इकाई प्रथम:
विभिन्न समुदायों के साथ समाज कार्य
1. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना क्या है?
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana) एक सरकारी योजना है जिसका मुख्य उद्देश्य गरीब लोगों को खाद्यान्न की सुरक्षा और समर्थन प्रदान करना है।
(प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से देश के गरीब नागरिकों को राशन प्रदान किया गया है. इस योजना को सरकार ने नवंबर 2020 तक बढ़ा दिया था. इस योजना के माध्यम से देश के 80 करोड़ गरीब नागरिकों को हर महीने 5 किलो गेहूं या चावल बिल्कुल मुफ्त प्रदान किए गए हैं. अब इस योजना को सरकार ने दिसंबर 2023 के बढ़ा दिया है.)
2. बेरोजगारी के कारण कौन-कौन से है?
बेरोजगारी के कारण कई अनुभव हो सकते हैं, जो निम्नलिखित हो सकते हैं:
1. आर्थिक अस्थिरता
2. तकनीकी प्रगति
3. शैक्षिक असंगठितता
4. औद्योगिक और आर्थिक परिवर्तन
5. जनसंख्या वृद्धि
3. प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण को परिभाषित कीजिए।
प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण न केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनभागीदारी को संबोधित करता है, बल्कि यह लोगों को सकारात्मक रूप से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास में सहभागी बनाने का भी एक माध्यम है। यह लोकतंत्र की मूलभूत सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से साकार करता है, साथ ही समानता, स्वतंत्रता, न्याय, और सामाजिक समावेशन के मूल्यों को प्रोत्साहित करता है।
1.लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण-इस योजना के फलस्वरुप आज लोकतांत्रिक व्यवस्था का गांव में विकेंद्रीकरण हुआ है। ग्रामों में जिला परिषद, ग्राम पंचायतों तथा पंचायत समितियों द्वारा ग्रामीण विकास में अधिकाधिक योगदान इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की ही एक मूर्त अभिव्यक्ति है। इसके फलस्वरूप विकास योजनाओं में ग्रामीण जनता की रुचि निरंतर बढ़ रही है तथा वह आत्म निर्भरता की दशा में आगे बढ़ी है।
4.स्वयं-सहायता समूहों के महत्व को बताइए।
स्वयं-सहायता समूहों का महत्व यह है कि वे लोगों को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं। ये समूह लोगों को संगठित करके समस्याओं का समाधान करने, सामूहिक विकास को प्रोत्साहित करने और आपसी सहायता के माध्यम से आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करते हैं। इन समूहों के अंतर्गत सदस्यों को ज्ञान, कौशल, और संसाधनों का साझा करने का मौका मिलता है, जिससे वे अपनी खुद की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं और आपसी सहायता से सशक्त हो सकते हैं। स्वयं-सहायता समूहों का महत्व यह है कि वे लोगों को स्वतंत्रता, स्वावलंबन और आत्मविश्वास की भावना प्रदान करते हैं, जो उन्हें समाज में आगे बढ़ने के लिए तैयार करती है।
5.कुछ प्रमुख जनजातीय समस्याओं को लिखिए।
जनजातियों को सामान्यतः विशेष सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। निम्नलिखित कुछ प्रमुख जनजातीय समस्याएं हैं:
सामाजिक समस्याएँ: सभ्य समाज के सम्पर्क में आकर जनजातियों में जो समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं उनमें मुख्य निम्नलिखित हैंः
1.कन्या मूल्य
2.बाल विवाह
3.नैतिकता का पतन
4.वेश्यावृŸिा, गुप्त रोग आदि
आर्थिक समस्याएँ
- स्थानान्तरित खेती
- वनों से संबंधित
- बदलती अर्थव्यवस्था
- ऋणग्रस्तता
- औद्योगिक मजदूर
- भूमि संबंधी
- शैक्षणिक
- राजनैतिक व प्रशासन संबंधी
स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ: सांस्कृतिक सम्पर्क की प्रक्रिया के फलस्वरूप जनजातीय लोगों में अन्य समस्याओं के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी घर करती जा रही हैं।
1.रोग ग्रस्तता और अज्ञानता
2.उचित चिकित्सा का अभाव
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
इकाई द्वितीय :
चिकित्सा सम्बन्धी क्षेत्र में
1. परामर्श प्रक्रिया के घटक लिखिए।
परामर्श की प्रक्रिया के तीन घटक मुख्य हैं-
1.परामर्श के लक्ष्य (ळवंस व िब्वनदेमसपदह)
2.सेवार्थी (उपबोमय) (ब्सपमदज), तथा
3.परामर्शदाता (ब्वनदेमसवत)
2. परामर्श मनोविज्ञान क्या है?
