इकाई प्रथम
परिचय मूल्य एवं सिद्धांत
1. भारत में सामूहिक का इतिहास लिखें।
भारत में सामूहिकता की भावना और उसका इतिहास बहुत प्राचीन हैं। इस देश में बड़ी-बड़ी सामुदायिक गतिविधियाँ और एकजुटता के उदाहरण मिलते हैं जो सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक या राजनीतिक मायनों में व्यापक प्रभाव डालती हैं। इसका इतिहास भारतीय सभ्यता, सामाजिक संस्कृति और राष्ट्रीय आंदोलनों के साथ जुड़ा हुआ है।
प्राचीनकाल में भारतीय समाज गांव और जाति के प्रमुख आधार पर संगठित था। लोग जाति, वंश, या धर्म के आधार पर एकत्र होते थे और उनकी संघटना व्यापक सामुदायिक जीवन पर आधारित थी। इस प्रकार की सामूहिकता को समुदाय (community) कहा जाता था। इन समुदायों के भीतर धार्मिक और सांस्कृतिक समानताएं, संस्कार, और साझा मूल्यों को बनाए रखने की प्रथा थी। उदाहरण के रूप में, विभिन्न जातियों और समुदायों में मातृभाषा, खाद्य, वेशभूषा, और साहित्यिक परंपराएं आदि अपनी अलग-अलग थीं, लेकिन उनके बीच भी कुछ सामान्यताएं मौजूद थीं जो समाज को एकजुट करती थीं।
आधुनिक भारतीय इतिहास में, सामूहिकता की भावना और आंदोलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हुए हैं। राष्ट्रीय आंदोलनों में, जैसे कि स्वतंत्रता संग्राम, सत्याग्रह, जनजागरण आंदोलन आदि में, लोग साथ आए और सामूहिक रूप से अपनी मांगों और विचारों को व्यक्त किया। इन आंदोलनों में समाज के विभिन्न वर्गों, धर्मों, जातियों, और समुदायों के लोग संगठित होकर एक हो गए और अदालतों, राजनीतिक नेताओं, और सार्वजनिक अधिकारियों के समक्ष अपनी मांगें रखीं। ये सामूहिक आंदोलन राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की प्रतीक हुए और इस प्रकार देश के इतिहास को बदल दिया।
भारतीय समाज में सामूहिकता की भावना आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लोग अपने समुदायों, संगठनों, और समाजिक समूहों में जुड़े रहते हैं और सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, और साहित्यिक मायनों में साझा उद्दीपन और सहयोग करते हैं। विभिन्न समाज सेवा के क्षेत्रों में भी सामूहिक गतिविधियाँ सक्रिय रहती हैं, जिनका उदाहरण मात्र सेवा संगठनों, आर्थिक सहकारी संस्थाओं, वृक्षारोपण अभियानों, ग्रामीण विकास समितियों, और जनसंचार मंचों में देखा जा सकता है।
भारतीय समाज में सामूहिकता की भावना न केवल संगठन और विकास के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे व्यक्तिगत और सामाजिक सहयोग भी बढ़ता है। यह भारतीय समाज की सद्भावना, एकता, और समरसता के संकेत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की नींव है।
2. पश्चिमी देशों (अमेरिका) में समूह कार्य के ऐतिहासिक विकास को लिखें।
पश्चिमी देशों, जैसे कि अमेरिका, में समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास व्यापक और रंगीन है। यहां कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम और यात्राएं हैं जो समूह कार्य के इतिहास में महत्वपूर्ण हैं:
1. आर्थिक संगठनों की स्थापना: पश्चिमी देशों में आर्थिक संगठनों की स्थापना का आदान-प्रदान बहुत पुराना है। यह संगठन लोगों को आपस में जोड़ते हैं और साझा उद्दीपन, सहयोग, और समूह कार्य के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करते हैं। व्यापारिक संघ, उद्योग संघ, कार्यसमूह, बाजारी संघ, और वित्तीय संस्थाएं इसके उदाहरण हैं।
2. आर्थिक आंदोलन: पश्चिमी देशों में ऐतिहासिक रूप से विख्यात आर्थिक आंदोलन रहे हैं। उदाहरण के लिए, 19वीं शताब्दी में अमेरिका में सामूहिकता के माध्यम से व्यापारिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी गई, जैसे नगरिक अधिकार आंदोलन और कारखानेदारों के खिलाफ वकालती आंदोलन। ये आंदोलन लोगों को एकजुट करते हुए उनकी मांगों को प्रभावशाली ढंग से प्रगट करने में सफल रहे।
