Skip to main content

लैंगिक समानता एवं महिलाओं के विरूद्ध अपराध: लघु उत्तरीय प्रष्न

इकाई प्रथम 

लैंगिक समानता की अवधारणा(Concept of Gender Equality)





*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई द्वितीय 

स्वास्थ्य और पोषण के स्तर पर भेदभाव  (Discrimination at the level of health and nutrition)




*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई तृतीय

लैंगिक आधार पर शोषण का अर्थ व जेंडर बजटिंग (Meaning of Exploitation on Gender Basis and Gender Budgeting)




*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई चतुर्थ

लिंग परीक्षण (Gender Testing)




*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*

इकाई पंचम

श्रम आधारित कानून व निकाय (Labour Based Laws and Bodies)


1.कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून क्या करता है?

यौन उत्पीड़न क्या है?

इस अधिनियम के तहत निम्नलिखित व्यवहार या कृत्य यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है-

व्यवहार या कृत्य- इच्छा के खिलाफ छूना या छूने की कोशिश करना जैसे यदि एक तैराकी कोच छात्रा को तैराकी सिखाने के लिए स्पर्श करता है तो वह यौन उत्पीड़न नहीं कहलाएगा, पर यदि वह पूल के बाहर, क्लास खत्म होने के बाद छात्रा को छूता है और वह असहज महसूस करती है, तो यह यौन उत्पीड़न है। शारीरिक रिश्ता/यौन सम्बन्ध बनाने की मांग करना या उसकी उम्मीद करना जैसे यदि विभाग का प्रमुख, किसी जूनियर को प्रमोशन का प्रलोभन देकर शारीरिक रिश्ता बनाने को कहता है, तो यह यौन उत्पीड़न है।

यौन स्वभाव की (अश्लील) बातें करना जैसे यदि एक वरिष्ठ संपादक एक युवा प्रशिक्षु/जूनियर पत्रकार को यह कहता है कि वह एक सफल पत्रकार बन सकती है क्योंकि वह शारीरिक रूप से आकर्षक है, तो यह यौन उत्पीड़न है।अश्लील तस्वीरें, फिल्में या अन्य सामग्री दिखाना जैसे यदि आपका सहकर्मी आपकी इच्छा के खिलाफ आपको अश्लील वीडियो भेजता है, तो यह यौन उत्पीड़न है।कोई अन्य कर्मी यौन प्रकृति के हों, जो बातचीत द्वारा लिखकर या छूकर किये गए हों।

कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013- सन 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम को पारित किया गया था। जिन संस्थाओं में दस से अधिक लोग काम करते हैं, उन पर यह अधिनियम लागू होता है।

ये अधिनियम 9 दिसम्बर 2013 में प्रभाव में आया था। ये अधिनियम विशाखा केस में दिये गये लगभग सभी दिशा-निर्देशों को अंगीकार करता है और शिकायत समितियों को सबूत जुटाने में सिविल कोर्ट वाली शक्तियां प्रदान की हंै। यदि नियोक्ता अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने में असफल होता है तो उसे 50,000 रुपए से अधिक अर्थदंड भुगतना पड़ेगा। ये अधिनियम अपने क्षेत्र में गैर-संगठित क्षेत्रों जैसे ठेके के व्यवसाय में दैनिक मजदूरी वाले श्रमिक या घरों में काम करने वाली नौकरानियां या आयाएं आदि को भी शामिल करता है।

ये अधिनियम कार्यशील महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न के खतरे का मुकाबला करने के बनाए गए हैं। ये विशाखा फैसले में दिये गये दिशा-निर्देशों को सहेजता है और इसके प्रावधानों का पालन करने के लिये नियोक्ताओं पर एक सांविधिक दायित्व अनिवार्य कर देता है।

हालांकि, इस अधिनियम में कुछ कमियां भी हंै जैसे कि ये यौन उत्पीड़न को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता। बस केवल नागरिक दोष माना जाता है जो सबसे मुख्य कमी है, जब पीड़ित इस कृत्य को अपराध के रुप में दर्ज करने की इच्छा रखती है तब ही केवल इसे एक अपराध के रुप में शिकायत दर्ज की जाती है। इसके साथ ही पीड़ित पर अपने वरिष्ठ पुरुष कर्मचारी द्वारा शिकायत वापस लेने के लिये दबाव डालने की भी संभावनाएं अधिक रहती है।