परामर्श मनोविज्ञान एक मनोविज्ञानिक क्षेत्र है जो लोगों को मानसिक समस्याओं के समाधान के लिए सहायता प्रदान करता है। यह मनोविज्ञान के सिद्धांतों, तकनीकों, और अभ्यासों का उपयोग करके मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीने में मदद करता है। परामर्श मनोविज्ञानी व्यक्तियों को एक-एक संदेह और समस्या को समझने में मदद करते हैं, और उन्हें संघर्षों का सामना करने और सकारात्मक परिवर्तन करने के लिए रणनीतियाँ प्रदान करते हैं। परामर्श मनोविज्ञान विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग होता है, जैसे मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार, संगठन, और समाजिक क्षेत्र। यह मानसिक समस्याओं का पता लगाने, समझने और उनका समाधान करने में मदद करता है ताकि व्यक्ति और समाज दोनों का मानसिक स्वास्थ्य सुधार सकें।
3. निर्देशन की प्रकृति पर टिप्पणी लिखें।
निर्देशन की प्रकृति मार्गदर्शन, संचालन और प्रेरणा की महत्वपूर्ण प्रभावशील तत्व है। यह एक प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा दृष्टिदेश, निर्देशन और गुणवत्ता मानकों का संकल्पन एवं अनुसरण किया जाता है।
ya
संक्षेप में कहें तो, निर्देशन की प्रकृति उच्चतम स्तर पर संगठन को दिशा देने, सदस्यों को प्रेरित करने, संगठनात्मक क्षमता का विकास करने और संगठन की सफलता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
4. कुछ प्रमुख महामारियों के नाम लिखिए।
कुछ प्रमुख महामारियों के नाम निम्नलिखित हैं:
1. कोविड-19 (कोरोनावायरस रोग-2019)
2. स्वाइन फ्लू (H1N1 इन्फ्लूएंजा)
3. एचआईवी/एड्स (मानव इम्यूनोडेफिशियंसी वायरस/एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशियंसी सिंड्रोम)
4. ईबोला वायरस रोग
5. सार्स (अत्यधिक संक्रामक श्वसन संक्रमण)
6. जिका वायरस रोग
7. हेपेटाइटिस (बी, सी, डी, ई)
8. मलेरिया
9. ट्यूबरकुलोसिस (क्षय रोग)
10. चिकनगुनिया बुखार
ये कुछ मात्र प्रमुख महामारियाँ हैं और यहां पर्याप्त स्थान नहीं है इस लिस्ट में सभी महामारियों को सम्मिलित करने का। विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में नवीनतम अध्ययन और उपयोगी जानकारी के आधार पर ये महामारियाँ बदल सकती हैं और नई महामारीयाँ भी उभर सकती हैं।
5. युवा पीढ़ी को किन क्षेत्रों में मार्गदर्शन एवं परामर्श की आवश्यकता होती है।
युवा पीढ़ी को निम्नलिखित क्षेत्रों में मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है:
1. करियर निर्धारण: युवा पीढ़ी को करियर चयन में मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है। उन्हें विभिन्न करियर विकल्पों के बारे में जानकारी, कौशल और रुचियों के आधार पर उचित करियर चुनने में मदद की जरूरत होती है।
2. शिक्षा: युवा पीढ़ी को शिक्षा में मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है। वे विद्यालय, कॉलेज या विश्वविद्यालय में उचित पाठ्यक्रम और कोर्स चुनने, शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे परिणाम प्राप्त करने और करियर के लिए अच्छे आवसर प्राप्त करने में मदद चाहिए।
3. व्यक्तिगत विकास: युवा पीढ़ी को व्यक्तिगत विकास में मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है। यह उन्हें स्वयं के साथ जुड़े मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर समझदारी से सोचने और उन्हें सही निर्णय लेने में मदद करता है।
4. आवास और वित्तीय योजनाएं: युवा पीढ़ी को आवास और वित्तीय योजनाओं में मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है। वे सही आवास विकल्पों को समझने, वित्तीय योजनाओं का उपयोग करने, संपत्ति निवेश और निजी वित्तीय योजनाओं के बारे में सही निर्णय लेने में मदद चाहिए।