3. सामाजिक आंदोलन: पश्चिमी देशों में सामाजिक आंदोलन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। ये आंदोलन लोगों को एकजुट करके सामाजिक बदलाव को प्रोत्साहित करते हैं। उदाहरण के लिए, समाज में जाति और लिंग के आधार पर असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई, महिला अधिकारों के लिए आंदोलन हुआ और गरीबी के खिलाफ संघर्ष किया गया।
4. राजनीतिक संगठनों की स्थापना: पश्चिमी देशों में राजनीतिक संगठनों की स्थापना भी महत्वपूर्ण रही है। ये संगठन वाद-विवाद, चुनाव, और राजनीतिक मुद्दों पर सामूहिक ढंग से काम करते हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों की स्थापना, सामूहिक चुनावी अभियान, और सांसदों द्वारा समूह कार्य इसके उदाहरण हैं।
5. सामाजिक सेवा संगठनों का विकास: पश्चिमी देशों में सामाजिक सेवा संगठनों का विकास भी महत्वपूर्ण रहा है। इन संगठनों के माध्यम से लोगों ने सामाजिक मुद्दों, जैसे गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, और पर्यावरण संरक्षण पर काम किया है। गैरसरकारी संगठन, यूनाइटेड नेशंस, रोटरी क्लब, नेशनल वॉलंटियर सर्विस, और अंतर्राष्ट्रीय गैरसरकारी संगठन इसके उदाहरण हैं।
इस प्रकार, पश्चिमी देशों में समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास विभिन्न क्षेत्रों में देश की विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। यह सामूहिकता, सहयोग, और संगठन के माध्यम से लोगों को एक साथ जोड़ने और विभिन्न मामलों का समाधान करने में मदद करता है।
3. समूह कार्य के किन्हीं 2 सिद्धान्तों को लिखें।
समूह कार्य के कई सिद्धांत हैं, लेकिन यहां दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख किया जा सकता है:
1. सहयोग: सहयोग समूह कार्य का मूलभूत सिद्धांत है। इसका अर्थ होता है कि सदस्यों को संगठित ढंग से मिलकर काम करना चाहिए और उन्हें एक दूसरे के समर्थन और मदद का संकेत करना चाहिए। सहयोग के माध्यम से सदस्य अपने संपादकीय दृष्टिकोण, कौशल, संसाधन और अनुभव को संगठन के लाभ के लिए संयोजित करते हैं। इससे संगठन की क्षमता बढ़ती है और सामरिक लाभ के साथ-साथ अधिक उच्चतम मानकों को भी साधने में मदद मिलती है।
2. समरसता: समरसता एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो समूह कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। यहां पर समरसता का अर्थ होता है कि सदस्यों को एक-दूसरे की भिन्नताओं और मतभेदों को स्वीकार करना चाहिए और संगठन में एक अनुभवशील और न्यायपूर्ण माहौल बनाना चाहिए। इससे सदस्यों के बीच संघर्ष और विभाजन की स्थितियाँ कम होती हैं और समूह को संगठित और सामरिक ढंग से काम करने में सहायता मिलती है। समरसता उच्चतम कार्य गतिशीलता, विश्वास, और संघर्ष के संकेतक होती है जो समूह के लिए आवश्यक होते हैं।
ये सिद्धांत समूह कार्य को समृद्ध, प्रभावी और सामरिक बनाने में मदद करते हैं और सदस्यों को संगठन में समर्थन और समरसता की भावना प्रदान करते हैं।
4. निर्देशित सामूहिक अन्तःक्रिया एवं जनतांत्रिक आत्मनिश्चीकरण का सिद्धान्त लिखें।
1. निर्देशित सामूहिक अन्तःक्रिया (Directed Collective Action):
निर्देशित सामूहिक अन्तःक्रिया सिद्धांत के अनुसार, समूह के सदस्यों को एक साथ लाया जाना चाहिए और उन्हें सामूहिक ढंग से कार्रवाई में जुटाया जाना चाहिए। इस सिद्धांत का उद्देश्य एक मांग या उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समूह के सदस्यों को प्रभावशाली तरीके से एकजुट करना है। इसे आमतौर पर नेतृत्व, संगठन, योजनाबद्धता और उच्चतम कार्य गतिशीलता के माध्यम से संपादित किया जाता है। निर्देशित सामूहिक अन्तःक्रिया सिद्धांत विभिन्न आंदोलन, यात्रा, हड़ताल, विरोध प्रदर्शन आदि में देखा जा सकता है जहां समूह के सदस्यों को एकजुट करके किसी विशेष मांग की प्राप्ति के लिए कार्रवाई की जाती है।
