Skip to main content

सतत विकास के आयाम: दीर्घ उत्तरीय

  इकाई प्रथम

विकास अर्थ परिभाषा एवं आयाम

1.  विकास को परिभाषित कीजिये। किसी सर्वमान्य विकास परिभाषा को निर्धारित करना क्यों कठिन है। समझाइये।

विकास एक प्रक्रिया है जिसमें समाज, अर्थव्यवस्था, और सांस्कृतिक तत्वों की स्थिति और गुणवत्ता में सुधार होता है। इसका मुख्य उद्देश्य मानव समाज के सभी सदस्यों के जीवन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, और जीवनस्तर में सुधार करना होता है। विकास की प्रक्रिया सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक, राजनीतिक, और पर्यावरणीय मानकों के अनुसार मापी जाती है।

किसी सर्वमान्य विकास परिभाषा को निर्धारित करना कठिन होता है क्योंकि विकास एक बहुआयामी और समग्र प्रक्रिया है जो समाज, अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक मान्यताएं, नैतिकता, और पर्यावरण के कई पहलुओं को संलग्न करती है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, और पर्यावरणीय प्रासंगिकताओं के अनुसार विकास की प्राथमिकता और लक्ष्य भिन्न हो सकते हैं। विकास की परिभाषा समाज, राष्ट्रीयता, और संसाधनों के विभिन्न मानकों और मूल्यों के साथ व्यक्तिगत और सामरिक मतभेदों पर आधारित होती है। इसलिए, एक सर्वमान्य विकास परिभाषा तय करना या संयुक्त परिभाषा निर्माण करना कठिन होता है।


2.   विकास के विविध आयामों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

यहां सतत विकास के विभिन्न आयामों के उदाहरण दिए जाते हैं:

1. सामाजिक सातत्यता:

   - शिक्षा: सामाजिक सातत्यता का महत्वपूर्ण आयाम शिक्षा है। शिक्षित समाज की विकासमय क्षमता में सुधार होता है और सामाजिक न्याय एवं उच्च जीवनायान के साथ सभी व्यक्तियों को समान अवसर मिलते हैं।

   - स्वास्थ्य: उच्च स्वास्थ्य स्तर का समाज मानसिक और शारीरिक रूप से सक्रिय होता है। स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में सुधार इस आयाम के तहत आते हैं।

   - सामाजिक सुरक्षा: समाज में गरीब, असहाय और वंचित वर्गों की सुरक्षा और सहायता को बढ़ावा देना इस आयाम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सामाजिक न्याय और उदारीकरण के माध्यम से सामाजिक सामंजस्य को बढ़ाता है।

2. आर्थिक सातत्यता:

   - ग्रामीण विकास: ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना आर्थिक सातत्यता का महत्वपूर्ण आयाम है। कृषि, ग्रामीण उद्योग और संबंधित क्षेत्रों में उद्यमिता, रोजगार संभावनाएं और आर्थिक आधार को मजबूत करने पर ध्यान देना आवश्यक है।

   - उद्योगिकीकरण: उद्योग क्षेत्र में नई तकनीक, उद्यमिता और नवाचारों के लागू होने से आर्थिक सातत्यता बढ़ती है। उद्योगों की विकास और प्रगति से रोजगार सम्भावनाएं बढ़ती हैं और आय का स्रोत मजबूत होता है।

3. पर्यावरणीय सातत्यता:

   - प्रदूषण नियंत्रण: प्रदूषण कम करना और पर्यावरण संरक्षण के लिए उचित कार्रवाई इस आयाम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पर्यावरणीय सतत्ता को बढ़ाने के लिए उर्जा संरक्षण, जल संरक्षण, प्रदूषण कम करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जनता को जागरूक करने की जरूरत होती है।

   - वन संरक्षण: वन संरक्षण और पौधों के संरक्षण पर ध्यान देना पर्यावरणीय सातत्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वन संरक्षण नदियों, जलवायु, वन्यजीवों और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है।

यह थे कुछ उदाहरण सामाजिक सातत्यता, आर्थिक सातत्यता और पर्यावरणीय सातत्यता के विभिन्न आयामों के बारे में। ये आयाम समाज के समृद्धि और समान विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं और एक स्थिर, स्थायी और संतुलित समाज की नींव हैं।


3.   जीवन की गुणवत्ता और विकास सूचकांकों के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।

जीवन की गुणवत्ता और विकास सूचकांकों के मध्य सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण है। जीवन की गुणवत्ता सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दृष्टि से एक व्यक्ति के जीवन में कुशलता, सुख, समृद्धि और संतुष्टि को मापने वाली प्रभावशील उपायोगिता है।

विकास सूचकांकों के माध्यम से हम जीवन के विभिन्न पहलुओं को मापते हैं और मूल्यांकन करते हैं। विकास सूचकांक आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य, पर्यावरण और अन्य क्षेत्रों में वृद्धि और प्रगति की मापदंड होते हैं।

जीवन की गुणवत्ता और विकास सूचकांकों के बीच सम्बन्ध होता है क्योंकि एक उच्च गुणवत्ता वाले जीवन में सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और मानसिक विकास के मापदंडों को प्राप्त करने की संभावना बढ़ती है। यह सूचकांक व्यक्ति और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि एक समृद्ध और स्वस्थ समाज की नींव एक समृद्ध और स्वस्थ व्यक्ति होती है।

जीवन की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समानता, समाज में सहभागिता और सामाजिक न्याय के प्रभावी उपायोग की आवश्यकता होती है। विकास सूचकांकों के माध्यम से समाज में सामाजिक, आर्थिक और मानसिक प्रगति के लक्षणों को मापा जा सकता है और विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए नीतियों और कार्यक्रमों को निर्धारित किया जा सकता है।


4.   सामाजार्थिक क्षेत्र के विद्वानों ने विकास के पैमानों को किस प्रकार स्पष्ट किया है।

सामाजार्थिक क्षेत्र के विद्वानों ने विकास के पैमानों को विभिन्न प्रकार से स्पष्ट किया हैं। यह पैमाने निम्नलिखित रूपों में समझे जा सकते हैं:

1. आय-व्यय और आर्थिक विकास: इस पैमाने में विकास का माप व्यक्ति और समाज की आर्थिक स्थिति, उत्पादन क्षमता, आय का वितरण, बेरोजगारी दर, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता, और अन्य आर्थिक मापदंडों के माध्यम से होता है।

2. शिक्षा और ज्ञान: इस पैमाने में विकास का माप शिक्षा स्तर, स्कूलों और कॉलेजों की उपलब्धता, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात, अंतर्राष्ट्रीय पदाधिकारियों की संख्या, ज्ञान की प्रगति, शैक्षिक संस्थानों के स्थानीय समर्थन और अन्य शिक्षा संबंधित मापदंडों के माध्यम से होता है।

3. सामाजिक सुरक्षा और न्याय: इस पैमाने में विकास का माप समाजिक सुरक्षा, न्याय, महिला और दलित सशक्तिकरण, गरीबी उन्मूलन, बाल श्रम निषेध, जनसंख्या का प्रबंधन, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, और अन्य सामाजिक मापदंडों के माध्यम से होता है।

4. स्वास्थ्य और कल्याण: इस पैमाने में विकास का माप जनसंख्या के स्वास्थ्य की स्थिति, मृत्युदर, रोगों का प्रसार, प्राथमिक और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं, प्रशासनिक क्षमता, आहार एवं पोषण, और अन्य स्वास्थ्य संबंधित मापदंडों के माध्यम से होता है।

इन पैमानों के माध्यम से समाज में विकास की अवस्था को मापा जा सकता है और उच्चतम सामाजिक और आर्थिक स्थिति की प्राप्ति के लिए नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण किया जा सकता है।


5.   विकास के समसामययिक माॅडल से पृथ्वी के लोगों के सम्मुख कौन-कौन सी प्रमुख चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं। 1.2 विकास से उपभोक्तावाद में वृद्धि

मानव की आधुनिक जीवन पद्धति जैसे संसाधनों के उपयोग के बजाय दोहन की प्रवृत्ति, उपभोक्तावादी नीति, आरामदेह एवं अनियंत्रित दिनचर्या, स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति, सहजीविता के स्थान पर परजीविता का दृष्टिकोण, आत्मनिर्भरता के बजाय परनिर्भरता की प्रकृति ने मानव को मानवीय गुणों से दूर किया है। पुनश्च मशीनीकरण एवं तरह तरह के घरेलु उपकरणों जैसे वातानुकुलन संयंत्र, शीतलन संयंत्र, दूरदर्शन, दूरभाष इत्यादि संसाधनों ने मानव को एक यंत्रवत पुतला बना दिया है। मानव यह भूल ही गया है कि वह और पर्यावरण प्रकृति के दो अविभाज्य एवं परस्पर पूरक घटक है। अर्थात पर्यावरण के विकास में ही हमारा विकास है एवं पर्यावरण की स्वस्थता एवं संमृद्धता ही हमारी स्वस्थता एवं संमृद्धता है। हमे सतत् विकास हेतु प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं संवर्धन करना होगा ताकि अगामी पीढियों के पास भी उक्त संसाधन मौजूद रहे। प्रत्येक मानव अपने पर्यावरण की गुणवत्ता का संरक्षण एवं परिवर्धन सतत् करता रहे ताकि हमको मिली प्राकृतिक विरासत अगामी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रह सके। विकास असीमित नहीं हो सकता क्योंकि अनेक प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, जैसे-

