्पादक क्षेत्रों की भी गतिविधियाँ होती हैं। यहाँ केवल उत्पादन क्षेत्रों के उदाहरण दिए गए हैं, जो राज्य की आर्थिक विविधता का हिस्सा हैं।


5. मध्य प्रदेश में वनोपज की उपलब्धता एवं विपणन नीति पर प्रकाश डालिये।

मध्य प्रदेश एक वनस्पति धनी राज्य है और वनोपज (वन से प्राप्त होने वाले उत्पाद) उपलब्धता और विपणन नीति राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है। यहाँ नीचे मध्य प्रदेश में वनोपज की उपलब्धता और विपणन नीति के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तत्वों को विस्तार से समझाया गया है:

1. वन संपदा उपलब्धता: मध्य प्रदेश में विभिन्न प्रकार के वन स्थल हैं जो वनोपज उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। यहाँ वनों में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों, औषधीय पौधों, लकड़ी, ताल और खाद्य वनस्पतियों की उपलब्धता होती है।

2. वनोपज उत्पादों की विपणन नीति: मध्य प्रदेश सरकार वनोपज उत्पादों के विपणन को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न नीतियों और योजनाओं को अपनाती है। इसके तहत, कृषि उपज, औषधीय और औद्योगिक वनोपज, गुदसा, खादी और अन्य उत्पादों के लिए उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाता है। विभिन्न बाजार विपणन योजनाओं, संगठनों और वित्तीय समर्थन के माध्यम से वनोपज उत्पादों की प्रदर्शनी, मार्केटिंग, उद्योग मेले और निर्यात को बढ़ावा दिया जाता है।

3. स्थानीय उद्यमिता की संरचना: मध्य प्रदेश में स्थानीय स्तर पर उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने विभिन्न योजनाएं शुरू की हैं। इन योजनाओं के तहत, स्थानीय उद्यमिता को वन संपदा के साथ संबंधित व्यापारिक, वित्तीय और प्रबंधन समर्थन प्रदान किया जाता है। यह स्थानीय उद्यमिता को उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन की सुविधा प्रदान करता है।

मध्य प्रदेश में वनोपज की उपलब्धता और विपणन नीति के माध्यम से, राज्य सरकार प्राकृतिक संसाधनों के संचयन, उपयोग और विपणन को संचालित करती है और स्थानीय उद्यमिता को प्रोत्साहित करती है। इसके अलावा, यह नवाचार, रोजगार सृजन, आर्थिक विकास और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


6. मध्य प्रदेश में लोक सेवा गांरटी योजनाओं के अंतर्गत किन्हें रखा गया है?
मध्य प्रदेश में लोक सेवा गारंटी योजनाओं के अंतर्गत निम्नलिखित क्षेत्रों को शामिल किया गया है:

1. लोक सेवा गारंटी अधिनियम (Public Service Guarantee Act): इस योजना के अंतर्गत, नागरिकों को निश्चित समयावधि के भीतर निर्दिष्ट सेवाओं की प्रदान की जाती है। इसमें शामिल सेवाओं में विभिन्न सरकारी नौकरी, पासपोर्ट बनाने की सेवा, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र आदि शामिल हैं।

2. राज्य स्तरीय स्वास्थ्य योजनाएं: मध्य प्रदेश में विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के तहत गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को मुफ्त चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इसमें आयुष्मान भारत योजना, मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना, बाल ह्रदय रोग निरीक्षण योजना, बाल संरक्षण योजना, नशा मुक्ति योजना आदि शामिल हैं।

3. शिक्षा योजनाएं: मध्य प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे आने वाले छात्रों को निःशुल्क शिक्षा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। इसमें छात्रवृत्ति योजना, मुख्यमंत्री निरंतर शिक्षा सुधार योजना, मुख्यमंत्री आत्मनिर्भर शिक्षा योजना, निजी विद्यालयों का वाउचर योजना, मुक्त आवासीय शिक्षा योजना आदि शामिल हैं।