2. जनतांत्रिक आत्मनिश्चीकरण (Democratic Empowerment):
जनतांत्रिक आत्मनिश्चीकरण सिद्धांत के अनुसार, समूह के सदस्यों को सक्रिय और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की जानी चाहिए। इसका मतलब है कि समूह के सदस्यों को समूह के उद्देश्यों, नीतियों, और कार्रवाईयों के बारे में सक्षम बनाना चाहिए और उन्हें निर्णय लेने में सक्षम बनाना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार, जनतांत्रिक मंच, मताधिकार, सभाभियांत्रण, और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सदस्यों को व्यापक रूप से साझा निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलती है। इस सिद्धांत का प्रयोग निर्णय लेने, नेतृत्व का चयन करने, और समूह के नीति और क्रियाकलापों के संचालन में समूह के सदस्यों की सहभागिता को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
5. लोचदार कार्यात्मक संगठन का सिद्धान्त एवं प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभव का सिद्धान्त लिखें।
1. लोचदार कार्यात्मक संगठन का सिद्धांत (Dynamic Organizational Principle):
लोचदार कार्यात्मक संगठन सिद्धांत के अनुसार, संगठन को प्रगतिशीलता और प्रगतिशीलता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सक्रिय और प्रभावी रूप से कार्य करना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार, संगठन को अपनी संगठनात्मक प्रक्रियाओं, नीतियों और कार्यक्रमों को समय-समय पर संशोधित और अद्यतित करने की आवश्यकता होती है। यह संगठन को उच्चतम स्तर पर उपयोगी और प्रभावी बनाने में मदद करता है। संगठन के सदस्यों को सक्रिय भूमिका देना, संगठन की चुनौतियों और अवसरों को समझना, और नवीनतम और विश्वसनीय तकनीकों का उपयोग करके नए और सुदृढ़ कार्यक्रम और नीतियों की विकास को प्रोत्साहित करना इस सिद्धांत के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
2. प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभव का सिद्धांत (Progressive Programmatic Experimentation Principle):
प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभव सिद्धांत के अनुसार, संगठन को नवीनतम और सुदृढ़ कार्यक्रमों का अनुभव प्राप्त करने के लिए सक्रिय और प्रयासशील रहना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार, संगठन को विभिन्न कार्यक्रमों की विचारों, प्रयासों, और अनुभवों को निर्दिष्ट करके प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके माध्यम से संगठन नए और सोची समझी चरणों, प्रगतिशील तकनीकों और विशेषज्ञताओं के माध्यम से कार्यक्रमों को अद्यतित करके अपनी प्रगति को सुनिश्चित कर सकता है। प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभव सिद्धांत संगठन को बदलाव के लिए उत्प्रेरक और विकास की गति को बढ़ाने में मदद करता है।
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इकाई-2
समूह गत्यात्मकता
1. समूह विकास के स्तरों को लिखें।
समूह विकास को साधारित रूप से चार स्तरों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये स्तर एक समूह के प्रगति और परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त किए जाने वाले कौशल, संगठनता और क्षमताओं के संकेतक हैं।
1. स्तर 1: व्यक्तिगत स्तर (Individual Level):