इस प्रकार, अधिनियम को एक सही कदम कहा जा सकता है लेकिन ये पूरी तरह से दोषरहित नहीं है और इसमें अभी भी सुधार की गुंजाइश है। यहां तक कि अब, पीड़ित को भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत पूरी तरह से न्याय पाने के लिये अपराधिक उपायों को तलाशना पड़ता है। और फिर, अपराधिक शिकायत धारा 354 के अन्तर्गत दर्ज की जाती है जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की विशेष धारा नहीं बल्कि एक सामान्य प्रावधान है।

कानून के अनुसार निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को महिला कर्मचारियों की कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ से सुरक्षा के लिये कानूनी अनिवार्यता के अन्तर्गत लिया गया है लेकिन समस्या इसके लागू करने और इसकी जटिलताओं में है। ये अभी अपने शुरुआती दिनों में है और अधिकांश संगठन, कुछ बड़े संगठनों को छोड़कर, प्रावधान के साथ जुड़े हुए नहीं है, यहां तक कि वो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के लिये बनाये गये कानून क्या है और इसके लिये क्या अर्थदंड है और क्या इसका निवारक तंत्र है, इन सब नियमों और कानूनों को सार्वजनिक करने वाले नियमों को सूत्रबद्ध भी नहीं करता। यहां तक कि वहां आन्तरिक शिकायत समिति भी नहीं है। 

यह कानून क्या करता है?

कार्यस्थल पर कामकाजी महिलाओं के साथ किए गए यौन उत्पीड़न को यह कानून अवैध मानता है। यह कानून यौन उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों को चिन्हित करता है और यह बताता है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की स्थिति में शिकायत किस प्रकार की जा सकती है।

1.यह कानून हर उस महिला के लिए बना है जिसका किसी भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ हो।

2. इस कानून में यह जरूरी नहीं है कि जिस कार्यस्थल पर महिला का उत्पीड़न हुआ है, वह वहां नौकरी करती हो।

3. कार्यस्थल कोई भी कार्यालय/दफ्तर हो सकता है, चाहे वह निजी संस्थान हो या सरकारी।


अथवा

कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून (Sexual Harassment at Workplace Act) महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थल की सुनिश्चितता के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून यौन उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा प्रावधान करता है और शिकायतों की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया को निर्धारित करता है।

कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून द्वारा, किसी भी कार्यस्थल में महिला कर्मचारियों के लिए एक यौन उत्पीड़न कमीशन की स्थापना की जाती है, जिसका उद्देश्य उनकी सुरक्षा और सुरक्षितता की सुनिश्चितता है। कमीशन के द्वारा कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न के मामलों की जांच और समाधान किया जाता है। कानून यौन उत्पीड़न के परिप्रेक्ष्य में एक स्पष्ट परिभाषा प्रदान करता है और इसे समाप्त करने के लिए सख्त कार्रवाई का प्रावधान करता है।

कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून द्वारा सुरक्षा कमीशन के निर्देशानुसार कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और कर्मचारियों को उनके अधिकारों और सुरक्षा के बारे में जागरूक किया जाता है। इसके अलावा, कानून यौन उत्पीड़न के लिए शिकायत प्रक्रिया को संगठित करता है और सुरक्षा के लिए सख्त संज्ञानशीलता और सजगता की मांग करता है।


2.नियोक्ता किसे कहते हैं?

नियोक्ता एक शब्द है जो किसी व्यक्ति, संगठन, या सरकारी या गैर-सरकारी संगठन द्वारा रोजगार के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति करने वाले व्यक्ति या संगठन को दर्शाने के लिए प्रयोग होता है। नियोक्ता कार्यालय, कंपनी, सरकारी विभाग, निजी कंपनी, संगठन, या किसी अन्य संगठन द्वारा नियोक्ता व्यक्ति के चयन, नियुक्ति, और रोजगार सम्बंधित मामलों का प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार होता है। वह नौकरी की पदों को विज्ञापित करने, आवेदन प्रक्रिया का प्रबंधन करने, साक्षात्कारों का आयोजन करने, और अंतिम रूप से उपयुक्त उम्मीदवार को नियुक्ति करने के लिए जिम्मेदार होता है।




3. भूमिगत कार्य निषेध क्या है?