कोयला-यह पारम्परिक ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत वर्तमान में भारत का कोयला उत्पादन में विश्व में पाचंवा स्थान है। इसी प्रकार लिग्नाइट जो कि कोयले का ही एक प्रकार है एवं इसे भूरा कोायला कहा जाता है इनकी खपत निरन्तर बढ़ती जा रही है। 
पेट्रोलियम-यह काफी ज्यादा मात्रा में पृथ्वी की सतह में पाया जाता है। ऊर्जा स्रोत होने के साथ-साथ इसका उपयोग दवाओं ,उर्वरक ,खाद्य सामग्री, प्लास्टिक, भवन निर्माण, पेन्ट, कपड़ा उद्योग इत्यादि में किया जाता है। 
प्राकृतिक गैस- इसके द्वारा न्यूनतम प्रदूषण होने से इसे हर्रा इंधन भी कहते है। जिस गति से इनका उपभोग किया जा रहा है, अगले कुछ वर्षों में पृथ्वी से अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।

1.3 विकास से पृथ्वी एवं लोगों के समक्ष आयी चुनौतियाॅ
मनुष्य ने तरक्की तो की किन्तु इसके बदले में प्रकृति एवं मानवता के समक्ष अनेक गंभीर चुनौतियाॅ भी प्रदान किया। अनियन्त्रित उपभोग के कारण पर्यावरण के समक्ष ऐसे संकट उत्पन्न हो रहे हैं जो न केवल मानव बल्कि पृथ्वी के अन्य समस्त जीवधारियों के अस्तित्व के लिए भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं। उनमें से कुछ प्रमुख यहाँ प्रदान किए जा रहे हैं -

1. तापमान बृद्धि से फसलों की पौष्टिकता में कमी: मानव के अनेक क्रियाकलापो एवं कुछ प्राकृतिक क्रियाओ के फलस्वरुप प्रायः अनेक हाउस गैसे जैसे कार्बन डाई आक्साइड, हाइड्रोजन मोनो आक्साइड, मीथेन ;ब्व्2ए भ्2व्ए ब्भ्4द्ध इत्यादि उत्पन्न होती है। कार्बन डाई आक्साइड गैस मानवीय कारणों जैसे ज़ंगलो की कटाई और जीवाश्म ईधंन के जलने और प्राकृतिक कारणों जैसे श्वसन और ज्वाला मुखी के विस्फोट से वातावरण में आती हैं। ये वायुमंडल मे एकत्रित होकर विशाल परत बनाती है जो पृथ्वी की गर्मी को वायुमंडल मे नही जाने देती। इसके कारण धरती के तापमान में निरन्तर बृद्धि हो रही है। इसे ग्रीन हाउस इफेक्ट के नाम से जाना जाता है। पिछले 150 वर्षों में तेज अैद्योगिकरण से धरती का तापमान 1.1 डिग्री बढ़ा है। बढ़ा हुआ तापमान फसलों की पौष्टिकता को कम रहा है। गेहूँ व चावल जैसी फसलों में प्रोटीन, जिंक, आयरन कम हो रहा है। बिगत वर्षों में गर्म हवाओं की जल्द आमद और बारिस में कमी से भारत में गेहूँ के उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। नतीजतन सरकार को गेहूं के  निर्यात पर पाबंदी लगानी पड़ी।

2. समुद्र की गर्मी बढ़ने से समुद्री जीव खतरे में: 1901 के बाद से समुद्री सतह के तापमान में 1.5 डिग्री की वृद्धि हुई है। साथ ही बीते 200 वर्षों में समुद्र अम्लीयता (एशिडीफीकेशन) में 30 प्रतिशतकी बृद्धि हुयी है। उससे कोरल रीफ अर्थात समुद्री मूंगंे की चट्टानों में रहने वाले जीवों का घर खतरे में है। केकड़ा, झींगा मछली जैसे जीवों के लिए अपना खोल बनाना मुश्किल हो गया है। इसके कारण 25 प्रतिशत समुद्री जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है।

3. प्रदूषण से हर साल 90 लाख मौतें: इंसान हर साल लाखों मीट्रिक टन प्रदूषण फैला रहा है वायु प्रदूषण से न सिर्फ पृथ्वी की सुरक्षा करने वाले ओजोन परत को नुकसान हुआ, बल्कि इसने हमारी सेहत को भी बिगाड़ा है। लैसेंट की रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण से 90 लाख लोगों की असमय मौत हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा 24 लाख मौतें भारत में हो रही हैं।

4. रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक डालने से उपजाऊ भूमि खराब होना:अधिक उपज के रासायनिक उर्वरकों का निरन्तर उपयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार फसलों को कीड़ों से बचानें के लिए कीटनाशकों का भी बेहिसाब उपयोग किया जा रहा है। 1990 से 2018 के बीच दुनिया में इसका उपयोग करीब दोगुना बढ़कर 23 लाख टन से 41 लाख टन हो गया है। इससे भूमि, पानी और हमारी सेहत को भी नुकसान हुआ है। विश्व में कृषि भूमि का 64 प्रतिशत हिस्सा (245 लाख वर्गकिमी) रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से खराब हो रहा है।

5. बीते 25 साल में 13 लाख वर्ग मील के जंगल काट दिए हैं: विश्व बैंक का अनुमान है कि 20वीं सदी की शुरूआत से अब तक 1 करोड़ वर्ग किमी. जंगल मनुष्य ने नष्ट किए हैं। पिछले 25 वर्षों में ही 13 लाख वर्ग किमी. जंगल सिकुड़ गए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1960 के दशक के बाद से आधे से अधिक वन नष्ट हो गए हैं। हर सेकंड एक हेक्टेयर से अधिक उष्णकटिबंधीय वन नष्ट हो जाते हैं।

6. ओजोन परत का ह्रास:आॅक्सीजन पर सूर्य के प्रकाश की क्रिया से ओजोन गैस बनती है । यह पृथ्वी की सतह से 20 से 50 किमी ऊपर एक पर्त बनाती है। वायुमंडल में यह प्रक्रिया प्राकृतिक रुप से चलती रहती है पर बहुत धीमी होती है। इसके प्रत्येक अणु में तीन परमाणु होते है। यह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणो से बचाती है। उपरी वायुमंडल का ओजोन पराबैगनी  किरणो को सोखकर इन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से रोकती है। रेफ्रिजरेटरो, वातानुकूलन के सयंत्रों, एरोसोल के छिड़काव इत्यादि द्वारा उत्सर्जित क्लोरोफ्लोरो कार्बन ओजोन पर्त के साथ क्रिया कर उसे उसे नष्ट कर रहें हैं। वस्तुतः ये सी.एफ.सी. अणु ओजोन के अणुओं से क्रिया करके उन्हें आॅक्सीजन के अणुओ में तोड़ देते हैं आॅक्सीजन के अणु पराबैगनी किरणो को नही सोखते। 1980 के दशक में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन की पर्त को पतला होते पाया गया है। यही प्रवृत्ति अब आॅस्ट्रेलिया समेत दूसरे स्थानो पर भी देखने को मिली है। ओजोन पर्त का विनाश होने से सूर्य की पराबैगनी किरणे पृथ्वी पर पॅहुचकर त्वचा कैसंर जैसी गम्भीर बीमारियो को जन्म देती है।

7. जलवायु परिवर्तन:जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है। जलवायु परिवर्तन के 5 प्रमुख लक्षणहैं। कार्बन डाई आक्साइड की विश्वव्यापी सान्द्रता में वृद्धि, विश्वव्यापी सतह तापमान में वृद्धि, उŸारी ध्रुवीय (आर्कटिक) समुद्र की बर्फ मे कमी, स्थलीय बर्फ में कमी तथा समुद्र के जल स्तर में वृद्धि। वर्ष 2005-2010 में विश्वव्यापी सतही तापमान सर्वाधिक दर्ज किए गए। आर्कटिक समुद्र की बर्फ में 1979 से लेकर 2000 की औसत बर्फ की तुलना में अब 11.5 प्रतिशत की दर से कमीं आ रही है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैण्ड दोनो जगह स्थलीय हिम की परत पिघल रही है। अंटार्कटिका महाद्वीप की वर्फ में वर्ष 2002 से प्रतिवर्ष 100 घन किलोमीटर की कमी आ रही है। इसी प्रकार सन् 1970 से 1990 के बीच समुद्र स्तर 1.70 मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ रहा था जबकी 1994 के बाद से यह वृद्वि 3.19 मिमी की दर से प्रतिवर्ष बढ रहा है। इस प्रकार से जलवायु परिवर्तन के पीछे वैज्ञानिक पक्ष सुस्पष्ट है कि उक्त घटनाएं पर्यावरण के प्रति मानव के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का परिणाम है।