5. सामाजिक परिवेश: युवा पीढ़ी को सामाजिक परिवेश में मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है। उन्हें समाजिक मुद्दों को समझने, सही समाजिक संबंध और दूसरों के साथ सही तरीके से व्यवहार करने में मदद चाहिए।
ये केवल कुछ उदाहरण हैं और युवा पीढ़ी की आवश्यकताओं और परिस्थितियों पर आधारित हैं। आपकी विशेष परिस्थितियों और आपके आसपास के संसाधनों के आधार पर अन्य क्षेत्रों में भी मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता हो सकती है।
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
इकाई तृतीया
परिवार कल्याण
1. वंचित वर्ग को परिभाषित करें
वंचित वर्ग एक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवस्था है जिसमें लोग अपने आवास, आहार, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक सुविधाओं तक पहुंच में असमर्थ होते हैं। ये वर्ग सामाजिक और आर्थिक असमानता के कारण अपने आप को मानसिक, आर्थिक, और सामाजिक रूप से वंचित महसूस करता है।
2. सामाजिक पैरवी क्या है और क्यों आवश्यक है?
सामाजिक पैरवी एक सामाजिक सुरक्षा योजना है जो लोगों को आर्थिक, स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं प्रदान करती है। इसका मुख्य उद्देश्य वंचित, कमजोर और अवसरहीन वर्गों की मदद करना है ताकि वे समाज के साथ समरस और गरिमामय जीवन जी सकें। सामाजिक पैरवी के तहत, सरकार और अन्य सामाजिक संगठन निम्नलिखित क्षेत्रों में योजनाएं चलाते हैं: आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, पेंशन, विकलांगता समर्थन, रोजगार योजनाएं आदि।
3. मानव अधिकार हनन क्या है?
मानव अधिकार हनन वह स्थिति है जब किसी व्यक्ति या समूह के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। यह मानव अधिकारों की संरक्षा, समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। इसमें व्यक्तिगत अधिकारों, सामाजिक अधिकारों, नागरिक अधिकारों, न्यायिक अधिकारों, और मौलिक मानवाधिकारों का हनन शामिल हो सकता है। मानव अधिकार हनन कई रूपों में हो सकता है, जैसे कि विचारधारा की बाधाओं, भेदभाव, उत्पीड़न, जुबानी या शारीरिक हिंसा, ग़ैरकानूनी गिरफ्तारी, यातना, व्यापारिक उत्पीड़न, बाल मजदूरी, और बंधुआ मजदूरी शामिल हो सकता है।
4. दिव्यांगजनों के प्रकार बताइए?
दिव्यांगजनों के प्रकार निम्नलिखित हैं:
- विकलांगता: ये व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, दृष्टिगत या श्रवणगत क्षमताओं में कमी रखते हैं, जो उनकी दैनिक गतिविधियों और सामाजिक प्रभावों पर प्रभाव डालती हैं।
- मानसिक विकलांगता: इसमें मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौतियों से प्रभावित होने वाले व्यक्ति शामिल होते हैं, जैसे कि मनोरोग, विक्षिप्तता, मनोविषमता, अवसाद आदि।
- दृष्टिगत विकलांगता: इसमें व्यक्ति की दृष्टि कमजोर होती है या वे अंधे होते हैं।
- श्रवणगत विकलांगता: इसमें व्यक्ति की सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, जैसे कि सुनने में कमी या गहराहट से श्रवण करने की असमर्थता।
- अन्य: इसके अलावा, और भी कई प्रकार की दिव्यांगता हो सकती है जैसे कि बौद्धिक विकलांगता (शिक्षात्मक क्षमता में कमी), संचारिक विकलांगता (भाषा के असमर्थता), अंग विकलांगता (अंगों की कमी या खो जाना) आदि।
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
इकाई चतुर्थ :
नेतृत्व के साथ समाज कार्य
1. स्वामी विवेकानंद की प्रमुख शिक्षाएँ क्या हैं?