भूमिगत कार्य का निषेधः माइंस एक्ट (खान अधिनियम) 1952, सेक्शन 46(1)(बी) जमीन के नीचे के खान के किसी भी भाग में महिला श्रम को प्रतिबंधित करता है।

                                                            अथवा

भूमिगत कार्य निषेध, जिसे अंग्रेजी में "Groundwork Prohibition" भी कहा जाता है, एक कानूनी अवरोध है जो किसी विशेष भूमि पर कार्य करने को निषिद्ध करता है। यह अवरोध विभिन्न कारणों से लगाया जा सकता है, जैसे कि इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, निर्माण कार्य, भूमि संरक्षण, पर्यावरणीय मामलों का ध्यान, सुरक्षा और आपराधिक गतिविधियों को रोकना, आदि। यह निषेध कानूनी अवरोध शासनादेश, नियमावली, या स्थानीय प्रशासनिक नियमों के माध्यम से लागू किया जा सकता है। इसका उद्देश्य विशेष क्षेत्र में निर्माण या कार्य करने की अनुमति न देकर, संरक्षण और सुरक्षा को सुनिश्चित करना होता है। भूमिगत कार्य निषेध का पालन करना उपयुक्त कानूनी प्रक्रिया और मंजूरी के बिना उन व्यक्तियों या संगठनों को रोकता है जो भूमि के उपयोग में सीमित कार्य करना चाहते हैं।


4.घरेलू हिंसा में धारा 14 क्या है?

भारतीय दंड संहिता के अनुसार, धारा 14 घरेलू हिंसा को दर्ज करती है। धारा 14 का शीर्षक है "घरेलू हिंसा के लिए दंडनीयता"। यह धारा विभिन्न प्रकार की घरेलू हिंसा को कवर करती है, जिसमें पति या पत्नी द्वारा दूसरे पति या पत्नी के प्रति शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या अन्य प्रकार की हिंसा शामिल होती है।

धारा 14 में घरेलू हिंसा के लिए दंड की प्रावधानिकता होती है और इसे अपराध के साथ संबंधित अदालतों में सुनवाई के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके तहत, दोषी को कारावास, जुर्माना या दोनों के संयुक्त तर्क के आधार पर सजा की जा सकती है। यह धारा घरेलू हिंसा के खिलाफ कानूनी संरचना को बनाए रखने और पीड़ित पक्ष की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।


5.कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न में आंतरिक षिकायत समिति क्या है।

कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न के मामलों को देखने और निपटान करने के लिए आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee, ICC) गठित की जाती है। यह समिति भारत में यौन उत्पीड़न परिभाषित कानूनी ढांचे, जैसे कि "सेक्स्युअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन अट वर्कप्लेस" (Prevention, Prohibition and Redressal) अधिनियम, 2013 के तहत स्थापित की जाती है।

आंतरिक शिकायत समिति में समिति के अध्यक्ष, कार्यस्थल के कर्मचारी, वर्गीकृत कर्मचारी, और कार्यस्थल की अन्य संबंधित अधिकारियों से मिलकर बनती है। इस समिति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न के मामलों की शिकायतों को सुना जाए और उन्हें निष्पादित करने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।

आंतरिक शिकायत समिति का कार्यालय और कार्यालयकर्ता आमतौर पर कार्यस्थल के अंदर ही होते हैं ताकि पीड़ित पक्ष को सुरक्षित और विश्वासनीय माहौल में शिकायत दर्ज करने और जांच प्रक्रिया में सहायता मिल सके। समिति को निष्पादित करने के लिए नियमों और दिशानिर्देशों के अनुसार कार्य करना पड़ता है और उसे अदालती अधिकार होते हैं।

आंतरिक शिकायत समिति के माध्यम से पीड़ित पक्ष को न्यायिक सुनवाई, जांच, दंडाधिकारिक कार्रवाई और निपटान के लिए विश्वासनीय एवं निष्पक्ष संरचना प्रदान की जाती है।