चूँकि जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण हमारे विभिन्न गतिविधियों जैसे दहन, परिवहन, इत्यादि के लिए उŸाम किस्म के चूल्हो, परिवहन के लिए उच्च दक्षता के इंजनो एवं औद्योगिक करण में भी उच्च दक्षता की मशीनों का प्रयोग किया जाय तो कार्बन उत्सर्जन मे कमी लाई जा सकती है। इन सभी सयंत्रो व मशीनो की दक्षता केवल तकनीकी परिवर्तन कर प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही यदि पर्यावरण के प्रति जनजागरूकता उत्पन्न की जाये तो मानव अपनी जीवन शैली परिवर्तित कर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन की चुनौती को कम कर सकता है। 

1.3.1 और अब प्रकृति हमसे क्या चाहती है

1. इको सिस्टम को बचाने के लिए लैंड यूज में बदलाव रोकना होगा:पिछले 50 वर्षों में हमारे इकोसिस्टम को अभूतपूर्व नुकसान हुआ है। इसका सबसे बड़ा  कारण है- लैंड और सी यूज में बदलाव। इंसान ने भूमि का उपयोग बदल किया है और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभावों को अनदेखा कर 1970 के बाद फसलों का उत्पादन 300 गुना बढ़ा लिया। लेकिन इकोसिस्टम को बचाने के लिए यह प्रवृत्ति रोकनी होगी।

2. पानी, गैस, तेल जैसे संसाधनों का अति दोहन रोकना होगा: शिकार, मछली पकड़नें और लकड़ी काटने से लेकर तेल, गैस, कोयला और पानी को धरती के भीतर से निकालने से दुनिया के बड़े हिस्से में तबाही आई है। प्रकृति इंसान को साल भर इस्तेमाल के लिए जो संसाधन देती ह,ै उसे इंसान 6-7 माह में ही खर्च कर देता है। हमें संसाधनों का उतना ही इस्तेमाल करना होगा, जितना हर साल प्रकृति फिर बना लेती है।

3. एक बड़ा संदेश जो प्रकृति इंसान को रोज भेज रही है: प्रकृति का संदेश एकदम साफ है। प्रकृति एवं मानवता एक दूसरे के पूरक हैं। अगर हम फूल-पौधे, पशु-पक्षी कीट-पंतगे, शैवाल को संरक्षित करते हैं तो हम भी सुरक्षित हैं। इनके बिना मनुष्य का धरती पर टिकना संभव नहीं है फिर इंसान क्यों पेड़-पौधों कीट-पतंगों के महत्व को नहीं पहचान रहा है। उसने क्यों ताजी हवा ,बहते पानी का आनंद लेना छोड़ दिया है। 

4. पशु-पक्षियों को बचाने के लिए उपभोग के प्रति सतर्क होना: पर्यावरण परिवर्तन से 47 प्रतिशत पक्षी प्रभावित हुए हैं। ग्लोबल वार्मिंग से इनकी 5 प्रतिशत प्रजातियाँ खत्म हो सकती हैं। इधर 2050 तक हमारी आबादी 8 अरब से अधिक होगी। यानी इंसान अन्य जीव-जंतुओं की जगह पर कब्जा और बढ़ाएंगे ऐसे में हमें उपभोग के प्रति सतर्क होना होगा। हमें क्लीन एनर्जी जैसे सोलर ऊर्जा, ई-व्हीकल को तेजी से अपनाना होगा।

5. जंगल व वन्य जीवों की दुनिया में दखलंदाजी बंद करनी होगी:मनुष्य ने वन्य जीवों की दुनिया में बेवजह की दखलंदाजी की है इसलिए सभी नए संक्रामक रोगों में से सिर्फ 75 प्रतिशत वन्यजीवों से हो रहे हैं। कोविड, साॅर्स जैसी महामारियां इसी का नतीजा है। हमारा स्वास्थ्य पूरी तरह से जलवायु और उन अन्य जीवो पर निर्भर करता है, जिनके साथ हम पृथ्ची पर रह रहे हैं। हमें जीवो की दुनिया में दखलंदाजी बंद करनी होगी।

6 जैव विविधता संरक्षण: ‘‘जैव विविधता को संरक्षित करना जैव विविधता का संरक्षण कहलाता है।’’ चूॅकि जैव विविधता मानव सभ्यता के विकास की स्तम्भ है, इसलिए इसका संरक्षण अति आवश्यक है। जैव विविधता हमारे भोजन, कपड़ा, औषधि, ईंधन आदि की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी भूमिका अदा करती है। जैव विविधता पारिस्थितिक सन्तुलन को बनाये रखने में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त यह प्राकृतिक आपदाओें जैसे बाढ, सूखा आदि से राहत प्रदान करती है। वास्तव में जैव विविधता प्रकृति की स्वाभाविक सम्पत्ति है और इनका क्षय एक प्रकार से प्रकृति का क्षय है। अतः प्रकृति को नष्ट होने से बचाने के लिए जैव विविधता को संरक्षण प्रदान करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।   

वश्व स्तर पर विकास के वैकल्पिक माॅडल के बारे में बहस जोर पकड़ रही है क्योंकि विकास के मौजूदा माॅडल की कमियां स्पष्ट होती जा रही हैं। विकास की मौजूदा राह में पर्यावरण विनाश व जलवायु परिवर्तन जैसा गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है।गरीबी और अभाव आज भी बडे स्तर पर बने हुए हैं जबकि विषमता और तेजी से बढ रही है। उपभोक्तावाद, लालच और प्रतिस्पर्धा पर आधारित विकास की राह न केवल सामाजिक समरसता व सहयोग में कमी कर रही है बल्कि इसके कारण नए तनाव उत्पन्न हो रहे हैं।इस स्थिति मे पेचीदा होती समस्याओं के बीच विकास के वैकल्पिक माॅडल की जरूरत है।

अब केवल राष्ट्रीय आय व जीएनपी की वृद्धि पर मात्र फोकस करना उचित नहीं है। क्योंकि प्रायः जीएनपी की तेज वृद्धि के दौर में ही पर्यावरण का विनाष असहनीय हद तक बढ गया है। यदि कोई समुदाय एक वर्ष में अपने वन काट के बेंच देता है तो उसकी आय में अधिक वृद्धि दर्ज होती है जबकि कोई समुदाय वनों को बचाकर रखता है तो उसकी आय में वृद्धि दर्ज नहीं होती है। किसी बस्ती में शराब व जुए का कारोबार दूर-दूर तक फैलता है तो उसकी आय मे तेज वृद्धि दर्ज हो जाती है, जबकि इससे किसी की भी भलाई संभव ंनहीं है।
अतः राष्ट्रीय आय के मानदंड को छोड़कर हमें यह पूछना चाहिए कि दुनिया बेहतर बन रही है कि नहीं। इस व्यापक सोंच में यह सवाल बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या सब लोगों की बुनियादीं जरूरतें बेहतर ढंग से पूरी हो रहीं हैं या नहीं। सब लोगों की रोटी, कपडा, मकान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना बडी प्राथमिकता बननी चाहिए। अतः विकास के वैकल्पिक राह पर विमर्श अब अति महत्वपूर्ण हो गया है। इसका एक पक्ष तो यह स्पष्ट है कि अब लोगों की बुनियादी जरूरतों को स्थायी तौर पर पूरा करने के साथ ही ंपर्यावरण की रक्षा करने को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास केवल अल्पकालीन नहीं होने चाहिए, अपितु टिकाऊ होने चाहिए। यह तभी हो सकता है जब प्राकृतिक संसाधनो के आधार एवं, पर्यावरण की रक्षा को साथ-साथ उच्च महत्व मिले। भोजन और आश्रय से बडी जरूरत साफ हवा व पानी की है, यह जरूरत भी पर्यावरण की रक्षा से जुडी हुई है। पर्यावरण रक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रित करने के जो भी प्रयास अभी संभव है वह किए जाए। बढ़ती आपदाओं से बचाव की बेहतर तैयारी को विभिन्न स्तरों पर समुचित महत्व देना जरूरी है।