4. किसान कल्याण योजनाएं: मध्य प्रदेश में किसानों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं। इसमें किसान कर्ज माफी योजना, किसान बीमा योजना, मुख्यमंत्री भूमि स्वामित्व योजना, मुख्यमंत्री सौर कृषि पंप योजना, मुख्यमंत्री कृषि उपाज ऋण माॅफी योजना, किसानों को मशरूम उत्पादन योजना आदि शामिल हैं।

इन योजनाओं के अंतर्गत मध्य प्रदेश सरकार ने गरीब, वंचित वर्ग, किसान और अन्य समाजिक गुरुवंशों की सेवा में सुधार करने का प्रयास किया है। यह योजनाएं सार्वजनिक सेवाओं को सुगम और उपयोगी बनाने के लिए निर्माण की गई हैं।



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इकाई चतुर्थ
पर्यावरणीय सातत्यता


 1.    जल प्रदूषण के प्रमुख कारण लिखिये।

जल प्रदूषण के प्रमुख कारणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

1. औद्योगिक अपशिष्ट और निकासी: औद्योगिक क्षेत्रों से उत्पन्न विभिन्न पदार्थों और विषाणुओं के निकासी जल प्रदूषण का प्रमुख कारण है। यह निकासी धातुओं, एसिड, लालसितापन, न्यूक्लियर अपशिष्ट, उर्वरक, उद्योगिक तत्व, रंग, जहरीले तत्व और अन्य केमिकल सामग्री को शामिल कर सकती है।

2. कृषि और उपयोग जल का: कृषि उपयोग, सिंचाई, उद्यानों और नगरीय क्षेत्रों में प्रयोग होने वाले कीटनाशक, उर्वरक, पेशेवर स्थली, उद्यानों से निकलने वाले विषाणुओं और औद्योगिक उत्पादों के प्रयोग से भी जल प्रदूषण होता है। उच्च मात्रा में कीटनाशक, उर्वरक और खाद्य पदार्थों का प्रयोग जलमार्ग की स्थिति को गंभीरता से प्रभावित कर सकता है।

3. नगरीय निकासी: नगरीय क्षेत्रों से निकलने वाले स्वच्छता और नगर विनिर्माण के निकासी जल प्रदूषण का मुख्य कारण हैं। इसमें नगरीय नदियों से निकलने वाले विषाणुओं, जहरीले तत्वों, औषधियों, उच्च स्तर पर निकलने वाले नाइट्रेट, फॉस्फेट और अन्य उपादानों का समावेश हो सकता है।

4. जलकर्मियों के अनुप्रयोग: जलकर्मियों द्वारा अयोग्य ढंग से प्रयोग होने वाले जल संरचनाओं, जैसे कि नहर, तालाब, नल, सीवर, सफाई तंत्र, प्राकृतिक झीलें, जलाशयों का अनुप्रयोग भी जल प्रदूषण का कारण बन सकता है। निर्माण, संचालन, रखरखाव और तत्परता की कमी से ये संरचनाएं जल प्रदूषण का स्रोत बन सकती हैं।

5. प्राकृतिक आपदाएं: प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जल प्रदूषण हो सकता है, जैसे कि बाढ़, जल प्रलय, जलवायु परिवर्तन, जल उथल-पुथल, भूस्खलन आदि। इन आपदाओं के कारण उच्च मात्रा में मलद्वारा प्रवाहित होने वाला जल प्रदूषण का स्रोत बन सकता है।

ये कुछ मुख्य कारण हैं, जो जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। जल प्रदूषण का संबंधित कारण स्थानीय परिस्थितियों, उपयोग और प्रबंधन के साथ विभिन्न हो सकते हैं और इसके निरामय उपाय को समझने के लिए वैज्ञानिक और नीतिगत अध्ययन की आवश्यकता होती है।


 2.    प्रदूषण मुक्त ऊर्जा से क्या आशय है? इसकी प्राप्ति के लिये क्या उपाय किये जा रहे हैं?
प्रदूषण मुक्त ऊर्जा से आशय है कि उपयोग में आने वाली ऊर्जा को ऐसे स्रोतों से प्राप्त किया जाए जो पर्यावरण के लिए क्षतिपूर्ण प्रदूषण नहीं करते हैं या कम प्रदूषण करते हैं। यह ऊर्जा स्रोत पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य और समुदाय के लाभों को हानि पहुंचाए बिना उपयोगिता प्रदान करती है।