स्वामी विवेकानंद की प्रमुख शिक्षाएं:
- आत्मविश्वास: विवेकानंद ने आत्मविश्वास को महत्वपूर्ण माना और युवा पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा दी।
- धर्म में एकता: उनका संदेश था कि सभी धर्म समान और एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। धर्म में एकता और समरसता को स्वीकार करना चाहिए।
- ज्ञान की महत्ता: विवेकानंद ने ज्ञान को महत्वपूर्ण साधना माना और शिक्षा के माध्यम से समाज को सुधारने की अपार शक्ति दी।
- सेवा और समर्पण: उन्होंने सेवा और समर्पण की महत्ता को स्वीकार किया और अपने जीवन को समाज की सेवा में समर्पित किया।
2. समाजशास्त्र में धार्मिक समूहों की चार आधारभूत श्रेणियाँ कौन-कौन सी हैं?
समाजशास्त्र में धार्मिक समूहों की चार आधारभूत श्रेणियाँ हैं:
- वैदिक धर्मीय समूह: इसमें हिन्दू और उसके उपनिषदों, वेदों और पुराणों पर आधारित समूह शामिल होते हैं।
- शिक्षावादी समूह: इसमें बौद्ध, जैन, सिख, ब्राह्मो समाज, आर्य समाज और दादाभाई नारोजी के समाजशास्त्रीय विचारों पर आधारित समूह शामिल होते हैं।
- अभिप्रेतियां और जातिगत समूह: इसमें इस्लाम, ख्रिस्तियता, जूदेयों और पारसी समाजों के समूह शामिल होते हैं।
- अज्ञेय धार्मिक समूह: इसमें ऐसे समूह शामिल होते हैं जो किसी विशेष धर्म से संबंधित नहीं होते हैं, जैसे कि शामनियों, तंत्रिकों, आदिवासी समूहों और अन्य प्राकृतिक धार्मिक परंपराओं के समूह।
3. प्रमुख समाज सुधार आंदोलनों के नाम लिखिए
प्रमुख समाज सुधार आंदोलनों के कुछ प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:
1. स्वदेशी आंदोलन (भारत)
2. विद्रोह आंदोलन (भारत)
3. खिलाफत आंदोलन (भारत)
4. नॉन-कोउपरेटिव मोवमेंट (भारत)
5. आदिवासी आंदोलन (भारत)
6. महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन (भारत)
7. महिला उत्थान आंदोलन (विश्वभर)
8. सविनय अवज्ञा आंदोलन (भारत)
9. मानवाधिकार आंदोलन (विश्वभर)
10. भाषा आंदोलन (भारत)
ये कुछ मात्र उदाहरण हैं और अन्य भी कई समाज सुधार आंदोलन इतिहास में शामिल हैं जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या मानवाधिकार से संबंधित मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से आयोजित किए गए हैं।
4. ग्रामीण नेता को किन बातों में जागरूक होना चाहिए?