पर यह तभी संभव हो सकेगा यदि विश्व व राष्ट्रीय स्तर पर सम्पत्ति व आय की अत्यधिक विषमताओं को कम किया जा सके और इस तरह उच्चतम प्राथमिकता .वाले कार्यो ंको आगे बढाने के लिए आर्थिक संसाधन प्राप्त किए जा सकें। अतः विश्व स्तर पर व अपने देश के स्तर पर आर्थिक विषमता को कम करना बहूत जरूरी है।
जब सभी लोगों व विशेषकर निर्धन लोगों की जरूरतों पर विशेष ध्यान की बात कही जाती है तो उसके साथ एक सवाल यह भी जुड़ जाता है कि क्या अन्याय केवल आर्थिक स्तर पर होता है, या इसके विभिन्न सामाजिक संदर्भ में भी जाति, धर्म, रंग, नस्ल लिंग आदि के आधार पर कई तरह के गंभीर भेद-भाव मौजूद हैं और इस तरह के अन्याय को दूर करने को भी ऊंची प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मूल उद्देष्य तो यह है कि न्याय व समता पर आधारित सामाजिक सद्भावना व भाईचारा भी ऐसी व्यवस्था में ही अच्छी तरह पनप सकता है।
मानव समाज का दुख-दर्द बहुत हद तक उसके आपसी सम्बन्धों से जुडा है। सामाजिक बिखराव व पारिवारिक टूटन के कारण बढ़ती आय के दौर से भी दुख-दर्द बढ सकता है। विभिन्न समुदायो ंमें टकराव से या सांम्प्रदायिकता से अमन-शांति छिन सकती है, सामाजिक ताना-बाना टूट सकता है। अतःसद्भावना व सहयोग को बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है, इसके लिए सतत् प्रयास होने चाहिए।

सामाजिक सौहार्द व सद्भावना के लिए निरंतरता से प्रयास करते हुए इन प्रयासांे को द्वेष व दुनियां में अमन-शांति के व्यापक प्रयासों से जोड़ना चाहिए। इससे निशस्त्रीकरण के प्रयासों को जनमत का व्यापक आधार मिलेगा। सभी महाविनाशक हथियारों को धरती से दूर करने का लक्ष्य सदा सामने रहना चाहिए। एक बडी संभावना हमारे सामने यह भी है कि जो खरबों रूपये बहुत विनाशक हथियारो व अन्य सैन्य खर्च पर दुनिया भर में लग रहें हैं उन्हें प्राथमिकता के विकास कार्यों व पर्यावरण रक्षा के कार्यों पर खर्च किया जाय।

कितना बजट व अन्य संसाधन विकास कार्यो ंमें जाएंगे व कितने हथियारों में, कितने शहरी विकास मे ंजाएंगे व कितने ग्रामीण में, कितने संसाधन जरूरतों की वस्तुओं पर खर्च होंगे व कितने विलासिता पर यह सब महत्वपूर्ण सवाल हैं। इस तरह न्यायसंगत प्राथमिकताओं, अमन, पर्यावरण, रक्षा व समता के लक्ष्यों को लेकर ही पूरी दुनिया ंमें विकास का सही मार्ग तय होना चाहिए । सब कुछ बाजार के जिम्मे ंनही ंछोडा जा सकता है, व देष-दुनिया के स्तर पर आर्थिक नियोजन की जरूरत है ताकि न्यायसंगत प्राथमिकताओं को पूरा किया जा सके।
पर्यावरण की रक्षा, खाद्य-सुरक्षा व करोडों लोगों की आजीविका की रक्षा जरूरी है। उस माॅडल को स्वीकार नहीं किया जा सकता है जिसमें गाॅंववासियों के विस्थापन व महानगरों की बढती जनसंख्या  को विकास माना जाता है। इसके स्थान पर गांवों व कस्बो ंमें स्थायित्व व वहां अधिक विविधता भरे रोजगारों की उपलब्धि को महत्व देने पर बल दिया जा रहा है जिससे कृषि के साथ अन्य रोजगार भी गांवों के पास उपलब्ध रहें। इस संदर्भ में आदिवासियों के विस्थापन को रोकने को विषेष महत्व देना चाहिए।
विकेंन्द्रीकरण की नीतियां अपनानें से ग्रामीण विकास के नए रचनात्मक आयाम खुल सकतें हैं। भूमंडलीकरण के स्थान पर विकेंन्द्रीकरण की नीति को विकास का प्रमुख आधार बनाना चाहिए।

साथ में यह समझना जरूरी है कि धरती केवल मनुष्यों के लिए नहीं है। सभी प्रजातियों की रक्षा व उनके पनपने के प्राकृतिक स्थानों की रक्षा को समुचित महत्व मिलना चाहिए। पर्यावरण क्षरण रोकने हेतु हमको पर्यावरण हितैषी पदार्थो ,तकनीकों,दिनचर्या एवं जीवनशैली को अपनाना होगा।संक्षेप में उक्त दृष्टिकोण से भरी जीवन पद्धति से पर्यावरण का विकास होगा तथा हम व हमारी अगामी पीढ़ी खुशहाल रह सकेगी अन्यथा कि दशा मे पर्यावरण क्षरण एवं हमारा विनाश सुनिश्चित होगा।

6.   सातत्य को परिभाषित करते हुये इसके विविध आयाम स्पष्ट कीजिये।




सातत्य एक व्यापक अवधारणा है जो विकास के लिए महत्वपूर्ण है। सातत्य का मतलब होता है संतुलन और सुरक्षा के साथ एक निरंतर और स्थायी प्रगति का अनुभव करना। सातत्य के विभिन्न आयामों को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:

1. सामाजिक सातत्य: सामाजिक सातत्य में समाज के सभी वर्गों, जातियों और समुदायों को समानता, न्याय और अवसरों का समान दर्जा मिलना चाहिए। सामाजिक सातत्य के आयाम में शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमिकाएं, समाजिक सुरक्षा, भाषा और संस्कृति के मामले शामिल होते हैं।

2. आर्थिक सातत्य: आर्थिक सातत्य में सभी व्यक्ति को आय, रोजगार, व्यापारिक संभावनाएं और आर्थिक सुरक्षा के साधनों का निश्चित स्तर प्राप्त होना चाहिए। आर्थिक सातत्य के आयाम में वित्तीय स्थिरता, रोजगार सृजन, उद्योग, कृषि, खाद्य सुरक्षा, बाजार संरचना आदि शामिल होते हैं।

3. पर्यावरणीय सातत्य: पर्यावरणीय सातत्य में संतुलित और संरक्षित पर्यावरण के

 साथ विकास की गति रखनी चाहिए। इसमें स्वच्छता, जलसंरक्षण, ऊर्जा प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग, वन संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, जलवायु परिवर्तन के सामरिकता आदि आते हैं।

इन सातत्य के आयामों को संतुलित रूप से प्रभावी बनाने के लिए सभी संघर्षशील और संयुक्त प्रयास करने चाहिए, जिसमें सरकार, समाज, स्वयंसेवी संगठन, विशेषज्ञ और विभिन्न सामाजिक गतिविधियाँ शामिल हों।

*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई द्वितीय

सामाजिक सातत्यता की अवधारणा एवं सतत विकास लक्ष्यों में सामाजिक सातत्यता


   

2.1.1 सतत विकास लक्ष्यों में सामाजिक सातत्यता

सतत विकास लक्ष्यों में प्रारम्भ के पांच लक्ष्य तथा लक्ष्य क्रमांक 10 एवं 16सामाजिक सातत्यता स्थापित करने के लिए कार्य करने पर बल देते हैं। इस प्रकार 17 सतत विकास लक्ष्यों में सें 7 लक्ष्य सामाजिक सातत्यता से संबंधित है, जो निम्नांकित हैं-

1.पूप विश्व से गरीबी के सभी रूपों की समाप्ति। (लक्ष्य-1)
2.भूख की समाप्ति, खा़द्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और सतत कृषि को बढावा। (लक्ष्य-2)
3.सभी आयु के लोगो में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढावा। (लक्ष्य-3)
4.समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही सभी को सीखने का अवसर देना। (लक्ष्य-4)
5.लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही महिलाओ और लड़कियों को सशक्त करना। (लक्ष्य-5)
6.देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना । (लक्ष्य-10)
7.सतत विकास के लिए शांतिपूर्ण और समावेशी समितियों को बढावा देने के साथ ही सभी स्तरो पर इन्हें प्रभावी जवाबदेह बनना  ताकि सभी के लिए न्याय सुनिश्चित हो सके। (लक्ष्य-16)


3. गरीबी उन्मूलन के लिये केन्द्र और राज्य स्तर पर किये जा रहे प्रयासों पर समीक्षात्मक आलेख लिखिये।


1. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा): इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में एक वित्तीय वर्ष में सौ दिनों की मजदूरी-रोजगार की गारंटी देकर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका सुरक्षा को बढ़ाना है, यह सहायता परिवार के उस सदस्य को दी जाती है जो सदस्य अकुषल श्रमिक है।

यह राज्य के साथ साझेदारी में शुरू किया गया भारत सरकार का कार्यक्रम है। मनरेगा ग्रामीण गरीबी (ग्रामीण गरीबी की तीव्रता) और मौसमी गरीबी को कम करने में मदद करता है, लेकिन समग्र गरीबी को कम करने में मददगार नहीं है।

2. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम): एनआरएलएम गरीबों के मजबूत जमीनी स्तर के संस्थानों के निर्माण के माध्यम से गरीबी को कम करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम है। ये संस्थाएँ गरीब परिवारों को लाभकारी स्वरोजगार और कुशल वेतन रोजगार के अवसरों तक पहुँच बनाने में सक्षम बनाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी आय में स्थायी आधार पर सराहनीय वृद्धि होती है,

3. मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन: यह स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करके गरीबी उन्मूलन करने के लिए राज्य स्तर पर गठित स्वायत्त संगठन है। महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और समुदाय आधारित सेवा प्रदाता पर ध्यान देने के साथ मजबूत आत्मनिर्भर सामुदायिक संस्थानों का विकास संगठन का उद््देश्य है।

4. शहरी ग्रामीण आजीविका मिशन (यूआरएलएम): यह राज्य सरकार की सहभागिता में लागू भारत सरकार का कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य शहरी गरीब परिवारों की गरीबी और असुरक्षा को कम करके उन्हें लाभकारी स्वरोजगार और कुशल मजदूरी रोजगार के अवसरों तक पहुंच बनाने में सक्षम बनाना है।

5. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन: देश के चिन्हित जिलों में स्थायी रूप से क्षेत्र विस्तार और चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए 2007-08 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत खेत स्तर पर मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को बहाल करना तथा किसानों के बीच विश्वास बहाल करने के लिए कृषि स्तर की अर्थव्यवस्था (यानी कृषि लाभ) को बढ़ाना है। मध्यप्रदेश शासन भी मिशन की मूल रणनीति के अनुरूप किसानों की क्षमता निर्माण के साथ-साथ उन्नत प्रौद्योगिकियों, अर्थात बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, मृदा संरक्षण, एकीकृत कीट प्रबंधन, कृषि मशीनरी और औजार, सिंचाई उपकरणों के संसाधन संरक्षण को बढ़ावा दे रही है।

6. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए):मध्यप्रदेश सरकार का खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता संरक्षण विभाग एनएफएसए-2013 के प्रावधानों के कार्यान्वयन में अग्रणी रहा है। एनएफएसए अधिनियम के तहत परिकल्पित सुधार के तहत:सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) उपकरण का प्रयोग” उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) का आॅटोमेषन केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता के साथ शुरू किया गया था। एफपीएस ऑटोमेशन का लक्ष्य लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) को अधिक कुशल, प्रभावी और पारदर्शी बनाना और सिस्टम में बढ़ती जवाबदेही लाना है।

7. एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस): केंद्र प्रायोजित यह योजना राज्य सरकार की भागीदारी में शुरू की गई है। यह दुनिया का सबसे बड़ा समुदाय आधारित कार्यक्रम है, जिसमें 6 वर्ष उम्र तक के बच्चे, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली 16 से 44 वर्ष की आयु तक की माताओं और महिलाओं को लक्षित किया जाता है। योजना का लक्ष्य लक्षित समुदाय के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा (केएपी) में सुधार करना है। परियोजना का समग्र लक्ष्य भारत में बच्चों के पोषण और बचपन विकास के परिणामों में सुधार करना है।

8. मध्यान्ह भोजन योजना: यह राज्य के साथ भागीदारी में शुरू किया गया भारत सरकार का कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य शिक्षा का सार्वभौमीकरण, राज्य के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के छात्रों को पकाए गए मध्यान्ह भोजन प्रदान करना, बढ़ते बच्चों के पोषण स्वास्थ्य के स्तर में सुधार, तथा सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति बढ़ाना तथा शाला त्यागी बच्चों की संख्या में कमी लाना है। 

9. अन्नपूर्णा योजना: अन्नपूर्णा योजना का उद्देश्य उन वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है, जो पात्र हैं, और राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (एनओएपीएस) के दायरे से बाहर रह गए हैं। अन्नपूर्णा योजना के तहत लाभार्थी को प्रति माह 10 कि.ग्रा खाद्यान्न निःशुल्कः प्रदान किया जाता है। 
10. मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना शुरू: राज्य द्वारा 92 लाख से अधिक परिवारों को रियायती खाद्यान्न (रु.1 प्रति किलो), चीनी, मिट्टी का तेल आदि प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना शुरू की गई। मप्र सरकार ने भारत सरकार की पहल अंत्योदय अन्न योजना कार्यान्वित की है जिसमें प्रत्येक बीपीएल परिवार को 35 किग्रा खाद्यान्न/परिवार यानि 5 किग्रा/सदस्य पर दिया जाता है।
11. सतत कृषि, विस्तार और प्रौद्योगिकी योजनाएँ:देश के चिन्हित जिलों में स्थायी रूप से क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता में वृद्धि के माध्यम से चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने, व्यक्तिगत खेत स्तर पर मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को बहाल करने और किसानों के बीच विश्वास को बहाल करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण  राज्य और केन्द्र प्रायोजित योजनायें निम्नाकित हैं-

1.राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाय), 
2.राज्य सूक्ष्म सिंचाई मिशन 
3.मुख्‍यमंत्री खेत तीर्थ योजना 
4.प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 
5.परंपरागत कृषि विकास योजना 
6.प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 
7.राष्ट्रीय कृषि विस्तार और प्रौद्योगिकी मिशन (एनएमएईटी) 
8.तेल बीज एवं तेल ताड़ राष्ट्रीय मिषन (एनएमओओपी)


4. सामाजिक सातत्य को प्राप्त करने की दिशा में प्रदेश सरकार की अभिनव प्रयासों का वर्णन कीजिये।

राज्य द्वारा की गई पहल

1. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (छथ्ैड):राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन 2007-08 में देश के चिन्हित जिलों में स्थायी रूप से क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता बढ़ाने के माध्यम से चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाजों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत खेत स्तर पर मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को बहाल करना है

2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (छथ्ै।):सरकार ने उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण भोजन की पहुँच सुनिश्चित करके मानव जीवन चक्र के दृष्टिकोण से भोजन और पोषण सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से 10 सितंबर 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 को अधिसूचित किया है। 

3. एकीकृत बाल विकास सेवा (प्ब्क्ै):यह केंद्रीय सरकार द्वारा प्रायोजित तथा राज्य सरकार की साझेदारी में शुरू की गई योजना है। यह दुनिया का सबसे बड़ा समुदाय आधारित कार्यक्रम है, जिसमें 6 वर्ष तक के बच्चों, 16-44 वर्ष की गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को लक्षित किया जाता है। योजना का लक्ष्य लक्षित समुदाय के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में सुधार करना है। 

4. मिड डे मील योजना:यह भारत सरकार का राज्य के साथ साझेदारी में शुरू किया गया कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य स्कूलों के छात्रों को पकाए गए मिड-डे मील का प्रावधान, बढ़ते बच्चों के पोषण स्वास्थ्य के स्तर में सुधार और बच्चों की ड्रॉपआउट दर को कम करना है। 

5. आंगनवाड़ी चलो अभियानICDS के तहत AWCs के माध्यम से प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बारे में समुदाय को जागरूक करने के लिए है ताकि पूरे राज्य में ICDS सेवाओं की मांग को बढ़ाया जा सके।

आजीविका संबंधी योजनाएं और कार्यक्रम

कृषि-राज्य को कृषि क्षेत्र में अनुकरणीय प्रदर्शन के लिए भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च पुरस्कार: कृषि कर्मण पुरस्कारः से सम्मानित किया गया है। अगस्त 2017 में, राज्य सरकार ने  भावान्तर योजना ’या क्म िमूल्य घाटा वित्तपोषण योजना’ शुरू की, जो कृषि में मूल्य जोखिम को कम करेगी। इस योजना के तहत, अगर किसानों को अधिसूचित फसलों को कम कीमतों पर बेचना पड़ता है, तो उन्हें मुआवजा दिया जाएगा।