प्रदूषण मुक्त ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए कई उपाय अपनाए जा रहे हैं। यहां कुछ मुख्य उपायों का उल्लेख किया गया है:

1. नवीनतम ऊर्जा तकनीक: प्रदूषण मुक्त ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए नवीनतम ऊर्जा तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हाइड्रो पावर, जैव ईंधन, जीवाणु ऊर्जा, ग्रीन फ्यूल आदि प्रदूषण मुक्त ऊर्जा के उच्च पोटेंशियल उपाय हैं।

2. ऊर्जा संगठन: ऊर्जा संगठनों द्वारा प्रदूषण मुक्त ऊर्जा के प्रयासों का समर्थन किया जा रहा है। सरकारी और गैर सरकारी संगठन, विशेषज्ञ समूह और गैर सरकारी संगठनों द्वारा संगठित कार्रवाई और प्रोजेक्टों का निर्माण किया जा रहा है।

3. नीतिगत प्रोत्साहन: सरकारें और अन्य संगठनें प्रदूषण मुक्त ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत प्रोत्साहन उपाय अपना रही हैं। इसमें ऊर्जा उत्पादन, ऊर्जा संगठनों की संरचना, उद्योग नीतियों और वित्तीय योजनाओं को सुधारकर ऊर्जा परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना शामिल है।

4. जनजागरूकता और शिक्षा: जनजागरूकता को बढ़ाने और ऊर्जा संबंधित शिक्षा को प्रचारित करके लोगों को प्रदूषण मुक्त ऊर्जा के महत्व को समझाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

5. प्रदूषण कम करने की नीतियां: निर्माण, वाणिज्य, वित्त, परिवहन, कृषि आदि क्षेत्रों में प्रदूषण को कम करने के लिए नीतियां बनाई जा रही हैं। उदाहरण के लिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नवीनतम विकासों को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां और ऊर्जा उत्पादन, वितरण, उपयोग, और उपयोगिता में प्रदूषण को न्यूनतम करने के लिए कठिनाईयों को हल करने की नीतियां शामिल हैं।

6. ऊर्जा संगठनों के प्रदूषण नियंत्रण: प्रदूषण के कारणों को समझने और इसके नियंत्रण के लिए ऊर्जा संगठनों को निर्देशित किया जा रहा है। उच्च प्रदूषण उत्पादन करने वाले स्रोतों को पहचानने, प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का उपयोग करने, और प्रदूषण नियंत्रण उपायों की अमलीभूतता को मापने के लिए तकनीकी उपाय अपनाए जा रहे हैं।

ये उपाय प्रदूषण मुक्त ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए अभियांत्रिकी, नीति, जनसंचार, शिक्षा, और सहयोग के माध्यम से कार्यान्वित किए जा रहे हैं। इन उपायों का उचित और संगठित अमल अधिक प्रदूषण मुक्त ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण है।


 3.    मध्य प्रदेश में पर्यावरणीय स्थिति पर एक समीक्षात्मक आलेख लिखिये।

मध्य प्रदेश में पर्यावरणीय स्थिति: एक समीक्षात्मक आलेख

मध्य प्रदेश, भारत का मध्यवर्ती राज्य, प्राकृतिक सौंदर्य, वनस्पति समृद्धि और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि, इस राज्य में अन्यायपूर्ण उपयोग, जल प्रदूषण, जंगलों का अत्यधिक विपणन और पर्यावरणीय बदलावों के कारण बदलती पर्यावरणीय स्थिति के मुद्दों से जूझ रहा है। इस आलेख में, हम मध्य प्रदेश की पर्यावरणीय स्थिति का समीक्षात्मक विश्लेषण करेंगे और इससे संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों को परिदृश्य देंगे।