इस स्तर पर, समूह के सदस्य व्यक्तिगत रूप से अपने कौशल, ज्ञान, क्षमताएं, और अनुभव का विकास करते हैं। यह स्तर समूह के सदस्यों के स्वयं के प्रगतिशीलता, स्वयं-विश्लेषण, और नए कौशलों के सीखने के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। सदस्यों के व्यक्तिगत स्तर का विकास समूह के संगठनात्मक विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है।
2. स्तर 2: समूह स्तर (Group Level):
इस स्तर पर, समूह अपने सदस्यों के बीच संगठनात्मक संघर्ष, सहभागिता, संगठनता, और सहयोग की विकास करता है। इस स्तर पर समूह व्यक्तिगत सदस्यों के बीच संघर्षों को समझने, संघर्षों को समाधान करने, सहभागिता को प्रोत्साहित करने और संगठनात्मक क्षमताओं को विकसित करने के लिए काम करता है।
3. स्तर 3: संगठन स्तर (Organizational Level):
इस स्तर पर, समूह अपनी संगठनात्मक संरचना, कार्यप्रणाली, नीतियों, और आदर्शों के विकास के लिए काम करता है। यह स्तर समूह के सदस्यों के बीच संगठनात्मक संघर्षों को समाधान करने, संगठनात्मक विशेषताओं को प्रोत्साहित करने, नीतियों को समझने और अनुपालन करने के माध्यम से समूह की संगठनात्मक क्षमता को विकसित करता है।
4. स्तर 4: परिस्थिति स्तर (Environmental Level):
इस स्तर पर, समूह अपने आसपास के परिवेश के साथ संघर्षों का सामना करता है और उन परिस्थितियों के लिए रणनीतियां बनाता है जिनमें समूह को बदलने और विकसित होने की आवश्यकता होती है। समूह को अपने परिस्थितियों को समझने, उन्हें प्रभावित करने के लिए रणनीतियां तैयार करने, और अवसरों को चुनने के लिए काम करना पड़ता है।
इन स्तरों पर समूह विकास एक संयोजन के रूप में होता है, जहां प्रत्येक स्तर प्रभावित होता है और समूह को संपूर्ण विकास के दिशानिर्देशक के रूप में सहायता करता है।
2. समूह संरचना को विस्तार में लिखें।
समूह विकास को साधारित रूप से चार स्तरों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये स्तर एक समूह के प्रगति और परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त किए जाने वाले कौशल, संगठनता और क्षमताओं के संकेतक हैं।
1. स्तर 1: व्यक्तिगत स्तर (Individual Level):
इस स्तर पर, समूह के सदस्य व्यक्तिगत रूप से अपने कौशल, ज्ञान, क्षमताएं, और अनुभव का विकास करते हैं। यह स्तर समूह के सदस्यों के स्वयं के प्रगतिशीलता, स्वयं-विश्लेषण, और नए कौशलों के सीखने के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। सदस्यों के व्यक्तिगत स्तर का विकास समूह के संगठनात्मक विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है।
2. स्तर 2: समूह स्तर (Group Level):
इस स्तर पर, समूह अपने सदस्यों के बीच संगठनात्मक संघर्ष, सहभागिता, संगठनता, और सहयोग की विकास करता है। इस स्तर पर समूह व्यक्तिगत सदस्यों के बीच संघर्षों को समझने, संघर्षों को समाधान करने, सहभागिता को प्रोत्साहित करने और संगठनात्मक क्षमताओं को विकसित करने के लिए काम करता है।
3. स्तर 3: संगठन स्तर (Organizational Level):
इस स्तर पर, समूह अपनी संगठनात्मक संरचना, कार्यप्रणाली, नीतियों, और आदर्शों के विकास के लिए काम करता है। यह स्तर समूह के सदस्यों के बीच संगठनात्मक संघर्षों को समाधान करने, संगठनात्मक विशेषताओं को प्रोत्साहित करने, नीतियों को समझने और अनुपालन करने के माध्यम से समूह की संगठनात्मक क्षमता को विकसित करता है।
4. स्तर 4: परिस्थिति स्तर (Environmental Level):
इस स्तर पर, समूह अपने आसपास के परिवेश के साथ संघर्षों का सामना करता है और उन परिस्थितियों के लिए रणनीतियां बनाता है जिनमें समूह को बदलने और विकसित होने की आवश्यकता होती है। समूह को अपने परिस्थितियों को समझने, उन्हें प्रभावित करने के लिए रणनीतियां तैयार करने, और अवसरों को चुनने के लिए काम करना पड़ता है।