2. पशुपालन और पशुधन के अवसर: मध्य प्रदेश में कुल मवेशियों की आबादी का लगभग 10.27 प्रतिशत और देश में कुल दूध उत्पादन का 7 प्रतिशत है। शीर्ष महासंघ मध्य प्रदेश सहकारी डेयरी महासंघ (डच्ब्क्थ्) में पांच क्षेत्रीय सहकारी दुग्ध संघ (भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, और उज्जैन) हैं और 2.82 लाख दुग्ध उत्पादकों से 8.79 लाख किलोग्राम दुग्ध डेयरी की खरीद कर रहा है। 

3. मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन 
4. दीनदयाल अंत्योदय योजना 
5. सतत कृषि, विस्तार और प्रौद्योगिकी योजना

6. सूरजधारा और अन्नपूर्णा योजना:अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के किसानों को प्रोत्साहित करती है। सूरजधारा योजना मध्यप्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई एक ऐसी योजना है जिसका उद्देश्य - अनुसुचित जाति एवं अनुसुचित जन जाति के लघु एवं सीमांत कृषको को अलाभकारी फसलो/किस्मो के स्थान पर लाभकारी दलहनी/तिलहनी फसलो के उन्नत एवं विपुल उत्पादन देने वाली किसमो के बीज उपलब्ध कराना है।


7. प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना:प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और बीमारियों के परिणामस्वरूप फसल की किसी भी स्थिति में क्षति हेतु किसानों को बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए, किसानों को प्रगतिशील कृषि प्रथाओं को अपनाने के लिए, उच्च कृषि में मूल्य और उच्च प्रौद्योगिकी के द्वारा कृषि आय को स्थिर करने के लिए कार्य करती है।।


5. सामाजिक सातत्य के लिये प्रदेश में किन उपायों को किया जाना आप आवश्यक मानते हैं। अपने मत के समर्थन में तर्क दीजिये।





6. लैंगिक समानता क्या है? विकास के दृृष्टिकोण से इसके महत्व का प्रतिपादन कीजिये।


हमें यह पता होना चाहिए कि लिंग शब्द की उत्पत्ति सामाजिक न्याय से हुई है। अतः इसकी जानकारी होना आवश्यक है कि सामाजिक न्याय क्या है। सामाजिक न्याय का अर्थ है सभी लोगों की पूर्ण और वास्तविक समानता पॉल जॉर्ज आदर्श नीति जिसमें समाज के सभी सदस्यों को एक ही मूल अधिकार, सुरक्षा, अवसर, दायित्व और सामाजिक लाभ प्राप्त होते हैं।

सामाजिक कानून- समूह के सामाजिक कार्यों और व्यक्तियों को बढ़ावा देने और उनके अधिकारों की रक्षा करने के मकसद से जो कानून बनाए जाते हैं, उन्हें सामाजिक कानून कहा जाता है।

लिंग कामुकता, धर्म राजनीतिक सम्बद्धता उम्र की दौड़, विकलांगता का स्थान सामाजिक वर्ग, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां या पृष्ठभूमि अथवा समूह सदस्यता का अन्य विशेषताओं के आधार पर उनके कल्याण के बारे में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है और न ही उन्हें विवश किया जाता है। अन्याय को चुनौती देकर और विविधता का मूल्यांकन करके न्यायपूर्ण समाज को बढा़वा देना।

1. बिना किसी भेदभाव के समानता या समान अवसर।
2. समानता- समानता का अभाव ही समानता है।
3. असमानता- भेदभाव पूर्ण स्थिति होती है।

असमानता दो प्रकार की होती है-

1.प्राकृतिक असमानता- जो कुदरत से मिलती है इसमें मनुष्य कोई बदलाव नहीं कर सकते। जैसे- नदी, पहाड़, पेड़, पौधे, झरने, शारीरिक बनावट इत्यादि।

2. सामाजिक असमानता- यह असमानता समाज निर्मित करता है जो लिंग, धर्म जाति वर्ग, राजनीतिक सम्बद्धता, उम्र, दौड़, विकलांगता इत्यादि पर आधारित होती है।
प्राकृतिक असमानता में कोई भी बदलाव नहीं ला सकता लेकिन सामाजिक असमानता दूर की जा सकती है।

लैंगिक समानता- लैंगिक समानता को अंग्रेजी में “जेंडर इक्वॉलिटी” भी कहा जाता है। इसमें लिंग भेदभाव को न देखते हुए अवसरों और संसाधनों तक समान पहुंच की स्थिति के रूप में व्याख्या की जाती है। निर्णय लेने और आर्थिक भागीदारी सहित, बिना किसी पक्षपात के विभिन्न आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और व्यवहारों का मूल्यांकन करना भी कहा जाता है।


*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई तृतीय

आर्थिक सातत्यता


    1.    आर्थिक सातत्य से आप क्या समझते हैं? विस्तार से समझाइये।


आर्थिक सातत्य एक महत्वपूर्ण आयाम है जो विकास के साथ संबंधित है। इसका मतलब होता है सभी व्यक्तियों को आर्थिक रूप से सुरक्षित और समृद्ध बनाना। आर्थिक सातत्य का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों को आय, रोजगार, व्यापारिक संभावनाएं और आर्थिक सुरक्षा के साधनों में समानता और पहुंच प्रदान करना है।

आर्थिक सातत्य के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाते हैं:

1. आय: आय एक महत्वपूर्ण आर्थिक मापदंड है जो व्यक्ति द्वारा अर्जित धन की मात्रा को दर्शाता है। आर्थिक सातत्य के लिए महत्वपूर्ण है कि सभी व्यक्ति को न्यायसंगत आय मिलनी चाहिए, ताकि वे अपने आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।

2. रोजगार: आर्थिक सातत्य के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण योगदान होता है। व्यक्ति को उचित रोजगार के द्वारा आय प्राप्त करने का मौका मिलना चाहिए। सकारात्मक रोजगार मौके की उपलब्धता आर्थिक सुरक्षा और स्वावलंबन का माध्यम होती है।

3. व्यापारिक संभावनाएं: आर्थिक सातत्य के लिए व्यापारिक संभावनाएं महत्वपूर्ण होती हैं। उद्यमिता, व्यापार की संभावनाएं और नवाचार के माध्यम से आर्थिक विकास होता है। व्यापारिक संभावनाएं नए रोजगार के अवसर प्रदान करती हैं और समृद्धि के लिए मार्ग प्रदर्शन करती हैं।

4. आर्थिक सुरक्षा: आर्थिक सातत्य का महत्वपूर्ण हिस्सा आर्थिक सुरक्षा है। इसका अर्थ होता है कि व्यक्ति को आवश्यक आर्थिक संरचना और सुरक्षा होनी चाहिए, जिससे वे अनिश्चितताओं और आर्थिक संकटों का सामना कर सकें। आर्थिक सुरक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपने आवश्यकताओं को पूरा करने, भविष्य के लिए बचत करने और अपात्रों की सहायता करने में सक्षम होता है।

यहां उपरोक्त आयाम आर्थिक सातत्य के महत्वपूर्ण पहलु हैं, जो सामाजिक और आर्थिक विकास के माध्यम से व्यक्तियों को सुरक्षित और समृद्ध बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।



    2.    मध्य प्रदेश में अधः संरचना के लिये किये गये प्रयासों को विस्तार से लिखिए।




मध्य प्रदेश में अधः संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) के विकास के लिए कई प्रयास किए गए हैं। निम्नलिखित विवरण में इन प्रयासों का विस्तार से वर्णन किया गया है:

1. सड़क विकास: मध्य प्रदेश सरकार ने सड़क नेटवर्क के विकास पर विशेष ध्यान दिया है। प्रदेश में सड़कों के निर्माण, मरम्मत और विस्तार को प्राथमिकता दी गई है। बड़े और छोटे शहरों के बीच सड़क योजनाओं का विकास किया गया है और गांवों को भी सड़क सुविधाओं से जोड़ा गया है। सड़क नेटवर्क के विकास से यातायात के साधनों की उपलब्धता और लोगों की आर्थिक गतिशीलता में सुधार हुआ है।

2. बिजली विकास: बिजली का विकास मध्य प्रदेश के अधः संरचना के लिए महत्वपूर्ण है। सरकार ने ऊर्जा संबंधित योजनाओं को बढ़ावा दिया है और नई बिजली परियोजनाओं का निर्माण किया है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हाइड्रो पावर आदि विद्युत स्रोतों के प्रयोग का विस्तार किया गया है। इससे अधिक लोगों को बिजली की सुविधा मिली है और उद्योगों को बेहतर बिजली आपूर्ति प्राप्त होती है।

3. जल संसाधन: मध्य प्रदेश में जल संसाधन के विकास को महत्व दिया जाता है। सरकार ने नदी विकास, जलाशय निर्माण, जलसंचयन योजनाओं को प्रदान किया है। जल संसाधन के विकास से कृषि, पेयजल, औद्योगिक उपयोग आदि के क्षेत्रों में सुधार हुआ है। इससे अन्य सामाजिक और आर्थिक उपयोगों के लिए जल संसाधन की उपलब्धता में वृद्धि हुई है।