1. जल प्रदूषण: मध्य प्रदेश में जल प्रदूषण मुख्य चुनौती है। नगरीय क्षेत्रों और उद्योगिक क्षेत्रों से आने वाले निकासी पानी, कृषि के लिए उपयोग होने वाला कीटनाशक और उर्वरक, और जल स्रोतों की मांग के कारण जल की गुणवत्ता पर दबाव पड़ रहा है। यह प्रदूषण जल प्रदूषण स्रोतों जैसे नदियों और झीलों के लिए भी एक मुख्य चिंता का कारण है।

2. जंगलों का विपणन: मध्य प्रदेश वनस्पति समृद्ध राज्य होने के बावजूद, जंगलों का अत्यधिक विपणन एक बड़ी समस्या है। अवैध वनों कटाई, वन्य जीवों के अवैध व्यापार, वन्यजीव तस्करी, और प्राकृतिक वनस्पति की हानि के कारण वन संसाधनों की खतरे में पड़ाव है। इससे न केवल वन्य जीवों के लिए संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है, बल्कि यह भूमि एकीकरण, पानी की संचयन और मिट्टी की उत्पादकता पर भी असर डालता है।

3. वातावरणीय परिवर्तन: मध्य प्रदेश क्षेत्रफल के हिसाब से विविधताओं से भरा हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप वातावरणीय परिवर्तन के प्रभाव अनुभव हो रहे हैं। इसके तहत वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, जल संकट, जलवायु बदलाव, और जैव विविधता के अनुपात में परिवर्तन शामिल हैं। ये परिवर्तन जीवनीय विविधता, कृषि उत्पादन, और लोगों के जीवन पर सीधे प्रभाव डालते हैं।

मध्य प्रदेश में पर्यावरणीय स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। यह समाधान शामिल करते हैं:

1. पानी के संचयन और प्रबंधन: जल संरचनाओं की निर्माण, जल संचयन, और जल संवर्धन के लिए योजनाएं विकसित की जा रही हैं।

2. वन संरक्षण: अवैध वनों कटाई का निरोध, वन्यजीव संरक्षण, और वन्यजीव तस्करी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है।

3. जल प्रदूषण का नियंत्रण: नगरीय और औद्योगिक क्षेत्रों में जल प्रदूषण को कम करने के लिए उपाय अपनाए जा रहे हैं, जैसे कि एकीकृत निगरानी, जल पायपाइप नेटवर्क का निर्माण, और जल प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का उपयोग।

4. पर्यावरणीय शिक्षा और जागरूकता: जनता को पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति जागरूक करने के लिए शिक्षा और संचार के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

5. वनों का पुनर्जीवित करना: वनों की पुनर्जीवित करने और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण के अभियान और वन संरचना के प्रोत्साहन की जा रही है।

6. जैव ऊर्जा: वन्य ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करके जैव ऊर्जा के विकास को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह साफ ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रदूषण कम करने में मदद करेगा।

मध्य प्रदेश सरकार और संबद्ध संगठनों द्वारा इन पहलों का प्रबंधन किया जा रहा है ताकि पर्यावरणीय स्थिति में सुधार हो सके और साथ ही साथ संतुलित और स्थायी विकास सुनिश्चित किया जा सके। यह स्थानीय जनता, सरकारी अधिकारियों, संगठनों, और सभी नागरिकों की सहभागिता को आवश्यकता रखता है ताकि हम संयुक्त बाल के साथ पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर सकें।


 4.    प्रदेश सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं संपोषण के लिये चलायी जा रही विविध योजनाओं के प्रभाव का विश्लेषण कीजिये।

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही विविध पर्यावरण संरक्षण और संपोषण योजनाओं का प्रभाव व्यापक है। ये योजनाएं उच्च मानकों के अनुसार वन्यजीव संरक्षण, जल संरचना, जल संचयन, बाढ़ प्रबंधन, जैव ऊर्जा विकास, जल प्रदूषण नियंत्रण, पारिस्थितिकी संरक्षण, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, और पर्यावरणीय शिक्षा पर केंद्रित हैं।

यहां कुछ प्रमुख योजनाओं का विश्लेषण है:

1. वन्यजीव संरक्षण: मध्य प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें वन्यजीव अभयारण्य, बाघ अभयारण्य, गौर संरक्षण, तेंदुआ संरक्षण, और अन्य प्रदेश के मुख्य वन्यजीवों के लिए संरचनाएं और सुरक्षा के कार्य शामिल हैं। इन योजनाओं के प्रभाव से वन्यजीव संरक्षण में सुधार हुआ है और प्रदेश की वन्यजीव संपदा को सुरक्षित रखने का काम हो रहा है।

2. जल संरचना और जल संचयन: जल संरचना और जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें झीलों का पुनर्जीवित करना, नहरों का निर्माण, तालाब विकास, जल संचयन के लिए तालाबों का बनावटीकरण, और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन के लिए जल संचयन योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं के प्रभाव से जल संरचना एवं संचयन में सुधार हुआ है और जल संपदा का उपयोग बेहतर ढंग से हो रहा है।

3. पारिस्थितिकी संरक्षण: प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही पारिस्थितिकी संरक्षण योजनाएं प्रदेश की मानवीय और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें भूजल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण, वायु प्रदूषण नियंत्रण, प्लास्टिक प्रबंधन, बाढ़ प्रबंधन, और पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं के प्रभाव से प्रदेश की पारिस्थितिकी स्थिति में सुधार हुआ है और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हो रही है।

4. जैव ऊर्जा विकास: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही जैव ऊर्जा विकास योजनाएं जल, वायु, और बायोगैस के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हैं। इनमें गौवंश प्रबंधन, बायोगैस प्रोजेक्ट, सौर ऊर्जा विकास, जल संचयन के लिए सूखे के बागवानी के तत्वों का उपयोग, और विज्ञान प्रसार के माध्यम से जैव ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन योजनाओं के प्रभाव से जैव ऊर्जा के प्रयोग में वृद्धि हुई है और ऊर्जा स्वतंत्रता की स्थिति में सुधार हुआ है।

5. औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण: प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण योजनाएं औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण को नियंत्रित करने और प्रदूषण के प्रभावों को कम करने के लिए हैं। इनमें वायु प्रदूषण नियंत्रण, जल प्रदूषण नियंत्रण, ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण, और कारख़ाने में प्रदूषण नियंत्रण शामिल हैं। इन योजनाओं के प्रभाव से प्रदेश में औद्योगिक प्रदूषण कम हुआ है और स्वस्थ माहौल का निर्माण हो रहा है।

प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का प्रभाव स्थानीय स्तर पर विस्तार से महसूस हो रहा है। ये योजनाएं प्रदेश की पर्यावरणीय स्थिति को सुधारने, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करने, और स्थायी विकास की दिशा में मदद करने का काम कर रही हैं। हालांकि, उनके सफल प्रभाव को सुनिश्चित करने के लिए संगठन, संगठनात्मक योजनाएं, तकनीकी निरीक्षण, और जनसंपर्क को मजबूत करने की आवश्यकता है।


 5.    स्वच्छ भारत अभियान में मध्य प्रदेश शासन के योगदान को स्पष्ट कीजिये।

मध्य प्रदेश शासन ने स्वच्छ भारत अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह अभियान भारत सरकार की पहल है जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को स्वच्छ और स्वस्थ बनाना है। मध्य प्रदेश सरकार ने अभियान के लिए विभिन्न पहलुओं पर काम किया है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

1. शौचालय निर्माण: मध्य प्रदेश सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों के लिए मुफ्त शौचालय निर्माण के प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाए हैं। इससे स्वच्छता की स्थिति में सुधार हुआ है और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

2. जनसंख्या स्वास्थ्य शिविर: मध्य प्रदेश सरकार ने जनसंख्या स्वास्थ्य शिविर की योजना शुरू की है, जिसमें निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इसके माध्यम से लोगों को जनसंख्या परिचर्चा, गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता, मातृत्व स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, और एचआईवी/एड्स जागरूकता की सेवाएं मिलती हैं।