Comments

Popular posts from this blog

सामाजिक सामूहिक कार्य : अति लघु उत्तरीय / वस्तुनिष्ठ प्रश्न

इकाई प्रथम परिचय मूल्य एवं सिद्धांत    1. समूह कार्य की परिभाषा दें। समूहकार्य एक व्यवस्थित एवं सक्रिय शिक्षण विधा है जो छात्रों के छोटे समूहों को मिलकर एक आम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम करने के लिए प्रोत्साहित करती है। ये छोटे समूह नियोजित गतिविधियों के माध्यम से अधिक सक्रिय और अधिक प्रभावी सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। अथवा क्वायल ग्रेस (1939) सामाजिक समूहिक कार्य का उद्देश्य समूह की स्थितियों में व्यक्तियों की अंतःक्रियाओं द्वारा व्यक्तियों का विकास करना तथा ऐसी सामूहिक स्थितियों को उत्पन्न करना जिससे समान उद्देश्यों के लिए एकीकृत,सहयोगी सामूहिक क्रिया हो सके।  विल्सन एंड ड्राईलैंड (1949) सामाजिक समूह कार्य एक मनो सामाजिक प्रक्रिया हैं, जो नेतृत्व की योग्यता और सहकारिता के विकास से उतनी ही संबंधित हैं, जितनी सामाजिक उद्देश्य के लिए सामूहिक अभिरुचियों के निर्माण से हैं।     2. समूह कार्य में मूल्य को लिखें। मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त इच्छाएँ एवं लक्ष्य हैं जिनका आन्तरीकरण समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है। विभिन्न विद्वानों साम...

सामुदायिक संगठन एवं सामाजिक क्रिया : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर

इकाई प्रथम     1.    सामुदायिक संगठन की अवधारणा एवं तकनीकों का वर्णन करें। वर्तमान सामुदायिक जीवन के अध्ययन एवं अवलोकन से ज्ञात होता है कि समुदाय का वर्तमान स्वरूप शताब्दी पूर्व के सामुदायिक जीवन से सर्वथा भिन्न है। औद्योगीकरण, शहरीकरण, परिवहन और संचार सुविधाओं, सामाजिक अधिनियम और राजनीतिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने न केवल शहरी सामुदायिक जीवन बल्कि ग्रामीण सामुदायिक जीवन को भी प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, वर्तमान सामुदायिक जीवन अपनी वास्तविक विशेषताओं जैसे सामुदायिक सहयोग, पारस्परिक जिम्मेदारी, सामुदायिक कल्याण, सुरक्षा और सामुदायिक विघटन की ओर विकास से दूर जा रहा है। मात्रा की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि नगरीय समुदाय का विघटन ग्रामीण समुदाय से अधिक हुआ है। इन दो समुदायों के पुनर्गठन और विकास के लिए सामुदायिक संगठन बहुत महत्वपूर्ण है। ### सामुदायिक संगठन की अवधारणा सामुदायिक संगठन (Community Organization) का अर्थ है सामुदायिक संसाधनों और क्षमताओं का उपयोग करते हुए समुदाय के सदस्यों के कल्याण और विकास के लिए संगठित प्रयास करना। इसका उद्देश्य समुदाय क...

महिला एवं बाल विकास : बाल सुरक्षा प्रावधान और चुनौतियां

   यहाँ जिनेवा सम्मेलन, ग्रसित व्यक्तियों के अधिकार सम्मेलन, बाल अधिकारों संबंधित घोषणा और अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार सम्मेलन की तुलना करने वाली एक टेबल है: मापदंड जिनेवा सम्मेलन ग्रसित व्यक्तियों का अधिकार सम्मेलन बाल अधिकारों संबंधित घोषणा अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार सम्मेलन उद्देश्य युद्ध के समय मानवाधिकारों की सुरक्षा विकलांग व्यक्तियों के अधिकार और गरिमा की रक्षा बच्चों के अधिकारों की मान्यता बच्चों के नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार वर्ष 1949 2006 1959 1989 स्थल जिनेवा, स्विट्जरलैंड न्यूयॉर्क, संयुक्त राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र महासभा संयुक्त राष्ट्र महासभा मुख्य प्रावधान युद्ध के कैदियों, घायल सैनिकों, और नागरिकों की रक्षा विकलांग व्यक्तियों के लिए समानता और समावेशी समाज की परिकल्पना बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार बाल श्रम, शोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सुरक्षा से संबंधित प्रमुख संस्थान अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस संयुक्त राष्ट्र (UN) संयुक्त राष्ट्र (UN) संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का आध...