इन स्तरों पर समूह विकास एक संयोजन के रूप में होता है, जहां प्रत्येक स्तर प्रभावित होता है और समूह को संपूर्ण विकास के दिशानिर्देशक के रूप में सहायता करता है।
3. समूह में सम्पन्न होने वाली गतिविधियों का वर्णन करें।
समूह में सम्पन्न होने वाली गतिविधियाँ विविधता और समृद्धता के साथ होती हैं। नीचे कुछ प्रमुख समूह गतिविधियाँ दी गई हैं:
1. साझा विचार-विमर्श (Brainstorming): समूह के सदस्यों के बीच एक साथ विचारों और विचारों का विस्तार करना, नए और स्वर्णिम विचारों को उत्पन्न करना और समस्याओं के समाधान के लिए नए आविष्कार और अवसरों की खोज करना।
2. सहयोगी कार्य (Collaborative Work): समूह के सदस्यों के बीच सहयोग करके सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक साथ कार्य करना। सदस्यों के अलग-अलग कौशल और विशेषज्ञता का उपयोग करके परस्पर सहायता करना और एक दूसरे की कमियों को पूरा करने में मदद करना।
3. कार्ययोजना और विधियाँ (Planning and Strategies): समूह के सदस्यों के बीच समूह कार्य के लिए योजनाएं तैयार करना, कार्ययोजना बनाना और निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए रणनीतियाँ तय करना। यह समूह को सामरिकता का एक उच्च स्तर प्रदान करती है और सदस्यों के कार्य को समर्थन करती है।
4. समूह संघर्ष और निपटान (Conflict Resolution): समूह में उत्पन्न होने वाले संघर्षों को समझना, समस्या की जड़ का पता लगाना, समूह के सदस्यों के बीच मेलजोल और समझौता करना। संघर्षों को सकारात्मक रूप से हल करना और समूह को एकजुट होकर समस्याओं का समाधान करना।
5. देखभाल और समर्थन (Support and Care): समूह के सदस्यों के बीच समर्थन प्रदान करना, आपसी संबंधों को मजबूत करना, उन्नति के लिए प्रोत्साहित करना और एक दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखना। समूह के सदस्यों की आत्मविश्वास और सामरिकता को बढ़ाना और विभाजनों को दूर करने के लिए सहायता करना।
6. प्रगतिशील और अभिवृद्धि-संचार (Innovative and Growth-Oriented Communication): समूह में अद्वितीय और प्रगतिशील संचार के तरीकों का उपयोग करके सदस्यों के बीच विचारों, ज्ञान का साझा करना और विकसित करना। संचार के माध्यम से आपसी संबंधों को मजबूत करना और समूह के लिए नए अवसरों और आगे बढ़ने की दिशाओं को खोजना।
ये गतिविधियाँ समूह के संपन्न होने वाले कार्यों का केंद्र हैं और समूह के सदस्यों को एक साथ काम करने, सहयोग करने, विचारों का आदान-प्रदान करने, संघर्षों का समाधान करने, और सामूहिक उन्नति और प्रगति की साधना करने में मदद करती हैं।
- समूह के गठन: समूह चिकित्सा में एक समर्पित समूह के गठन किया जाता है, जिसमें सामरिक चिकित्सा के लिए रुचि रखने वाले व्यक्तियों को शामिल किया जाता है।
- संघर्षों का सामना: सभी सदस्यों के बीच एक सुरक्षित और आदान-प्रदानीय माहौल में, समस्याओं, विचारों और अनुभवों का साझा करना किया जाता है। सदस्यों को आपस में संवाद करने की स्वतंत्रता दी जाती है और उन्हें एक दूसरे की समस्याओं पर समर्पण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
- समूह सहयोग: सदस्यों को एक दूसरे की समस्याओं का समर्थन करने और सहायता करने के लिए प्रेरित किया जाता है। समूह के सदस्य अपने अनुभवों, उपासनाओं और उपायों का साझा करते हैं ताकि दूसरे सदस्य उससे सीख सकें और समस्याओं के लिए संगठित समाधान ढूंढ सकें।
- समूह सुरक्षा और भरोसा: समूह चिकित्सा में सुरक्षा और भरोसा का माहौल बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। सभी सदस्यों को सम्मान, आपसी समझ, और विश्राम के साथ एक दूसरे के साथ संवाद करने का अधिकार होता है।