3. खुले म

ें शौच मुक्त गांव: मध्य प्रदेश सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच को खत्म करने के लिए पहल की है। इसके लिए निःशुल्क शौचालय निर्माण, स्वच्छता के प्रति जागरूकता, और समुदाय की सहभागिता को बढ़ावा दिया जा रहा है।

4. ग्रामीण स्वच्छता संगठन: मध्य प्रदेश सरकार ने ग्रामीण स्वच्छता संगठन (ग्राम स्वच्छता विकास समिति) की स्थापना की है। ये संगठन गांवों में स्वच्छता को बढ़ाने के लिए जनसंगठन, जागरूकता, और कार्यक्रमों को संचालित करते हैं।

5. नदी स्वच्छता: मध्य प्रदेश सरकार ने नदियों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया है। नदी धारणा के लिए जल संरक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और नदीघाटों की सफाई को प्राथमिकता दी जा रही है।

इन योजनाओं के माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उच्च स्तर पर कार्य कर रही है। इन योजनाओं का प्रभाव स्थानीय स्तर पर महसूस ह

ो रहा है और लोगों की स्वच्छता और पर्यावरण संबंधित जागरूकता में सुधार दिख रहा है। इसके साथ ही, ये योजनाएं लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करके उनकी जीवन गुणवत्ता को भी सुधार रही हैं।


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इकाई पंचम
लक्ष्यों हेतु साझेदारी (लक्ष्य-17)

1.स्वयंसेवी संगठनों से क्या समझते हैं?

स्वयंसेवी संगठनों से हमारे दिमाग में एक समुदाय की भावना और स्वयंसेवा के आदान-प्रदान की योजना आती है। ये संगठन आम तौर पर स्थानीय स्तर पर स्थापित होते हैं और स्थानीय समुदाय के लोगों द्वारा संचालित होते हैं। स्वयंसेवी संगठनों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक या किसी अन्य क्षेत्र में समाज की सेवा करना होता है। ये संगठन विभिन्न कार्यों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता आदि के क्षेत्र में कार्य कर सकते हैं। इन संगठनों के सदस्य अपने समय, धन, और प्रतिभा का संचय करके समुदाय की सेवा करते हैं और सामाजिक उत्पादन को सुधारने में मदद करते हैं। स्वयंसेवी संगठन एक समरस और सशक्त समुदाय की रचना करने का माध्यम भी होते हैं जहां लोग आपस में मिलकर समाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का सामरिक महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है?

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) एक आंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, सहयोगी विकास, मानवाधिकारों की संरक्षा, और विश्व स्तर पर सामरिक समस्याओं का समाधान करना है। यह 1945 में स्थापित किया गया था और वर्तमान में उसमें 193 सदस्य देश शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ का संगठनात्मक संरचना पांच मुख्य स्तंभों पर आधारित है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र महासभा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र प्रशासनिक संरचना, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद, और संयुक्त राष्ट्र महासचिवालय शामिल हैं। इन संरचनाओं के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र विभिन्न क्षेत्रों में अपने कार्यों को समायोजित करता है और सदस्य देशों के बीच सहयोग और समझौते की व्यवस्था को संचालित करता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, विश्व वाणिज्य संगठन,और कई अन्य संगठनों के साथ सहयोग करता है। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित है, लेकिन कई अन्य संयुक्त राष्ट्र संघ कार्यालय भी विभिन्न देशों में स्थापित हैं।

3. लोक कल्याणकारी राज्य किसे कहते हैं?

लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) एक ऐसा राज्य होता है जिसकी मुख्य प्राथमिकता नागरिकों के कल्याण, सुरक्षा, और सामरिकता की सुनिश्चितता होती है। इस राज्य का उद्देश्य न केवल अर्थव्यवस्था के संतुलन को बनाए रखना होता है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, निःशक्तता सहायता, न्यायिक सुविधाओं, आवास, और अन्य महत्वपूर्ण सेवाओं के आदान-प्रदान का भी प्रबन्ध करता है।