4. शिक्षा और स्वास्थ्य: शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश में प्रयास किए गए हैं। सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के लिए अस्पताल, चिकित्सा संस्थान, औषधालय, स्वास्थ्य केंद्र आदि का निर्माण किया है। इसके साथ ही शिक्षा क्षेत्र में भी विद्यालय, महाविद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान, बालवाड़ी, स्कूल बस सुविधाएं आदि के विकास का प्रयास किया गया है। इससे लोगों को उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जो उनके आर्थिक और सामाजिक विकास में मदद करती हैं।

5. ग्रामीण विकास: मध्य प्रदेश में ग्रामीण विकास को महत्व दिया जाता है। सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं, जल सुविधाएं, बिजली पहुंच, सड़क सुविधा, शिक्षा सुविधाएं, कृषि विकास आदि के लिए विशेष प्रोग्राम और योजनाएं शुरू की हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक स्थिरता, जीवनान्तरण में सुधार, और लोगों के जीवन के सभी पहलुओं में सुधार हुआ है।

मध्य प्रदेश में ये प्रयास अधः संरचना के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए हैं। इन प्रयासों के माध्यम से प्रदेश में जनसंख्या के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और जीवनायामक पहलुओं में सुधार होने का अवसर मिला है।



    3.    मध्य प्रदेश के औद्योगिक और रोजगार परिदृश्य पर एक समीक्षात्मक आलेख लिखिए।

3.2.4 मध्यप्रदेश राज्य कौशल विकास मिशन
मध्यप्रदेश राज्य कौशल विकास मिशन (एमपीएसएसडीएम) का उद्देश्य राज्य में कौशल विकास कार्यक्रमों को लागू करने में लगे अन्य विभागों को कौशल, समन्वय और मार्गदर्शन के लिए राज्य स्तरीय एजेंडा विकसित करना है। कौशल विकास और रोजगार प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित कार्य किए हैं-
1.विभिन्न आगामी कौशल प्रशिक्षण योजनाएं।
2.प्रशिक्षुओं और प्रशिक्षण अधिकारियों के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति।
3.सभी 51 जिलों के आईटीआई में स्मार्ट क्लासरूम शुरू किए जाएंगे।
4.विभिन्न उद्योग भागीदारों के साथ फ्लेक्सी-एमओयू पर हस्ताक्षर करने की मदद से आईटीआई और उद्योग के मध्य संबंध बनाए जा रहे हैं।
5.आईटीआई प्रशिक्षुओं को उत्तीर्ण करने के लिए शिक्षुता प्रशिक्षण की दोहरी प्रणाली शुरू की जाएगी।

3.4.5 चुनौतियां एवं कमियां
1.औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के कौशल-विकास और प्रोत्साहन में अंतर करना।
2.स्टार्ट अप के प्रशासकों और इन्क्यूबेटरों के क्षमता निर्माण की आवश्यकता
3.महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने में पिछड़ापन
4.विभिन्न एमएसएमई योजनाओं के गुणवत्ता मानक कार्यक्रमों और लाभों के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।
5.बौद्धिक संपदा संरक्षण और बार कोड के उपयोग को बढ़ावा देने की जटिल प्रक्रियाएं।
6.जटिल स्थानीय कर संरचना और जीएसटी व्यवस्था के लिए अपर्याप्त प्रशिक्षण।
7.राज्य भर में वित्तीय संस्थानों की पैठ बढ़ाने की आवश्यकता है
8.स्थानीय और राज्य स्तर पर ट्रेड यूनियनों द्वारा प्रतिरोध
9. उद्योग द्वारा वर्तमान और भविष्य के कौशल और जनशक्ति आवश्यकताओं में अंतर
10. अंतरराज्यीय प्रवासी कामगारों के लिए रोजगार के अवसर का अभाव
11. मप्र में महिला श्रमिकों के लिए वेतन अंतर और असमान रोजगार के अवसर

चुनौतियों से निपटने की रणनीति
मध्यप्रदेश एक निवेश केंद्र के रूप में उभर रहा है और निवेशकों के लिए पहली प्राथमिकता बनने की कल्पना करता है। विभिन्न विभागों के सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से, राज्य मौजूदा एमएसएमई को मजबूत करने और नए क्लस्टर विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करता है। औद्योगिक क्षेत्र के विकास से भौगोलिक और आर्थिक वातावरण का विश्लेषण करने के लिए ध्यान केंद्रित करना सफल स्टार्टअप और विभिन्न वातावरण में एमएसएमई की रणनीतियों की व्यवहार्यता की जाँच करना आवश्यक है। कृषि और कृषि आधारित व्यवसायों में मजदूरों की स्थिति में सुधार पर अधिक जोर दिया जाता है। 

वाणिज्य, उद्योग और रोजगार विभाग (DoCIE)
1. यह एक फोकस सेक्टर है जिसमें विभाग ने उच्च मूल्य वर्धन के साथ 10 प्रमुख उच्च-प्रदर्शन क्षेत्रों की पहचान की है। 
2. रक्षा उत्पादन प्रोत्साहन नीति, औद्योगिक प्रोत्साहन नीति, विशेष वस्त्र पैकेज, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को विशेष सहायता की नीतियां और योजनाएं निवेश को प्रोत्साहित करेंगी।
3. खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित अपैरल और गारमेंट पार्क, फूड पार्क स्थापित करके राज्य परिधान और परिधान निर्माताओं को आकर्षित करने के लिए तथा सूचना प्रौद्योगिकी और सक्षम सेवाओं और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए आईटी पार्क के द्वारा निर्यात को बढ़ावा दिया जाय।

4.मध्यप्रदेश राज्य कौशल विकास मिशन- युवाओं को बड़े पैमाने पर विभिन्न तकनीकी और व्यावसायिक व्यवसायों में बाजारोन्मुख गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण देकर राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है। 
5. श्रम विभाग- यह विभाग विभिन्न श्रम कानूनों के प्रभावी प्रवर्तन, श्रमिकों के हितों की रक्षा और सुरक्षा के माध्यम से सामंजस्यपूर्ण औद्योगिक संबंधों की सुविधा प्रदान करता है। 
6. पर्यटन विभाग- पर्यटन नीति 2016 के साथ, विभाग ने सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) के माध्यम से पर्यटन आधारित परियोजनाओं के उचित विकास के माध्यम से सांस्कृतिक, वन्य जीवन, तीर्थ, अवकाश और व्यावसायिक पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास तेज कर दिए हैं।

7. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विभाग  (MSME) - सभी के लिए पूर्ण और उत्पादक रोजगार प्राप्त करने के लिए एमएसएमई सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक कारकों में से एक होगा। कौशल अंतर को भरने के लिए कौशल विकास कार्यक्रम, एमएसएमई प्रोत्साहन योजना, बुनियादी ढांचा विकास, ऑटो परीक्षण ट्रैक, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना, एमएसएमई को विपणन और वित्तीय सहायता, और स्थानीय विक्रेताओं को उप-अनुबंध कुछ प्रमुख महत्पपूर्ण क्षेत्रों में पहल आवश्यक है। 


    4.    आर्थिक सातत्य से कौन-कौन से सतत विकास लक्ष्य सम्बन्धित हैं?


सतत विकास लक्ष्यों में लक्ष्य 8, 9,11 एवं 12 सामाजिक सातत्यता स्थापित करने के लिए कार्य करने पर बल देते हैं। 17 सतत विकास लक्ष्यों में सें 4 लक्ष्य सामाजिक सातत्यता से संबंधित है, जो निम्नांकित हैं-
1.सभी के लिए निरंतर समावेशी और सतत आर्थिक विकास पूर्ण और उत्पादक रोजगार और बेहतर कार्य को बढ़ावा देना। (लक्ष्य-8)
2.लचीले व बुनियादी ढांचे समावेशी व सतत औद्योगीकरण को बढावा। (लक्ष्य-9)
3.सुरक्षित, लचीले और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण। (लक्ष्य-11)
4.स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना। (लक्ष्य-12) 



    5.    विकास के लिये सामाजिक और आर्थिक सातत्य के कारकों की अंतरनिर्भरता को उपयुक्त उदाहरणों से स्पष्ट कीजिये।

विकास के लिए सामाजिक और आर्थिक सातत्य के कारकों की अंतरनिर्भरता के उदाहरण निम्नलिखित हैं:

1. शिक्षा: एक समाज में शिक्षा के प्राप्त होने की सामाजिक सातत्य अवधारणा के साथ आर्थिक सातत्य भी अधिक महत्वपूर्ण होती है। अगर एक समाज में अधिकांश लोग शिक्षित होंगे, तो उन्हें नौकरी और आय कमाने के अवसर मिलेंगे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधारेगी। साथ ही, शिक्षित लोग समाज में अधिक समानता, न्याय, और सामाजिक उच्चता को बढ़ावा देने में सक्षम होंगे।