ग्रामीण नेता को निम्नलिखित बातों में जागरूक होना चाहिए:
1. ग्रामीण समस्याओं की पहचान: ग्रामीण नेता को ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को समझने और पहचानने की क्षमता होनी चाहिए। वह ग्रामीण समुदाय की मांगों और जरूरतों को समझें और उन्हें समाधान ढूंढने के लिए कार्य करें।
2. सामरिक और आर्थिक विकास: ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सामरिक और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने की जरूरत होती है। ग्रामीण नेता को इसके लिए सामरिक और आर्थिक सुविधाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए और इन दिशाओं में कदम उठाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
3. किसानों की समर्थन: ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। ग्रामीण नेता को किसानों की समस्याओं को समझने, उनकी समर्था करने और उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभ का प्राप्त करने में मदद करनी चाहिए।
4. सामाजिक न्याय: ग्रामीण नेता को सामाजिक न्याय के मामले में भी सक्षम होना चाहिए। वह ग्रामीण समुदाय की दरिद्रता, जातिवाद, लिंग भेदभाव, बाल श्रम और अन्य सामाजिक मुद्दों के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय रहें।
5. जल संरक्षण और स्वच्छता: जल संरक्षण और स्वच्छता ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण नेता को जल संरक्षण के लिए जागरूकता फैलानी चाहिए और स्वच्छता के मामले में संचार के जरिए लोगों को संबोधित करने और प्रेरित करने की जरूरत होती है।
यह थी कुछ महत्वपूर्ण बातें जिन पर एक ग्रामीण नेता को जागरूक होना चाहिए। हालांकि, ये सिर्फ उदाहरण हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में और भी कई चुनौतियाँ और मुद्दे हो सकते हैं जिन पर ग्रामीण नेताओं को ध्यान देना चाहिए।
5. संभ्रांत वर्ग को परिभाषित कीजिए |
राजनीतिक विकास के सम्भ्रान्तजन वर्ग एवं नेतृत्व का स्वरूप: भारत के राजनीतिक विकास में सम्भ्रान्तजन वर्ग एवं नेतृत्व के स्वरूप का उल्लेख विभिन्न विद्वानों ने किया है। रजनी कोठारी के अनुसार विकास की इन प्रक्रियाओं का जनक सम्भ्रान्तजन का छोटा भाग चल रहा है जिसकी एकता उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि में देखी जा सकती है। उच्च जाति, शिक्षित सम्भ्रान्तजन वर्ग एक स्तुत के रूप में स्वीकार्य किया जाता रहा है। राजनीतिक व्यवस्था में चाहे सत्तारूढ़ पक्ष हो या विरोधी पक्ष मूल स्त्रोत इसी सामाजिक पृष्ठभूमि से सम्बन्धित है। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में विभिन्न समूहों में बॅंटे हुए राजनीतिक वर्ग तथा सम्भ्रान्तजन वर्ग की सांस्कृतिक सामाजिक पृष्इभूमि से काई अंतर नहीं है।
टी.बी. बोटोमोर ने भारत तथा अर्द्ध- विकसित देशों में सम्भ्रान्तजन वर्ग के निम्न पांच आदर्श स्वरूपों की कल्पना की है। -
1. राजवंशीय सम्भ्रान्तजन 2. मध्यवर्गीय सम्भ्रान्तजन
3. क्राान्तिकारी बुद्धजीवी ) 4. साम्राज्यवादी प्रशासक
5. राष्ट्रवादी नेतृत्व
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
- शिशु हत्या: नवजात शिशु की हत्या करना या उसे मरने का कोई भ्रमित कारण बताना।
- बाल श्रम: बच्चों को अवैध और उचित उम्र से कम उम्र में श्रमिक के रूप में नियोजित करना।
- बाल यौन उत्पीड़न: बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न, यौन शोषण, बलात्कार या अनुचित यौन संपर्क की घटनाओं का अनुभव कराना।
- बाल अभियान्त्रिति: बच्चों को अनुचित रूप से आरामदायक स्थानों पर ले जाकर उन्हें आत्मसात करना, दवा या नशीली पदार्थों का सेवन कराना, या उन्हें शराबियों या नशे में होने के लिए बनाना।
- बाल अपहरण: बच्चों को अपहरण करना या उन्हें अपनी संपत्ति या सेवा के लिए बलात्कार करना।
- यहां दिए गए जवाबों में कुछ मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है, और इसे विस्तारपूर्वक व्याख्या किया जा सकता है।
Comments
Post a Comment