- नेतृत्व और मार्गदर्शन: एक प्रशिक्षित नेता या मार्गदर्शक द्वारा समूह चिकित्सा की प्रक्रिया का मार्गदर्शन किया जाता है। वे समूह के लिए निर्देशित गतिविधियों, समर्थन की प्रदान, और समस्याओं के समाधान के लिए सामरिक तकनीकों का उपयोग कर सकते हैं।
- समूह चिकित्सा की प्रक्रिया में सदस्यों को अपनी समस्याओं को पहचानने, समझने, और उनका समाधान करने के लिए अवसर मिलता है। समूह के माध्यम से सहयोग, समर्थन, और संघर्षों का समाधान होता है जो सदस्यों को मानसिक और आत्मिक रूप से स्वस्थ बनाता है।
- लक्ष्यों और मानदंडों का साझा करना: समूह के सदस्यों के बीच लक्ष्यों और मानदंडों का साझा करना। समूह को समझना कि वे क्या प्राप्त करना चाहते हैं और कैसे उन्हें प्राप्त करेंगे।
- संगठन की योजना बनाना: समूह के सदस्यों के बीच कार्य की योजना तैयार करना। कार्य की विभाजन, संगठन और संघटना की योजना तैयार करना जिससे समूह के सदस्य अपने कार्यों को संगठित रूप से पूरा कर सकें।
- संचालन और सहयोग का निर्धारण करना: समूह में विभिन्न गतिविधियों के लिए संचालन की जरूरत होती है और सदस्यों के बीच सहयोग का माध्यम बनाया जाता है। समूह के सदस्यों को निर्देशित करने, सहायता करने और एक दूसरे का समर्थन करने के लिए संचालन प्रक्रिया स्थापित की जाती है।
- समायोजन की निगरानी करना: समायोजन की प्रक्रिया का समय-समय पर मूल्यांकन करना और आवश्यकतानुसार आवश्यक सुधार करना। समूह के सदस्यों के बीच तालिका, निगरानी, और समायोजन की जरूरत को मान्यता देना।
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इकाई चतुर्थ
समूह कार्य में कार्यक्रम नियोजन: अर्थ, महत्व, नियोजन एवं विकास प्रक्रिया समूह कार्य में कार्यक्रम नियोजन -
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इकाई पंचम
समूह कार्य में अभिलेख लेखन: उद्देश्य, प्रकार, सिद्धांत एवं महत्व
1. समूह कार्य में अभिलेखन के उद्देश्य एवं प्रकारों को लिखें।
समूह कार्य में अभिलेखन के उद्देश्य एवं प्रकारों को निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है:
अभिलेखन के उद्देश्य:
1. ज्ञान संग्रहीतीकरण: अभिलेखन के माध्यम से समूह के द्वारा प्राप्त ज्ञान, जानकारी, और अनुभवों को संग्रहीत करना।
2. प्रगति मॉनिटरिंग: समूह के कार्य और प्रगति को निरीक्षण करना, समस्याओं का पता लगाना, और सुधार की आवश्यकता को पहचानना।
3. साझा सूचना: सदस्यों के बीच सूचना, ज्ञान, और अनुभव का साझा करना।
4. सुधारों का समीक्षण: गतिविधियों, प्रक्रियाओं, और निर्णयों का समीक्षण करके समूह की उत्पादकता, सक्रियता, और प्रभावशीलता में सुधार करना।
5. निरीक्षण और मूल्यांकन: समूह के कार्य की निरीक्षण करना, मूल्यांकन करना और अवस्थानुसार सुधार करना।
अभिलेखन के प्रकार:
अभिलेखन के दो महत्वपूर्ण प्रकार हैंः-
1. वर्णनात्मक प्रकार:- यह सबसे महत्वपूर्ण तरीका है। इसमें तथ्यों एवं कार्यों को विस्तार से लिखा जाता है तथा प्रत्येक घटना व स्थिति का स्पष्ट चित्रण किया जाता हैं। घटना का क्रमानुसार चित्रण होता है।
2. संक्षिप्त अभिलेख- इस प्रकार के अभिलेखों में सामाजिक अध्ययन व सामाजिक अतिवृत्ति को कई अंशो में विभक्त कर देते हैं। विषय के आधार पर संपूर्ण प्रक्रिया को कई भागों में विभाजित कर दिया जाता है, जैसे-अभिज्ञान आंकड़े, भागीकरण, अंतःक्रियाएं, समस्याएं इत्यादि।
2. समूह कार्य में अभिलेखन के उद्देश्य लिखें।
समूह कार्य में अभिलेखन के निम्नलिखित उद्देश्य हो सकते हैं:
1. संगठन और व्यवस्था: अभिलेखन समूह के कार्यों को संगठित और व्यवस्थित रखने में मदद करता है। यह समूह के कार्यक्रम, मीटिंगों, और प्रोजेक्ट्स के आदेश, संगठन, और अनुसंधान को बनाए रखने में मदद करता है।