2. रोजगार: आर्थिक सातत्य के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण भूमिका होता है। एक समाज में यदि लोगों को उच्चतर शिक्षा, कौशल और तकनीकी योग्यता का प्राप्त होता है और उन्हें उच्चतर और भरपूर मान्यता वाले रोजगार के अवसर मिलते हैं, तो उनकी आर्थिक स्थिति सुधारेगी। विकासशील देशों में कौशलों के आधार पर नौकरियां और व्यापार अवसर समृद्ध होते हैं, जिससे आर्थिक सातत्य बढ़ती है।

3. स्वास्थ्य सेवाएं: स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एक समाज में सामाजिक और आर्थिक सातत्य के गुणवत्तापूर्ण मापदंड है। यदि लोगों को उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त होती हैं, तो वे स्वस्थ रहेंगे, उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी और उनकी आर्थिक दशा सुधारेगी। सामाजिक सातत्य की दृष्टि से, स्वास्थ्य सेवाएं सभी वर्गों के लोगों के लिए उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि समाज में सभी का समान उपयोग हो सके।


1. न्यायाधीशों की उपलब्धता: सामाजिक सातत्य के प्रति विशेष ध्यान देने के लिए न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में आर्थिक सातत्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यदि गरीब और असहाय लोगों को उच्चतर न्यायाधीशों और कोर्ट सुविधाओं का उपयोग करने का अधिकार होता है, तो उनकी सामाजिक स्थिति सुधारेगी और उन्हें न्याय मिलेगा। यह सामाजिक सातत्य के साथ-साथ आर्थिक सातत्य की भी एक प्रक्रिया है, क्योंकि अधिकांश गरीब लोग आर्थिक मदद की आवश्यकता होती है उच्चतर न्यायाधीशों की सुविधाओं का उपयोग करने के लिए।

2. उद्यमिता और व्यापार: आर्थिक सातत्य का महत्वपूर्ण तत्व व्यापारिक उद्यमिता है। जब लोग व्यापार करके आर्थिक उपयोग कमाते हैं, तो उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता, स्वावलंबन और समृद्धि का अनुभव होता है। यदि समाज में उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाता है और आर्थिक सामरिकी उद्योगों को समर्थन प्रदान किया जाता है, तो लोग अपने आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकते हैं और सामाजिक विकास को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

3. निवेश और उद्यमिता: आर्थिक सातत्य के दृष्टिकोण से, निवेश एक महत्वपूर्ण कारक है जो विकास को प्रोत्साहित करता है। यदि एक समाज में उच्च मात्रा में निवेश होता है, तो उद्यमिता को समर्थित करने के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता होती है। यह सामाजिक सातत्य के प्रति आर्थिक सातत्य की भी एक प्रक्रिया है, क्योंकि अधिकांश लोग निवेश करने के लिए आर्थिक स्रोतों की आवश्यकता होती है, जो उनके व्यापारिक उद्यमों को आगे बढ़ाने में मदद करता है।

यह उदाहरण दिखाते हैं कि सामाजिक और आर्थिक सातत्य एक-दूसरे से गहरा जुड़े होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। सामाजिक सातत्य समानता, न्याय और समावेशितता की दृष्टि से सामाजिक विकास को सुनिश्चित करता है, जबकि आर्थिक सातत्य संपन्नता, स्वतंत्रता और समृद्धि की दृष्टि से आर्थिक विकास को सुनिश्चित करता है। इन दोनों के कारकों का संतुलन सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।


*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई चतुर्थ
पर्यावरणीय सातत्यता

    1.    पर्यावरणीय सातत्य से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिये।



    2.    पर्यावरणीय सातत्य से कौन-कौनसे सतत विकास लक्ष्य सम्बन्धित हैं?


    3.    संतुलित विकास की अवधारणा क्या है ? 


    4.    जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता और महत्व पर प्रकाश डालिये।


    5.    जलवायु परिवर्तन क्या है? इसके दुष्प्रभावों से किस प्रकार बचा जा सकता है?
  


  6.    पर्यावरण प्रदूषण को स्पष्ट करते हुए इसके प्रमुख कारणों को लिखिये।



*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई पंचम
लक्ष्यों हेतु साझेदारी (लक्ष्य-17)




Comments

Popular posts from this blog

समाज कार्य अभ्यास के क्षेत्र: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 इकाई प्रथम:  विभिन्न समुदायों के साथ समाज कार्य       1. ग्रामीण समुदाय की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। ग्रामीण समुदाय एक संघटित समूह है जो गांवों में निवास करता है और एक साझा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिचय रखता है। यह समुदाय ग्रामीण क्षेत्रों के जीवन की आधारभूत इकाई होती है और उनके आर्थिक, सामाजिक, कृषि, पशुपालन, व्यापार, कला और संस्कृति के क्षेत्रों में सक्रिय रहती है। ग्रामीण समुदायों में सामाजिक बंधुत्व, परंपरा, समानता, साझा जिम्मेदारी और सहायता के मूल्य आदान किए जाते हैं। ये समुदाय अपनी आवासीय पर्यावरण का संचालन करते हैं, खेती-कृषि के द्वारा अपनी आजीविका उत्पन्न करते हैं और एक-दूसरे के साथ साझा संसाधनों का उपयोग करते हैं। ग्रामीण समुदायों की समृद्धि और विकास उनके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तत्वों के सद्भाव और सुरक्षा पर निर्भर करती है। ग्रामीण समुदाय उन लोगों का समूह होता है जो ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं और एक साझा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान रखते हैं। इन समुदायों के सदस्य आपसी संबंधों में जुड़े होते हैं और एक दूसरे की सहायता और समर...

सामाजिक शोध एवं सांख्यिकी : लघु उत्तरीय प्रश्न

  इकाई प्रथम  सामाजिक शोध - अर्थ, खोज एवं अनुसंधान 1. अनुसन्धान और सामाजिक अनुसन्धान में क्या अन्तर है। अनुसंधान और सामाजिक अनुसंधान में यह अंतर होता है कि अनुसंधान एक व्यापक शोध प्रक्रिया है जो किसी विषय की गहराई में जाकर नई ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जबकि सामाजिक अनुसंधान संबंधित सामाजिक मुद्दों, समस्याओं, और प्रश्नों का अध्ययन करके समाज को सुधारने और विकास करने के लिए ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है। 2. सामाजिक अनुसन्धान की परिभाषित कीजिए। अनुसंधान और सामाजिक अनुसंधान में यह अंतर होता है कि अनुसंधान एक व्यापक शोध प्रक्रिया है जो किसी विषय की गहराई में जाकर नई ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जबकि सामाजिक अनुसंधान संबंधित सामाजिक मुद्दों, समस्याओं, और प्रश्नों का अध्ययन करके समाज को सुधारने और विकास करने के लिए ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है। 3. सामाजिक अनुसन्धान के प्रेरक तत्वों का उल्लेख करिए। सामाजिक अनुसंधान के प्रेरक तत्वों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं: सामाजिक न्याय और इंसानी हित:  सामाजिक अनुसंधानकर्ता को सामाजिक न्याय को सुधारने और...

समाज कार्य अभ्यास के क्षेत्र: लघुउत्तरीय

 इकाई प्रथम:  विभिन्न समुदायों के साथ समाज कार्य  1. नगरीय करण के फलस्वरूप तंग बस्तियों के कारण एवं प्रभाव संक्षिप्त में बताइये। तंग बस्तियाँ नगरीयकरण के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली समस्याओं के चलते होती हैं। यहां कुछ मुख्य कारण और प्रभावों को संक्षेप में देखा जा सकता है: कारण : 1. जनसंख्या दबाव: नगरीयकरण के कारण शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या का विस्तार होता है, जिसके परिणामस्वरूप संकीर्ण इलाकों में ज्यादातर लोग बस्तियों में निवास करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। 2. अवसाद इलाकों में घुसपैठ: तंग बस्तियों में अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर लोग रहते हैं और इसके कारण अवसाद, आर्थिक संकट और अपराध की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे इलाकों में अधिकांश बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहते हैं। 3. सामाजिक और आर्थिक असामानता: तंग बस्तियों में सामाजिक और आर्थिक असामानता बढ़ती है। यहां लोग न्यूनतम सुविधाओं के बिना रहते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति पक्षपाती नीतियों के कारण मजबूत नहीं होती है। प्रभाव: 1. सामाजिक संकट: तंग बस्तियों में जीवन की कठिनाइयों से जूझना पड़ता है, जैसे कि घुसपैठ, अपराध,...