इकाई प्रथम
लैंगिक समानता की अवधारणा(Concept of Gender Equality)
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इकाई द्वितीय
स्वास्थ्य और पोषण के स्तर पर भेदभाव (Discrimination at the level of health and nutrition)
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इकाई तृतीय
लैंगिक आधार पर शोषण का अर्थ व जेंडर बजटिंग (Meaning of Exploitation on Gender Basis and Gender Budgeting)
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इकाई चतुर्थ
लिंग परीक्षण (Gender Testing)
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इकाई पंचम
श्रम आधारित कानून व निकाय (Labour Based Laws and Bodies)
यौन उत्पीड़न क्या है?
इस अधिनियम के तहत निम्नलिखित व्यवहार या कृत्य यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है-
व्यवहार या कृत्य- इच्छा के खिलाफ छूना या छूने की कोशिश करना जैसे यदि एक तैराकी कोच छात्रा को तैराकी सिखाने के लिए स्पर्श करता है तो वह यौन उत्पीड़न नहीं कहलाएगा, पर यदि वह पूल के बाहर, क्लास खत्म होने के बाद छात्रा को छूता है और वह असहज महसूस करती है, तो यह यौन उत्पीड़न है। शारीरिक रिश्ता/यौन सम्बन्ध बनाने की मांग करना या उसकी उम्मीद करना जैसे यदि विभाग का प्रमुख, किसी जूनियर को प्रमोशन का प्रलोभन देकर शारीरिक रिश्ता बनाने को कहता है, तो यह यौन उत्पीड़न है।
यौन स्वभाव की (अश्लील) बातें करना जैसे यदि एक वरिष्ठ संपादक एक युवा प्रशिक्षु/जूनियर पत्रकार को यह कहता है कि वह एक सफल पत्रकार बन सकती है क्योंकि वह शारीरिक रूप से आकर्षक है, तो यह यौन उत्पीड़न है।अश्लील तस्वीरें, फिल्में या अन्य सामग्री दिखाना जैसे यदि आपका सहकर्मी आपकी इच्छा के खिलाफ आपको अश्लील वीडियो भेजता है, तो यह यौन उत्पीड़न है।कोई अन्य कर्मी यौन प्रकृति के हों, जो बातचीत द्वारा लिखकर या छूकर किये गए हों।
कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013- सन 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम को पारित किया गया था। जिन संस्थाओं में दस से अधिक लोग काम करते हैं, उन पर यह अधिनियम लागू होता है।
ये अधिनियम 9 दिसम्बर 2013 में प्रभाव में आया था। ये अधिनियम विशाखा केस में दिये गये लगभग सभी दिशा-निर्देशों को अंगीकार करता है और शिकायत समितियों को सबूत जुटाने में सिविल कोर्ट वाली शक्तियां प्रदान की हंै। यदि नियोक्ता अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने में असफल होता है तो उसे 50,000 रुपए से अधिक अर्थदंड भुगतना पड़ेगा। ये अधिनियम अपने क्षेत्र में गैर-संगठित क्षेत्रों जैसे ठेके के व्यवसाय में दैनिक मजदूरी वाले श्रमिक या घरों में काम करने वाली नौकरानियां या आयाएं आदि को भी शामिल करता है।
ये अधिनियम कार्यशील महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न के खतरे का मुकाबला करने के बनाए गए हैं। ये विशाखा फैसले में दिये गये दिशा-निर्देशों को सहेजता है और इसके प्रावधानों का पालन करने के लिये नियोक्ताओं पर एक सांविधिक दायित्व अनिवार्य कर देता है।
हालांकि, इस अधिनियम में कुछ कमियां भी हंै जैसे कि ये यौन उत्पीड़न को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता। बस केवल नागरिक दोष माना जाता है जो सबसे मुख्य कमी है, जब पीड़ित इस कृत्य को अपराध के रुप में दर्ज करने की इच्छा रखती है तब ही केवल इसे एक अपराध के रुप में शिकायत दर्ज की जाती है। इसके साथ ही पीड़ित पर अपने वरिष्ठ पुरुष कर्मचारी द्वारा शिकायत वापस लेने के लिये दबाव डालने की भी संभावनाएं अधिक रहती है।