2. ज्ञान संग्रहीतीकरण: अभिलेखन के माध्यम से समूह के सदस्यों की ज्ञान, जानकारी, और अनुभवों को संग्रहीत करने का उद्देश्य होता है। इससे समूह की साझा ज्ञानबांधी, सीखने, और अधिकारिता में सुधार होता है।
3. समीक्षा और मूल्यांकन: अभिलेखन समूह के कार्य को समीक्षा करने और मूल्यांकन करने के लिए उपयोगी होता है। समूह के कार्यक्रम, प्रोजेक्ट्स, और प्रगति की मापदंडों की जांच करने के लिए अभिलेखन के उद्देश्य से विचार किया जाता है।
4. संचालन और नियंत्रण: अभिलेखन के माध्यम से समूह के कार्यों का संचालन और नियंत्रण किया जा सकता है। यह समूह के कार्यों, अवधारणाओं, और नीतियों की जानकारी को प्रबंधित करने में मदद करता है और अनुभवों से सीखकर सुधार करने की क्षमता प्रदान करता है।
इन उद्देश्यों के माध्यम से अभिलेखन समूह कार्य में आदेश, संगठन, ज्ञान, मूल्यांकन, और नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है।
3. समूह कार्य में अभिलेखन के महत्व को लिखें।
समूह कार्य में अभिलेखन का महत्व निम्नलिखित कारणों से होता है:
1. संगठन और सुविधाजनकता: अभिलेखन समूह के कार्यों को संगठित रखने में मदद करता है। यह सभी दस्तावेज़, ज्ञान, और जानकारी को सुरक्षित और सुविधाजनक ढंग से संग्रहीत करने की सुनिश्चित करता है। इससे सदस्यों को आसानी से जरूरी जानकारी तक पहुंच मिलती है और कार्यों का आदेशित और तारीका से प्रबंधन होता है।
2. ज्ञान संग्रहीतीकरण: अभिलेखन समूह के ज्ञान को संग्रहीत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके माध्यम से समूह के सदस्य अनुभव, ज्ञान, और सफलताएं साझा कर सकते हैं। यह समूह के सदस्यों की समृद्धि और सीखने में मदद करता है और एक साझा ज्ञानबांधी का सृजन करता है जो समूह के लिए अनमोल संसाधन बनती है।
3. पुनरावृत्ति और सुधार: अभिलेखन समूह को अपने कार्यों की मूल्यांकन और समीक्षा करने का मौका देता है। समूह के द्वारा अभिलेखित डेटा, प्रगति रिपोर्ट, और अनुभवों का विश्लेषण किया जा सकता है, जिससे कार्यों में सुधार करने की जरूरत और क्षेत्रों में नई नीतियों और प्रक्रियाओं का आविष्कार किया जा सकता है।
4. संगठनात्मक संवेदनशीलता: अभिलेखन समूह को संगठनात्मक संवेदनशीलता प्रदान करता है। यह समूह के सदस्यों को उनके अभियांत्रिकी, अनुभव, और योग्यताओं के बारे में जागरूकता प्रदान करता है। इसके माध्यम से सदस्य अपने संगठन में महत्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्धारण कर सकते हैं और उन्हें अच्छी तरह से साझा कर सकते हैं, जिससे संगठन में एक मजबूत नेतृत्व संरचना विकसित होती है।
इस प्रकार, अभिलेखन समूह कार्य में विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह संगठितता, ज्ञान संग्रहीतीकरण, सुधार, और संगठनात्मक संवेदनशीलता को संभालने में मदद करता है। इसके माध्यम से समूह अद्यतन रहता है और अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रगति करता है।
4. समूह कार्य में मूल्यांकन की विधियों को लिखें।
BOOK P.NO. 133-134
समूह कार्य में मूल्यांकन की विभिन्न विधियाँ इस प्रकार हो सकती हैं:
1. स्वायत्तता के आधार पर मूल्यांकन: समूह के सदस्यों को स्वतंत्रता दी जाती है कि वे अपने कार्यों की मूल्यांकन करें। इसमें सदस्यों को स्वयं तय करने की स्वतंत्रता मिलती है कि वे किस प्रकार कार्यों को मूल्यांकित करेंगे, जैसे कि स्व-मूल्यांकन, आत्माविश्लेषण, या लिखित प्रतिक्रिया।
2. पारिस्थितिकी आधारित मूल्यांकन: समूह के सदस्यों द्वारा पारिस्थितिकी मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें दूसरे सदस्यों या नेतृत्व द्वारा अभिप्रेत किए गए मानकों और प्रमाणित निर्देशों के आधार पर समूह के कार्यों की मूल्यांकन की जाती है। इसमें लिखित या मौखिक रूप से प्रतिक्रिया और सुझाव प्रदान किए जाते हैं।