लोक कल्याणकारी राज्य के तहत, सरकार उपयुक्त कल्याणकारी योजनाओं, कानूनों, नियमों, और प्रोत्साहनों के माध्यम से नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा को सुनिश्चित करती है। इसमें आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक सुविधाएं शामिल होती हैं जो समृद्धि, समानता, और सामाजिक अवसरों की सुविधा को बढ़ाने का प्रयास करती हैं।

लोक कल्याणकारी राज्य की सिद्धांतों में सामाजिक न्याय, समानता, और सामाजिक सहायता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसका मकसद अर्थव्यवस्था के संतुलन के साथ-साथ समाज की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार करना होता है और गरीबी, असमानता, बेरोजगारी, रोग, बालिका श्रम, निःशक्तता, वृद्धावस्था, और अन्य समस्याओं का समाधान करना होता है। यह राज्य सरकार द्वारा सामाजिक कल्याण, न्याय, और सुरक्षा के आदान-प्रदान के माध्यम से अपने नागरिकों की जीवन गुणवत्ता को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।


4. जवाबदेह प्रशासन से क्या आशय है?

जवाबदेह प्रशासन (Accountable Governance) से आशय होता है कि सरकारी और शासनिक संस्थानों की प्रशासनिक क्रियाएं और निर्णयों को संवेदनशीलता, पालनशीलता, और प्रतिबद्धता के साथ संचालित किया जाए। इसका मतलब होता है कि नेताओं और अधिकारियों को अपने कार्यों और निर्णयों के लिए जवाबदेही लेनी चाहिए और जनता के सामान्य हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करना चाहिए।

जवाबदेह प्रशासन की मुख्य उद्देश्य होता है सत्यप्रियता, पारदर्शिता, संपादकीयता, न्यायनिष्ठा, और जनहित के मानकों के प्रति प्रतिबद्धता का सुनिश्चय करना। जवाबदेह प्रशासन के माध्यम से सरकारी नेताओं और अधिकारियों के प्रदर्शन को मापने, मूल्यांकन करने, और जनता को उच्चतम स्तर की सेवा प्रदान करने के लिए विभिन्न मापकों और मानकों का उपयोग किया जाता है।

जवाबदेह प्रशासन के माध्यम से सरकारी संगठनों को सत्यप्रिय और पारदर्शी जानकारी प्रदान करने, निर्णयों की बाध्यता और निष्पादन के लिए उच्चतम स्तर की जवाबदेही को सुनिश्चित करने, और जनहित की प्राथमिकता को समझकर कार्य करने का प्रयास किया जाता है। इसके अंतर्गत सरकारी नेताओं और अधिकारियों को जनता के सामर्थ्य, आपातकालीन जवाबदेही, और न्यायाधीशीता के लिए जवाबदेह बनाया जाता है।


5. निर्मल ग्राम से आप क्या समझते हैं?

निर्मल ग्राम एक प्रशासनिक और सामाजिक पहल है जो स्वच्छता, स्वच्छ जल, और स्वच्छता से संबंधित ग्रामीण क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य रखती है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य होता है सभी ग्रामीण क्षेत्रों को निश्चित मानकों के अनुसार स्वच्छता के क्षेत्र में विकसित करना, स्वच्छ जल के संसाधनों का प्रबंधन करना, और एक स्वच्छ और हरित ग्रामीण समुदाय की गठबंधन बनाना है।

निर्मल ग्राम अभियान में, ग्राम सभाएं, स्थानीय निकाय, ग्राम पंचायत, स्वयंसेवी संगठन और नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए संगठनित किए जाते हैं। यहां, समुदाय को स्वच्छता, स्वच्छ जल, और स्वच्छता के लिए जागरूक किया जाता है, जल संसाधनों के सही प्रबंधन को प्रोत्साहित किया जाता है, स्वच्छता और सामाजिक अभियानों का आयोजन किया जाता है, और सामुदायिक सहयोग के माध्यम से स्वच्छता के मानकों को प्राप्त किया जाता है।

निर्मल ग्राम अभियान स्वच्छता और हाइजीन के मानकों को सामान्यतया पूरा करने और ग्रामीण क्षेत्रों को स्वच्छ एवं स्वच्छ जल के लिए प्रेरित करने का एक महत्वपूर्ण कदम है।




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