इस प्रकार, अधिनियम को एक सही कदम कहा जा सकता है लेकिन ये पूरी तरह से दोषरहित नहीं है और इसमें अभी भी सुधार की गुंजाइश है। यहां तक कि अब, पीड़ित को भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत पूरी तरह से न्याय पाने के लिये अपराधिक उपायों को तलाशना पड़ता है। और फिर, अपराधिक शिकायत धारा 354 के अन्तर्गत दर्ज की जाती है जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की विशेष धारा नहीं बल्कि एक सामान्य प्रावधान है।
कानून के अनुसार निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को महिला कर्मचारियों की कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ से सुरक्षा के लिये कानूनी अनिवार्यता के अन्तर्गत लिया गया है लेकिन समस्या इसके लागू करने और इसकी जटिलताओं में है। ये अभी अपने शुरुआती दिनों में है और अधिकांश संगठन, कुछ बड़े संगठनों को छोड़कर, प्रावधान के साथ जुड़े हुए नहीं है, यहां तक कि वो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के लिये बनाये गये कानून क्या है और इसके लिये क्या अर्थदंड है और क्या इसका निवारक तंत्र है, इन सब नियमों और कानूनों को सार्वजनिक करने वाले नियमों को सूत्रबद्ध भी नहीं करता। यहां तक कि वहां आन्तरिक शिकायत समिति भी नहीं है।
यह कानून क्या करता है?कार्यस्थल पर कामकाजी महिलाओं के साथ किए गए यौन उत्पीड़न को यह कानून अवैध मानता है। यह कानून यौन उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों को चिन्हित करता है और यह बताता है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की स्थिति में शिकायत किस प्रकार की जा सकती है।
1.यह कानून हर उस महिला के लिए बना है जिसका किसी भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ हो।
2. इस कानून में यह जरूरी नहीं है कि जिस कार्यस्थल पर महिला का उत्पीड़न हुआ है, वह वहां नौकरी करती हो।
3. कार्यस्थल कोई भी कार्यालय/दफ्तर हो सकता है, चाहे वह निजी संस्थान हो या सरकारी।
कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून (Sexual Harassment at Workplace Act) महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थल की सुनिश्चितता के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून यौन उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा प्रावधान करता है और शिकायतों की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया को निर्धारित करता है।
कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून द्वारा, किसी भी कार्यस्थल में महिला कर्मचारियों के लिए एक यौन उत्पीड़न कमीशन की स्थापना की जाती है, जिसका उद्देश्य उनकी सुरक्षा और सुरक्षितता की सुनिश्चितता है। कमीशन के द्वारा कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न के मामलों की जांच और समाधान किया जाता है। कानून यौन उत्पीड़न के परिप्रेक्ष्य में एक स्पष्ट परिभाषा प्रदान करता है और इसे समाप्त करने के लिए सख्त कार्रवाई का प्रावधान करता है।
कार्यस्थल यौन उत्पीड़न कानून द्वारा सुरक्षा कमीशन के निर्देशानुसार कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और कर्मचारियों को उनके अधिकारों और सुरक्षा के बारे में जागरूक किया जाता है। इसके अलावा, कानून यौन उत्पीड़न के लिए शिकायत प्रक्रिया को संगठित करता है और सुरक्षा के लिए सख्त संज्ञानशीलता और सजगता की मांग करता है।
3. भूमिगत कार्य निषेध क्या है?
भूमिगत कार्य का निषेधः माइंस एक्ट (खान अधिनियम) 1952, सेक्शन 46(1)(बी) जमीन के नीचे के खान के किसी भी भाग में महिला श्रम को प्रतिबंधित करता है।
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