3. प्रशंसा या निंदा आधारित मूल्यांकन: समूह के सदस्यों द्वारा कार्यों की प्रशंसा या निंदा के माध्यम से मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें समूह के सदस्यों को आपसी संवाद द्वारा अपने सहयोगियों के कार्यों की प्रशंसा या निंदा करने की स्वतंत्रता मिलती है। इसका उद्देश्य समूह के सदस्यों को प्रोत्साहित करना और सुधार की सलाह प्रदान करना होता है।
4. सांख्यिकीय मूल्यांकन: समूह के कार्यों की मूल्यांकन की प्रक्रिया मात्रागणित के माध्यम से होती है। इसमें विभिन्न मापदंडों के आधार पर समूह के कार्यों को आंकलन किया जाता है, जैसे कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग, समय के प्रबंधन, कार्य की गुणवत्ता, योग्यता के आधार पर सदस्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन आदि।
5. अंतरंग मूल्यांकन: यह मूल्यांकन प्रक्रिया समूह के सदस्यों के बीच में होती है। सदस्यों को आपसी बहस और समाधान के माध्यम से अपने कार्यों की मूल्यांकन करने का मौका मिलता है। इसमें सदस्यों के बीच विचार-विमर्श और सहमति के माध्यम से कार्यों का मूल्यांकन किया जाता है।
इन मूल्यांकन विधियों का उपयोग समूह कार्य की गुणवत्ता, सदस्यों के प्रदर्शन की व्याख्या, सुधार के लिए सुझाव देने और सहयोगी परिणामों को पहचानने के लिए किया जाता है। ये मूल्यांकन विधियाँ समूह के सदस्यों को स्वचालित रूप से मूल्यांकन करने और समूह के कार्यों के प्रबंधन में सहायता प्रदान करने में मदद करती हैं।
5. समूह कार्य में पर्यवेक्षण की भूमिका का उल्लेख करें।
समूह कार्य में पर्यवेक्षण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्यवेक्षण समूह के कार्यों, प्रगति और प्रदर्शन की निगरानी और मूल्यांकन करने का माध्यम है। इसके माध्यम से समूह के नेता और प्रशासनिक प्रभावशाली व्यक्ति समूह के कार्यों को नियंत्रित कर सकते हैं और सही मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।
पर्यवेक्षण के माध्यम से निम्नलिखित कार्यों को सम्पन्न किया जाता है:
1. प्रगति की माप: पर्यवेक्षण के द्वारा समूह के नेता और प्रशासनिक प्रभावशाली व्यक्ति समूह की प्रगति को मापते हैं। यह उन्हें बताता है कि क्या समूह अपने लक्ष्यों की ओर प्रगति कर रहा है या नहीं।
2. कार्य का मूल्यांकन: पर्यवेक्षण समूह के कार्यों की मूल्यांकन करने में मदद करता है। समूह के नेता और प्रशासनिक प्रभावशाली व्यक्ति को इसके माध्यम से पता चलता है कि कार्य कितना सफल और गुणवत्तापूर्ण है और कहां सुधार की जरूरत है।
3. संघटन का मार्गदर्शन: पर्यवेक्षण द्वारा समूह के नेतृत्व को संघटन की मार्गदर्शन करने में मदद मिलती है। समूह के कार्यों की प्रगति को देखते हुए नेतृत्व सही निर्णय और सही कार्रवाई कर सकते हैं और समूह को सफलता की ओर आगे ले जा सकते हैं।
4. संघटन के संघटकों की प्रगति का मूल्यांकन: पर्यवेक्षण के माध्यम से समूह के सदस्यों की प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है। यह समूह के नेता को बताता है कि कौन-कौन सदस्य अपने कार्यों में सफल हैं और किसी भी क्षेत्र में सुधार की जरूरत है।
5. गतिविधियों का अनुसरण: पर्यवेक्षण समूह के गतिविधियों का निगरानी करने में मदद करता है। इससे समूह के नेतृत्व को यह पता चलता है कि क्या सभी गतिविधियाँ समय पर हो रही हैं और कार्यों की अच्छी प्रगति हो रही है।
पर्यवेक्षण समूह कार्य में नेतृत्व और प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है जो समूह के सदस्यों को मार्गदर्शन और मूल्यांकन में मदद करता है।
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